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________________ ७२ समन्तभद्र-भारती परिच्छेद ७ सिद्ध होनेपर आगमसिद्ध उसीप्रकारसे प्रमाण होता है जिस प्रकार कि हेतुसिद्ध । इति देवागमाप्त-मीमांसायां षष्ठः परिच्छेदः । सप्तम परिच्छेद अन्तरंगार्थता-एकान्तकी बौद्ध-मान्यता सदोष अन्तरङ्गार्थतैकान्ते बुद्धि-वाक्यं मृषाखिलम् । प्रमाणाभासमेवातस्तत् प्रमाणादृते कथम् ॥७१।। 'यदि ( विज्ञानाद्वैतवादी बौद्धोंके मतानुसार ) अन्तरंगार्थताका एकान्त माना जाय–अन्तरंग जो स्वसंविदित ज्ञान उसीके वस्तुता स्वीकार की जाय और बहिरंग जो प्रतिभासके अयोग्य जड़ है उसके वस्तुता न मानी जाय तो बुद्धिरूप अनुमान और वाक्यरूप आगम सब मिथ्या ठहरते हैं। जब मिथ्या ठहरते हैं तब वे प्रमाणाभास ही हुए; क्योंकि प्रमाण सत्यसे और प्रमाणाभास मिथ्या( मृषा )से व्याप्त होता है। और प्रमाणाभासका व्यवहार बिना प्रमाणका अस्तित्व अङ्गीकार किये कैसे बन सकता है ?-नहीं बन सकता । अतः अन्तरंगार्थताके एकान्तकी मान्यता दूषित है। उसे अनुमानादि किसी भी प्रमाणसे सिद्ध नहीं किया जा सकता; और जब सिद्ध नहीं किया जा सकता तो दूसरोंको उसकी प्रतीति भी नहीं कराई जा सकती।' ( जो ग्राह्य-ग्राहकाररूप है वह सब भ्रान्त है, ऐसी संवेदनाद्वतकी मान्यतासे संवेदनात भी भ्रान्त ठहरता है; क्योंकि स्वरूपका ज्ञान भी वेद्य-वेदक-लक्षणका अभाव होनेपर घटित Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org:
SR No.001170
Book TitleAptamimansa
Original Sutra AuthorSamantbhadracharya
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1978
Total Pages190
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size9 MB
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