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________________ १०६ हरिवंशपुराणे नव चैव सहस्राणि चतुःशतयुतानि तु । चतुर्णामपि मेरूणां भूमौ विष्कम्भ इष्यते ॥५१६॥ एकोनत्रिंशदेव स्युः सहस्राणि शतानि च । पञ्चविंशति सप्तव परिधिर्वसुधातले ॥५१७॥ सहस्राधं च गत्वोव नन्दनं स्वतिविस्तृतम् । पञ्च पञ्चाशतं पञ्चशती सौमनसं वनम् ॥५१८॥ पाण्डुकं च सहस्राणि गत्वाष्टाविंशतिः पृथु । चतुर्णवतिसंयुक्ता योजनानां चतुःशती ॥५१९॥ शतान्यर्द्धचतुर्थानि सहस्राणि नवापि च । नन्दनै मन्दरस्यायं विष्कम्भः परिभाषितः ॥५२०॥ सप्तषष्टिसहस्रार्द्धमेकोनत्रिंशदेव च । सहस्राणि परिक्षेपो नन्दने मन्दराद् बहिः ॥५२१॥ शतान्यर्द्धचतुर्थानि सहस्राण्यष्ट नन्दनात् । विना मन्दरविष्कम्मः स चाभ्यन्तर ईरितः ॥५२२॥ षड्वंशतिसहस्राणि पञ्चाग्रा च चतुःशती । परिधिर्मन्दरस्यैष नन्दनान्तरगोचरः ॥५२३॥ बाह्यस्त्रीणि सहस्राणि विष्कम्मोऽष्टौ शतानि च । मेरोः सौमनसे सान्तः सहस्रेण विवर्जितः ॥५२४॥ बाह्यस्तस्य सहस्राणि द्वादशैव हि षोडश । मन्दरस्य परिक्षेपो वने सौमनसे स्थितः ॥५२५॥ अष्टौ चैव सहस्राणि तथैवाष्टौ शतानि च । चतुःपञ्चाशदप्यन्तः परिधिस्तस्य तद्वने ॥५२६॥ द्वाषष्टयकं शतं त्रीणि सहस्राणि च पाण्डुके । गव्यूतं साधिकं बोध्यः परिधिभूभृतः ॥५२०॥ नन्दनात् समरुन्द्रोऽद्रिः सहस्राणि दशोपरि । हानिस्तत्र क्रमादेवं वनारसौमनसादपि ॥५२८॥ दशमो दशमो भागो मूलात्प्रभृति हीयते । प्रदेशाङ्गुलहस्तादिश्चतुर्णा मेरुभूभृताम् ॥५२९॥ पुष्करिण्यः शिलाकूटप्रासादाश्चैत्यचूलिकाः । समानाः पञ्चमेरूणां व्यासावगाहनोच्छुयैः ॥५३०॥ शतानि द्वादशैव स्यात्पञ्चविंशति विस्तृतिः । मद्रशालवनस्यैषा धातकोखण्डवर्तिनः ॥५३१॥ लक्षा सप्त सहस्राणि शतान्यष्टौ च दीर्घता। नवसप्ततिरप्यस्य मद्रशालवनस्य तु ॥५३२॥ ___ तथा पृथिवीपरका विस्तार नौ हजार चार सौ योजन है ।। ५१६ ॥ पृथिवीतलपर उनको परिधि उनतीस हजार सात सौ पच्चीस योजन है ॥५१७॥ भूमितलसे पांच सौ योजन ऊपर चलकर अत्यन्त विस्तृत नन्दन वन है तथा पचपन हजार पांच सौ योजन ऊपर सौमनस वन है॥५१८॥ सौमनस वनसे अट्ठाईस हजार चार सौ चौरानबे योजनपर जाकर विशाल पाण्डुक वन है ।।५१९।। नन्दन वनमें मेरुका विस्तार नौ हजार तीन सौ पचास योजन कहा गया है ॥५२०॥ इसी वनमें मेरुकी बाह्य परिधिका विस्तार उनतीस हजार पांच सौ सड़सठ योजन है ।।५२१॥ नन्दन वनको छोड़कर मेरु पर्वतका भीतरी विस्तार आठ हजार तीन सौ पचास योजन है ॥५२२।। मेरु पर्वतको नन्दन वन सम्बन्धी परिधि छब्बीस हजार चार सौ पाँच योजन है ॥५२३।। सौमनस वन में मेरु पर्वतका बाह्य विस्तार तीन हजार आठ सौ योजन है और आभ्यन्तर विस्तार इससे एक हजार योजन कम है ॥५२४।। सौमनस वनमें मेरु पर्वतकी बाह्य परिधि बारह हजार सोलह योजन है ॥५२५ । और आभ्यन्तर परिधि आठ हजार आठ सौ चौवन योजन है ।।५२६।। पाण्डुक वनमें मेरु पर्वतकी परिधि तीन हजार एक सौ बासठ योजन तथा कुछ अधिक एक कोश जानना चाहिए ॥५२७|| ये चारों मेरु पर्वत नन्दन वनसे दश हजार ऊपर तक जो समरुन्द्र हैं अर्थात् समान चौड़ाईवाले हैं और उसके बाद क्रमसे कम-कम होते जाते हैं। यह क्रम सौमनस वनके आगे भी जानना चाहिए। क्रम यह है कि मूलसे लेकर दश हजार योजनको वृद्धि होनेपर अंगुल हस्त तथा योजनका दसवां-दसवां भ कम होता जाता है। अर्थात् दश हजार योजन की ऊंचाईपर एक हजार योजन, दश हाथकी ऊंचाई पर एक हाथ और दश अंगुलकी ऊंचाईपर एक अंगुल विस्तार कम हो जाता है ॥५२८-५२९॥ पांचों मेरुओंकी वापियाँ, शिला, कूट, प्रासाद, चैत्य और चूलिकाएँ, चौड़ाई, गहराई और ऊँचाईकी अपेक्षा एक समान हैं ।।५३०॥ धातकीखण्डके भद्रशाल वनकी चौड़ाई बारह सौ पचीस योजन है ।।५३१।। और इसको लम्बाई एक लाख सात हजार आठ सौ उन्यासी योजन १. भूति विस्तृतं म., ङ. । भूमि- ग. । २. शिलाः कूटः प्रासादा-म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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