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________________ पञ्चमः सर्गः ११५ सहस्रपत्रसञ्छनाः स्फटिकस्वच्छवारयः । विचित्रमणिसोपाना 'विनक्राद्याः सवेदिकाः ॥६५६॥ अवगाहः पुनस्तासां योजनानां सहस्रकम् । आयामोऽपि च विष्कम्मो जम्बूद्वीपप्रमाणकः ॥६५७॥ नन्दा नन्दवती चान्या वापी नन्दोत्तरा परा । नन्दीघोषा च पूर्वाद्रर्दिश्च प्राच्यादिषु स्थिताः ॥६५८॥ सौधर्मेन्द्रस्य भोग्याद्या द्वितीयैशानमोगिनः । तृतीया चमरेन्द्रस्य चतुर्थी तु बलेरसौ ॥१५॥ विजया बैजयन्ती च जयन्ती चापराजिता । दक्षिणाम्जनशैलस्य दिक्ष पूर्वादिषु क्रमात् ।।६६०॥ शक्रस्य लोकपालाना पूर्वा तु वरुणस्य सा। क्रमाद् यमस्य सोमस्य भोग्या वैश्रवणस्य च ।।६६१।। पाश्चास्याअनशैलस्य पूर्वादिदिगवस्थिताः। अशोका सुपबुद्धा च कुमुदा पुण्डरीकिणी ॥६६२॥ मोग्याद्या वेणुदेवस्य वेणुतारतः परा। धरणस्य तृतीया तु भूतानन्दस्य चोत्तरा ॥६६३॥ उदीच्याम्जनशैलस्य प्राच्याद्या सुप्रभंकरा । सुमनाश्च दिशासु स्यादानन्दा च सुदर्शना ।।६६४॥ ऐशानलोकपालस्य वरुणस्य यमस्य च । सोमस्य च कुबेरस्य मोग्यास्तास्तु यथाक्रमम् ॥६६५।। पञ्चषष्टिसहस्राणि चत्वारिंशच्च पञ्च च । अन्तरं षोडशानां स्यादान्तरं योजनानि तु ॥६६६।। मध्यान्तराणि लक्षका चत्वारि च सहस्रकः । द्वियोजनाधिकानि स्युस्तासां वै षट्शतानि च ॥६६७।। बाह्यान्तराणि कक्षे द्वे त्रयोविंशतिरेव च । सहस्राणि तथैव स्युरेकषष्टया च षट्शती ॥६६८॥ तासां मध्येषु वापीनां जाम्बूनदमयाः स्थिताः । षोडशार्जुन मूर्धानो नाम्ना दधिमुखादयः ॥६६९॥ सहस्रमवगाढास्तु तदेव दशसंगुणम् । पटहा कृतयो व्यस्ता व्यायताश्च समुच्छ्रिताः ।।६७०॥ परितस्ताश्चतस्रोऽपि वापीर्वनचतुष्टयम् । प्रत्येक तत्समायामं तदद्धव्याससंगतम् ॥६७१।। इन पर्वतोंकी चारों दिशाओं में चार चौकोर अविनाशी वापियां हैं ॥६५५॥ ये वापियाँ कमलोंसे आच्छादित हैं, स्फटिकके समान स्वच्छ जलसे युक्त हैं, मगरमच्छादिसे रहित और वेदिकाओंसे युक्त हैं ॥६५६॥ इनकी गहराई एक हजार योजन तथा लम्बाई और चौड़ाई जम्बू द्वीपके बराबर एकएक लाख योजनकी है ।।६५७॥ पूर्व दिशामें जो अंजनगिरि है उसकी पूर्वादि दिशाओं में क्रमसे नन्दा, नन्दवती, नन्दोत्तरा और नन्दीघोषा नामकी वापिकाएँ स्थित हैं ॥६५८॥ इनमें पहली नन्दा नामकी वापी सौधर्मेन्द्रकी, दूसरी नन्दवतो ऐशानेन्द्रकी, तीसरी नन्दोत्तरा चमरेन्द्रकी और चौथी नन्दीघोषा वैरोचनको भोग्य है-क्रीडाका स्थान है ।।६५९।। दक्षिण दिशामें जो अंजनगिरि है उसकी पूर्वादि दिशाओंमें क्रमसे विजया, वैजयन्ती, जयन्ती और अपराजिता ये चार वापिकाएं हैं ॥६६०॥ इनमें-से पहली वापिकामें वरुण, दूसरीमें यम, तीसरीमें सोम, चौथीमें वैश्रवण क्रीड़ा करता है। ये चारों सौधर्मेन्द्रके लोकपाल हैं ॥६६१॥ पश्चिम दिशामें जो अंजनगिरि है उसकी पूर्वादि दिशाओंमें क्रमसे अशोका, सुप्रबुद्धा, कुमुदा और पुण्डरीकिणी ये चार वापिकाएं हैं। इनमें से पहली वापी वेणुदेवकी, दूसरी वेणुतालिकी, तीसरी धरणकी और चौथी भूतानन्दकी क्रीड़ा-भूमि है ॥६६२-६६३।। उत्तर दिशामें जो अंजनगिरि है उसकी पूर्वादि दिशाओं में क्रमसे सुप्रभंकरा, सुमना, आनन्दा और सुदर्शना ये चार वापिकाएँ हैं। इनमें ऐशानेन्द्रके लोकपाल, वरुण, यम, सोम और कुबेर क्रमसे क्रीड़ा करते हैं ।।६६४-६६५।। इन सोलह वापिकाओंका भीतरी अन्तर पैंसठ हजार पैंतालिस योजन है। मध्य अन्तर एक लाख चार हजार छह सौ दो योजन है और बाहरी अन्तर दो लाख तेईस हजार छह सौ इकसठ योजन है ॥६६६-६६८।। उन वापिकाओंके मध्यमें रूपामयो सफेद शिखरोंसे युक्त सुवर्णमय सोलह दधिमुख पर्वत हैं ॥६६९।। ये सभी पर्वत एक-एक हजार योजन गहरे, दश-दश हजार योजन चौड़े, लम्बे तथा ऊँचे एवं ढोलके आकार हैं ॥६७०|| चारों वापिकाओंकी चारों ओर चार वन हैं जो वापिकाओंके समान एक लाख योजन लम्बे और उनसे आधे अर्थात् १. नक्रमकरादिजन्तुरहिताः। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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