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________________ १०२ हरिवंशपुराणे योजनानां तु लौका सहस्राणि च षोडश । अन्तरं पर्वतानां स्यानिजपातालमूर्तिभिः ॥४६॥ नागवेलन्धराधीशा गिरिमस्तकवर्तिषु । वसन्ति नगरेष्वेते नागैर्वेलन्धरैः सह ॥४६५॥ नागानां च सहस्राणि द्विचत्वारिंशदम्बुधौ । लवणाभ्यन्तरां वेलां धारयन्ति नियोगतः ।।४६६॥ द्वासप्ततिसहस्राणि बाह्ये वेला जलाकुलाम् । धारयन्ति सदा नागा जलक्रीडादृढादराः ॥४६७॥ अष्टाविंशतिसंख्यानि सहस्राणि यथायथम् । अग्रोदकमदग्रं तु नागानां धारयन्ति च ॥४६८॥ द्वादशैव सहस्राणि वारिधावपरोत्तरम् । तावस्यव सहस्राणि विस्तृतः सर्वतः समः ॥४६९।। गोतमो नामतो द्वीपो गोतमस्तस्य चामरः । सोऽपि कौस्तुमदेवेन परिवारादिमिः समः ॥४७०।। मास्त्वेकोरुकाः पूर्वे दक्षिणे तु विषाणिनः । लागूलिनोऽपरे च स्युरुत्तरेऽमाषकास्तथा ।।४७१॥ विदिक्षु शशकर्णास्तु चतसृष्वपि भाषिताः । एकोरुकोत्तरापाच्योरश्वसिंहमुखाः क्रमात् ॥४७२॥ शष्कुलीकर्णनामानः पार्श्वयोस्तु विषाणिनाम् । श्वमुखा वानरास्या ये ते लाङगूलिकपार्श्वयोः ॥४३॥ अमाषकान्तयोश्चापि शष्कुलोकर्णमानुषाः । गोमुखा मेषवक्त्राः स्युर्विजया?भयान्तयोः ॥४७४।। हिमवत्प्राक्प्रतीच्योः स्युरुल्काकालमुखा नराः । मेघविद्युन्मुखाः प्राच्यप्रतीच्योः शिखरिश्रुतेः ॥४७५॥ आदर्शगजवक्त्राख्या विजयान्तियोर्मताः । चतुर्विशतिरेव स्युर्तीपाश्चापि तदाश्रयाः ॥१७॥ गत्वा पञ्चशतीं दिक्षु विदिक्ष्वन्तरदिक्षु च । पञ्चाशतं च ते द्वीपाः षट्शती मुखपर्वताः ॥४७॥ दिगाताः शतरुन्द्राः स्युः पञ्चविंशतिमद्विजाः । रुन्द्रा पञ्चशतं द्वीपा विदिश्वन्तरदिक्षु च ॥४७८॥ हैं ।।४६३।। इन पर्वतोंका अपने-अपने पाताल-विवरोंसे एक लाख सोलह हजार योजन अन्तर है ॥४६४।। इन पर्वतोंके ऊपर अनेक नगर बने हुए हैं उनमें वेलन्धर जातिके नागकुमार देवोंके साथ उनके स्वामी निवास करते हैं ॥४६५॥ लवण समुद्र में बयालीस हजार नागकुमार अपने नियोगके अनुसार उसकी आभ्यन्तर वेलाको धारण करते हैं और बहत्तर हजार नागकुमार जलसे भरी बाह्य वेलाको सदा धारण करते हैं। ये नागकुमार जलक्रीडा करने में दृढ़ आदर रखते हैं ॥४६६-४६७।। अट्ठाईस हजार नागकुमार लवण समुद्रकी उन्नत अग्रशिखाको धारण करते हैं ॥४६८|| लवण समुद्रको पश्चिमोत्तर दिशामें बारह योजन दूर चलकर बारह हजार योजन विस्तारवाला एक गोतम नामका द्वीप है। यह द्वीप सब ओरसे सम है तथा गोतम नामका देव उसका अधिष्ठाता है। परिवार आदिकी अपेक्षा गोतम देव कौस्तुभ देवके समान हैं ।।४६९-४७०|| लवण समुद्रकी पूर्व दिशामें एक टांगवाले, दक्षिणमें सींगवाले, पश्चिममें पूंछवाले और उत्तरमें गूंगे मनुष्य रहते हैं ।।४७१।। चारों विदिशाओंमें खरगोशके समान कानवाले मनुष्य कहे गये हैं। एक टांगवालोंको उत्तर और दक्षिण दिशामें क्रमसे घोड़े और सिंहके समान मुखवाले मनुष्य रहते हैं ॥४७२॥ सींगवाले मनुष्योंकी दोनों ओर शष्कुलीके समान कानवाले और पूंछवालोंको दोनों ओर क्रमसे कुत्ते और वानरके समान मुखवाले मनुष्य रहते हैं ॥४७३।। गूंगे मनुष्योंकी दोनों ओर शकूलीके समान कानवाले रहते हैं। विजयाध पर्वतके दोनों किनारोंपर जो कि पूर्व-पश्चिम समुद्रमें निकले हुए हैं क्रमसे गौ और भेड़के समान मुखवाले रहते हैं ।।४७४॥ हिमवत् पर्वतके पूर्व और पश्चिम कोणोंपर क्रमसे उल्कामुख और कृष्णमुख तथा शिखरी पर्वतके पूर्व-पश्चिम कोणोंपर मेघमुख और विद्युन्मुख मनुष्य रहते हैं ।।४७५।। और ऐरावत क्षेत्रमें जो विजया है उसके दोनों कोणोंपर दर्पण तथा हाथोके समान मुखवाले मनुष्य माने गये हैं। इस प्रकार उक्त चौबीस द्वीप ही ऊपर कहे हुए मनुष्योंके आश्रय हैं ॥४७६।। दिशाओं और विदिशाओंके अन्तरद्वीप समुद्रतटसे पाँच सौ योजन, अन्तरदिशाओंके साढ़े पांच सौ योजन और पर्वतोंके कोणवर्ती द्वीप छह सौ योजन आगे चलकर हैं इन द्वीपोंके अग्रभागमें एक-एक पर्वत हैं ॥४७७॥ दिशाओंके द्वीप १. -मुदने ख.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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