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________________ पञ्चमः सर्गः नामिपर्वतमानानि तानि कूटानि तेषु तु । देवाः स्वकटनामानः क्रीडन्ति निजयेच्छया ॥१९३॥ अध्यढे हि सहस्रार्दै नीलतो नीलवान् हृदः । तथोत्तरकुरुर्नाम्ना चन्द्रश्चैरावणोऽपरः ॥१९॥ माल्यवांश्च नदीमध्ये सर्वे पञ्चशतान्तराः । ते दक्षिणोत्तरायामाः पद्महदसमा मताः ॥१९५॥ निषधादुत्तरो नया निषधो नामतो हृदः । नाम्ना देवकुरुः सूर्यः सुलसश्च तडिप्रभः ॥१९॥ रत्नचित्रतटाः सर्वे वज्रमूला महाहदाः । तेषु नागकुमाराः स्युः पद्मप्रासादवासिनः ॥१९७॥ जलाद् द्विकोशमुद्विद्धं योजनोच्छितिविस्तृतम् । पद्म प्रतिहदं क्रोशविस्तृतोच्छ्रितकर्णिकम् ॥१९॥ पद्माः शतसहस्रं हि चत्वारिंशस्सहस्रकैः । शतं सप्तदशाग्रं स्यात् प्रतिपद्म परिच्छदः ॥१९९॥ एकैकस्य हृदस्यात्र पर्वता दश समुखाः । मान्ति काञ्चनकूटाख्याः सीतासीतोदयोस्तटे ॥२०॥ उच्छायमूलविस्तारैः शतयोजनकाः समाः । पञ्चसप्ततिका मध्ये पञ्चाशदविस्तृतारकाः ॥२०१॥ तेषामुपरि प्रत्येकमेकैकाकृत्रिमाः शुभाः। प्रतिमाश्च निरालम्बाः मोक्षमार्गकदीपिकाः॥२.२॥ धनुःपञ्चशतीतुझा मणिकाञ्चनरस्नगाः । पञ्चमेरुषु विख्यातं सहस्रोत्तरकटकम् ॥२०३॥ आक्रोपनगृहेष्वेषां शिखरेषु महास्विषः । देवाः काश्चनकामिख्याः संक्रीडन्ते समन्ततः ॥२०४॥ सीतोत्तरतटे कूटं पनोत्तरमनुत्तरे । तटे तु नीलवत्कटं पूर्वतो मेरुपर्वतात् ॥२०५॥ शीतोदापूर्वतीरे तु कुटं स्वस्तिकमस्ति तत् । तदअनगिरिप्रख्यं पश्चात्ते मेर्वनुत्तरे ।।२०।। तटे तु दक्षिणे तस्याः कुमुदं कुरमुत्तरे । पलाशमपराशायां ते तु मन्दरतो मते ॥२०७॥ दोनों तटोंपर यम कूट और मेघ कूट नामके दो कूट हैं ॥१९२॥ ये कूट नाभि पर्वतोंके समान विस्तारवाले हैं तथा इन कूटोंपर कूटोंके ही समान नामवाले देव अपनी इच्छानुसार क्रीड़ा करते हैं ।।१९३॥ नील पवंतसे साढ़े पांच सौ योजन दूरीपर नदीके मध्यमें नीलवान्, उत्तरकुरु, चन्द्र, ऐरावण और माल्यवान् नामके पांच ह्रद हैं। ये समस्त ह्रद पांच-पांच सौ योजनके अन्तरसे हैं तथा इनको दक्षिणोत्तर लम्बाई पद्म ह्रदके समान मानी गयी है ॥१९४-१९५॥ इसी प्रकार निषध पर्वतसे उत्तरको ओर नदीके बीच निषध. देवकर, सयं, सलस और तडित्प्रभ नामके पाँच महाह्रद हैं। इन सबके तट रत्नोंसे चित्र-विचित्र हैं तथा सबके मूल भाग वज्रमय हैं। इन महाह्रदोंमें कमलोंपर जो भवन बने हैं उनमें नागकुमार देव निवास करते हैं ॥१९६-१९७॥ प्रत्येक महाह्रदमें एक-एक प्रधान कमल है जो जलसे दो कोश ऊंचा है, एक योजन विस्तृत है और एक कोश विस्तृत कणिकासे युक्त है ।।१९८।। प्रत्येक प्रधान कमलके साथ परिवार रूपमें एक लाख चालीस हजार एक सौ सत्रह कमल और भी हैं ॥१९९॥ तथा एक-एक महाह्रदके सम्मुख सीता, सीतोदा नदियोंके तटपर कांचनकूट नामके दश-दश पर्वत हैं ॥२००॥ इन पर्वतोंकी ऊंचाई सौ योजन है तथा विस्तार मूलमें सौ योजन, मध्यमें पचहत्तर योजन और अग्रभागमें पचास योजन है ।।२०१॥ उन कांचनकूटोंमें प्रत्येकके ऊपर एक-एक अकृत्रिम शुभ जिन-प्रतिमाएं हैं जो निराधार हैं, मोक्ष मार्गको प्रकाशित करनेवाली हैं, पाँच सौ धनुष ऊंची हैं, मणिमयी, सुवर्णमयी तथा रत्नमयी हैं। एक-एक मेरुपर दो-दो सौ कूट हैं और पांचों मेरुओंके एक हजार कूट प्रसिद्ध हैं ॥२०२-२०३॥ इन पर्वतोंके शिखरोंपर अनेक क्रीड़ागृह बने हुए हैं उनमें महाकान्तिके धारक कांचनक नामके देव सब ओर क्रीड़ा करते रहते हैं ।।२०४॥ मेरु पर्वतसे पूर्वकी ओर सीता नदीके उत्तर तटपर पद्मोत्तर और दक्षिण तटपर नीलवान् नामका कूट है ।।२०५॥ मेरु पर्वतसे दक्षिणकी । ओर सीतोदा नदीके पूर्व तटपर स्वस्तिक और पश्चिम तटपर अंजनगिरि कूट है ॥२०६|| इसी सीतोदा नदीके दक्षिण तटपर कुमुद कूट और उत्तर तटपर पलाश कूट है। ये दोनों ही कूट १. नामानि म. । २. मिताः म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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