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________________ ९० हरिवंशपुराणे ईषदून परिक्षेपः सहस्राणि दश स्मृतः । त्रिंशत्येकोनपञ्चाशत्त्रयश्चैकादशांश काः ॥ २९९ ॥ स्यात् पत्रिंशत्सहस्राणि गत्वादौ पाण्डुकं वनम् । चतुर्नवतिसंयुक्ता तद्विस्तारश्चतुःशती ॥ ३००॥ द्विषष्टियोजननान्यत्र सहस्रत्रितयं शतम् । गव्यूतं साधिकं मेरोः परिधिः परिकीर्तितः ॥ ३०१ ॥ चत्वारिंशत्तमुद्दिद्धा मूर्ध्नि वैडूर्यचूलिका । मूलमध्यान्तविस्तारैर्द्वादशाष्टचतुर्विधा ॥ ३०२ ॥ त्रिंशद् भवेन्मूले मध्ये स्यात् पञ्चविंशतिः । चूलिकायाः परिक्षेपो द्वादशा च साधिकाः ॥ ३०३॥ पार्थिवाः पट्परिक्षेपाइचूलिकायाः प्रभृत्यधः । एकादशप्रकारोऽन्यः सप्तमोऽपि वनैः कृतः ॥ ३०४।। लोहिताक्षमयः पूर्वः पद्मरागमयः परः । तथा वज्रमयः सर्वरत्नो वैडूर्यविग्रहः ॥ ३०५ ॥ हरितालमयः षष्टस्तेषां प्रत्येकमिष्यते । पञ्चशत्यपि विस्तारः सहस्राण्यपि षोडश ॥ ३०६ ॥ भद्र लवनं भूमौ मानुषोत्तरमेव च । सदेवनागभूतानां रमणानि वनानि च ॥ ३०७ ॥ परिक्षेपो वनं चान्यन्नन्दनं चोपनन्दनम् । वनं सौमनसं चान्यदुपसौमनसं तथा ॥ ३०८ ॥ पाण्डुकं दशमं प्रोक्तमुपपाण्डुकमन्त्यजम् । मेरोरेकादश ज्ञेयाः परिक्षेपाः परीक्षकैः ॥ ३०९ ॥ देशेष्वेकादशानां तु पूरणेषु हि मन्दरः । मौलविष्कम्मभागानामेकैकेन प्रहीयते ।। ३१० ॥ सर्वत्राङ्गुलमानादौ यावद् योजनमानकम् | हानिवृद्धी इति ग्राह्ये मेरुविस्तारगोचरे ॥ ३११॥ पर्वतकी भीतरी परिधि दश हजार तीन सौ उनचास योजन तथा एक योजनके ग्यारह भागोंमें तीन भाग प्रमाण है || २९९ || यहाँसे छत्तीस हजार योजन ऊपर चलकर पर्वतके ऊपर चौथा पाण्डुक वन है, यहाँ पर्वत चार सौ चौरानबे योजन चौड़ा है || ३०० || यहाँ पर्वत की परिधि तीन हजार एक सौ बास योजन कुछ अधिक एक कोश है ।। ३०१ ॥ मेरु पर्वत के मस्तकपर चालीस योजन ऊंची वैडूर्य मणिमयी चूलिका है । यह चूलिका मूलमें बारह योजन, मध्यमें आठ योजन और अन्तमें चार योजन चौड़ी है || ३०२ || चूलिकाको परिधि मूलमें सैंतीस योजन, मध्यमें पचीस योजन और अग्र भाग में कुछ अधिक बारह योजन है || ३०३ || मेरु पर्वतकी चूलिकासे लेकर नीचे तक १ लोहिताक्षमय, २ पद्मरागमय, ३ वज्रमय, ४ सर्वरत्नमय, ५ वैडूर्यमय और ६ हरितालमय ये छह पृथिवीकाय रूप परिधियाँ हैं । इन परिधियोंमें प्रत्येकका विस्तार सोलह हजार पाँच सौ योजन है। इनके सिवाय वनोंके द्वारा की हुई एक सातवीं परिधि और भी है। तथा उसके नीचे लिखे अनुसार ग्यारह भाग परीक्षकोंके द्वारा जानने योग्य हैं - १ भद्रशाल वन, २ मानुषोत्तर, ३ देवरमण, ४ नागरमण, ५ भूतरमण, ६ नन्दन, ७ उपनन्दन, ८ सौमनस, ९ उपसौमनस, १० पाण्डुक और ११ उपपाण्डुक | इनमें से पृथिवीपर जो भद्रशाल वन है उसमें भद्रशाल, मानुषोत्तर, देवरमण, नागरमण और भूतरण ये पाँच वन हैं। उससे ऊपर चलकर नन्दन वनमें नन्दन और उपनन्दन, सौमनस वन में सौमनस और उपसौमनस तथा पाण्डुक वनमें पाण्डुक और उपाण्डुक वन हैं ||३०४-३०९ || इन भागो में यदि ग्यारह भाग मेरुपर चढ़ा जाये तो वहाँ मूल भागकी चौड़ाईसे एक भाग कम चौड़ाई हो जाती है । इसी प्रकार सब जगह योजन पर्यन्त अंगुल हाथ आदि प्रमाणों में भी मेरुके विस्तार में हानि तथा वृद्धि समझना चाहिए। भावार्थ - ऊपर जो ग्यारह भाग बतलाये हैं उनमें प्रथम भागसे यदि ग्यारह योजन ऊंचा चढ़ा जाये तो मेरुकी चौड़ाई मूलभागकी चौड़ाईसे एक योजन कम हो जाती है और यदि ग्यारह हाथ या ग्यारह अंगुल चढ़ा जाये तो वहाँ की चौड़ाई मूलभागकी चौड़ाईसे एक हाथ या एक अंगुल कम हो जाती है 1 इसी प्रकार यदि ऊपरसे नीचेकी ओर आया ★ मेरु पर्वत निन्यानबे हजार योजन ऊंचा है। उसके सोलह हजार पाँच सौ योजन २ विस्तारवाले ६ खण्ड चूलिकासे लेकर नीचे तक हैं । उनकी रचना लोहिताक्ष आदि मणियोंकी है इसलिए उनके नाम भी उन्हींके अनुसार प्रतिपादन किये गये हैं । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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