SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 126
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ हरिवंशपुराणे गङ्गासिन्धू प्रतिक्षेत्रं कच्छादौ नीलतः सुते । सीतां प्रविशतोऽतीत्य विजयार्द्धगुहाद्वयम् ।।२६७॥ गिरिव्याससमायामे योजनाष्टकमुच्छिते । गुहे द्वादशविस्तारे द्वे द्वे स्यातां गिरौ गिरौ ॥२६॥ नद्यः षोडश गङ्गायाः समा भरतगङ्गया। ता रक्तारक्तवत्योस्तु तावन्त्यो निषधसूताः ॥२६९॥ निषधधान्नीलतस्तावत्संख्यास्तनामिकाः श्रुताः । नद्योऽपरविदेहेषु सीतोदां तु वजन्ति ताः ॥२७॥ नाम्ना साधारणेनोक्तास्ता एता रतिनिम्नगाः । चतुर्दशसहस्रेस्तु प्रत्येकं सरितां युताः ॥२७॥ अशीतिश्चापि चत्वारि सहस्राणि कुरुद्वये । प्रत्येक निम्नगा नद्यारधमर्धतटहये ।।२७२।। पञ्चलक्षाः सहस्राणि द्वात्रिंशस्त्रिंशदष्टभिः । प्रत्येकमुभयो द्यः सीतासीतोदयोयुताः ॥२७३॥ दशलक्षाः चतुःषष्टिसहस्राण्यष्टसप्ततिः । सर्वा एवापगाः प्रोका पूर्वापरविदेहयोः ।।२७४।। चतुर्दशसहस्राणि प्रत्येकं सरितो मताः । गङ्गासिन्ध्वोः पतन्त्यस्ताः रक्तारकोदयोश्च ताः ॥२३५॥ रोह्यायां रोहितास्यायां सहस्राणि पतन्ति ताः । सुवर्णरूप्यकलयोरष्टाविंशतिरेकशः ।।२७६।। षटपञ्चाशस्सहस्राणि ता हरिद्धरिकान्तयोः । पतन्ति सिन्धवो यद्वत् सनारीनरकान्तयोः ॥२७॥ संगताश्च समस्तास्ता गङ्गासिन्ध्वादिसिन्धवः । तिस्रो लक्षा नवत्या द्वे सहत्रे द्वादशापि च ॥२७८।। स्युश्चतुर्दशलक्षास्तु वैदेह्यस्ताश्च संख्यया । षट्पञ्चाशत्सहस्राणि नवतिश्च समुद्रगाः ॥२७९॥ द्वीपेऽस्मिन् काञ्चनैस्तुल्या वैडूर्यमयमूर्तयः । चतुस्त्रिंशत्सुरैः सेव्या वृपैर्वृषभपर्वताः ।।२८०॥ पूर्वापरविदेहान्ताः समुद्र तटसंगताः । देवारण्यवनामोगाश्चत्वारः सरितोस्तटे ॥२८॥ कच्छा आदि प्रत्येक क्षेत्रमें गंगा-सिन्धु नामकी दो नदियाँ हैं जो नील पवंतसे निकलकर विजयाध पर्वतको दोनों गुफाओंको उल्लंघन करतो हुई सीता नदीमें प्रवेश करती हैं ।।२६७।। प्रत्येक विजयाधं पर्वतमें उसकी चौड़ाईके समान लम्बी, आठ योजन ऊँची और बारह योजन चौड़ी दो-दो गुफाएँ हैं ॥२६८|| ये गंगा आदि सोलह नदियाँ, भरत क्षेत्रकी गंगा नदोके समान हैं। इसी प्रकार निषधाचलसे निकली हुई सोलह रक्ता, रक्तोदा नदियाँ भी ऐरावतकी रक्ता-रक्तोदाके समान हैं ॥२६९।। पश्चिम विदेह क्षेत्रमें भी इसी प्रकार गंगा, सिन्धु और रक्ता-रक्तोदा नामको सोलहसोलह नदियां निषधाचल और नीलाचलसे निकलकर सोतोदा नदीकी ओर जाती हैं ।।२७०|| समान नामसे जिनका कथन किया गया है ऐसी ये समस्त नदियाँ अत्यन्त प्रीतिको बढ़ाने वाली हैं तथा प्रत्येक नदियाँ चौदह हजार नदियोंसे युक्त हैं ।।२७१।। सीता और सीतोदा नदियोंका परिवार देवकुरु और उत्तरकुरुमें चोरासी हजार नदियोंका है। दोनों नदियों में प्रत्येक नदोके तटसे व्यालोस हजार नदियोंका प्रवेश होता है ।।२७२।। सीता, सीतोदा नामक उक्त नदियों में से प्रत्येक नदीमें पाँच लाख बत्तीस हजार अड़तीस नदियाँ मिली हैं ।।२७३।। पूर्व और पश्चिम विदेहमें इन समस्त नदियोंका प्रमाण दश लाख चौंसठ हजार अठहत्तर कहा गया है ।।२७४।। गंगा, सिन्धु एवं रक्तारक्तोदा नदियोंमें प्रत्येकका परिवार चौदह-चौदह हजार नदियोंका है ।।२७५।। रोह्या, रोहितास्या और सुवर्णकूला, रूप्यकूलामें प्रत्येकका अट्ठाईम-अट्ठाईस हजार नदियोंका परिवार है ।।२७६।। हरित्, हरिकान्ता और नारो, नरकान्तामें प्रत्येक नदीका परिवार छप्पन हजार नदियोंका है ।।२७७॥ विदेह क्षेत्रको छोड़ अन्य क्षेत्रोंको गंगा, सिन्धु आदि नदियोंको समस्त परिवार-नदियाँ मिलकर तीन लाख बानबे हजार बारह हैं ॥२१८|| विदेह क्षेत्रको समुद्र तक जानेवाली समस्त नदियोंको संख्या चौदह लाख छप्पन हजार नब्बे है ॥२७९।। ____ जम्बू द्वीपमें कांचन कूटोंके समान वैडूर्य मणिमय तथा श्रेष्ठ देवोंके द्वारा सेवनोय चौंतीस वृषभाचल हैं ।।२८०॥ सीता और सोतोदा दोनों नदियोंके तटपर पूर्व-पश्चिम विहार्यन्त लम्बे १. निर्गते । श्रुते म. । २. एवाराति-म., क. । ३. प्रधानदेवः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy