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________________ पञ्चमः सर्गः प्रासादेष शिरस्येषां स्वातिरप्यरुणः परः । पद्मश्चापि प्रभासश्च व्यन्तरा निवसन्ति ते ।।१६४॥ क्षेत्रपर्वतनद्याद्या येऽत्र द्वीपे प्रकीर्तिताः । द्विगुणा धातकोखण्डे पुष्कराद्धे च ते स्थिताः ॥१६५।। 'द्वीपानतीत्य संख्यातान् जम्बूद्वीपः परः स्थितः । सन्ति तत्र पुरोऽमीषामत्र ये गदिताः सुराः ॥१६६।। नीलमन्दरमध्यस्था उत्तराः कुरवो मताः। स्थितास्तु देवकुरवः सुमेरुनिषधान्तरे ॥१६॥ द्वाचत्वारिंशदष्टौ च शतानि व्यासतो मताः । एकादशसहस्राणि कुरवस्ते कलाद्वयम् ।।१६८॥ ज्या च तेषां त्रिपञ्चाशत्सहस्राणि धनुः पुनः । षष्टिश्चतुःशती चाष्टौ दशांशा द्वादशाधिकाः ।।१६९।। त्रिचत्वारिंशतं सैकसहस्राणि च सप्ततिः । चतुरंशा नवांशाश्च कुरुवृत्तं प्रकीर्तितम् ।। १७०।। सहस्राणि त्रयस्त्रिंशत् षट्शती चतुरंशकाः । अशीतिश्चतुरग्राऽसौ विदेहक्षेत्रविस्तृतिः ॥१७१॥ मेरोः पूर्वोत्तराशायां सीतायाः पूर्वतः स्थितम् । समीपं नीलशैलस्य जम्बूस्थलमुदीरितम् ॥१७२॥ पञ्चचापशतव्यासा गव्यूतिद्वयमुद्धता ! स्थलस्योपरि पर्येति सर्वतो रत्नवेदिका ॥१७३॥ तस्य पञ्चशती व्यासो मध्ये बाहुल्यमष्ट तु । गव्यूतिद्वितयं चान्ते स्थलस्य परिकीर्तितम् ।।१७४॥ जम्बूनदमये तत्र पीठिकाष्टोच्छ्रया स्थिता । मूलमध्यानविस्तारैदशाष्टचतुर्मिता ।।१७५॥ अधोऽधोऽन्या षडेतस्याः परितो मणिवेदिकाः । प्रत्येकमुपरि द्वे द्वे तासांता पद्मवेदिकाः ॥१७॥ मूले गव्यूतिविस्तीर्णः स्कन्धोच्छ्रायद्वियोजनः । अवगाहद्विगव्यूतिः शाखाव्याप्ताष्टयोजनः ॥१७७॥ दूर रहकर इन पर्वतोंकी प्रदक्षिणा देती हुई गयो हैं ॥१६३।। इन पर्वतोंके शिखरोंपर निर्मित भवनोंमें क्रमसे स्वाति, अरुण, पद्म और प्रभास नामके व्यन्तर देव निवास करते हैं ॥१६४।। जम्बू द्वीपमें जिन क्षेत्र, पर्वत तथा नदी आदिका वर्णन किया है, धातकीखण्ड तथा पुष्करार्धमें वे सब दूने-दूने हैं ॥१६५।। संख्यात द्वीप समुद्रोंको उल्लंघकर एक दुसरा जम्बू द्वीप भी है। इस जम्बू द्वीपमें जिन देवोंका कथन किया है उस दूसरे जम्बू द्वीपमें भी इन देवोंके नगर हैं ॥१६६।। नील कुलाचल और सुमेरु पर्वतके मध्य में जो प्रदेश स्थित हैं वे उत्तरकुरु माने जाते हैं और सुमेरु तथा निषध कुलाचलके बीचके प्रदेश देवकुरु कहे जाते हैं ॥१६७॥ ये दोनों कुरु विस्तारकी अपेक्षा ग्यारह हजार आठ सौ योजन दो कला प्रमाण माने गये हैं ॥१६८।। इनको प्रत्यंचा वेपन हजार और धनुःपृष्ठ छह हजार चार सौ अठारह योजन बारह कला है ।।१६९।। इन कुरु प्रदेशोंका वृत्तक्षेत्र इकहत्तर हजार एक सौ तैंतालीस योजन तथा एक योजनके नौ अंशोंमें चार अंश प्रमाण है ।।१७०॥ । विदेह क्षेत्रका समस्त विस्तार तैंतीस हजार छह सौ चौरासी योजन चार कला है ॥१७१।। मेरु पर्वतकी पूर्वोत्तर ( ऐशान ) दिशामें, सीता नदीके पूर्व तटपर नील कुलाचलके समीप जम्बू स्थल कहा गया है ॥१७२।। पाँच सौ धनुष चौड़ी और दो कोश ऊँची रत्नमयी वेदिका इस स्थलको चारों ओरसे घेरे हुए है ॥१७३॥ इस स्थलकी चौड़ाई मूलमें पांच सौ कोश, मध्यमें आठ कोश और अन्तमें दो कोश कही गयी है ॥१७४॥ इस स्वर्णमय स्थल में आठ कोश ऊँची एक पीठिका स्थित है जो मूलमें बारह कोश, मध्यमें आठ कोश और अन्तमें चार कोश चौड़ी है ॥१७५॥ इस पीठिकाके नीचे-नीचे चारों ओर रत्ननिर्मित छह वेदिकाएँ और हैं तथा उन प्रत्येक वेदिकाओंपर दो-दो रत्नमयी वेदिकाएं हैं। उन छहों वेदिकाओंपर जो लघु वेदिकाएँ हैं वे पद्मवेदिका कहलाती हैं ॥१७६॥ इस पूर्वोक्त पीठिकाके ऊपर जम्बू वृक्ष सुशोभित है। वह जम्बू वृक्ष मूलमें एक कोश चौड़ा है, उसका स्कन्ध दो योजन ऊँचा है, उसको गहराई दो कोश है, उसकी शाखाएँ आठ योजन . १. द्वोपानतोतसंख्यातान् म.। २. जम्बूद्वीपनामान्यो द्वीपः स्थितः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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