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________________ पञ्चमः सर्गः उच्छ्रायोऽपि हि सर्वेषां कूटानां च यथायथम्। आत्माधारावगाहस्य समानस्तु प्रभाषितः॥२२४ सिद्धायतनकूटेषु तेषु सर्वेषु ये गृहाः । सिद्धबिम्बसनाथास्ते विभ्राजन्ते यथायथम् ॥२२५॥ शेषोभयान्तकूटेषु रमन्ते व्यन्तरामराः । मध्ये च दिक्कुमार्यस्तु क्रीडागारेषु चारुषु ।।२२६॥ . मोगरा भोगवती सुभोगा मोगमालिनी । वत्समित्रा सुमित्राऽन्या वारिषेणा चलावती ॥२२॥ विदेहे चित्रकूटाख्यः पद्मकूटश्च पर्वतः । नलिनश्चैकशैलश्च नीलसीतान्तरायताः ॥२२८॥ पूर्वाधास्तु टश्च शैलो चैश्रवणोऽञ्जनः । आत्माजनश्च सर्वेऽपि ते सीतानिषधस्पृशः ॥२२९॥ श्रद्धावान् सुप्रसिद्धोऽद्रिर्विजयावांस्तथैव च । आशीविषस्तदन्यस्तु सुखावह इतीरितः ॥२३०॥ विदेहेष्वपरेष्वेते चरवारो देशभेदकाः । स्वायामेन प्रसिद्धेन सीतोदानिषधस्पृशः ॥२३॥ चन्द्रसूर्यौ च मालास्तौ नागमालस्तथाचलः । मेघमालश्च ते मध्ये नीलसीतोदयोः स्थिताः ॥२३॥ सरित्तटेषु चोच्छायस्तेषां वक्षारभूभृताम् । शतानि पञ्चशेषं तु पूर्ववक्षारवर्णितम् ॥२३३॥ प्रत्येकं षोडशस्वेषु मूर्ध्नि कूटचतुष्टयम् । कुलाचलान्तकूटेषु दिक्कुमार्यो वसन्ति ताः ॥२३॥ नदीसमीपकूटेषु जिनेन्द्रायतनानि तु । तथा मध्यमकूटेषु व्यन्तराक्रीडनालयाः ॥२३५॥ भद्रशालवन मेरोः पूर्वापरदिगायतम् । नानादुमलताकीर्ण वर्णनीयं यथाक्रमम् ॥२३६॥ आयामो मागयोस्तस्य द्वाविंशतिसहस्रकः । प्रत्येक द्विशती सार्दा दक्षिणोत्तरविस्तृतिः ॥२३७॥ पर हैं ॥२२२-२२३॥ इन सब कूटोंकी ऊँचाई यथायोग्य अपनी-अपनी गहराईके समान कही गयी है ।।२२४॥ इन चारों पर्वतोंके सिद्धायतन कूटोंपर जो मन्दिर हैं वे श्री सिद्ध भगवान्की प्रतिमाओंसे सहित हैं तथा यथायोग्य सुशोभित हो रहे हैं ॥२२५।। शेष तीन पर्वतोंके अन्तिम दो कूटोंमें व्यन्तर देव क्रीड़ा करते हैं और मध्यमें बने हुए सुन्दर क्रीड़ा-भवनोंमें दिक्कुमारी देवियाँ रमण करती हैं ॥२२६।। चारों पर्वतोंके बीच-बीचके दो-दो कूट मिलकर आठ कूट होते हैं उनमें क्रमसे १ भोगंकरा, २ भोगवतो, ३ सुभोगा, ४ भोगमालिनी, ५ वत्समित्रा, ६ सुमित्रा, ७ वारिषेणा और ८ अचलावती ये आठ देवियां कोड़ा करती हैं ।।२२७॥ विदेह क्षेत्रमें सोलह वक्षार गिरि हैं, उनमें १ चित्रकूट, २ पद्धकूट, ३ नलिन और ४ एकशेल ये चार पर्वत पूर्व विदेहमें हैं तथा नील पवंत और सीता नदीके मध्य लम्बे हैं ॥२२८॥ १ त्रिकूट, २ वैश्रवण, ३ अंजन और ४ आत्मांजन ये चार भी पूर्व विदेहमें हैं तथा सीता नदी और निषध शिं करनेवाले हैं अर्थात् उनके मध्य लम्बे हैं ॥२२९॥ १ श्रद्धावान, २ विजयावान्, ३ आशीविष और ४ सुखावह ये चार पश्चिम विदेह क्षेत्रमें हैं। ये चारों देशोंका भेद करनेवाले हैं और अपनी प्रसिद्ध लम्बाईसे सीतोदा नदी तथा निषध पर्वतका स्पर्श करनेवाले हैं ॥२३०-२३१॥१ चन्द्रमाल, २ सूर्यमाल, ३ नागमाल और ४ मेघमाल ये चार पश्चिम विदेहक्षेत्रमें हैं तथा नील और सोतोदाके मध्यमें स्थित हैं ॥२३२॥ इन समस्त वक्षार पर्वतोंकी ऊंचाई नदी तटपर पांच सौ योजनकी और अन्यत्र सब जगह पूर्व वणित वक्षारोंके समान चार सौ योजन है ॥२३३॥ इन सोलह वक्षार पर्वतोंमें प्रत्येकके शिखरपर चार-चार कूट हैं उनमें कुलाचलोंके समीपवर्ती कूटोफर दिक्कुमारी देवियाँ रहती हैं । नदीके समीपवर्ती कूटोंपर जिनेन्द्र भगवान्के चैत्यालय हैं और बीच के कूटोंपर व्यन्तर देवोंके क्रोडागृह बने हुए हैं ॥२३४-२३५।। मेरुकी पूर्व-पश्चिम दिशामें लम्बा तथा नाना प्रकारके वृक्षों और लताओंसे व्याप्त एक सुन्दर भद्रशाल वन है। यहाँ क्रमसे उसका वर्णन किया जाता है ॥२३६॥ उसकी पूर्व-पश्चिम भागको लम्बाई बाईस हजार योजन और दक्षिण-उत्तर चौड़ाई ढाई सो योजन है ।।२३७॥ वनके १. सुवत्सान्या म. । २. बलाचिता म. । ३. व्यन्तराः क्रीडनालयाः म., क. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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