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________________ १०४ हरिवंशपुराणे हे सहस्र शतान्यष्टावशीतिरपि चोत्तराः। जम्बूद्वीपसमा भागाः पुष्करद्वीपभाविनः ॥१८॥ द्वीपोऽपि धातकीखण्डः पर्येति लवणोदधिम् । योजनानां चतुर्लक्षविस्तीर्णो वलयाकृतिः ॥१८॥ सूचिरभ्यन्तरा पञ्च-लक्षा नव तु मध्यमा । बाह्या त्रयोदश द्वोपे धातकीखण्डमण्डिते ॥१९॥ परिधिः पूर्वसूच्यास्तु लक्षाः पञ्चदशोदिताः । एकाशीतिसहस्राणि शतं त्रिंशन्नवाधिकम् ॥४९॥ स चाष्टाविंशतिर्लक्षाः मध्यायाः षट्सहस्रकैः । चत्वारिंशरसहस्राणि पञ्चाशद् योजनानि च ॥४९२॥ बाह्यसूच्यास्त्वसौ लक्षाश्चत्वारिंशत्स हैकया । शतानि नव षष्ट्य के सहस्राणि दशापि च ॥४९३॥ पूर्वापरौ महामेरोद्वौं मेरू भवतोऽस्य च । इष्वाकारी विमक्तारौ पर्वतौ दक्षिणोत्तरौ ॥४९४॥ सहस्रयोजनव्यासौ द्वीपव्याससमायतौ। उच्छायेणावगाहेन निषधेन समौ च तौ ॥४९५॥ क्षेत्राणि भरतादीनि सप्त षट कुलपर्वताः । हिमवत्पूर्वका द्वीपे तत्रापि प्रतिमन्दरम् ॥४१६॥ पूर्वैः सहैकनामानः सर्वे नगनदीहृदाः । समोच्छ्रायावगाहाः स्युस्तेभ्यो द्विगुणविस्तृताः ॥४९७॥ अररन्ध्राकृतीन्यङ्कमुखान्यभ्यन्तरे बहिः । क्षुरप्राकृतवन्ति स्युः शैलक्षेत्राणि तानि च ॥४९८॥ लक्षया पर्वतै रुद्धं सहस्राण्यष्टसप्ततिः । द्विचत्वारिंशदष्टौ च शतानि क्षेत्रमत्र च ॥४९९॥ बडु योजनसहस्राणि षट् शतानि चतुर्दश । भरतान्तरविष्कम्मः शतं विशं नवांशकाः ॥५०॥ समुद्रके जम्बू द्वीपके बराबर चौबीस खण्ड हैं। धातको खण्डमें इससे छह गुने-एक सौ चालीस हैं। कालोदधिमें धातकीखण्डके खण्डोंसे सतगुने-छह सौ बहत्तर हैं और पुष्कराधमें कालोदधिके खण्डोंसे चौगुने-दो हजार आठ सौ अस्सी हैं ॥४८६-४८८।। इस प्रकार लवण समुद्रका वर्णन हुआ। अब धातकीखण्डका वर्णन करते हैं चार लाख योजन विस्तारवाला चडीके आकार दसरा धातकीखण्ड दीप भी चारों ओरसे लवणसमुद्रको घेरे हुए है ।।४८९॥ धातकी अर्थात् आंवलेके वक्षोंसे सुशोभित इस धातकीखण्ड द्वीपकी आभ्यन्तर सूची पांच लाख, मध्यम सूची नौ लाख और बाह्य सूची तेरह लाख योजनकी है ।।४९०॥ इनमें पूर्व-आभ्यन्तर सूचीकी परिधि पन्द्रह लाख इक्यासी हजार एक सौ उनतालीस योजन है ।।४९१।। मध्यम सूचीकी परिधि अट्ठाईस लाख छियालीस हजार पचास योजनकी है ।।४२२।। और बाह्य सूचीकी परिधि इकतालीस लाख दश हजार नौ सौ इकसठ योजनकी है ।।४९३।। इस द्वीपमें जम्बू द्वीपके महामेरुसे पूर्व और पश्चिम दिशामें दो मेरु पर्वत हैं तथा दक्षिण और उत्तरके भेदसे दो इष्वाकार पर्वत इसका विभाग करनेवाले हैं ॥४९४|| वे दोनों इष्वाकार पवंत एक हजार योजन चौड़े, द्वीपकी चौड़ाई बराबर चार लाख योजन लम्बे तथा ऊँचाई और गहराईकी अपेक्षा निषध पर्वतके समान ( चार सौ योजन ऊँचे और सौ योजन गहरे । ॥४९५॥ द्वीपके समान इस धातकोखण्डमें भी प्रत्येक मेरुकी अपेक्षा भरतको आदि लेकर सात क्षेत्र तथा हिमवान् आदि छह कुला वल हैं ॥४९६॥ यहाँके समस्त पर्वत, नदी और सरोवर जम्बू द्वीपके पर्वत, नदी और सरोवरके समान नामवाले हैं तथा उन्हींके समान ऊंचाई और गहराईसे युक्त हैं केवल विस्तार उनका दूना-दूना है ॥४९७|| इस द्वीपके पर्वत और क्षेत्र भीतरकी ओर नौ गाड़ीके पहियेमें लगे आरों तथा उनके बीचके अन्तरके समान हैं और बाहरको ओर क्षुराके समान हैं अर्थात् इनका आभ्यन्तर भाग संक्षिप्त और बाह्य भाग विस्तृत है ।।४९८।। इस धातकोखण्ड में एक लाख अठहत्तर हजार आठ सौ बयालोस योजन प्रमाण क्षेत्र पर्वतोसे रुका हआ है ॥४९९|| भरत क्षेत्रका आभ्यन्तर विस्तार छह हजार छह सौ चौदह योजन तथा १. परमन्दर म. । २.-रूध्वं म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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