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________________ समन्तभद्र-भारती [ परिच्छेद ३ (हे स्याद्वादन्याय-नायक अर्हन् भगवन् ) आपके मतमें ( सम्पूर्ण जीवादि ) वस्तुतत्त्व कथंचित् नित्य है; क्योंकि उसका प्रत्यभिज्ञान होता है-यह वही है जो पहले देखा था, ऐसा पूर्वोत्तरदशामें जो एकत्वका बोध होता है वह उसके नित्यत्वको सिद्ध करता है । और यह प्रत्यभिज्ञान अकस्मात्-बिना किसी कारणके निविषय तथा भ्रान्तरूप-नहीं होता; क्योंकि अविच्छेद रूपसे बिना किसी बाधाके अनुभवमें आता है। ( यदि प्रत्यक्षको बाधक माना जाय तो वह ठीक नहीं है, क्योंकि प्रत्यक्षका विषय वर्तमान पर्यायात्मक वस्तू होनेसे पूर्वाऽपर-पर्यायव्यापी एकत्वलक्षण प्रत्यभिज्ञानके विषयमें उसकी प्रवत्ति नहीं बनती। जो अपना विषय नहीं, उसमें कोई बाधक या साधक नहीं होता, जैसे श्रोत्रइन्द्रियके ज्ञान-विषयमें चक्षुइन्द्रियका ज्ञान।) ____ और आपके मतमें वस्तुतत्त्व कथंचित् क्षणिक है--अनित्य है; क्योंकि उसमें कालके भेदसे परिणाम-भेद पाया जाता हैक्षण-क्षणमें वस्तुको पर्यायें पलटती रहती हैं, जो कथंचित् एकदूसरेसे भिन्न होती हैं। पर्यायोंके इस पलटन ( परिवर्तन ) एवं 'परिणमनसे वस्तुमें प्रतिक्षण उत्पाद-व्ययके होते रहनेपर भी वस्तुका अपने ध्रौव्य गुणके कारण कभी नाश नहीं होता। इसी पर्यायदृष्टिसे वस्तु कथंचित् क्षणिक है-सर्वथा क्षणिक नहीं। वस्तुको सर्वथा क्षणिक तथा सर्वथा नित्य माननेपर ज्ञानका संचार नहीं बन सकेगा, यह दोष आएगा। ज्ञानका संचार अनेकान्तकी मान्यतामें ही प्रतीतिगोचर होता है।' उत्पाद-व्यय सामान्यका नहीं, विशेषका होता है न सामान्यात्मनोदेति न व्येति व्यक्तमन्वयात् । व्येत्युदेति विशेषात्ते सहैकत्रोदयादि सत् ।।५७।। (हे भगवन् ! ) आपके मतमें सामान्य स्वरूपसे-सर्व Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001170
Book TitleAptamimansa
Original Sutra AuthorSamantbhadracharya
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1978
Total Pages190
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size9 MB
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