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________________ पञ्चमः सर्गः १०५ क्षेत्राणां च भवेच्छेदो द्विशती द्वादशोत्तरा। एकोनविंशतिस्तत्र छेदः पर्वतगोचरः ॥५०॥ द्वादशव सहस्राणि तथा पञ्च शतानि च । एकाशीतिश्च पत्रिंशत्कला मध्यमविस्तृतिः ॥५०२॥ अष्टादश सहस्राणि पञ्चशत्यपि सप्त तु । चत्वारिंशद्बहिर्भागाः पञ्च पञ्चाशता शतम् ॥५०३॥ विष्कम्भत्रितयं ज्ञेयमाविदेहं चतुर्गुणम् । क्रमेण परतो हानिर्यावदैरावतक्षितिः ।।५.४॥ पूर्वस्माद् द्विगुणो व्यासो हिमवत्पूर्वकादिषु । द्वादशस्वपि च द्वीपे तेभ्यः पुष्करनामनि ॥ ०५॥ भूभृतोऽर्द्धतृतीयेषु वृक्षावक्षारवेदिकाः । मेरुवयं विगाहन्ते चतुर्भागं निजोच्छितेः ॥५०६॥ षड्गुणः स्वावगाहस्तु कुण्डानां विस्तृतिर्भवेत् । नदोहदावगाहोऽपि पञ्चाशद्गुणितश्च सा ॥२०७॥ उच्छायश्चैत्यगेहस्य सार्दो ज्ञेयः शताहतः । जम्बूप्रभृतयस्तुल्या महावृक्षा दशापि ते ॥५०॥ नद्यः सरांस्यरण्यानि कुण्डपद्मा नगा हृदाः । अपगाहैः समाः पूर्विस्तारैदिगुणाः परे ॥५०९! चैत्यचैत्यालया ये ते वृषभा नामिपर्वताः । चित्रकूटादरश्चापि तथा काञ्चनकादयः ॥५१०॥ दिशागजेन्द्रकुटानि यथास्वं वेदिकादयः । व्यासावगाहनोच्छायैः सर्वे द्वीपत्रये समाः ॥५३१॥ अर्धयोजनमुद्विद्धं व्यस्तं पञ्चधनुःशतीम् । प्रत्येकं सर्वकूटानां विदितं रत्नतोरणम् ॥५१२॥ अशातिश्च सहस्राणि चत्वारि च समुच्छ्यः । चतुर्णामपि मरूगां परयोझैपयोर्मवेत् ॥५१३।। सहस्रमवगाढाश्च मेदिनी ते तु मेरवः । सहस्राणि नवव्यस्ता मूले पञ्च शतानि च ॥५१४॥ त्रिंशदेव सहस्राणि द्वाचत्वारिंशता सह । तेषामेव विनिर्दिष्टः परिधिमूलगोचरः ॥५१५॥ एक योजनके दो सौ बारह भागों में एक सौ उनतीस भाग प्रमाण है ।।५००॥ धातकीखण्ड द्वीपमें पर्वत रहित क्षेत्रोंके दो सौ बारह खण्ड और पर्वतावरुद्ध क्षेत्रके एक सौ उन्नीरा खण्ड होते हैं ।।१०१॥ भरत क्षेत्रके मध्यम भागका विस्तार गरह हजार पाँच सौ इक्यासी योजन छत्तीस भाग है ॥५०२।। और बाह्य विस्तार अठारह हजार पाँच सौ सैंतालीस योजन एक सौ पचपन भाग है ॥५०३।। यह तीनों प्रकारका विस्तार विदेह क्षेत्र तकके क्षेत्रों में भरत क्षेत्रके विस्तारसे आगे-आगे चौगुना-चौगुना अधिक है और उसके आगे ऐरावत क्षेत्र तक क्रमसे चौगुना-चौगुना कम होता गया है ।।५०४|| धातकीखण्ड द्वीपमें हिमवान् आदि बारहों पर्वतोंका विस्तार जम्बू द्वीपके पर्वतोंसे दूना-दूना है। इसी प्रकार पुष्करवर द्वीपमें भी उनसे दूना-दूना विस्तार है ।।५०५।। अढ़ाई द्वीप में मेरु पर्वतको छोड़कर कुलाचल, वृक्ष, वक्षार पर्वत और वेदिकाओंकी गहराई अपनी ऊंचाईसे चौथा भाग है ॥५०६।। धातकीखण्डके कुण्डोंका विस्तार उनकी गहराईसे छह गुना, और नदी-सरोवरोंका विस्तार उनकी गहराईसे पचास गुना है ।।५०७॥ धातकीखण्डके चैत्यालयोंकी ऊंचाई डेढ़ सौ योजन है और जम्बू आदि दशों महावृक्ष एक समान विस्तारवाले हैं ।।५०८|| नदी, सरोवर, वन, कुण्ड, पद्म, पर्वत और सरोवर गहराईकी अपेक्षा जम्बू द्वीपकी नदी आदिके समान हैं तथा विस्तारको अपेक्षा दूने-दुने हैं ।।५०९।। चैत्य, चैत्यालय, वृषभाचल, नाभिपर्वत, चित्रकूट आदि कांचनगिरि आदि पर्वत, दिग्गजेन्द्रोंके कूट, तथा वेदिका आदि हैं वे सब विस्तार, गहराई तथा ऊँचाईकी अपेक्षा तीनों द्वीपोंमें समान हैं ।।५१०-५११|| धातकीखण्ड में समस्त कूटोंके रत्नमयी तोरण आधा योजन ऊंचे और पांच सौ धनुष चौड़े हैं ।।५१२।। धातकोखण्ड और पुष्कर इन दोनों द्वीपों के वारों मेरु पर्वतोंको ऊँचाई चौरासी हजार योजन है ।।५१३ वे मेरु पर्वत एक हजार योजन नीचे तो पृथिवीमें गहरे हैं और नौ हजार पाँच सौ योजन उनके मूलका विस्तार है ॥५१४|| उनके मूल भागको परिधि तीस हजार बयालीस योजन है ।।५१५।। १. वंसधर विरहिदं खलु जं खेतं हवदि धातकीखण्डे । तस्स दु छेदाणियमा वे चेव सदाणि वाराणि ॥१४।। -ज. प्र. ११ उद्देश्य २. मेरुं वयं म.। ३. परैः म.। १४ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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