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________________ पञ्चमः सर्गः १०७ पटपञ्चाशत्महस्राणि तिस्रो लेक्षा शतद्वयम् । सप्तविंशतिरायामो गन्धमादनविद्यतोः ॥५३३॥ नवपष्टिसहस्राणि लक्षाः पञ्च शतद्वयम् । एकोनषष्टिरायामो माल्यवत्सौमनस्यगः ॥५३४॥ द्वे लक्षे च सहस्राणि योविंशतिरेव च । 'कुलायन्ते कुरुव्यासः शतं पञ्चाशदष्ट च ॥५३५॥ तिस्रो लक्षाः सहस्राणि नवतिः सप्त चाष्ट तु । शतानि सप्त नवतिर्भागा द्वानवतिस्त्वयम् ॥५३६॥ वक्रायामः कुरूणां म्यादामेरोगकुहावलात् । पूर्वाधऽपि च पश्चाई धातकीखण्डमण्डले ॥५३७॥ तिम्रो लक्षाः सहस्राणि एट्पष्टिः पट शतान्ययम् । ऋज्वायामः कुरूणां स्यादशीतिश्चोभयान्तयोः।५३८। प्रतिमेरु विदेहान द्वात्रिंशत्पूर्ववन्मताः । पूर्वे पूर्वविदेहाख्या अपरे वारे स्थिताः ॥५३० ।। पूर्वस्पान्मन्दरापूर्वः कच्छाजनपदोऽवधिः । अपरादपरः सूच्या विजयो गन्धमालिनी ॥५४॥ एकादशव लक्षा हि सा सूचिः पञ्चविंशतिः । सहस्राणि शतं तस्मादष्टापञ्चाशता सह ॥११॥ लक्षाश्चास्याः परिक्षेपः पञ्चत्रिंशकाशितः । द्वापष्टिश्चाष्टपञ्चाशत्सहस्राणि प्रमाणतः ॥५४२॥ पद्मादिगृह्यो सूचीमङ्गलावत्यधिष्टिता । सा पूर्वापरयोमोरन्तराले तु या स्थिता ॥५४३।। लक्षाः षट् च सहस्राणि चतुःसततिरष्ट च । शनानि योजनानां सा द्वाचत्वारिंशता सह ॥५४४॥ एकविंशतिलक्षाश्च चतुस्त्रिशत्सहस्रकैः । त्रिंशदष्टौ पुनस्तस्याः सूच्या परिधिरिष्यते ॥५४५॥ व्यापी विजयविस्तारः सहस्राणि नवात हि । षट्शता त्रितयं च स्यादष्टमागास्वपस्तथा ॥५४६॥ स्वायामः क्षेत्रवक्षारविम सरितां विधा । सदवरमणानां स्यादादिमध्यान्तभेदतः ॥४७॥ कच्छाख्यविजयायामः पशलक्षाः सहस्रकैः । नवमिः पञ्चशत्याद्यः सप्तत्या द्विशतांशकैः ॥५४ ॥ विजयायामवृद्ध्यायी युको मध्योऽस्य जायते । मध्येऽपि च तयायामो युक्तोऽन्त्योऽयादिकेष्वपि॥५४९॥ है ।।५३२।। धातकोखण्डके गन्धमादन और विद्युद् गजदन्त पर्वतोंकी लम्बाई तीन लाख छप्पन हजार दो सौ सत्ताईस योजन है ॥५३३।। तथा माल्यवान् और सौमनस्य गजदन्तोंकी लम्बाई पांच लाख उनहत्तर हजार दो सौ उनसठ योजन है ॥५३४॥ कुलाचलोंके समीप कुरुक्षेत्रका विस्तार दो लाख तेईस हजार एक सौ अंठावन योजन है ।।५३५॥ धातकी खण्ड द्वीपके पूर्वार्ध और पश्चिमाधं दोनों भागोंमें मेरु पर्वतसे लेकर कुलाचलों तक कुरु प्रदेशोंकी वक्र लम्बाई तीन लाख सत्तानब हजार आठ मो सत्तानबे योजन और बानबे भाग है॥५३६-५३७॥ और दोनों ओर सीधी लम्बाई तीन लाख छयासठ हजार छह सौ अस्सी योजन है ॥५३८॥ जिस प्रकार जम्बू द्वोपमें एक मेरु पर्वतके बत्तीस विदेह हैं उसी प्रकार धातकी खण्ड में भी प्रत्येक मेरुकी अपेक्षा बत्तीस-बत्तीस विदेह हैं। इनमें पूर्वको ओर पूर्व विदेह और पश्चिमकी ओर पश्चिम विदेह स्थित हैं ॥५३॥ मेरु पर्वतसे पूर्व में कच्छा नामका देश है और पश्चिममें सुचोसे यक्त गन्धमालिनी । वह सूची ग्यारह लाख पचीस हजार एक सौ अंठावन योजन है ॥५४०-५४१।। इस सूचोको परिधि पैंतीस लाख अंठावन हजार बासठ योजन प्रमाण है ।।५४२।। पद्मा देशको आदि लेकर मंगलावती देश तक वह सूदी ली जाती है जो पूर्व-पश्चिम मेरु पर्वतोंके अन्तरालमें स्थित है ।।५४३॥ यह सूची छह लाख चौहत्तर हजार आठ सौ बयालीस योजन प्रमाण है ।।५४४॥ इस सूचोको परिधिका प्रमाण इक्कीस लाख चौंतीस हजार अड़तीस योजन है ॥५४५।। इसके देशका विस्तार नौ हजार छह सौ तीस योजन तथा एक योजनके आठ भागोंमें तीन भाग प्रमाण है ॥५४६।। क्षेत्र, वक्षारगिरि, विभंगा नदी और देवारण्य इनकी लम्बाई आदि, मध्य और अन्तके भेदसे तीन-तीन प्रकारको है ॥५४७॥ कच्छा देशकी आदि लम्बाई पांच लाख नौ हजार पाँच सौ सत्तर योजन तथा एक योजनके दो सौ बारह भागोंमें दो सौ भाग है ॥५४८॥ इसकी आदि १. कुलाद्यन्ते म. । २. शते म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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