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________________ पञ्चमः सर्गः ८७ सहस्रद्वितयं तेषां द्विशती च त्रयोदश । योजनाष्टमभागोना सा पूर्वापरविस्तृतिः ॥२५॥ नदीविस्तारहीनस्य विदेहस्यार्धविस्तृतिः । आयामो देशवक्षारविमङ्गसरितामसौ ॥२५॥ तद्देशविस्तरायामास्तन्मध्ये रजतादयः । द्वात्रिंशद्धारतेनामी समाना नवकूटकाः ॥२५५।। श्रेण्योः स्युनंगराण्येषां पञ्चपञ्चाशदेकशः । विद्याधराः वसन्त्येष परे द्वीपतये यथा ॥२५६॥ क्षेमा क्षेमपुरी ख्याता रिष्टा रिटपुरी परा । खड्गा मञ्जूषया सार्द्धमौषधी पुण्डरीकिणी ॥२५७॥ कच्छादिषु यथासंख्यमष्टास्वष्टाविमाः पुरः । राजधान्यः समादिष्टाः शलाकापुरुषोद्भवाः ॥२५८॥ सुसीमा कुण्डलामिख्या पुरी चान्या पराजिता । प्रमङ्करा चतुर्थी तु 'पञ्चम्यङ्कावतीरिता ॥२५९।। पद्मावती शुभाभिख्या साष्टमी रस्नसंचया। राजधान्यस्त्विमा मान्या वरसादिष यथाक्रमम् ॥२६॥ तथैवाश्वपुरो ज्ञेया परा सिंहपुरीति च । महापुरी तथैवान्या विजया च पुरी पुनः ॥२६॥ अरजा विरजा वासावशोका व तशोकया । राजधान्यः प्रसिद्धास्ताः पद्मादिषु यथाक्रमम् ॥२६२॥ विजया वैजयन्तो च जयन्तो चाऽपराजिता । चक्रा खड्गा च वप्रादिष्वयोध्यावध्यया समम् ॥२६३॥ दक्षिणोत्तरतो दैात् पुर्यों द्वादशयोजनाः। नवयोजन विस्तारा हेमप्राकारतोरणाः ॥२६॥ अल्पैः पञ्चशतैरैर्वृहद्भिस्ताः सहस्रकैः । रत्नचित्रकपाटाव्यर्दभ्रः सप्तशतैर्युताः ॥२६५॥ द्वादश स्युः सहस्राणि रथ्यानां तु यथायथम् । सहस्रं तु चतुष्काणां नगरीष्वक्षयारमसु ॥२६६॥ है ॥२५१-२५२।। इन सबका पूर्वापर विस्तार योजनके आठ भागोंमें से एक भाग कम दो हजार दो सौ तेरह योजन है ॥२५३॥ समस्त विदेह क्षेत्रके विस्तारमें-से नदीका विस्तार घटा देनेपर जो शेष रहे उसका आधा भाग किया जाये। यही देश, वक्षारगिरि और विभंगा नदियोंको लम्बाई है। भावार्थ-समस्त विदेह क्षेत्रका विस्तार तैंतीस हजार छह सौ चौरासी योजन चार कला है. उसमें सोता नदीका पाँच सौ योजनका विस्तार घटा देनेपर तैंतीस हजार एक सौ चौरासी योजन चार कलाका विस्तार शेष रहता है। इसका आधा करनेपर सोलह हजार पांच सौ बानबे योजन दो कला क्षेत्र बचता है। यही कच्छा आदि देश वक्षार गिरि ओर विभंगा नदियोंकी लम्बाईका है ॥२५४॥ इन बत्तीस विदेहोंमें बत्तीस विजयाध पर्वत हैं। इनकी लम्बाई कच्छादि देशोंकी चौड़ाईके समान है अर्थात् ये कूलाचलसे लेकर नदी तक लम्बे हैं। प्रत्येक विजयाधंपर नौ-नौ कट हैं और इन सबका वर्णन भरत क्षेत्रके विजयाधंके समान है ।।२५५।। इन विजयाओंकी दो-दो श्रेणियाँ हैं, प्रत्येक श्रेणीमें पचपन-पचपन नगर हैं और उन नगरोंमें भरत तथा ऐरावत क्षेत्रके समान विद्याधर निवास करते हैं ।।२५६।। १ क्षेमा, २ क्षेमपुरी, ३ रिष्टा, ४ रिष्टपुरी, ५ खड्गा, ६ मंजूषा, ७ औषधी और ८ पुण्डरीकिणी ये आठ नगरियाँ क्रमसे कच्छा आदि देशोंकी राजधानियाँ कही गयी हैं। इनमें शलाका पुरुषोंको उत्पत्ति होती है ॥२५७-२५८|| १ सुसीमा, २ कुण्डला, ३ अपराजिता, ४ प्रभंकरा, ५ अंकावती, ६ पद्मावती, ७ शुभा और ८ रत्नसंचया ये आठ क्रमसे वत्सा आदि देशोंकी राजधानियां जानना चाहिए ॥२५९-२६०।। १ अश्वपुरो, २ सिंहपुरी, ३ महापुरी, ४ विजयापुरी, ५ अरजा, ६ विरजा, ७ अशोका और ८ वीतशोका ये आठ नगरियां क्रमसे पद्मा आदि देशोंकी राजधानियां प्रसिद्ध हैं ।।२६१-२६२।। १ विजया, २ वैजयन्ती, ३ जयन्ती, ४ अपराजिता, ५ चक्रा, ६ खड्गा, ७ अयोध्या और ८ अवध्या ये आठ वप्रा आदि देशोंको राजधानियाँ हैं। ये सभी नगरियाँ दक्षिणोत्तर दिशामें बारह योजन लम्बी हैं, पूर्व-पश्चिममें नौ योजन चौड़ी हैं, सुवर्णमयो कोट और तोरणोंसे युक्त हैं। रत्तमयी चित्र-विचित्र किवाड़ोंसे युक्त पांच सौ छोटे और एक हजार बड़े दरवाजों तथा सात सौ झरोखोंसे सहित हैं ॥२६३-२५॥ इन अविनाशी नगरियोंमें बारह हजार गलियां और एक हजार चौक हैं ॥२६६।। १. पञ्चम्यङ्कवती म.। २. वक्रा म.। ३. गवाक्षः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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