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________________ पञ्चमः सर्गः १०३ ते पञ्चनवतं मागं 'स्वप्रदेशस्य चाप्लुताः । जलायोजनमुद्विद्धवेदिकापरिवारिताः ॥४७९॥ तेनैव षोडशाभ्यस्तमुपरिष्टाजलावृताः । संकलय्याधरं वोद्ध्वं क्षेत्रं वाच्यं जलावृतम् ॥४०॥ जम्बूद्वीपस्य यावन्तो द्वीपाः निकटवर्तिनः । तावन्तो धातकीखण्ड-द्वीपस्य लवणोदजाः ॥४८१।। अष्टादशकुलास्तेषु पल्यायुष्काः कुमानुषाः । एकोरुगाः गुहावासाः मृष्टमृद्भोजनास्तु ते ॥४८२॥ शेषपुष्पफलाहाराः वृक्षमूलनिवासिनः । एकान्तराशनाः मृत्वा जायन्ते भौमभावनाः ॥४८३॥ जम्बूद्वीपजगत्या च समुद्रजगती समा। अभ्यन्तरे शिलापट्ट बहिस्तु वनमालिका ॥४८४॥ चतुर्गुणस्तु विस्तारो द्वीपस्य जलधेस्तथा । सूची भवेत्रिभिन्यूनः तदन्ते मण्डलेऽखिले ॥४८५॥ विस्ताररहिता सूची चतुासगुणा तु या । तावन्तस्तु भवन्त्यस्य जम्बूद्वीपसमांशकाः ॥४८६॥ स्युश्चतुर्विंशतिर्मागा लवणद्वीपसंमिताः । षड्गुणास्ते परद्वीपे काले सप्तचतुर्गुणाः ॥४८७॥ सौ योजन, विदिशाओं तथा अन्तरदिशाओंके पाँच सौ योजन और पर्वतोंके तटान्तवर्ती द्वीप पचीस योजन विस्तारवाले हैं ॥४७८॥ इनका पंचानबेवां भाग जलमें डूबा है तथा ये एक योजन जलसे ऊपर उठी हुई वेदिकाओंसे घिरे हुए हैं ।।४७९॥ पंचानबेवें भागको सोलहसे गुणा करनेपर गुणित भागोंके बराबर इनके ऊपर-नीचेका क्षेत्र जलसे आवृत कहना चाहिए ॥४८०॥ लवण समुद्रके जितने अन्तर्वीप जम्बूद्वीपके निकटवर्ती हैं उतने ही धातकी खण्डके निकटवर्ती हैं। भावार्थ-दिशाओंमें चार, विदिशाओंमें चार, अन्तरालोंमें आठ और हिमवत् शिखरी तथा दोनों विजयाध पर्वतोंके आठ इस प्रकार चौबीस अन्तर्वीप जम्बूद्वीपके निकटवर्ती लवणसमुद्र में हैं तथा चौबीस धातकीखण्डके निकटवर्ती लवण समुद्रमें। सब मिलाकर लवण समुद्रमें ४८ अन्तर्वीप हैं ॥४८१।। उनमें अठारह कुल कुभोगभूमिया जीवोंकी है और वे एक पल्यकी आयुवाले हैं। एक टांगवाले मनुष्य गुफाओंमें रहते हैं तथा मधुर मिट्टीका भोजन करते हैं ।।४८२।। शेष मनुष्य फूल और फलोंका आहार करते हैं तथा वृक्षोंके नीचे निवास करते हैं। ये सब एक दिनके अन्तरसे भोजन करते हैं और मरकर व्यन्तर तथा भवनवासी देव होते हैं ॥४८३।। लवण समुद्रको जगती ( वेदी) जम्बू द्वीपकी जगतीके समान हैं उसके भीतरी भागमें शिलापट्ट हैं और बाहरी भागमें वन-पंक्तियां हैं ।।४८४॥ किसी भी द्वीप अथवा समुद्रका जितना विस्तार है उसे चौगुना कर उसमें से तीन घटा देनेपर उसके अन्तिम मण्डलकी सूचीका प्रमाण निकलता है ॥४८५।। इस करणसूत्रके अनुसार लवण समुद्रकी सूची पांच लाख है उसमें-से विस्तारके दो लाख घटा देनेपर तीन लाख रहे । उसमें चारका गुणा करनेपर बारह लाख हुए और उसमें विस्तारका प्रमाण जो दो लाख है उसका गुणा करनेपर चौबीस लाख हुए। इस तरह लवण -त्रिलोकसारस्य १. वप्रवेशस्य म. २. इगिगमणे पणणउदिग तुंगो सोलगुणमुवरि कि पयदे । दुगजोगे दीउदयो सदिया जोयणग्गया जलदो ॥९१५॥ ३. भवण वइवाण विन्तर जोइस भवणेसु ताण उप्पत्तो । ण य अण्णु त्थुपपत्ती बोधव्वा होई णियमेण ॥८५।। सम्मइंसणरयणं जेहिं सुगहियं णरेहिं णारीहिं । ते सव्वे मरिऊणं सोहम्माईसु जायंति ॥८६।। ४. दीपस्स समुदस्स य विक्खंभं चहि संगणं णियमा । तिहि सदसहस्स ऊणा सा सूची सव्वकरणेसु ॥९५॥ -जम्बू द्वीप प्रज्ञप्ति, १० उद्देश -ज.प्र., १० उद्देश Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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