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________________ हरिवंशपुराणे पूर्वमानार्द्धमानाश्च तृतीये मण्डले स्थिताः । तत्समानाश्चतुर्थे तु प्रत्येक दिक्चतुष्टये ॥४०॥ चतुर्थेभ्योऽर्द्धहीनाश्च पञ्चमे मण्डले स्थिताः । षष्ठे तु तत्समानस्ते प्रत्येक दिकचतुष्टये ॥४०९॥ लेणवेदिकया तुल्या वेदिका मण्डलद्वये । अर्धाधमाना सा वेद्या मण्डलस्य द्वये द्वये ॥४१०॥ प्रासादे विजयस्यात्र सिंहासनमनुत्तरम् । सचामरसितच्छत्रं तन्न पूर्वमुखोऽमरः ॥११॥ उत्तरस्यां सहस्त्राणि षट् सामानिकसंज्ञिनः । विदिशोश्च पुरः षट् स्युरग्रदेव्यश्च सोसनाः ॥४१२॥ आसनष्टौ सहस्राणि परिषत्पूर्वदक्षिणाः । मध्यमा दर्श बोधव्या दक्षिणस्यां दिशि स्थिताः ॥४१॥ द्वादशव सहस्राणि बाह्या साऽपरदक्षिणाः। आसनेष्वपरस्यां च सप्तसैन्यमहत्तराः ॥४१४॥ अष्टादश सहस्राणि चतुर्दिश्वारमरक्षकाः । मद्रासनानि तेषां च दिक्ष तावन्ति तासु च ॥४१५॥ अष्टादश सहस्राणि देवाश्च परिवारिकाः। विजयः सेव्यमानस्तैः पल्यं जीवति साधिकम् ॥४१६॥ विजयादुत्तराशायां सुधर्माख्या तु तस्सभा । दीर्घा षड् विस्तृता त्रीणि नवोच्चैः क्रोशगाहिनी ॥४१७॥ ततोऽप्युत्तरदिग्भागे तावन्मानो जिनालयः । अपरोत्तरतश्चास्मादुपपाश्र्वा सभा भवेत् ॥४१॥ अभिषेकसभा तपागलङ्कारसमाप्यतः । व्यवसायसमा तस्मात् संसमानाः सुधर्मया ॥४१९॥ पञ्चैव च सहस्राणि चत्वारोऽपि शतानि च । सप्तषष्टिश्च ते सर्व प्रासादा विजयास्पदे ॥४२०॥ बहिर्विजयपुर्यास्तु पञ्चविंशतियोजनीम् । गत्वा वनानि चत्वारि स्युः प्राच्या दिक्चतुष्टये ॥४२१॥ देदीप्यमान भवन बने हुए हैं ।।४०७।। तोसरे मण्डलमें भी इसी प्रकार भवनोंको रचना है परन्तु उनका प्रमाण पूर्व प्रमाणसे आधा है। चौथे मण्डलकी चारों दिशाओंमें जो भवन-रचना है वह तीसरे मण्डलको भवन-रचनाके समान है ।।४०८|| पांचवें मण्डलमें जो भवन हैं वे चौथे मण्डलके भवनोंसे अर्ध प्रमाण हैं और छठे मण्डलके भवन पांचवें मण्डलके भवनोंके समान हैं ।।४०९|| आदिके दो मण्डलोंमें उत्पत्ति स्थानको वेदिकाके तुल्य वेदिका है और उसके आगे दो-दो मण्डलोंकी वेदिकाएँ पूर्व-पूर्व वेदिकाके प्रमाणसे आधी-आधी विस्तारवाली जानना चाहिए ॥४१०॥ बीचके भवन में चमर और सफेद छत्रोंसे युक्त विजयदेवका उत्तम सिंहासन है। उसपर वह विजयदेव पूर्वाभिमुख होकर बैठता है ॥४१३॥ उसको उत्तर दिशामें छह हजार सामानिक देव बैठते हैं । तथा आगे और दो दिशाओंमें छह पट्टदेवियां आसन ग्रहण करती हैं ।।४१२।। पूर्व-दक्षिणआग्नेय दिशामें आठ हजार उत्तम पारिषद देव बैठते हैं। मध्यम परिषद्के दश हजार देव दक्षिण दिशामें स्थित होते हैं। बाह्य परिषद्के बारह हजार देव, पश्चिम-दक्षिण-नैऋत्य दिशामें आसनारूढ़ होते हैं और सात सेनाओंके महत्तर देव पश्चिम दिशामें आसन ग्रहण करते हैं ।।४१३-४१४|| चारों दिशाओंमें अठारह हजार अंग-रक्षक रहते हैं और चारों दिशाओंमें उतने ही उनके भद्रासन हैं ॥४१५|| विजयदेवके अठारह हजार परिवार देव हैं। इन सबके द्वारा सेवित होता हुआ वह कुछ अधिक एक पल्य तक जीवित रहता है ।।४१६|| विजयदेवके भवनसे उत्तर दिशामें एक सुधर्मा नामकी सभा है जो छह योजन लम्बी, तीन योजन चौड़ी, नौ योजन ऊंची और एक कोश गहरी है ॥४१७।। सुधर्मा सभासे उत्तर दिशामें एक जिनालय है जिसकी लम्बाईचौड़ाई आदिका विस्तार सुधर्मा सभाके समान है। पश्चिमोत्तर दिशामें उपपाश्वं सभा है ॥४१८।। उसके आगे अभिषेक सभा, उसके आगे अलंकार सभा, और उसके आगे व्यवसाय सभा है । ये सब सभाएं सुधर्मा सभाके समान हैं ॥४१९॥ विजयदेवके नगरमें सब मिलाकर पांच हजार चार सौ सड़सठ भवन हैं ॥४२०।। विजयदेवके नगरसे बाहर पचीस योजन चलकर पूर्वादि दिशाओंमें चार वन १. विदिशोऽस्य म.। २. आसनैः सह विद्यमाना सासनाः म.। विदिशि षट महादेवीनामासनानि । ३. दशसहस्राणि । ४. सेव्यमानस्तैः म.। ५. जीवन्ति म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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