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शंकर कवि प्रणीत विज(य)वल्लीरास ॥
___ सं. विजयशीलचन्द्रसूरि
तपगच्छपति श्रीहीरविजयसूरिना नाममा आवता 'विजय' शब्दने प्राधान्य आपीने, तेमना गुणगानरूपे रचायेल आ रास-रचना छे. वि.सं. १६५१मां 'शंकर' नामना कविए आ रास रच्यो होवानुं तेनी अन्तिम ढाळ परथी जाणी शकाय छे.
___ आ रासनो उपयोग, मुनि विद्याविजयजीए, 'सूरीश्वर अने सम्राट' नामक प्रमाणभूत अने ऐतिहासिक ग्रन्थना निर्माणमां को हतो. परन्तु आ रास अद्यावधि प्रगट थयो नथी; तेनी प्रतिओ पण मळती नथी; अने हीरविजयसूरिने विषय बनावीने थयेली रचनाओनी प्रसिद्ध थयेली यादीओमां पण आनो उल्लेख नथी. 'सूरीश्वर अने सम्राट्' मां अलबत्त, आनो सन्दर्भ सांपडी रहे छे.
आ रासना रचयिता मुनि छ के गृहस्थ, ते जाणी शकातुं नथी. आ रासनी पंदरमी ढालनी छठ्ठी कडीमां “तपागछ पंडित गिरूआ सीसि वेली विजयसू गाई रे" एवो निर्देश छे, ते परथी 'शंकर' नामना मुनिनी आ रचना होय तेवी छाप पडे खरी. अने पोताना गुरुनुं नाम नथी लख्यु, तेथी कवि साक्षात् हीरविजयसूरिना शिष्य होवानी अटकळ पण करी शकाय. पण स्पष्ट प्रमाणनी गरज तो रहेज छे.
आ रासनी प्रति कया भण्डारनी छे, तथा तेनी जेरोक्स नकल कोणे मोकली हती, ते बधुं अत्यारे तो विस्मृतप्राय छे. वर्षोथी आ प्रतिलिपि मारी पासे पडी छे. आर्छ आर्छ याद आवे छे के शिवपुरी (म.प्र.)ना ग्रन्थसंग्रहमां आ प्रति होय अने त्यांथी तेनी नकल श्री काशीनाथ सराक द्वारा मळी होवी जोईए. अन्य कोई भण्डारमा आ रचनानी प्रति होवानुं जाणवामां नथी.
कवि ऋषभदासे सं. १६८५मां 'हीरविजयसूरिरास'नी रचना करी. ते एक सुदीर्घ अने सुग्रथित रचना छे. परंतु, प्रस्तुत विजयवल्ली रास साथे तेने मेळवीए, त्यारे तरत जणाई आवे के कवि ऋषभदासे आ विजयवल्ली रासना
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अनुसंधान-२४ माळखाने आदर्श बनावीने पोतानी रासरचना करी होवी जोईए. विजयवल्ली रासमां जे समग्र वृत्तान्त साव संक्षेपमा, जे क्रमे वर्णवेल छे, ते ज लगभग क्रमे ते बधो वृत्तान्त पूरा विस्तारथी ऋषभदासे वर्णव्यो छे.
विजयवल्ली रासनी प्रति १२ पानांनी छे. तेमां पत्र त्रीजुं नथी. पत्र २मां बीजी ढालनी ७मी कडी अधूरी छे, अने पत्र ४ मा १४मी कडी जोवा मळे छे. एम लागे छे के पत्र २ मांनी ढाल ते बीजी ढाल न होतां प्रथम ढालनो ज बीजो विभाग हशे, अने ते पूर्ण थया बाद ढाल २ना दूहा तथा १४ कडीओ ते पत्रमा समाविष्ट हशे. ३जा पत्रनी त्रुटिने कारणे वर्णनमा मोटो गाळो पड़ी जाय छे. हीरजी पोताना मातापिताने दीक्षा मारे सम्मत करवानो यत्न करे छे ते वातथी तूटतुं वर्णन, मातापिता- मृत्यु, पाटण-गमन, बेननी सम्मतिपूर्वक दीक्षाग्रहण, ज्ञानार्जन, पदप्राप्ति, गुरुवियोग- आ तमाम प्रसंगोविहो| थतुं थतुं, पत्र ४मां अकबरना आमंत्रणना अनुसन्धाने विहार करी अमदावाद आव्याना वर्णनथी पार्छ संधायुं छे.
प्रथम रणसिंह द्वारा थयेल ओशवाल-वंशनी स्थापनानी वात आलेखीने कवि हीरगुरुनी ४२ पेढीनां नामो वर्णवे छे. 'हीररास' मां पण ११मी ढालमां आ ४२ पेढी नाम-वर्णन छे. त्यां ४२ मां एक नाम ओछु होवानुं अथवा जडतुं न होवानुं तेना संपादकश्रीने जणायुं छे. अहीं प्रथम ढालनी नवमी कडीमां ‘धाम ए गुण केरु गुणराज सोए' - ए पंक्तिमा आवतुं 'गुणराज' नाम, ते खूटतुं नाम होवानो संभव छे.
घणी ढालोमां एक ढाले बे गीत जोवा मळे छे, ते आ रासनी विशेषता छे. ते अनुसार पहेली ढालना बीजा गीतमां हीरजीनो तेना मातिपिता साथेनो मीठो संवाद वर्णवातो देखाय छे. ते पछी तो गच्छपतिना रूपमा हीरगुरु देखा दे छे, अने दिल्ली भणी विहरतां अगाऊ 'विजयसेन' शिष्यने आचार्यपद अर्पवापूर्वक गच्छनी धुरा सोंपीने तेमनी विदाय ले छे, अने तेओ रडती आंखे विदाय आपे छे, तेनुं ढूंकुं बयान थयुं छे.
ढाल ३ना. द्वितीय भागमां गुरु आगरा पहोंचे छे त्यारे अकबरे तेना पुत्र द्वारा तेमनुं सामैयुं कराव्यानुं वर्णन छे. तो चोथी ढालमां, दूहा-विभागमां जैनेतर वादीओ साथे वाद करवाना आवतां ते करीने ते वादीओने हीर
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शिष्योए विजय मेळव्यानी वात थई छे. अने ते पछी ढाल-विभागमां हीरगुरुथी प्रसन्न थएल वादशाहे तेमना विषे जे प्रशंसात्मक बोल उच्चारेला, तेनुं स्वरूप विस्तारथी मळे छे. 'हीररास'मां आ ज वात ऋषभदासे (ढाल ६०-६१मां)
आलेखी छे, ते वांचतां अत्युक्ति थई होवानी शंका जागती, पण हीरगुरुनी विद्यमानतामां ज रचायेली आ रचनामां पण ते ज वातो लगभग तेवा ज शब्दोमां जोवा मळी, त्यारे ते उक्तिओ यथातथ होवानी सहज प्रतीति थई.
ढाल ५मां विजयसेनसूरि आदिनी पाछा फरवानी विनंतिना पत्रोनी तथा बादशाहनी बेळे बेळे रजा लईने नीकळे छे त्यारे शाहनी विनंतिथी शान्तिचन्द्र वाचकनो हाथ स्वहस्ते शाहना हाथमां सोंपीने पछी विहार करे छे ते वर्णन छे.
ढाल ६मां हीरगुरुना दयामय सदुपदेशथी बादशाह अकबरे जीवदयानां जे जे कार्यों कर्या हतां तेनुं बयान छे, अने ते अंगेनां शाही फरमानो खुद धनविजयगणि विहार करी करीने सर्वत्र पहोंचाडवापूर्वक तेनो अमल कराववानुं कार्य करे छे तेनी वात पण थई छे.
ढाल ७ मां गुरुना विहारनी, सीरोहीमां चोमासानी, तथा त्यां दयाप्रधान कार्यो कर्यांनी वात छे, उपरांत, वाचक कल्याणविजयजीने वैराट नगरे प्रतिष्ठा कराववा मोकल्या, त्यां ते प्रसंगे बे करोड द्रम्मनो सद्व्यय थयानी पण नोंध छे.
ढाल ८मां शत्रुजय-गिरनारनां तीर्थो शाहे हीरगुरुने भेट आप्याना उल्लेख साथे, राधनपुरे बिराजमान गुरु प्रत्ये विजयसेनसूरिने सत्वरे बादशाह पासे आववाना आमंत्रणनी सूचना छे. ८मी ढालना बीजा भागमां गुरुशिष्यनो हृदयद्रावक संवाद वांचतां एक बाजु वाचक गद्गदभाव अनुभवे छे, तो बीजी बाजु अहोभाव पण तेटलो ज जागे छे.
ढाल ९/१ मां बादशाहें विजयसेनसूरिने पूछेला सवालो छे, तो ९/ २ मां गुरु द्वारा अपायेला तेना जवाबो छे, ते बहु रसप्रद छे. ते पछी नन्दविजय पासे ८ अवधान करावीने प्रसन्न थयेलो शाह तेमने 'खुशफहम', बिरुद आपे छे तेनी विगत छे.
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अनुसंधान - २४
ढाल १० मां गंगा अने सूर्य विषेना विवादनो निर्देश थयो छे. तो ढाल ११मां सेंकडो ग्राम-नगर- देशोना संघो शत्रुंजयनी यात्राए आवे छे, अने जगद्गुरुना सांनिध्ये तीर्थयात्रा आराधे छे, तेनुं विस्तृत वर्णन छे. ढाल १२१३मां शत्रुंजयना महिमानुं वर्णन थयुं छे. ढाल १४मां गुरुनी लागणीने अनुसरीने सर्व संघ विजयसेनसूरिने हवे गुजरात पधारवानी विनंतिनो पत्र पाठवे छे तेनुं सुन्दर वर्णन छे.
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छेल्ली - पंदरमी ढालमां उपसंहार करतां कवि हीरगुरुना विशिष्ट उपाध्यायशिष्योनां नामो उल्लेखे छे, अने प्रान्ते सं. १६५१ना वर्षे निजामपुरे आ 'विजयवेली'नी रचना करी होवानुं कवि शंकर सूचवे छे.
आदिनाथ तीर्थंकर माटे अनेकवार 'आदिल' शब्दनो प्रयोग अहीं थयो छे, ते रसप्रद छे. मुस्लिम - अरेबिक संस्कारना वातावरणमां ते समाजना लोकोने ओळख आपवा माटे आवो शब्द कोईए प्रयोज्यो हशे, जे आ रीते ग्रन्थस्थ थयो जणाय छे. तदुपरांत सुलतान, झडाल, नेजा, असमान, रेसम, हुर, वगेरे मुसलमानी शब्दोनो कविए सुखद प्रयोग कर्यो छे.
व्यवध, व्यकट, ध्यन - आवा बधा प्रयोगो ऋषभदासनी रचनाओमांना तेवा घणा प्रयोगोनुं स्मरण करावे छे, अने ते समयनी बोलचालनी भाषा प्रत्ये लक्ष्य खेंचे छे.
प्रति अशुद्ध छे. घणा शब्दो त्रुटक छे, कां स्पष्ट समजाता नथी. ते कारणे अर्थ समजवामां जरा काठिन्य अनुभवाय तेम छे. परभाषाना शब्दोनो प्रचुर प्रयोग छे, ते शब्दो बेसाडवानी पण समस्या खरीज आ बधुं छतां, आज लगी अप्रगट रहेली एक महत्त्वपूर्ण अने ऐतिहासिक कृतिनुं सम्पादन यथामति करवानो मोको मळ्यो तेनो परितोष छे. साथे, सुज्ञ जनोने प्रार्थना छे के आ रासनी हस्तप्रति क्यांयथी पण जडी जाय तो ते पाठववा कृपा करवी. जेथी आनुं पुनः संशोधन थई शके.
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श्रीविजवल्लीरास ॥ श्री सारदायै नमः ॥
दूहा ॥ आदिलप्रमुख श्रीजिनवरा, तास चरणि धरी मन्न । पुंडरीक थइ गणधरा, चौदसया बावन्न ॥१॥ गिरुआ चरणकमल नमी, सरसति दिउ आधार । श्री हीरविजयसूरी प्रगट, गाउं जग साधार ||२|| वीरपाटि-उदयाचलि, उइदयु अविचल भाण । शाह अकब्बर विकट नृप, प्रतिबोध्यु सुरताण ॥३|| बिरुद धरीयुं जगत्रगुर, महीतलि शाह टाली मारि । हीरा परि श्रीहीरजी, झगइ सकल संसारि ॥४॥ तास तणा च्यालीस उर, दोइ अधिक अभिराम । विमल वंश-परीआतणां, बोलुं व्यवरी नाम ||५|| संवत पांच दाहोतरि, श्रीनन्नसूरि प्रतिबोध । खीमाणंदी गोत्र जस, राठुडां वर जोध ||६|| गयवर हव्य(य)वर रथ सबल-पायक देश विशाल । प्रथम धर्मधोरी हुओ, श्रीरणसिंह भूपाल ॥७॥
ओश वंशनी थापना, थापी अरडक्कमल्ल । पुण्यपूरपूरी नदी, महीतलि चाली भल्ल ||८||
राग-सामेरी ॥ देवराज सुत तस वर, रिद्धि रूप सोहइ अमर
तस घर अभयचंद अंगज भणूं ए ॥१॥ तस सुत सोहइ नानसी, कीरति दीपइ भाणसी
जाणसी करणु करणी बहू करि ए ॥२॥
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अनुसंधान-२४ तास पुत्र जेसंग मुणिउ, दोषे सोई अवगुणिउ ।
मई सुण्यु तेजु पुत्र ते तास तु ए ॥३॥ तस सुत लीबु सांभल्यु, अमृत पाहि सो गलिउ
नवि छल्यु राजु पुत्र तेहनु ए ||४|| तास तणु सुत मांडण, ऐ तु (खैतु) सब दुख छांडण
हांडण कीरति जगमा तेहनी ए ||५|| समरु सुत वली तास तु, पाप न आवइ आसतु
जास तु प्रबल पूत्र ऊजल सदा ए ॥६॥ रामु अंगज तास ए, दीठइ पुहुचइ आम ए
भास ए मेघु मयगलनी परिइंए ॥७।। राल्हण पुत्र सु सुंदरु ए, अभिनव भा(ला)गे पुरंदरू
सुरतरु सहिजु सुत सोहइ भलु ए ॥८॥ नानु निरूपम नाम ए, सोनु सो अभिराम ए
धाम ए गुण केरु गुणराज सो ए ।।९।। कमसिंह करमी भणु, डाहाना केम गुण गणुं
अतिघणुं तोलानुं सुंदरपणुं ए ॥१०॥ मतिवंता महिराज ए, सिंधु सारइ काज ए
छज ए देवचंद तस अंगजूए ॥११॥ राजधराभिध जाण ए, गांजण विमल विनाण ए
सुजाण ए आसपाल अविनीतलि ए ॥१२॥ रंगु रतिपति रूप ए, साजन मानइ भूप ए
__ अनुप ए राहलु अभिनव तर्या ए ॥१३॥ सामल सहिजि सुहाकरू, सगरू सोहइ मनहरु
जगवरु जोमा जोड नहीं जगिई ए ॥१४॥ . आसग अनुपम सांभली, दीठइ देवसीइ रली
मनि टली आरति वाहड देखतां ए ॥१५॥
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दामु दुरीअ विणासीअ, देवि दान उदासीअ
कुंह कुमति विणासीअ, महीतलि जेणि विभासीअ जेणइ पुण्य सुवेलडी ए ||१७||
तास पीआ गुणपूरीअ, अवगुण कीधा दूरीअ
सूरीअ नाथी सीहणि सारिखी ए ||१८|| सूर सुपन पामी तदा, सेजिइं सूतां एकदा
आसीआतह (तेह ? ) तणी हुं सी भणु ए ||१६||
सा मुदा पति पासइ आवी वदइ ए || १९|| कूरिंग भणइ सुजाण ए, पुत्र हसि जगि भाण ए
आण ए त्रिभुवन जेहनी चालसि ए ||२०|| अवधि संपूरण तव भई, जनमिउ पुत बहु गुणमई
जगि थई कीरति रतिनइ आपती ए ॥ २१ ॥ नाम धरिडं तस हीरु ए, सो सब जगनु हीरु ए
वीरु ए लाख चुरासी जीवनुं ए ||२२|| पूरव प्रीआ अजूआलीअ, रणसिंह लगि विशालीअ
पालीअ पुण्यनीक तरु सीचवा ए ||२३|| लहूअलगि वइरागीअ, अथिर संसारनुं त्यागीअ
वइरागीअ हीरजी रागी धर्मनुं ए ||२४|| वरस आठ दोई भरि, चारित्रस्युं मन अणुसरि
आदरि वचन भणे पितु मातस्युं ए ॥ २५ ॥ राग गुडी ॥ दूहा ॥
ए गुणी पंडित हूंउ हवि, तम्हे धरु घरभार ! पाणिग्रहण तुम मेलीइ, उछ्व करी उदार ॥ १ ॥
वलतुं वी( ही ) र वचन भणि, मातपिता सुणि वाणि । नन परणुं व्यापार न न करु सु ताणो ताणि ॥ २ ॥ |
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हुं न न राचुं एणि जगि, मात तात सही जाणि । हीरु हीरा वुहुरसि श्रीविजयदान भणिखाणि || ३ || सेठि सधरमी थइ करूं, वुहुरं ( रुं) धर्म क्रयाण । श्रीविजयदानसूरिंदनी, मानुं नित प्रति आण ||४||
ढाल ॥
मातपिता कहि हीरजी रे, इम कां बोलु बोल हैअडइ गाढिम कां ग्रही, इंम स्युं हुआ निटोलो रे
चरण ( चारित्र) चितई वस्यु ॥१॥
करहु न केलिकल्लोलो, लछी विलसु रंगरोलो रे चारि० ॥१॥
अनुसंधान-२४
'नवि जाण्यु संसारनु, लीलां लहरी भोग
बालपणइ वयरागस्यु रे, आदर कां मांडिउ तमे योगो रे || चा०२ ॥
हीर कहि सुणि मातजी रे, वृद्धपणानी आस
घडीइ घूंट भराइसि, चितमांहि घणुंअ उदासो रे ॥ चा० ३ ||
हीर कहि सुणिपूरवइ, ऋषि थावडुसु जोइ
गयसकुमाल नारी तजी, अममत्तु तप सोइ ॥ चा० ४ ||
मेघकुमर नारी तिजी, छांडी राजनु भार
षीधरणि (? वीरतणी ?) सेवा धरी, भवनु पामिउ तेणे पारो रे || चा०५ ||
अवंतीकुंअर अलवेसरू, छांडी आठइ नारि
नलनीगुलम चिंतन करी, तरीउ एणइ संसारि रे || चा०६ ||
ढंढण बालऋष (षी) सरू, धन्नु शालिभद्र ते दोइ ऋद्धिरमणि छंडी करी
( पत्र ३ नथी; खंडित प्रति) ......
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कीजइ भासन ॥१४॥ च्यारि खंड साहिब सुलतानां, अकबर इतना देत हि मानां । नु गुरकुं दीजइ आदेसा, चिले बुलावन सुंदर वेसा ॥१५॥ श्रीगुरु अमदावादि सु आवइ, खान मलिक सामहिणे यावइ । सब वृतंत कहि तब खानां, तुम परि खुसी भए सुलतानां ॥१६।। सोना रूपा वाहन दीजि, हीर कहत हम नजरि न दीजइ । पाउ चिलत- इ हेंडे ज्याणा, पंचग्रास मांगी करि खाणा ॥१७॥ खान मलिक खोजा वड मीरा, यु नीरागी सांचा पीरा । युं तारे मई सोहइ चंदा, तिउं बन्यु हीरविजयसूरिंदा ॥१८॥ संघ सयल मलीआ संसारी, चिलत हीरगुरु चरणविहारी । श्रीविजयसेनसूरीसर तेडा, तुं तपगछका तारण बेडा ॥१९॥ गणधी(धा?)री धर लीजइ सब म(अ?)ब भार तुमही सिर दीजइ सजल नयन शर नामइ पाया तुम जय लद्धयो तपगच्छराय शंकर कहत बोल लवलेसा, हीर सूर उदयु बहुदेसा ॥२०॥
ढाल ३ ॥ राग असाउरी ॥
दूहा ॥ देस विदेस विहारता, मारगि उछव रंग । ते कवीअण किम वर्णवइ, पंडित पोढा संग ॥१॥ श्रीवाचक उर चि- ध गणि, मुनिजन वादी साथ । उद्धत प्रतिवादी गजां, केसरि परि दि बाथ ॥२॥ शहर शरोमणि आगरि, पुहुता उछव कोडि । थानसिंह हय गय दीउं, लुंछन करि करजोडि ||३|| कोडिगमे सोवण्ण धण, विलसइ संघ सुजाण । आयु त्रिभुवनतिलक गुरु, सव गच्छपति सुरताण ॥४॥
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________________ 18 अनुसंधान-२४ ढाल कडखानी // असाउरी // सखी देखीइ जैन सुलतान आयु, भविकजन कोडि आनंद पायु मुनिपती नरपती गुणीअ सुंदरमती, त्रिभोवनि हीरजी हर्षे गा[यु] ॥स० 1 // गाजता गयवरा हींसता रयवरा, नरवरा सुरवरा खेचरा सोहइ / पालखी डोल चकडोल सुखआसनां -सनारूप थई जगत्र मोहइ // 2 // शाह अकबर सबरसेन स्युं सामही याउ कहि पुत्र वड शाह काजे / -करीअ तसलीम सेषूजी गुर लेनकुं, आवहि साइ(ह) चक्रवर्ति दिवाजइ ||3|| बहुल नीसाणकी वाणि घूम्मइ सही, गहगही सपत वाजित्र वाजइ / व्यवध नफेरीआं मदन वड भेरीआं, नेरीआं शब्द असमान गाजइ // 4 // ताल कंसाल रणकाल(?) मन मोहतां, राग के अंग मीरदंग जोडी / याचका व्यवध गुणगंज मन रंजस्यु, भणइ सो यूथ मिलि लक्ष कोडी / / 5 / / छत्रचामर झगइ पानसोविन भगि, लगि असमान झंडाल नेजा / कामिनी सीस लीइ कलश सोविनतणा, झलहलि सोइ त्रिभुवन तेजा // 6 // धरणितल-फ(पु?)शंकला(ल)नेउर जरजरी, रेसमा हुर भाती विछायु / कहत शंकर सदा कोडि मंगल मुदा, धर्मदा हीरसूरिंद पायु / / 7 / / ढाल 4 // राग गुडी // दूहा / / शुभदिन जाई गच्छपती, श्रीअकबर प्रति धर्म / आसीसा देई वदइ, पूछइ बहुला मर्म // 1 // गौड चौड कर्णाटना, कासमीर ग्वालेर / वादी पुर पइठाणना, गूजरउर आसे(र) // 2 // इम वादी विकट गोरख वडा मुकंद (?) व्यवध वाद जीतइ व्यकट शांतिचंद भाणचंद // 3 // सरसंधी को न - सकइ, मोड्या मान मरट्ट / वाचक ..... विबुधस्यूं, हीर लहि जयवट्ट // 4 //
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श्रीविमलहर्षवाचक प्रमुख, श्रीसोमविजय उव झाय । तास तणा गुण देखि करि, दिल्लीपति चमकाय ॥५॥
ढाल ॥ दिल्लीपति पतशाह अकब्बर, बोलइ बोल विचारी हीरविजयसूरीसर देख्या, साचा परउपगारी बे |दि० १॥ योगी यंगम यती शन्यासी, सोफी शेष मुलाणा मंती तंती यंती बहुविध यंदा जोसा जाणा बे ॥२॥ बौध वेस दरवेस सु तालिम(?) यौ वैष्णव अनुरागी को लोभी को धर्म न बूझइ, सो मत कहु वइरागी बे !॥३॥ दंडधरा मठधारी नागा, कंथा कंठि चलावइ गोदडीआ उर कडी कापडी, सो मनि कबूअ न भावइ बे ॥४॥ भसम चढावइ जटा धरावइ, मौनी नाम सुणावइ पंच धरि जे अगनि व्वो(छो?)डावइ, परमारथकुं ध्यावइ बे ।।५।। गिरी पुरी भारती कहावइ, ऊभा करि आहारा कीधी कपटी कूड चलावइ, सो किडं पामइ पारा बे ॥६॥ बोलुं बोलुं हक्क पुकारि, आप करि जीऊ मारि सो गुरु ग्यानी ग्यान दिखावइ, ऊभी पार ऊतारि बे ॥७॥ नारी भेष धरी जे नाचइ, अंगभंग दिखलावइ अयु प्रसाद जगदीश्वर केरा, मन भावइ सो खावइ बे ॥८॥ लाल गुलाल अबीरु छांटइ, दधि घमसाण मशचइ(?) कृष्ण उपर गोपिका बनावइ, अंगोअंगि लगावइ बे ॥९॥ घोडे हाथी मुहुर नगीना, दो दो तीन सु धारी बेटा बेटी व्याह चलावइ, लालुं के व्यापारी बे ॥१०॥
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अनुसंधान-२४ खइर महिर की वात न छूझइ, युं भावइ त्युं बोलइ बहुत करी मइ दिलकुं विच्यारा, हीर धर्म नही तोलइ बे ॥११॥ मइ फुरमान इउ फुरमाया, यो च्याही सो दीआ राउ विलतपइंडे किउं आ(?) सो जन कच्छूअ न लीआ ॥१२॥ हीर कहत पतिशाह-मुगामणि, हम योगी वइरागी खेल स्वीडोल(?)हयगय सुखासन उन तई हूए त्यागी बे ॥१३॥ हम व्यवहारी वाणि पुत्र घरि मांगी खाणा खावइ रागी जमात (?)मा नही तनमइ वांकी वाट न पावइ बे ॥१४॥ पातशाह बहु वसु हेम धन पेसकसीमइ छोड़े हीरबीजइसूरी कहि हजरत उनमइ कच्छूअ न लोडुं बे ॥१५॥ मोती लाल पावि(मणि?) परवाले, देतइ कछूअ न लीना गाजीशाह कहि सब यूठे हीरा खरा नगीना बे ॥१६॥ यो उसाफ सुण्या था तेरा सो मइंनय तुं देख्या पाकदिखें पूरा वइरागी उर न को जगि पेखा बे |१७|| हृदि अवंसा धरति छत्रपति यो च्याहीइ सो लीजि मांगू को दिन जीउ न मारि ता फुरमान सो दीजि बे ॥१८॥ पेस कीआ जही तुम मांग्या हीरविजइसूरि लेवइ शाह खिताब श्रीजगत्रगुर का पेमु करी तव देवइ बे ॥१९।। कोऊ मांगइ देस नवेरे दाम जरीना जोई हीरि उमरयना(?)वर मांगी उर न अइसा कोई बे ॥२०॥ शाह कहि हम ही थइ तेरे, च्यारि खंड मइ थाणां मई हुं गुणित देसका साहिब, तु त्रिभुवन सुलतानां बे ॥२१॥ सीस धरी फुरमान मेवडे, देस विदेसुं धावइ उहां के खान मलिक उंबरे सो शिर परिई चढावइ बे ॥२२॥
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त्रिभुवन भाण भुवनका दीवा, श्रीजिनशासन राया श्रीहीरविजयसूरीसर के शंकर प्रणमइ पाया बे ॥२३॥
ढा. ५ ॥ राग हुसेनी ॥
दूहा ।। गूजर थइ कागल लखि, श्रीविजयसेनसूरिंद । वेगिइं देसि पधारयो, मन-चकोरका चंद ॥१॥ लोचन तरसइ तातजी, दरसिन तेरे काजि । सूधुं नीरागुपणुं, देखाड्य मुझ आज ॥२॥ पाटण अमदावाद अरू, खंभायत धुरि मंडि ! विवध अभिग्रह आदरि, के वि वगय छ छंडि ॥३॥ दिल्लीपति प्रति वीनती, करइ प्रयाणइ रेस । अकबरजी कहि जगत्रगुरु, तुम किउं याउ विदेस ॥४॥
ढाल ॥ अयारांदपुबे (?) हम हइ रागी यु वइरागी चिलनकुं चितवइ राहा । जगत्रगुर श्रीहीरविजय प्रति कहत अकबर साहा ॥१॥ अ० ॥ तुम हम हीके घणे जीऊ परि छोर्या मइं किउं यावइ । बुजरक वार पाक दीदारा दिल मोरसुं भावइ ।।२।। अरज एक हइ अवल उलीआ मुझ धोरी पटधारी श्रीविजयसेनसूरि सब मुनिस्युं लिखत हइ वारोवारी ॥३॥ शाह करि जु मोहि दरसकुं, जु भेजु हम पासुं । कुल होइ तु रुखसद देवई, किउं करि होइ उधासुं ॥४॥ वड वजीर तबतइ श्रीवाचक शांतिचंद हइ तेरा । सो तु मेरे पासहि छोडु तु दिल मानइ मेरा ॥५॥
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अनुसंधान-२४ भाणचंद खासो हइ पंडित मेरे दिल हुं सुहावइ । जगतगुरु थु, तेरे नमुने हम बगसीसुं पावइ ॥६॥ शांतिचंद वाचक सइ हाथिई श्रीगुरु शाहकुं देवई । दिल्लीपति सुलतान अकब्बर . . . . . . . . . !|७|| प्यार करी तब हुत परगने घोरे हाथी [न]जराना । उर कछू महि मांगु सो भी हम तुमहीकुं दीना ना ।।८।।
ढाल ६|| राग मारू |
दूहा ॥ श्रीहीरविजयसूरि प्रतिइं श्री अकबर सुरताण । बहुत दिवसनइ अंतरि, आपि सीख प्रयाण ॥१॥ चतुर शरोमणि बुद्धिनिधि, अकबर-गुरपद जेह । शेष श्री अव्वलफजल शाह प्रतिइं कहि तेह ।।२।। जब लग श्रीगुर हीर है, तब लग दिली अमारि । अरज करत हम जिहि रहि, तिहां काउं होवइ मारि ॥३॥ श्रीहीरविजयसूरिंद प्रति, जे जे दीधा बोल । शंकर कहि सोई वहुँ, सांभलतां रंगरोल ॥४॥
ढाल ॥ शाह अकब्बर गुर प्रतिइं करि ग्रही तव देवइ मान । जीव न मारुं तुमनई ना(ता?)के हो देवइ फुरमान ॥१॥ शा० ।। प्रथम वार श्रीरवितणा, नसदिन हो न न कहिणा मारि । गौ-गोवछा केरडा ताकुं हो ज(जा)णुं तुम आधार ॥२॥ शा०॥ वाघ वडे हइ सीगलीउ रची ते हो मोटे कलि हार । साऊषे न लुंहा न न बाहु, हो यमुना मइ जार ॥३॥
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वड सरवर मछीआं भरे, ता मइ हो न न मेहलुं डोर । बहिरी बाज न छाडिहुं न न पाडु हो बनमांहि सोर ॥४॥ मृग न मारुं नासता वनचरा सांबर अरु हो रोझ । कारशकार तणा करुं न धरूं हो ए पशुअनका गोझ ॥५॥ जनमदिवस अकबरतणा आपि हो खेलइ नवरोज । तस दिन कोऊ न जीऊ मरि मेवडे सो लेसो लेवइ षोज ॥६॥ श्रीअकबरसुत तीनके जनमके दिन सोइ अमारि । पजूसण दुमणे पलइं, अट्ठाई तो तुं संभारि ॥७॥ ईद परव पतिशाहकु, शाहकी हइ जे चांदराति । वरसगांठि शरकारमइ जोतम(?) दिनु नही जीउ का घात ॥८।। बंद छोडाए बहु दुनी जीउ थइ न न मारूं चोर । तुम दरिशन पातक टरे जे जे हो मइ कीए अधोर ॥९॥ अयुं अब केते दिन ही एसो कहत हो किम आवइ पार । उमर वधारि हीरजी, सब पंखी पशुअन आधार ॥१०॥ दयाधर्मध्यारी हुआ छत्रपति श्री साह जलाल । दीन दुनीका पातशा उछव हो करि मंगलमाल ॥११॥ मेरी आज्ञा जब लगि, तब लगि हइ तेरी आण । अइसी करि वलामणीउ, उज्जका(?) निजहत्थि फुरमान ॥१२॥ आप मस्यारे (?) मेवडे, श्रीगुरुको सो सेवइ पाये । कहि शंकर गूज्जरप्रति, आवइ हो श्रीतपगच्छराय ॥१३।।
राग केदारु ॥
दूहा ॥ धन्यविजय धेन(धन) धन्य सो, महीतलि रक्खी माम (?) । जंघाचारणनी परिई करइ हीरनां काम ||१।।
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अनुसंधान-२४
धन्य हीर अकबर सुधिन, धन्नविजय धन धन्न । हेम रत्न कुंदणपरिई वणि मिल्यां एक मन ॥२॥ त्रिभुवन हिंसा वारवा, सेनानी समत्थ । धन्नविजय पंडित शिरिई, साचा जगगुर हत्थ ॥३॥ श्रीशांतिचंद्रवाचक प्रतिइं, थापी छत्रपति पासि । उद्भुत गुतबव(?) पुण्यघट, विचरइ मन उल्लास ॥४॥ श्रीजिनशासनसुलतानजी, आवइ जेम सुलतान । महीतलि आण मनावतु, त्रिभुवन लहितु मान ॥५॥ सारं बध किउं बनि सकुं, मेरे मुखि एक जीह । हीर हीर - वर जपि, सुजसचंद कीअ लीह ॥६॥ आनंदिउ संसार सब, पशुपंखिनि कुलकोडि । असपति नरपति गजपती, सीस नमि कर जोडि ॥७॥
ढाल ॥ मारु ॥ . आविइ होर धर्मविणजारा, सब पुन्य वस्तु नही पारा । सई सबल वृषभ मुनि धोरी, धरि सबल भार रीस बोरी ॥१॥ गुरगुणके छतीस कृयाणे, सो सबहि समेटी आणो । जे आंग उपांग के जोडे, सो धरहि भार नही थोडे ॥२॥ गुरवाणिसु साकर सारा, बनावइ गिहुं परि फारा । गुण गूंणीमई न न मावइ, सो परमारथकुं ध्यावइ ||३|| वर वाचक हाथी डोडे, मुनि सबल सेन नहीं घोडे । जिनआण-समीआणे डेरे, जिणि पाप वेरै सब थेरे ॥४॥ नव चा(वा?)डि फिराई वालइ, इयु देसविदेस स्युं चालइ । तहां सुजसवाज बहु वाजइ, शोभा धजती(नी?) परि छाजइ ॥५।।
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तस नायक नवल निरंदा, श्रीहीरविजयसूरिंदा । सौ वेचइ धर्मक्रयाणा, ताथइ नायक लाभ सुजाणा ॥६!। वसलाभ प्रगुट जगि जाणइ, तेहनि शंकर वलीअ वखाणि । नागुर पवित्र सुकीना, तीहां आवइ हीर नगीना |७|| सो वात वइराटि सु जाणी, सा. इंद्रराज गुणखाणी । सो करहि विमल प्रासादा, वडा शिखरबंध गिरिवादा ॥८॥ गुर आइ प्रतिष्टा कीजइ, हम लछिका लाहा लीजइ । हम लिखइ लेख शिरनामी, पाउधारु जगत्रगुरु स्वामी ॥९॥ तव पासइ वाचकइंदा, श्रीकल्याणविजय मुनिचंदा । वइराटि प्रासाद उतंगा, जाइ करु प्रतिष्टा रंगा ॥१०॥ गुरवचन सु सीस चढावइ, वाचक वइराटि आवइ । तब करि नगर श्रृंगारा, सो वरसइ हेमकी धारा ॥११॥ दोइ कोडि द्राम सुविलासा, इंद्रराजकी पुहुचइ आसा । इम वाचक बहु जस पावि, कल्याणविजय मनि भावइ ।।१२।। नित काज वडे इम कीजइ, श्रीहीरकुं उपम दीजि । सीरोही टांडा आवइ, चुमास चतुर तिहां छा(था)वइ ॥१३॥ कितु देख्या सुन्यान जाण्या, सो वेचइ धर्मक्रयाणा । वडा राय खित्रीआं राणा, प्रतिबोधइ शवर (सरव?) सुजाणा ॥१४॥ इम पाटण अमदावादा, खंभायतका जगि नादा । खान आय मल्या बहु बंदा, नवा न - का करि आक्रंदा (?) ॥१५॥ सो हीरजी बंद छोडावइ, निज देस गाम घर पावइ । तस संघ पुण्यफल लेवइ, श्रीहीरकुं लाभ सुदेवइ ॥१६॥ पातसाह सनाषत चारा(?) - ष वडा धर्मविणजारा । इस पासि वडे फुरमानां, सब जीवकुं अभयादानां ॥१७॥
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शंकर तस प्रणमइ हेजिइं, श्रीहीर तपइ तपतेजिइं । गिरुइ कीआ ध- मु गाला, वसुधा भई मंगलमाला || १८ ||
ढाल ८ || सारी
दूहा ||
शांतचंद वाचक प्रतिइं, कहत अकब्बर शाह । श्रीविजयसेनसूरिंद किउं नाया कहत उछाह ॥१॥ तुम याई ए वथुउ (?) - हीर पेस क्या लेउ । वाचक कहि श्रीशाहजी, विमलाचल गिरि देउ ||२|| सेत्तुं सयल मुकी तमुं (?) तुम ही दीया गिरनार । श्रीहीरविजयसूरि पेस कीय, दीइ फुरमान उदार ||३|| ढूंबा जेउर जाजीआ, अकर करि जे कोइ । सूली फांसा टालया, भुमथी ( ? ) छंडे सोइ ||४||
भाणचंद उवझायका, वेग देयो वास । हुआ पहुचाई हीरकुं कुछ्य मांगतहु हम पासि ॥५॥
आदमुं मोकलाय करि, वाचक गूजर देसि । आवइ बहु उछवसहित विजय बुलाव नरेस ॥६॥ हीर पाय प्रणमी करी, महीतलि सो फुरमान । सेत्तुंजगिरि मुगतु सदा, सब जीवकुं अभयादान ॥७॥
रायधनपुरवरमांहि तव, श्रीगुर अछिचुमासि । श्रीविजयसेनसूरि तेडवा, वड मेवडा उल्लासि ॥८॥
अनुसंधान - २४
आइ कहि श्रीजगत्रगुर, तुमे संभारु बोल । श्रीविजयसेनसूरिंदकुं भेजूं उहि रंगरोल ॥९॥
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राग मल्हार सामेरी ॥ श्रीविजयसेनसूरि कहि, जगगुर प्रति कर जोडि ललनां । अब कहिणा यूगता नही, हम शिर तुम कर छोरि ललनां वि. १॥ कहत हीर मुनिहंसकुं तुम कब न रहे दूरि । 'जाउ' कहुं किम आ मुखिइं, हृदय प्रेम जल पूरि ललनां ।।२।। मेरे बालवइरागी लाडिले तपगच्छध(धु?)र धोरी धीर ललनां । कहां लाहुर गूजर कहां किउं याउगे वीर ललनां ॥३॥ तुम प्रतापि जिहां तीहां दिन दिन हुइ रंगरोल ललनां । माहि(टि?) आदेस दीउ गुरजी 'मनकापड के वो (बो)ल (?) ललनां ॥४॥ सीख मागि गुर केरीआं महीतलि दिली अवाज ललनां । विजयसेन-शाहा मिलनकी, संघ करि सब साज ललनां ॥५॥ साथि लीए बहु मेवडे, मुनिजन वादी संग ललनां । सा मंडाण जु देखही सबजन होवइ रंग ललनां ॥६।। हीरविजयसूरि पाए नमी, तेहस्युं मांगइ सीख ल. । मो शिर पणि (एणि?) धरु गुरजी, जिम धरी देतई दीख ललनां ॥७|| तीन प्रदक्षण देवही, तुम पय मोहि आधार ललनां । वृद्ध भाव वहइ तुमतणा, तुम तन करणी सार ललनां ।।८|| अंदेसा मनि मत करु झूकी(?)सीस विदेस ललनां ।। तुम हृदयां भीतर धरूं, हीर सुमंत नरेस ललनां ।।९॥ तुम मेरे माता पिता, तुम मेरे सुलतान ललनां । वेगिइं चरण दिखावयो, तीन भुवन के भाण ललनां ॥१०॥ अनुक्रमि देप(स?) अजूआलता लाहुरि नयरि पहूत ललनां । उच्छ्व हुइ अनेकधा शंकर कहत बहूत ललनां ॥११॥ १. 'मत काएड(र)के बोल ललनां' (?) ।
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अनुसंधान-२४
ढाल ९! राग केदारु ॥
दूहा ॥ श्रीअकबर पतिशाह प्रति, भाणचंद मुनिचंद । वीनती सामहीआतणी करि सुमंगल-कंद ॥१॥ सब वाजित्र पतिशाहकु, हय गय रथ असवार । संघ मल्या अतिसामटा, सो गणत न आवइ पार ।।२।। उत्तम दिन संजोइ करि, मिलिसु मन उच्छाह । देखी दिल भींतरि खुसी, इस गुणका नही ठाह ||३|| शाह परीक्षा कारणि, विविध बोल पूछंति । तस उत्तर सुलतान प्रति, हरखिई रंजन दिति ॥४॥
राग केदारु ।। तुम पग्मचारी किउं आए हो जगगुर के लाडिले तुम बहुत पिराणे पाय(ये) हो ज० । क्हु हीरजी हइ कुण ठाणि हो ज० ए कछ्यू कहीहि मेरेसु वाणि हो ज० ॥१॥ कद हमकुं करत अयाद हो ज० कइधु मोहे अजपा नाद हो ज० । तुम तास सीष्य पद ठाणि हो ज० हम पेग(म)सु लाया ताणि हो ज० ॥२॥ तुम आप खित्ताब गुरुं दीआ ज० तुम आप बराबरि करि लीआ ज० । तुम अवल कुण हइ याति हो ज० वइराग लीआ कुण भाति हो ज० ॥३॥
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तुम गाम ठाम कहां धाम हो ज० तुम माता पिता क्या नाम हो ज० । तुम कइसा पालु धर्म हो ज०१ ॥४।। तुम केरे केते सीस हो ज० तुम किउं करि बारी रीस हो ज० । तुम क्या क्या पढे हो ज० तुम कुं करि कीआ मन गढे हो ज० ||५|| तुम ध्यान योध बलवंत हो ज० तुम जपहु कुणका मंत हो ज० । तुम खासे पंडित कूण हो ज० तुम मइ नही देखत उण हो ज० ॥६॥ हवई ए बोलनु जबाप श्रीविजयसेनसूरि दि छि । एह ज ढाल ॥ त्व विजयसेनसूरिंद हो महीधरण लाडिले कहि अकबर प्रति सुखकंद हो म० । हम छोड्या वाहनभेद होम० हम चलत न पावइ खेद हो म० ॥१॥ हए हीरजी गूज्जर देस हो म० उंहि बहुत हइ नयर निवेस हो म० । मइ तास सीस रजरेणु हो म० तस राग मोह्या मन एण हो म० ॥२॥ मइ तस पद पंकज हंस हो म० तांका कछ्यू मो मइ अंस हो म० | तुम क्षिणु क्षिणु करत अयाद हो म०
तुम गुणके लीने नाद हो म० ॥३॥ १. एक पंक्ति छूटी गई छे एम जणाय छे.
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अनुसंधान-२४
कही धर्मवधारण वाणि हो म० दीदार कु आप इहि ठाणि हो म० । हम अच(व?)ल याति ओसवाल हो म० त्यागी था जब मइ बाल हो म० ||४|| मइ अथिर कह्या संसार हो म० ताका किउं आवइ पार हो म० । नुडलाई हमारा गाम हो म० कमासा तातका नाम हो म० ॥५॥ कोडाई मेरी मात हो म० सो छांड्या कुटंब संघाथ हो म० । दान शील सुतप भाव धर्म हो म० तामइ जीवदया वडु मर्म हो म० ॥६॥ हम सीस हइ देस विदेस हो म० को पोढे को लघु वेस हो म० । तामइ नंदविजय लघुसीस हो म० तामइ 'अष्टविधान नरीस हो म० ॥७॥ हम ध्यानी तपकइ तेजि हो म० हम ईश जपि मन हेजि हो म० । इम सुणी अकब्बर शाह हो म० दिल भीतरि धरत उच्छाह हो म० ||८|| कहि शंकर वाधिउ वान हो म० प्रतिबोध्यु वड सुलतान हो म० । जिनशासन राखी रेह हो म० जगि करुणा वूठु मेह हो म० ॥९||
१. अष्टावधान ॥
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ढाल ॥ राग रामगिरी ।।
दूहा ॥ आलमपनह जलालदीन अकबर कहत सूजाण । ईछा लिपबइतां लिषि देखइ अष्टविधान ॥१॥ नंदविजय सो देखी करि, मेटी लिखि सो फेरि । ऊलटा वांचत नही खता प्रबल विधांनां नेरि ॥२॥ नंदीविजय प्रति साहजी, थापि सो खुशिफिम | उर परीक्षा अतिभली, करि शाहजी इम ॥३॥ वादीजित् शवशाशनी, तास छोडाया मांन । घोडा महिषी महिष न न मारि सो फुरमांन |४||
ढाल ॥ मुनिपती तुम्ह योगी बिरागी सब संसार के त्यागी हो तूम्ह गूण देखत भए रागी हो
॥१ मुनि० ॥ अवल एक पूछत हूं तुम्ह पिं पतशाह कहि बांनी । सूरिज गंग संग न न बंछु साच जूठ क्युं जांणी ॥२ मु०॥ च्यार खंड के पंडित सब मिली उनकी देत ऊगाही । विजयसेनसूरि कदि हठरत उनमि सूधि मति नांही ॥३ मु० ॥
__ जगतपति तुम्ह हु धर्म के रागी । सूरेज नाम शितसहस पढि हम, गंगरंचित भीना वाद करत वादीकु ऊतर, जो पूछत सोई दीना ॥४ जगत० ॥ अकबर शाहकु दिल खुसी भई, कहि मांगु सो दीजि । लाहुर आदि शंध-ठठा लगि, मारिनिवारन कीजि ॥५ जगत० ॥ मारिनिवारन मास छहू लगि, जगतगुरुकुं दीनी । अब तु सकल भूवनप्राणी प्रति उमरवधारण कीनी ॥६ मुनी० ॥
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अनुसंधान-२४ हीर बीर(बर) सावो त्रिभोवन काजी के विसे धोरी (?) शंकर कहत कोडि गुण तुम्हमि हूं क्युं बरनूं मति थोरी ॥७ मुनी०।।
ढाल ११॥ राग मेवाडो ॥ शाह मुराद अ क )बरसुतन, गाजि अम्हदावादि । पंडित गूणचंद पासिहि पटु फिरावि नादि ॥१॥ हीर खजांनि बिमलगिरि जाणी जगतमझारि । .... संघ चलावही, जे कुंता (हूंता?) संसारि ॥२॥ धन्यविजय पंडित प्रथि, सेत्तूंजगिरि नूं काम । जतन करेवा सुपहीसू, केइ न मगि (मागे?) दाम ॥३॥ पूरव पछिम उत्तरा दक्षण बहला देस । विवध सजाई वाहनां, विवध संचऊर वेस ॥४॥ लाहूर ओर नीलावभमल(?) गौड चौड करनाट । बेंगाला काबिल प्रटे, भोट छोट अ लाट ॥५॥ कासमीर खूरसाणका, शंधू सव लेख ताई । मूलतांनी ग्वालेरका संघपति सब आई ॥६॥ मरुधर मालव सरसोरठी, मेवाडी मनरंग । वागड नमीआडा तणां दख्यण केरा संग ||७|| पाटण अमदावाद उर, खंभाइत गूणगेह । संघपति गूजर तणा, सो दानि वरीषि मेह ।।८।। चुरासी बंदिरतणा, सोरठ संघ विनाणि । श्रीहीरविजयसूरि आपथिं धिन विलसि न न कांणि ॥९॥
(ढाल |) मूवी(पुहवी?)के भूषनां सेचूँजि पधारीइ सब भविका प्रति पार ऊतारीइ । संब(घ) दूख दूरीआं दूरि निवारीइ तूम्ह हा बोलावन अंवर उछारीइ ॥१॥
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नूटक: उछारि अंवरा संघपती सब बीनती गुरुपि कहि
सो वचन मांनी परम ध्यांनी रीदय भीतरि गहिराहि ॥२॥ अनेक उछ्व रंग वाधि साज बहू सेजवालीआं माफा सो घोडे विहिलि नव नव कोरनी बहूजालीआ ||३|| चालि : हय गय बहुले बहू असवारा, पाइक पाला संघ न पारा 1 श्रावक श्रावी कोडि ऊदारा, जांणू के आया सब संसारा ॥४॥ टक : संसार सब मिली कर चालइ सेस भारई ( ? ) हिंडोल ए । अनेक बंदी भाट द्रव देव गुरु गुण बोल ए ॥५॥ अनेक मूनीपती तास छत्रपति हीरजी व्यंतामणी
वरविमल वाचक पंडिता गुण पुरगो (?) हि( ही ) र वडा गुणी ||६|| चालि : भल समीआणे बडे बडे, डेरे खड़े सो कीने रे । देखत दूरगति टारै फेरे, जांणू धर्म कि पर्वत वेरे ||७||
त्रूटक : परबत वेरे पून्य केरे वाडि आडि करि दूखां अनेक तंबू उर सराचे (?) तोरणां सो नवलखां ॥८॥ पालखी डोली छत्र चामर सीकरी सो सोभकूं झुंडाल नेजा रसणि..... जा भकूं ॥ ९ ॥
चालि : इसे संघपती साज बहू कीआ, धरम के कारण आसन बहू दीआ । इसी करणी धरणी मिलिआ, मुगतितरु के फल यु करी लीआ
॥१०॥
त्रूटक : यु लीए फल बहु मूगति केरे भलेरे कारिज करि - रत आविं अचल दीठु बहूरि दीसि तेह परि ||११|| अभीनवा साहामी भक्ति भोजिन लाहण रूपा हेमकी चिहुं पासि मंगल वाद वाधि वदि वाणी खेम की ॥१२॥
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चालि : हीर गुरखी (की ?) त्रिभूवनि रेहा, जिनशासनकी टारी खेहा । संब(घ) दूख [छां?] डी मंड्या नेहा, जांणूं वूठा अमीसो मेहा ॥१३॥
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अनुसंधान-२४ Jटक : सो मेह वूठा आज तूठा हरिख भरि कुलदेवता
ध्यन सो मानव विमलगिरि पिरि हीरगुरुकू सेवता ॥१४॥ आश्चर्य मोटू महीअ माहि छत्रपति सेतुंज दीइ तेजपाल प्रति कहि शंकरी ते हीरजी बहू फल लीइ ॥१५॥
ढाल १२ ॥ दूहा ॥ सेतुंजगिरि श्रीआदिजिन, जगगुर हीर रतन्त्र । एक ठुरि जो वंदही सो नर नारी धिन ॥१॥ ज्यूगप्रधान श्रीजगत्रगुरु तास सूजस वीस्तार । विस्तारी कवीयण कहि सो किमहि न आवि पार ।।२।।
राग केदारो ॥ लाभ लही श्रीजगत्रगुरू बोली, सेतुंज समु नही तोलि रे । मूगतिखेत्र ए साचु जाणु कुमती कां मन डोलि रे ॥१॥ मि वंदुरे गिरिचंदु रे सब तीरथ, चंदु रे भविजन पापनिकंदु रे जिणि दीठि भाजि भवदंदु रे ॥२ वंदु० ॥ संप्रति जिनना सीस मूनीश्वर पांच कोडिसू सीधा रे । पुंडरीक सो एतां कोडी अणसण लाहो लीधां रे ॥३ वंदु० ॥ नमि वीद्याधरना हीआ दिल(?) पूत्र सू जोडी रे । साढी पांच कोडी मुनि साथि वाडिल (वारिखिल?) द्रावीड दस कोडी रे
॥४॥
भरत अनि श्रीराम मूण्यंदा, तीन तीन तस कोडी रे । नारद लाख एकाणूं रखिसूं, भवनी सांकल छोडी रे ॥५॥ पांडव पांचि वीसां कोडी, संबू नि प्रद्युमना रे । साडी आठ कोडी मूनी साथि, सीव पाया नही दूम्ना रे ॥६॥
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पूरव वार नवांणू आदिल, विमलाचलि पुहुता रे । नेम विना त्रेवीश तीर्थंकर, सूरवर मूनीवर जोता रे ॥७॥ रायणि रूखतलि पद ठावी, धावी निज मूनि ध्यांनां रे । भरत प्रमुख ऊधार घणेरा, बहुत कहुं क्या मानां रे ॥८॥ कंकर कंकर सीध अनंता, होइ गया नगराजि रे । तीरथ महिमा वधारि श्रीगुर, श्रवजन तारण काजि रे ॥९॥ नरग निगोदि अनि तीरजंचाथी तुं कुगति निवारी रे । नरवर देव गती सूख साधि, एणि गिरि चढिए वारी रे ॥१०॥ इम ऊपदेस लही श्रीगुरथि, 'मूंगता सोथि (?) पावे रे । देस विदेस केरे संघपति हीर साथि लि आवे रे ॥११॥ शंकर क्यु मनि भावि श्रीगुर, वड संघपति जयधारी रे । रंगवधारण तेज वधार[ण] कीरति निति कहूं तोरी रे ॥१२॥
ढाल १३ ॥ राग मेवाडो ॥ मेरा मनपंकजका भमरला रे, श्री विमलाचलि वासो रे । मोह मांडि छांडी रहु रे भोगी लीलविलासो रे ॥१ मेरा० । हूं तरसू तूझ देखवा रे तू नवि आणे चीतो रे । एकपखु ए नेहलु रे, निपट न मोही मीतो रे ॥२ मेरा० ॥
आदिल आदिल मि जपूरे, ज्यु बापीयडा मेहो रे । लिखइ न एक संदेसडु रे, एकपखु ए नेहो रे ॥ ३ मेरा० ॥ डूगर ऊपरि डूगरी रे तिहां ति कीधु वासो रे । योग धरी अलगु रा रे, तू इह भूवन करइ वासो रे ।।४ मेरा० ॥ मातपिता जेणई जनमीउ रे, लाड लडायु जेहो रे ।
तासतणउ तूं न हूउ रे तु हम नाणूं छेहो रे ॥५ मेरा० ॥ १. सुगती सो थि(दी?)पावे रे (?) ।
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अनुसंधान-२४ मति तुं सब कर्यु सरिखू रे, न लहिउ आप पीआरु रे । भरत सरीखा भोलव्या रे, वेलत- कीधी सारो रे (?) ६ मेरा० ॥ धिन विमलाचल रूखडी रे, धिन ते सरस मोरो रे । राति दिवस तुम्ह देखही रे, लेखइ सोरा सोरो रे I७ मेरा० ॥ में रीझं (?) परदेसी प्राहुणा, मो दिलमंदिर आवो रे । सकलसु खावी सूखडी रे प्रेम करी तूं लावे रे ॥८ मेरा० ॥ आदिल कहितां उहुलसूं रे, देखू तोरी वाटो रे । घडीअ घडीअ आवी मिलूं रे, पंथ न सरज्या मोटा रे ॥९ मेरा० ॥ ताहारि मनि त्रिभोवन वसि रे, माहारि मनिं तू एको रे । वीनतडी कोडि लखू रे, कहित न आवि छेको रे || १० मेरा० ॥ दीठो लेसूं भांमणां रे, ललीय ललीय नमूं पाय रे । निठोर नाथ मनावस्यूं रे सेत्तुंजगिरि तु नाया रे ॥११ मेरा० ॥ शंकर कर जोडी कहि रे, आदिल लील भूआल रे । आशा पूरे अम्हतणी रे, न्व (?)(भ) वि भावन प्रतिपालो रे ।।१२ मेरा०||
ढाल १४ ॥ राग गुडी ||
दूहा ॥ आनंदि सब जब जगत तणउ संघ मिली गूणधाम । श्रीविजयसेनसूरि प्रति, लेख लिखइ अभिराम ॥१॥
ग्वालनी योबन गरब गहेली - ए ढाल ॥ मोहन हीरजी केरा लाला, जपि..... गि तो गूनमाला अतिहि निरागी तूम्ह होए, अकबरशाहतूं मोहे ॥१ मोह० ॥ चालि : गूजरथि कागद लिखि लाल, संघ सो वाल हम हा तरसि (?) तोही दरसि तोही दरसनकू खबर न करहू कपाली, खबर न करहू कपाला संज्यभो... चूआला ॥२ मोहन० ।।
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37 तुम्ह बिछूरि बहू दिन भए लाल हम क्यु रहि ना जाइ पूछे पवरे जोसी जांनां श्री गुरुकइ कब आई श्रीगुरु किधु कब आवइ सब जपे मासा(ला?) पावइ ॥३ मो०।। यू गूमांन न कीजीइ लाल रूसं जाई बीदेस हम खिजमतथिं कछूअ न चूके ईतनी चढाई क्युं रीस ईतनी चढाई क्यु रीस जपि गुण तीहा नीसदीसइ ।। ४ मो० ॥ साहिब तेरा हीरजी लाल आणि क्युं मनमांह निपट निमोह न होईई साजन महिर न आतु मनमाहि महिर न आतु मनमाहींआं तपति उ नारि बिन छहीआं (?) ॥५ मो०॥ चलन न देता दोही कू लाल जु जानत विसी घात हूं बूझत तूम निठोर निरागी सत न रहिईन बातु गूनहनबाढि कछू गातुं (?) ॥६ मो०।। श्रीविजयसेनसूरीसरु रे लाल सब मुनी के सिरताज शंकर तेज वधारण लाला चलनकू ढील न काज चलन कू ढील न कीजइ सब जन आनंद सू दीजइ ॥७मो० ॥
ढाल १५ ॥ राग धन्यासी ॥ मि पाउ रे सब जगकु तारण पायु हीरविजयसूरीसर गातां हैअडइ हरिष न माउ रे ॥१॥ श्रीविजयसेनसूरीसर ग(गा)तां, भणे रसना अंमृत पाउ चरणइ कमल मन ज्युं मधुकर पति पूरण प्रेम अथाउ रे ॥२ सब०॥ श्रीधर्मसागर मोटा वाचकवर विमलहरिष उवझाया शांतिचंद वाचक गुणसागर परिघल पून्यि पाया रे ॥३ सब० ॥ सकलकलानधि भविकजनबोहक कल्याणविजय गणधारी सोमविजय उवझाय पगट मल भाणचंद सी जोरी रे (?) ॥४ सब०॥
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अनुसंधान-२४ पंडित गणिवर मुनिवर सूंदर जिति ज्यत्यनी मनि भाया श्रीहीरविजयसूरीसर केरा सपरिवार सूखदाया रे ||ज्ञ सब० ॥ संवत सोल एकावन(वोछरि, श्री निजामपुरि आई तपगछपंडित गिरुआ सीसि वेली विजयसू गाई रे ॥६ सब० ॥ जब लगि मेरु मही रवि शशि नग सागर वाहनि राजइ हीरविजयसूरी कहइ शंकर जस पडहु तब गाजइ रे
सब जगकु तारण पाऊ ॥ इति श्रीविज[य]वल्लीरास संपूर्ण ॥
कठिन शब्दोनो कोश दूहा
पूर्वज व्यवरी विवरी-विवरणपूर्वक
परीआ
Uw
पाहि वीरु प्रीआ
करतां वीरो-भाई परिया-पूर्वजो
दूहा
वहुरसि
व्यवहार-व्यापार करशे
दूहा
३
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लुंछन
न्युंछनक-लूंछणुं (गुरु सामे धरीने हाथी घोडा वगेरेनुं याचकोने अपातुं दान)
ढाल
व्यवध
विविध सोविन सोवन-सुवर्णतुं असमान आसमान-आकाश झंडाल नेजा झंडावाळा नेजा-ध्वजा
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दूहा
व्यकट सरसंधी
विकट स्वरसन्धि(?)
विगय
विगई-विकृति, (जैनोमां विगई तरीके ओळखाती दूध, दही, घी वगेरे छ वस्तु)
ढाल
बुजरक उलीआ
बुझर्ग-वृद्ध के परिपक्व वयवाळा ओलिया
ढाल
शीगडी (?)
सीगलीउ साऊषे लुहा जार गोझ
जाळ गोस्त-मांस
जघाचारण
एक प्रकारनी चालवानी लब्धि धरावनार मुनि, जे घणुं अने झडपथी चाले तो पण थाक न अनुभवे.
ढाल
गिहुँ परि फारा
घउंना फाडा (लापशी)
ढूंबा जेउर जाजीआ
जजियावेरो
ढाल
अष्टविधान
अष्टअवधान
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________________ अनुसंधान-२४ शवशासनी शैव शासनवाळा ढाल अंवर उछारीइ अंबर-वस्त्र, उछारीइ-पाथरवू(?) ('खोळो पाथरवा'ना अर्थमां होय तेम लागे 12 साहामी भक्ति सार्मिक भक्ति ल्हाणी-प्रभावना लाहण दूहा ज्यूगप्रधान युगप्रधान-युगपुरुष ढाल मूगतिखेत्र तीरजंचा "मुक्ति' पमाडनारुं क्षेत्र तिर्यंच ढाल उहुलतूं उल्लसुं * * *