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________________ हरिवंशपुराणे 'अश्मगर्भमहास्कन्धो वैज्रशाखोपशोमितः । राजद्राजतपनाढ्यो मणिपुष्पफलाङ्करः ॥१७॥ रक्तपल्लवसंतानरअितान्तदिगन्तरः । पीठिकायां पुरोक्तायां जम्बूवृक्षः प्रकाशते ॥१७९॥ पृथिवीपरिणामस्य नानाशाखोपशोमिनः । महादिक्ष चतस्रोऽस्य महाशाखा महातरोः ॥१८॥ तत्र चोत्तरशाखायां सिद्धायतनमद्भुतम् । आदरानादरावासाः प्रासादास्तिसृषु स्थिताः ॥१८॥ जम्बूवृक्षस्य तस्याधस्त्रिंशद्योजनविस्तृताः । पञ्चाशयोजनोच्छायाः प्रासादा देवयोस्तयोः ॥१८२॥ वेदिकान्तरदेशेषु चक्रवालेषु सप्तसु । प्रधानकगुमोपेताः परिवारोऽस्य पादपाः ।।१८३॥ चत्वारोऽनन्तरं तस्य ततश्चाष्टोत्तरं शतम् । चत्वारि च सहस्राणि सहस्राणि च षोडश ॥१८४॥ द्वात्रिंशच्च सहस्राणि चत्वारिंशत्तु तान्यतः । चत्वारिंशत् सहाष्टाभिः प्रधानैः सप्तभिर्युताः ॥१८५।। मिश्राः शतसहस्रं तु चत्वारिंशसहस्रकैः । संजायन्ते समस्तास्ते शतमेकोनविंशतिः ॥१८६॥ दक्षिणापरतो मेरोः सीतोदायास्तटे परे । निषधस्य समीपस्थं राजतं शाल्मलीस्थलम् ॥१८७॥ जम्बूस्थलेसमे तत्र शाल्मलीवृक्ष इष्यते । वक्तव्या तस्य निःशेषा जम्बूवृक्षस्व वर्णना ।।१८८॥ तत्र दक्षिणशाखायां सिद्धायतनमक्षयम् । प्रासादास्तु त्रिशाखासु तत्र देवाविमौ मतो ॥१८९॥ वेणुश्च वेणुदारी तावादरानादरौ यथा । उत्तरेषु कुरुविष्टौ तथा देवकुरुविमौ ॥१९०॥ नीलार्दक्षिणाशायां योजनैकसहस्रके । सीता पूर्वतटे चित्र विचित्रं कुटमप्यतः ॥१९॥ निषधस्योत्तराशायां सीतोदातटयोस्तथा । यमकूटं मतं पूर्व मेघकटमतः परम् ॥१९२॥ तक फैली हुई हैं, उसका महास्कन्ध नीलमणिका बना हुआ है, वह होराको शाखाओंसे शोभित है, चाँदीके सुन्दर पत्तोंसे युक्त है, उसके फूल-फल तथा अंकुर मणिमय हैं, और उसने अपने लाल-लाल पल्लवोंके समूहसे समस्त दिशाओंके अन्तरालको लाल-लाल कर दिया है ।।१७७-१७९॥ पृथिवीकाय रूप तथा नाना शाखाओंसे सुशोभित इस महावृक्षकी चारों दिशाओंमें चार महाशाखाएँ हैं ॥१८०। इनमें उत्तर दिशाको शाखापर आश्चर्य उत्पन्न करनेवाला जिनमन्दिर है और शेष तीन दिशाओंकी शाखाओंपर भवन बने हुए हैं जिनमें आदर-अनादरका निवास है ।।१८१।। उस जम्बू वृनके नीचे उन दोनों देवोंके तीस योजन चौड़े और पचास योजन ऊँचे अनेक भवन बने हुए हैं ॥१८२॥ वेदिकाओंके सात अन्तरालोंमें एक-एक प्रधान वृक्षसे सहित जो अनेक वृक्ष हैं वे ही इस जम्बू वृक्षके परिवार-वृक्ष कहलाते हैं ॥१८३॥ प्रथम वृक्षके परिवारवृक्ष चार हैं, दूसरेके एक सौ आठ, तीसरेके चार हजार, चौथेके सोलह हजार, पाँचवेंके बत्तीस हजार, छठेके चालीस हजार और सातवेंके अड़तालीस हजार हैं। सात प्रधान वृक्षोंको साथ मिलानेपर इन समस्त वृक्षोंकी संख्या एक लाख चालीस हजार एक सौ उन्नीस होती है॥१८४-१८६।। मेरु पर्वतकी दक्षिण-पश्चिम ( नैऋत्य ) दिशामें सीतोदा नदीके दूसरे तटपर निषधाचलके समीप रजतमय एक शाल्मली स्थल है ॥१८७॥ जम्बू स्थलकी समानता रखनेवाले इस शाल्मली स्थल में शाल्मली वृक्ष है । उसका सब वर्णन जम्बू वृक्षके वर्णनके समान जानना चाहिए ।।१८८॥ शाल्मली वृक्षकी दक्षिण शाखापर अविनाशी जिन-मन्दिर है और शेष तीन शाखाओंपर जो भवन बने हुए हैं उनमें वेणु और वेणुदारी देव निवास करते हैं। जिस प्रकार उत्तरकुरुमें आदर और अनादर देव इष्ट माने गये हैं उसी प्रकार देवकुरुमें वेणुदारी देव इष्ट माने गये हैं ॥१८९-१९०॥ नील पर्वतकी दक्षिण दिशामें सीता नदीके पूर्व तटपर एक हजार योजन विस्तारवाले चित्र और विचित्र नामके दो कूट हैं ।।१९१।। इसी प्रकार निषध पर्वतको उत्तर दिशामें सीतोदा नदीके १.नीलमणिमयमहास्कन्धः । २. हीरकशाखोपशोभितः । ३. शोभमानरजतमयपत्रसहितः। ४. परिवारमा मताः ख. । ५. संजायते म.। ६. जम्बूस्थलसमस्तत्र म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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