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________________ पञ्चमः सर्गः द्वाविंशति सहस्रे द्वे शतानि नव विस्तृताः । योजनानि पुनस्तेषां वेदिका भद्रशालवत् ॥२८२॥ विदेहक्षेत्रमध्यस्थः कुरुक्षेत्रद्वयावधिः । योजनानां सहस्राणि नवतिर्नव चोद्धतः ॥२८३॥ मेखलात्रयसंयुक्तः ख्यातो मेरुमहीधरः । ऊर्ध्व चूलिकयोद्भासी सचत्वारिंशदुच्चयः ॥२८॥ सहस्रमवगाहोऽस्य सहस्राणि दशाऽत्र च । विष्कम्भो नवतिश्च स्याद् दशैकादशमागकाः ॥२८५॥ सैकास्त्रिंशत्सहस्राणि शतानि नव वै दश । योजनानि तथा भागौ साधिको परिधिगिरेः ॥२८६॥ तलात् सहस्रमुद्गस्य सहस्राणि दशोपरि । योजनानि स विष्कम्भो भूमौ भवति भूभृतः ॥२८॥ सैकस्त्रिंशसहस्राणि षट्शती विंशतिद्वयम् । योजनानि त्रयः क्रोशाः शते द्वादश दण्डकाः ॥२४॥ हस्तास्त्रयस्तथैव स्यादङ्गलानि त्रयोदश । साधिकानि परिक्षेपो भद्रशालेऽद्रिगोचरः ॥२८९॥ गत्वा पञ्चशतीमूव मेखलायां तु नन्दनः । स्यात्पञ्चशत विष्कम्मं मन्दरं परितो वनम् ।।२९०॥ नव तत्र सहस्राणि शतानि नव षट्कलाः । चतुःपञ्चाशदप्यस्य विष्कम्भः पुष्कलो गिरेः ॥२९॥ एकत्रिंशत्सहस्राणि तथा तत्र चतुःशती । गिरेबर्बाह्यपरिक्षेपः साधिका नवसप्ततिः ॥२९॥ स एव च सहस्रोनो विष्कम्मोऽभ्यन्तरः स्फुटः । नन्दने मन्दरस्य स्यात् परिक्षेपोऽपि वक्ष्यते ॥२९३॥ अष्टाविंशतिरेष स्यात् सहस्राणि शतत्रयम् । षोडशाग्राः कलाश्चाष्टौ परिधिः साधिका गिरेः ॥२९॥ सहस्राणि द्विषष्टिं च गत्वा पञ्चशतीं ततः । नन्दनेन समानं तद् वनं सौमनसं भवेत् ॥२९५॥ चत्वारि च सहस्राणि शते द्वे च द्विसप्ततिः । अष्टौ भागाश्च विष्कम्मो बाह्यस्तत्र भवेद् गिरेः ॥२९६॥ परिक्षेपः पुनस्तस्य सहस्राणि त्रयोदश । शतं पञ्चतयं ज्ञेयमेकादश च षट कलाः ॥२९७।। बाह्यो यो गिरिविष्कम्भः सहस्रेण स वर्जितः । स्वादभ्यन्तरविष्कम्भस्तस्येति मुनयो विदुः ॥२९८॥ तथा समुद्र तटसे मिले हुए चार देवारण्य [ दो देवारण्य, दो भूतारण्य ] वनके प्रदेश हैं ॥२८१।। इन वनोंकी वेदिकाएं भद्रशाल वनके समान बाईस हजार दो सौ नो योजन विस्तृत हैं ।।२८२।। विदेह क्षेत्रके मध्य में प्रसिद्ध मेरु पर्वत स्थित है, उसकी सीमा देवकुरु और उत्तरकुरु तक फैली हुई है, वह निन्यानबे हजार योजन ऊंचा है, तीन मेखलाओंसे युक्त है, चालीस योजन ऊंची चूलिकासे सुशोभित है, उसकी गहराई एक हजार योजन है और पृथिवी तलपर चौड़ाई दश हजार नब्बे योजन तथा एक योजनके ग्यारह भागोंमें दश भाग प्रमाण है ॥२८३-२८५।। उसकी परिधि इकतीस हजार नौ सौ दश योजन तथा कुछ अधिक दो भाग प्रमाण है ।।२८६॥ तल भागसे एक हजार योजन ऊपर चलकर पृथिवीपर इस पर्वतकी चौड़ाई दश हजार योजन है ॥२८७।। भद्रशाल वनके समीप इसकी परिधि इकतीस हजार छह सौ बाईस योजन तीन कोश बारह धनुष तीन हाथ और कुछ अधिक तेरह अंगुल है ।।२८८-२८९|| भद्रशाल वनसे पांच सौ योजन ऊपर चलकर मेरु पर्वतको चारों ओर मेखलापर पांच सौ योजन चौड़ा दूसरा नन्दन वन है॥२९०|| वहाँ इस पर्वतकी चौडाई नौ हजार नौ सौ चौवन योजन छह कला है ॥२२१॥ नन्दन वनके समीप इस पर्वतकी बाह्य परिधि इकतीस हजार चार सौ उन्यासी योजनसे कुछ अधिक है ॥२९२।। भीतरी चौड़ाई आठ हजार नौ सौ चौवन योजन छह कला है। अब इसकी अभ्यन्तर परिधि कहते हैं ॥२९३।। नन्दन वनके समीप मेरुकी अभ्यन्तर परिधि अट्ठाईस हजार तीन सौ सोलह योजन तथा कुछ अधिक आठ कला है ।।२९४॥ नन्दन वनसे साढ़े बासठ हजार योजन ऊपर चलकर तीसरा सौमनस वन है। यह वन नन्दन वनके ही समान है ॥२९५॥ सौमनस वनमें पर्वतको बाह्य चौड़ाई चार हजार दो सौ बहत्तर योजन आठ कला है ॥२९६।। और बाह्य परिधि तेरह हजार पांच सौ ग्यारह योजन छह कला है ॥२९७|| पर्वतकी जो बाह्य चौड़ाई बतलायी है उसमें एक हजार योजन कम करनेपर भीतरी चौड़ाई निकलती है ऐसा मुनिगण कहते हैं ॥२९८।। १. चोच्छ्रिता म.। १२ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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