Book Title: Rajasthan ke Jain Sanskrut Sahityakar
Author(s): Shaktikumar Sharma
Publisher: Z_Kesarimalji_Surana_Abhinandan_Granth_012044.pdf
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Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ राजस्थान के जैन संस्कृत साहित्यकार C] डॉ० शक्तिकुमार शर्मा, "शकुन्त", सहायक शोध अधिकारी (संस्कृत), साहित्य संस्थान, राजस्थान विद्यापीठ, उदयपुर कर्मकाण्ड एवं आडम्बर के विरोध में पनपे जैन और बौद्ध धर्मों ने समाज के अभिजात्य वर्ग में व्याप्त कुरीतियों को समाप्त करने के लिए लोकभाषा एवं लोक संस्कृति का आश्रय लिया। पालि एवं प्राकृत की सरिता में गौतम बुद्ध एवं महावीर ने अपने उपदेशों को प्रवाहित किया। त्रिपिटक एवं आगम साहित्य की रचनाएँ हुई। तथापि जनमानस में संस्कृत तत्वज्ञों के प्रति व्याप्त आदर की भावना ने बौद्ध एवं जैन तत्त्वज्ञों को भी प्रभावित किया । अश्वघोष ने सौन्दरानन्द एवं बुद्धवरित लिवकर ख्याति ऑजत की। फलत: जैन धर्म ने भी धर्माशर्माभ्युदय एवं यशस्तिलकचम्पू की रचना कर संस्कृत में पर्दापण किया। राजस्थान का जैन साहित्यकार भी इस कार्य में पीछे नहीं रहा। विक्रम की अष्टम शती से प्रवाहित यह स्रोतस्विनी आज तक भी कलकल ध्वनि से मरुधरा को निनादित करती रही है। (१) रविषेण-रविषेण सेन परम्परा के आचार्य लक्ष्मणसेन के शिष्य थे।' सेन संघ के भट्टारक सोमकीति राजस्थान के निवासी होने के कारण दिगम्बर सम्प्रदाय के इस संघ का राजस्थान में बहुत प्रचार था। विद्वानों का अनुमान है कि आप भी राजस्थान के निवासी थे। पद्मचरित की पुष्पिका के अनुसार इस रचना की समाप्ति महावीर निर्वाण के १२०३ वर्ष, ६ माह पश्चात विक्रम संवत् ७३४ में हुई । अतएव इनका समय विक्रम की ८वीं शती स्वीकार किया जा सकता है। पद्मचरित जैन दृष्टिकोण से लिखी गई रामकथा है। मर्यादा पुरुषोत्तम राम ही इस काव्य के नायक पद्म हैं । १२३ पर्वो की इस रचना में आठवें नारायण लक्ष्मण, भरत, सीता, जनक, अंजना, पवन, हनुमान, राक्षसवंशी रावण, विभीषण एवं सुग्रीव का विस्तृत वर्णन है। (२) हरिभद्रसूरि-श्वेताम्बर सम्प्रदाय के आप्त पुरुष हरिभद्रसूरि की लीलाभूमि चित्रकूट (चित्तौड़) थी। राजपुरोहित जाति में उत्पन्न आचार्य हरिभद्र ने याकिनी नामक महत्तरा से प्रतिबोधित होकर संन्यास ग्रहण किया। आपके दीक्षा गुरु जिनदत्तसूरि थे । आपका आविर्भाव सं० ७५७ से ८५७ के मध्य स्वीकार किया जाता है। __ भारतीय दर्शन के गढ़तम रहस्यों का अध्ययन कर आपने योग दर्शन को जैन धर्म से मिश्रित कर योगदृष्टि समुच्चय, योगबिन्दु, योग-शतक एवं योगविशिका नामक कृतियों की रचना की। न्यायदर्शन के दृष्टिकोण से अनेकान्तवाद प्रवेश, अनेकान्तजयपताका, न्यायविनिश्चय, लोकतत्त्वनिर्णय, शस्त्रवार्ता समुच्चय, सर्वज्ञसिद्धि प्रकरण मौलिक एवं दिङ्नाग कृत न्याय प्रवेश टीका तथा न्यायावतार टीका, टीकाग्रन्थ हैं । टीका ग्रन्थों की दृष्टि से आपकी साहित्य को बहुत बहुत बड़ी देन है। इनके प्रमुख टीका ग्रन्थ निम्न हैं -पद्मचरित १. आसादिन्द्रगुरो दिवाकरपतिः, शिष्योऽस्य चाहन्मनि । तस्माल्लक्ष्मणसेन सन्मुनिरदः, शिष्यो रविस्तु स्मृतः ।। द्विशताभ्यधिके समा सहस्र, समतीते अर्धचतुर्थ-वर्ष-युते । जिनभास्करवर्धमानसिद्धेः, चरितं पद्मनेरिदं निबद्धम् ॥ -पद्मचरित Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ . ४४८ कर्मयोगी श्री केसरीमलजी सुराणा अभिनन्दन ग्रन्थ : पंचम खण्ड .... . ................................................................... अनुयोगद्वारसूत्र टीका, आवश्यकसूत्र बृहद्वृत्ति, आवश्यक नियुक्ति टीका, जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्र टीका, जीवागम-सूत्र-लघुवृत्ति, तत्त्वार्थसूत्रटीका, दशवैकालिक सूत्रटीका, नन्दीसूत्रटीका, पिण्डनियुक्ति टीका, प्रज्ञापना सूत्र प्रदेश व्याख्या, ललितविस्तरा, चैत्यवन्दन सूत्रवृत्ति आदि।। राजस्थान के संस्कृत साहित्य को आचार्य हरिभद्रसूरि का आदि कवि कहा जा सकता है। (३) सिद्धषिसूरि-सिषिसूरि निवृत्ति कुल के आचार्य दुर्गस्वामी के शिष्य थे । आचार्य दुर्गस्वामी का स्वर्गवास भिन्नमाल (भीनमाल) में हुआ। अतएव आपका कार्यक्षेत्र राजस्थान ही रहा । दुर्गस्वामी की मृत्यु के पश्चात् आपने गर्गस्वामी को अपना गुरु बनाकर दीक्षा ग्रहण की। उपमितिभवप्रपंच कथा में सं० ६६२ अंकित है। अतएव आपका स्थिति काल १०वीं शती स्वीकार किया जा सकता है। आपकी दो रचनाएँ साहित्यिक जगत् में विख्यात रहीं-उपमितिभव-प्रपंच नामक रचना एक विशालकाय महारूपक है। विश्व साहित्य में यह एक प्राचीनतम रूपकमय उपन्यास है। प्रतीत होता है कि संस्कृत कवि कृष्णचन्द्र यति को 'मोहविजय' नामक रूपक लिखने की प्रेरणा इस ग्रन्थ से मिली होगी। चन्द्रकेवली चरित एक चरित काव्य है। इनके अतिरिक्त उपदेशमाला एवं न्याया वतार पर आपकी टीकाएँ भी प्रसिद्ध हैं। - (४) अमृतचन्द्र-महापण्डित आशाधर ने अमृतचन्द्र का उल्लेख सूरिपद के साथ किया जिससे ज्ञात होता है कि वे अभिजात कुल के थे। पं० नाथूराम प्रेमी ने लिखा है-"अमृतचन्द्र वामणवाडे आये तथा सिंह नामक कवि को 'पज्जुण्णचरिउ' लिखने की प्रेरणा दी। यह बामणवाड़ यदि सवाईमाधोपुर जिले में स्थित बामणवास है तो आपका कार्यक्षेत्र राजस्थान ही सिद्ध होता है। आपका स्थितिकाल १०वीं एवं ११वीं शती के मध्य माना जाता है। आपकी तीन रचनाएँ प्रसिद्ध हैं-(१) पुरुषार्थसिद्ध युपाय, (२) तत्त्वार्थसार, (३) समयसारकलश । पुरुषार्थसिद्ध युपाय २२६ पद्यों की संस्कृत रचना है जिसमें जैनधर्म के त्रिरत्न (सम्यक्दर्शन, सम्यक्ज्ञान, सम्यक्चारित्र) व्यवहारनय-निश्चयनय, आस्रव आदि जैन दर्शन के तत्त्वों का विवेचन है। अधिकारों से संवलित तत्त्वार्थसार में जीव-अजीव, आस्रव, बन्ध, मोक्ष, निर्जरा आदि का विशद विश्लेषण है। आचार्य कुन्दकुन्द की कृति समयसार पर आत्मख्याति नामक टीका में परिष्कृत गद्यशैली एवं गाथा के शब्दों की व्याख्या के मनोरम उदाहरण प्राप्त होते हैं। (५) रामसेन-दिगम्बर सम्प्रदाय के प्रस्तुत कवि रामसेन बागड (डूंगरपुर-बांसवाड़ा क्षेत्र) से सम्बन्धित एवं नरसिंहपुरा जाति के संस्थापक थे। भट्टारक परम्परा के अनेक विद्वानों ने अपनी प्रशस्तियों में रामसेन को आदरपूर्वक स्मरण किया है । आपका समय १०वीं शती माना जाता है। तत्त्वानुशासन नामक २५८ श्लोकों की रचना में अध्यात्म का सुन्दर विश्लेषण किया गया है। अपनी सुबोध एवं सरल शैली के माध्यम से कठोर, नीरस एवं दुर्बोध विषय को भी सहज, सरल एवं सरस बना दिया है । कर्मबन्ध, उसकी मुक्ति, मुक्ति का उपाय (ध्यान), उसका भेद आदि का वर्णन सहज एवं आकर्षक बन पड़ा है। (६) आचार्य महासेन-आचार्य महासेन लाल बागड़ संघ के पूर्णचन्द जयसेन तथा गुणाकरसेन सूरि के शिष्य थे। इनके गुणों के परिगणन में सिद्धान्तज्ञ, वाग्मी, यशस्वियों द्वारा मान्य, सज्जनों में अग्रणी एवं परमार वंशी मुंज द्वारा पूजित' विशेषणों का प्रयोग हुआ है। मुंज के स्थितिकाल के आधार पर आपका समय १०वीं शती स्वीकार किया जा सकता है । १ तच्छिष्यो विदिताखिलोरुसमयो वादी च वाम्मी कवि, शब्दब्रह्मविचारधामयशसां मान्यो सतामग्रणी। आसीत् श्रीमहसेनसूरिरनघः श्रीमुंजराज चितः, सीमादर्शनबोधप्रत्तपसां भब्याब्जनी बान्धवः ॥ Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ राजस्थान के जैन संस्कृत साहित्यकार ४४६ ...... .................................................................... आपकी समग्र की ति एकमात्र कृति प्रद्युम्नचरित पर अवलम्बित है। १४ सर्गों के इस महाकाव्य में श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न का जीवन चरित रस एवं अलंकारों से सरस एवं अलंकृत काव्यशैली में निबद्ध है। (७) जिनेश्वरसूरि-मध्य प्रदेश के निवासी कृष्ण ब्राह्मण के पुत्र श्रीधर ही वर्धमान सूरि से दीक्षा प्राप्त कर जिनेश्वरसूरि हो गये। अणहिलपुरपत्तन में आपका शास्त्रार्थ सूराचार्य जी से हुआ। महाराजा दुर्लभराज की अध्यक्षता में होने वाले इस शास्त्रार्थ में जिनेश्वरसूरि को विजय के साथ खरतर नामक विरुद की प्राप्ति हुई। आपका कार्यक्षेत्र राजस्थान व गुजरात था। आपकी रचनाएँ मूलतः टीकाएँ हैं । प्रमालक्ष्य, अष्टकप्रकरण एवं कथाकोष प्रकरण पर जालोर एवं डीडवाना में स्वोपज्ञ नामक टीकाओं की रचनाएँ की। प्रमालक्ष्य जैनदर्शन का आद्य ग्रन्थ एवं शेष प्रकरण ग्रन्थ हैं। इन तीन ग्रन्थों की रचना आपने ग्यारहवीं शती में की है। (E) बुद्धिसागरसूरि-श्रीधर के अनुज श्रीपति ने भी दीक्षा ग्रहण कर बुद्धिसागर नाम धारण किया । जिनेश्वरसूरि के अनुज होने के नाते आपका समय भी ग्यारहवीं शती ही स्वीकार किया जा सकता है। आपकी एकमात्र कृति पंचग्रन्थी व्याकरण है जिसका अपर नाम ही बुद्धिसागर व्याकरण हो गया है। आचार्य हेमचन्द्र ने भी इस व्याकरण का उपयोग अपने ग्रन्थों में किया है। (8) कवि उड्ढा-चित्रकूट के निवासी कवि डड्ढा पोरवाड़ जाति के श्रीपाल के पुत्र थे । आपका निवासस्थान चित्रकूट था। विद्वानों के अनुसार आपका समय १०५० है । आपकी एकमात्र कृति संस्कृत पंचसंग्रह है, जो प्राकृत पंचसंग्रह का अनुवाद मात्र है। यद्यपि पंचसंग्रह का अनुवाद अमितगति ने भी किया था। किन्तु अमितगति के अनुवाद में जहाँ अनावश्यक बातें भी हैं, वहाँ डड्ढा ने वाणी पर संयम का अंकुश रखा है। (१०) आचार्य शुभचन्द-शुभचन्द नाम से कई आचार्य जैन परम्परा में हो चुके हैं। प्रस्तुत शुभचन्द' के निवासस्थान, कुल, वंश परम्परा के विषय में कुछ भी ज्ञात नहीं। इनकी कृति ज्ञानार्णव की शताधिक प्रतियाँ राजस्थान के जैन भण्डारों में प्राप्त होती हैं, जिससे यह अनुमान होना है कि आप राजस्थान के निवासी थे। ____आपकी कृति ज्ञानार्णव योग दर्शन (जैन मान्यतानुसार) का प्रमुख ग्रन्थ है। ४८ प्रकरणों के इस ग्रन्थ में १२ भावना, पंचमहाव्रत, ध्यान आदि का सुन्दर विवेचन हुआ है। (११) आचार्य ब्रह्मदेव-आचार्य ब्रह्मदेव आश्रमपत्तन के निवासी थे। आश्रमपत्तन बूंदी जिले में अवस्थित केशवरायपत्तन (केशारायपाटन) का पुराना नाम है । ब्रह्मदेव की दोनों कृतियों की रचना यहाँ हई। आपने दो ग्रंथों-बहद्-द्रव्य-संग्रह एवं परमात्म प्रकाश पर श्रेष्ठी सोमराज के लिए टीका लिखी । द्रव्यसंग्रह में श्रेष्ठी सोमराज के प्रश्नों का नामोल्लेख के साथ उत्तर दिया गया है जिससे यह प्रतीत होता है कि श्रेष्ठी सोमराज की शंकाओं का समाधान उक्त ग्रन्थ के रूप में हुआ है। (१२) जिनवल्लभसूरि-जिनवल्लभसूरि का अधिकतर समय चित्रकूट में ही व्यतीत हुआ। आप जिनेश्वर सरि के शिष्य थे एवं अभयदेवसूरि के पास अध्ययन करते थे। सं० ११६७ में अभयदेवसूरि की मृत्यु के पश्चात आचार्य पद पर अभिषिक्त हुए । इसी वर्ष आप भी अपने गुरु का अनुगमन स्वर्ग चले गये।' आपकी कृतियाँ अनेक हैं जिनके नाम निम्न प्रकार परिगणित किये जा सकते हैं १. बल्लभ भारती Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४५० कर्मयोगी श्री केसरीमलजी सुराणा अभिनन्दन ग्रन्थ : पंचम खण्ड ...... ................................................................... सैद्धान्तिक रचनाएँ ये हैं:१. धर्मशिक्षा प्रकरण २. संघपट्टक ३. सूक्ष्मार्थ विचारसारोद्धार ४. आगमिक वस्तु विचारसार ५. पिण्डविशुद्धि ६. द्वादशकुलक आदि। ___ साहित्यिक सौन्दर्य से संबलित रचनाएँ निम्न हैं:१. शृगारशतक २. प्रश्नोत्तरकषष्टिशतकाव्य ३. अष्ट सप्ततिका अथवा चित्रकूटद्वीप वीर चैत्य प्रशस्ति ४. भावारिवारण आदि । (१३) जिनपतिसरि-मलधारी जिनचन्द्र के शिष्य जिनपति सूरि का जन्म सं० १२१० में विक्रमपुर में हुआ। आपके पिता का नाम यशोवर्धन एवं माता का नाम सूहवदेवी था। आपने आशिका-नरेश भीमसिंह एवं अजमेर-नरेश पृथ्वीराज चौहान की सभा में शस्त्रार्थ कर विजय प्राप्त की। आपकी दीक्षा १२१७ में, आचार्य पद प्राप्ति १२२३ तथा मृत्यु १२७७ में हुई। आपकी रचनाओं में कतिपय स्तोत्र के अतिरिक्त वृत्तियाँ प्रमुख हैं। जिनवल्लभसूरि की संघपट्टक एवं बुद्धिसागर की पंचलिंगी व्याकरण पर आपकी टीकायें प्रसिद्ध हैं। प्रबोधोदय एवं वादस्थल नामक कृतियाँ दर्शन एवं तर्क की दृष्टि से उपयोगी प्रतीत होती हैं । (१४) जिनपालोपाध्याय-जिनपति सूरि के शिष्य जिनपालोपाध्याय की दीक्षा संवत् १२२५ में पुष्कर में हुई । सं० १२७३ बृहद्द्वार में कश्मीरी पण्डित मनोदानन्द के साथ शस्त्रार्थ कर विजय प्राप्त की। सं० १३११ में पालनपुर में आपका स्वर्गवास हुआ । अत: राजस्थान एवं गुजरात आपका कार्यक्षेत्र स्वीकार किया जा सकता है। आपकी कृतियों में दो मूल एवं शेष टीका कृतियाँ हैं । सनत्कुमार चक्रीचरित' शिशुपालवध की कोटि का एक श्रेष्ठ महाकाव्य है। जबकि युगप्रधान आचार्य गुर्वावली जैन आचार्यों का ऐतिहासिक विवरण प्रदान करती है। षट्स्थानक प्रकरण, उपदेश रसायन, द्वादश कुलक, धर्मशिक्षा एवं चर्चटी पर विवरण नामक टीकायें प्रमुख है। आचार्य जिनपाल एक ओर मूलग्रन्थ रचने की कारयित्री प्रतिभा से सुशोभित हैं वहीं प्राचीन ग्रन्थों को समझकर टीका करने की भावयित्री प्रतिभा से भी सम्पन्न हैं। (१५) लक्ष्मीतिलकोपाध्याय-जालोर जनपद के निवासी उपाध्याय लक्ष्मीतिलक ने प्रत्येकबुद्ध चरित महाकाव्य की रचना की । इस काव्य में जैन धर्म के सभी मुक्तपुरुषों के जीवनचरित का क्रमिक विवरण है। श्रावकधर्म बृहद्वृति की रचना जालोर में हुई। (१६) आचार्य जयसेन - वीरसेन के प्रशिष्य एवं सोमसेन के शिष्य आचार्य जयसेन का पारिवारिक नाम चारुभट था। दिगम्बर सम्प्रदाय में दीक्षित होने के पश्चात् ही आपका नाम जयसेन रखा गया। इनके पितामह का नाम भालूशाह एवं पिता का नाम महीपति था। डा. ए. एन. उपाध्याय ने इनका समय १२-१३वीं शती माना है। १. खतरतगच्छालंकार युगप्रधानाचार्य गुर्वावली २. यह ग्रन्थ महा विनयसागर द्वारा सम्पादित होकर प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर से प्रकाशित हो गया हैं। ३. सूरि श्री वीरसेनाख्यो मूलसंघेऽपि सत्तया । नैर्ग्रन्थपदवीं भेजे जातरूपधरोऽपि यः । ततः श्री सोमसेनोऽभूत् गणीगुणगणाश्रय, तद्विनेयोऽस्ति यस्तस्मै जयसेन तपोभृते । शीघ्र बभूव मालूसाधुसदा . धर्मरतोवदान्ध, सुनुस्ततः साधु महीपतिस्तमारयं चारुभट स्तनूजः ॥ . Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ राजस्थान के जैन संस्कृत साहित्यकार ४५१ (१७) पं० आशाधर-पं० आशाधर मूलत: मण्डलगढ़ (मेवाड़) के निवासी थे। आपके पिता का नाम सलक्खण एवं माता का नाम श्रीरत्नी था। आपकी पत्नी सरस्वती एवं पुत्र छाहड़ था। शहाबुद्दीन गौरी द्वारा अजमेर एवं दिल्ली पर अधिकार कर लेने के कारण धारा नगरी चले गये वहाँ से नलकच्छपुर (नालछा) चले गये। नलकच्छपुर में अध्ययन अध्यापन करते रहे । सं० १२८२ में आप नलकच्छपुर से सलखण चले गये। आपकी गति न्याय, व्याकरण, काव्य, अलंकार आदि में थी। आपकी सर्वतोमुखी प्रतिभा के परिणामस्वरूप १८ ग्रन्थ रत्नों की सृष्टि हुई। उनके नाम क्रमश: निम्न हैं:१. प्रमेयरत्नाकर २. भरतेश्वराभ्युदय ३. ज्ञानदीपिका ४. राजमतीविप्रलम्भ ५. अध्यात्मरहस्य ६. मूलराधना टीका ७. इष्टोपदेश टीका ८. आराधनासार टीका ९. अमरकोश टीका १०. भूपान चतुर्विंशति टीका ११. क्रियाकलाप १२. काव्यालंकार टीका १३. जिनसहस्रनाम १४. जिनपंजर काव्य १५. त्रिषष्टि स्मृति शास्त्र १६. रत्नत्रय विधान १७. सागार धर्मामृत १८. अनागार धर्मामृत उपर्युक्त ग्रन्थों में से प्रमेयरत्नाकर, भरतेश्वराभ्युदय, ज्ञानदीपिका, राजमतीविप्रलंभ, अमरकोशटीका आदि ग्रन्थ अभी तक अनुपलब्ध हैं। शेष में जिनपंजरकाव्य एवं जिनसहस्रनाम स्तोत्र हैं । ___ अध्यात्मरहस्य दर्शन का ग्रन्थ है। इसमें आशाधर ने बहिरात्मा-अन्तरात्मा एवं परमात्मा के स्थान पर स्वात्मा, शुद्धात्मा एवं परब्रह्म नामक भेद किये हैं। त्रिषष्टिस्मृतिशास्त्र की रचना जाजक पण्डित की प्रेरणा से हुई। इसमें प्रेसठ शलाका पुरुषों का जीवनचरित्र संक्षेप में वणित है। सागार धर्मामृत में गृहस्थ जीवन की आचार संहिता तथा अनागार धर्मामृत में मुनि जीबन की आचार संहिता का वर्णन है। उक्त दोनों ग्रन्थों की रचना क्रमशः सं० १२९६ एवं सं० १३०० हुई। (१८) वाग्भट्ट-प्रस्तुत वाग्भट्ट अष्टांगहृदयकार, नेमिनिर्वाण महाकाव्यकार तथा वाग्भट्टालंकार-कर्ता तीनों ही वाग्भट्टों से भिन्न हैं । आप माक्कलय के पौत्र नेमिकुमार के पुत्र थे। आपकी दो वृत्तियाँ प्रसिद्ध हैं-छन्दोऽनुशासन एवं काव्यानुशासन । छन्दोऽनुशासन १. संज्ञाध्याय, २. समवृत्तरूप ३. अर्धसमवृत्त, ४. मात्रासमक, ५. मात्राछन्दक नामक पाँच अध्यायों में विभक्त है। २८६ सूत्रों के काव्यानुशासन में रस, अलंकार, छन्द, गुण, दोष आदि का कथन किया गया है। स्वरचित स्वोपज्ञ टीका में परम्परानुसार विभिन्न ग्रन्थों के पद्य उदाहरण रूप में दिये गये हैं। इन दोनों ग्रन्थों से ज्ञात होता है आप काव्यशास्त्र के उत्कृष्ट कोटि के विद्वान् थे। (१६) अभयतिलक-१३वीं एवं १४वीं शती में वर्तमान अभय तिलकोपाध्याय ने जिनेश्वर सूरि को अपना गुरु बनाया। १२९१ में दीक्षित होने के पश्चात् १३१६ में उपाध्याय पद प्राप्त किया। १. म्लेच्छेशेन सपादलक्षविषये व्याप्तिसुवृत्तक्षिति त्रासान्विन्ध्य नरेन्द्रदौः परिमलस्फूर्जस्त्रितर्गोजसि ॥ प्राप्तोमालवमण्डले बहुपरीवारः पुरीमाबासन् । योधारामपठज्जिनप्रमिति वाक्यशास्त्र महावीरतः ।। २. श्रीमदर्जून भूपालराज्ये श्रावकसंकुले । जैनधर्मोदयार्थ यो नलकच्छपुरेऽवसत् ॥ Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४५२ कर्मयोगी श्री केसरीमलजी सुराणा अभिनन्दन ग्रन्थ : पंचम खण्ड आपकी तीन रचनायें प्रसिद्ध हैं-१. पंचप्रस्थान न्याय-तर्क व्याख्या २. पानीय वादस्थल, ३. हेमचन्द्रीय द्वयाश्रय काव्य टीका। (२०) जिनप्रभसूरि-जिनसिंह सूरि के शिष्य जिनप्रभसूरि मोहिलीवाड़ी (झुझुनु) के निवासी रत्नपाल एव खेतलदेवी के पुत्र थे । आपने सं० १३६६ में दीक्षा प्राप्त करके सं० १३४१ में आचार्य पद प्राप्त किया। आपकी प्रमुख रचनायें श्रेणिकचरित एवं विविध तीर्थकल्प मौलिक कृतियाँ हैं। इनके अतिरिक्त कल्पसूत्र, साधु प्रतिक्रमण, षडावश्यक, अनु योग चतुष्टयव्याख्या, प्रव्रज्याभिधान, कातंत्र विभ्रमटीका, अनेकार्थ संग्रह, शेष-संग्रह, विदग्धमुखमण्डन, गायत्री विवरण आदि पर टीका लिखी। (२१) जिनकुशलसूरि- श्वेताम्बर सम्प्रदाय के तीसरे दादाजी जिनकुशलसुरि के गुरु कलिकालकल्पतरु जिनचन्द्र सूरि थे । सं० १३८३ में रचित इनकी एकमात्र कृति चैत्यवंदन कुलक वृत्ति है। (२२) पद्मनन्दि-भट्टारक प्रभाचन्द्र के शिष्य पद्मनन्दि जाति से ब्राह्मण थे। भट्टारक पद्मनन्दि भट्टारक बनने से पूर्व आचार्य पद से सुशोभित होते थे । ३४ वर्ष की आयु में सं० १६८५ में भट्टारक पद प्राप्ति करने वाले पद्मनन्दि ने अपनी भक्ति के प्रभाव से पाषाणमयी सरस्वती को मुख से बुला दिया था। आपका कार्यक्षेत्र मेवाड़, हाड़ौती, झालावाड़, टोंक आदि थे। आपकी अधिकतर रचनाएँ पूजा, स्तोत्र, कथा आदि वर्गों में आती हैं-१. श्रावकाचार, २. व्रतोद्यापनपूजा, ३. नन्दीश्वर भक्तिपूजा, ४. सरस्वती पूजा, ५. सिद्धपूजा, ६. वीतरागस्तोत्र, ७. पार्श्वनाथस्तोत्र, ८. लक्ष्मीस्तोत्र, ६. शांतिनाथस्तवन, १०. परमात्मराजस्तोत्र, ११. भावना चौबीसा, १२. देवशास्त्रगुरुपूजा, १३. रत्नत्रय पूजा, १४. अनन्तव्रतकथा। (२३) भट्टारक सकलकोति-सन्त सकलकीति का जन्म १४४३१ में करमसिंह एवं शोभादेवी के घर हुआ। आपका बचपन का नाम पूर्णसिंह पदर्थ था । २६ वर्ष की आयु में सम्पूर्ण सम्पत्ति को त्यागकर संन्यास ग्रहण कर लिया। नैणवां नामक ग्राम में भट्टारक पद्मनन्दि के पास आप रहे। आपने न केवल स्वाध्याय किया अपितु शिष्यों को भी अध्यापन करवाया । ब्रह्म जिनदास ने आपको निर्ग्रन्थराज हरिवंशपुराणकार ने तपोनिधि तथा सकलभूषण ने पुण्यमूर्ति५ कहा । इनकी मृत्यु महसाना में १४६६ में हुई। आपकी रचनाएँ लगभग ५० हैं। उनमें संस्कृत रचनाओं के नाम क्रमशः निम्न प्रकार है(१) मूलाचार प्रदीप, (२) प्रश्नोत्तरोपासकाचार, (३) आदिपुराण, (४) उत्तरपुराण (५) शान्तिनाथचरित, १. हरषी सुणीय सुवाणि पालइ अन्य उअरि सपर । चोउद त्रिताल प्रमाणि पुरइ दिनपुत्र जनमी ।। न्याति मांहि मुहुतवन्त हुंबड हरख बखाणिइए। करमसिंह वितपन्न उदयवन्त हम जाणीइय ।। शोभित तरस अरधांग मूली सहीस्य सुन्दरीय । सील स्पगारित अंग पेखु प्रत्यक्षे पुरंदरीय ।। ३. ततोऽभवत्तस्य जगत्प्रसिद्धेः, पट्टेमनोज्ञ सकलादिकीतिः । महाकवि: शुद्धचरित्रधारी, निर्ग्रन्थराजा जगति प्रतापी ।। ४. तत्पट्टपकेजविकासभास्वान्, बभूव निर्ग्रन्थवर: प्रतापी । महाकवित्वादिकलाप्रवीणः, तपोनिधिश्रीसकलादिकीतिः ।। तत्पट्टधारीजनचित्तहारी, पुराणमुख्योत्तमशास्त्रकारी । भट्टारक श्री सकलादिकीर्तिः, प्रसिद्धनामाजनि पुण्यमूर्तिः ।। -जम्बूस्वामिचरितम् -हरिवंश पुराण -उपदेशरत्नमाला . Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ राजस्थान के जैन संस्कृत साहित्यकार ४५३ .......................................................................... (६) वर्धमानचरित (७) मल्लिनाथचरित (८) यशोधरचरित, (९) धन्यकुमारचरित, (१०) सुकुमालचरित, (११) सुदर्शनचरित, (१२) श्रीपालचरित, (१३) नेमिजिनचरित, (१४) जम्बूस्वामीचरित, (१५) सद्भाषितावली, (१६) व्रतकथाकोष, (१७) कर्मविपाक, (१८) तत्त्वार्थसारदीपक, (१६) सिद्धान्तसारदीपक (२०) आगमसार, (२१) परमात्मराजस्तोत्र, (२२) सारचतुविंशतिका, (२३) द्वादशानुप्रेक्षा। ___आदिपुराण एवं उत्तरपुराण भागवत् पुराण के २४ अवतारों की भाँति २४ तीर्थंकरों का विवेचन देते हैं। आदिपुराण में २० सर्गों में ऋषभनाथ का चरित वणित है तो उत्तरपुराण में शेष २३ तीर्थंकरों का चरित वर्णित है। मल्लिनाथ, पार्श्वनाथ, वर्द्धमान, यशोधर, शान्तिनाथ, धन्यकुमार एवं नेमिजिनचरित काव्यों में नामानुसार तीर्थंकरों एवं महापुरुषों का चरित क्रमश: २७, २३, १६, ८, १६ सर्गों में वर्णित है। सद्भाषितावली एक सुभाषित ग्रन्थ है। कर्मविपाक एवं तत्त्वार्थसार जैन धर्म की दार्शनिक मान्यताओं पर प्रकाश डालता है। व्रतकथाकोष में व्रतों एवं परमात्मराजस्तोत्र स्तुतिग्रन्थ है। (२४) जिनवर्धनसूरि-जिनराजसूरि के शिष्य जिनवर्धनसूरि ने देवकुलपाटन में सं० १४६१ में आचार्य पद प्राप्त किया। आपका कार्यक्षेत्र जैसलमेर और मेवाड़ था । आपकी रचनाओं में सर्वप्रमुख रचना प्रत्येकबुद्धचरित एवं सत्यपुरमण्डन प्रमुख है। प्रत्येकबुद्धचरित में रघुवंश की भांति सभी तीर्थंकरों का क्रमिक जीवन-चरित वणित है। टीका साहित्य की दृष्टि से सप्तपदार्थी टीका एवं वाग्भट्टालंकार टीका आपकी न्याय एवं काव्यशास्त्र की मर्मज्ञ विद्वत्ता का द्योतन कराती है। (२५) बाडव-बाडव एक सफल टीकाकार है। बाडव की टीकाओं के स्मरणमात्र से मल्लिनाथ की स्मृति हो आती है। विराटनगर राजस्थान के निवासी बाडव ने प्रत्येक महत्त्वपूर्ण महाकाव्य को अपनी टीका से विभूषित किया है। मल्लिनाथ ने अपनी टीकाओं का नाम संजीवनी रखा तो "बाडव ने अपनी सभी टीकाओं का नाम अवचूरि रखा । आपने कुमारसंभव, रघुवंश, किरातार्जुनीयम्, 'मेघदूत, शिशुपालवध के अतिरिक्त वृत्तरत्नाकर, वाग्भट्टालंकार, विदग्ध मुखमण्डन एवं योगशास्त्र जैसे शास्त्रीय ग्रन्थों पर भी टीकाएँ लिखी हैं । स्तोत्रों पर टीका लिखने की परम्परा का निर्वाह कर आपने वीतरागस्तोत्र, भक्तामरस्तोत्र, जीरापल्लीपार्श्वनाथस्तोत्र, कल्याणमन्दिरस्तोत्र एवं त्रिपुरास्तोत्र पर अवचूरि का प्रणयन किया। (२६) चारित्रवर्धन-कल्याणराज के शिष्य चारित्रवर्धन का समय १४७०-१५२० था। आपका कार्यक्षेत्र झुंझनू के आस-पास रहा । बाडब की परम्परा का निर्वाह करते हुए आपने भी टीका साहित्य का प्रणयन किया। ___ आपकी प्रमुख कृतियां-रघुवंश, कुमारसंभव, शिशुपालवध, मेघदूत, नैषधीयकाव्यम्, राघवपाण्डवीय, आदि महाकाव्यों पर टीकाएँ हैं। सिन्दूरप्रकरण टोका भावारिवारण एवं कल्याणमन्दिरस्तोत्र की टीका जैन सम्प्रदायों में अत्यधि क लोकप्रिय रही। (२७) जयसागर-सं० १५४० में आसराज एवं सोखू के घर में जन्मे जयदत्त जिनराज का शिष्यत्व स्वीकार कर जयसागर बन गये। आपके भाई मण्डलीक ने आबू में खरतर वसही का निर्माण करवाया। जैसलमेर, आबू, गुजरात, सिंध, पंजाब एवं हिमाचल का विहार करने वाले मुनि जयसागर ने शताधिक स्तोत्रों की रचना की। इनकी मुख्य कृतियाँ विज्ञप्ति-त्रिवेणी हैं। पृथ्वीचन्द्रचरित, शान्तिनाथजिनालय प्रशस्ति, सन्दोह दोहावली टीका, गुरुपारतन्त्र्यस्तोत्रटीका, भावारिवारण टीका हैं। विज्ञप्तित्रिवेणी एक ऐतिहासिक रचना है, जिसमें नगरकोट, कांगड़ा आदि का दुर्लभ विवरण प्राप्त होता है। पृथ्वीचन्द्रचरित चरितकाव्य एवं शान्तिनाथ जिनालय प्रशस्ति जैसलमेर, में उक्त नाम से बने मन्दिर की प्रशस्ति है। (२८) कोतिरत्नसूरि-जिनवर्धनसूरि के शिष्य एवं देवलदे के पुत्र देल्हाकंबर ही आगे चलकर कीर्तिरत्नसूरि Page #8 -------------------------------------------------------------------------- ________________ -0 ० ૪૫૪ कर्मयोगी श्री केसरीमलजी सुराणा अभिनन्दन ग्रन्थ : पंचम खण्ड ••• के नाम से विख्यात हुए। आपकी दीक्षा सं० १४६३ में हुई और वाचनाचार्य पद १४७०, उपाध्याय १४८० एवं आचार्य पद १४६७ में प्राप्त किया । +++ आपकी एकमात्र रचना नेमिनाथ महाकाव्य है । नेमिनाथ महाकाव्य संस्कृत के ह्रासकाल की रचना है । भारवि एवं माय द्वारा प्रवर्तित अलंकार मार्ग की प्रवृत्तियों का अनुकरण करते हुए कीतिरत्नसूरि ने छोटी-सी घटना को सजा-संवार कर १२ सर्गों में प्रस्तारित कर दिया। स्वप्न, वसन्त वर्णन, धर्मोपदेश, निर्वाण प्राप्ति आदि के विवरण मनोरम एवं रोचक बन पड़े हैं। (२९) नवचन्द्रसूरि नवचन्द्रसूरि के जीवन-चरित्र के विषय में विशेष सामग्री उपलब्ध नहीं हो सकी। तोमरनरेश वीरम के सभासदों की व्यग्योक्ति से आहत होकर नयचन्द्र सूरि ने प्राचीन कवियों की प्रतिभा से प्रतिस्पर्धा में हम्मीर महाकाव्य की रचना की ।" रणस्तम्भपुर ( रणथम्भौर ) के महाराजा हम्मीर के जीवन चरित का वर्णन होने के कारण इतना निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि उनका राजस्थान से गहन सम्बन्ध रहा होगा । " प्रथम छः सर्गों में चाहमान वंश की उत्पत्ति तथा हम्मीर के पूर्वजों का वर्णन है। मुख्य कथन ८-१३ सर्गों में है । राजपूती शौर्य की साकार प्रतिमा महाहठी हम्मीर एवं अलाउद्दीन खिलजी के घनघोर युद्धों एवं अन्ततः प्राणोत्सर्ग का वर्णन है। हमीर काव्यम् की प्रमुख विशेषता यह है कि कल्पना एवं काव्य-सौन्दर्य के आवरण में कहीं भी ऐतिहासिक तथ्य विलीन नहीं हो पाये हैं। काव्य की दृष्टि से यह ग्रन्थ उच्च बिन्दु तक पहुँचा हुआ है। इसके काव्यगत वैशिष्ट्य पर स्वयं कवि को गर्व है । (३०) जिनहर्ष - जिनहर्ष ने अपने काव्य वस्तुपालचरित की रचना चित्रकूट (चितौड़) के जिनेश्वर मन्दिर में सं० १४६७ में की। * आठ विशालकाय प्रस्तावों में कवि ने चालुक्य नरेश वीरधवल के नीति निपुण मन्त्री वस्तुपाल एवं उनके अनुज तेजपाल का जीवनचरित लिखा है। इस काव्य में वस्तुपाल एवं तेजपाल के विषय में उपयोगी जानकारी है किन्तु पौराणिक संकेतों एवं काव्यात्मक वर्णनों में कथावस्तु इतनी उलझ गयी है कि उसको प्राप्त करने के लिए पाठक का मन आहत होकर निराश हो जाता है। ४५५६ श्लोकों के इस महाकाव्य में वस्तुपाल के जीवन पर मुश्किल से २५०३०० श्लोक ही प्राप्त होते हैं । कवि में मानवीय गुणों, साहित्यिक प्रेम एवं जैन धर्म के प्रति अपार उत्साह परिलक्षित होता है। वस्तुपाल का जितना वर्णन दिया गया है वह प्रामाणिक है यह सन्तोष की बात है । १ हम्मीर महाकाव्यम्, १४ : ४३, २ वही, १४ : २६ ३ वही, १४ : ४६ ४ वस्तुपालचरित प्रशस्ति, ११ ५ भट्टारक पट्टावलि शास्त्र भण्डार (३१) जिनहं ससूरि - मेघराज एवं कमलादे के पुत्र जिनहंससूरि जिनसमुद्रसूरि के शिष्य थे। सं० १५२४ में जन्म ग्रहण कर १५३५ में दीक्षा प्राप्त की । धौलपुर में बादशाह को चमत्कार दिखाकर ५०० बन्दियों को कारागार से मुक्त कराया । आपकी प्रमुख कृति आचारांगसूत्र दीपिका है जिसकी रचना १५७२ में बीकानेर में हुई । (३२) भट्टारक ज्ञानभूषण — भट्टारक ज्ञानभूषण नामक चार व्यक्ति हो चुके हैं। प्रस्तुत भट्टारक ज्ञानभूषण ज्ञानकीर्ति के भ्राता थे । सं० १५३५ में सागवाड़ा में हुई प्रतिष्ठाओं का संचालन दोनों भ्राताओं ने ही किया । आप बृहद शाखा के भट्टारक के नाम से प्रसिद्ध हैं तथा ज्ञानकीर्ति लघुशाखा के आपने गुजरात, आभीर, तैलब, महाराष्ट्र, द्रविड़, रायदेश (ईडर), मेरुभार (मेवाड़), मालवा, कुरुजांगल, विराट, नीमाड़, आदि प्रदेशों को अपने ज्ञान से प्रभावित किया । . Page #9 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भट्टारक ज्ञानहंस व्याकरण, छन्द, अलंकार साहित्य तर्क आगम अध्यात्म आदि शास्त्र रूपी कमलों पर विहार करने वाले राजहंस थे । शृद्ध ध्यानामृत पान की उन्हें लालसा थी । " 3 नाथूराम प्रेमी ने इनके तत्त्वज्ञान-तरंगिणी, सिद्धान्तसार-भाष्य, परमार्थोपदेश, आदीश्वर फाग, भक्तामरोद्यापन, सरस्वती पूजा तथा परमानन्द जी ने आत्म-सम्बोधन काव्य सरस्वतीस्तवन आदि रचनाओं का परिणयन किया है । राजस्थान के जैन शास्त्र भण्डारों में ऋषिमण्डल पूजा, पंचकल्याणोद्यापनपूजा, भक्तामरपूजा, श्रुतपूजा, शास्त्रमण्डलपूजा तथा दशलक्षण व्रतोद्यापन पूजा आदि अतिरिक्त ग्रंथ भी प्राप्त होते हैं । राजस्थान के जैन संस्कृत साहित्यकार ४५५ तत्त्वज्ञानतरंगिणी नामक रचना इनकी सर्वोत्कृष्ट कृति है । १८ अध्यायों में विभक्त तथापि लघुकाय रचना में शुद्ध आत्मतत्त्व प्राप्ति के उपाय बताये गये हैं । भट्टारक पद छोड़कर मुमुक्षत्व की ओर अग्रसर कवि की यह प्रौढ़ रचना विद्वत्ता एवं काव्यत्व से परिपूर्ण है । (३३) भट्टारक शुभचन्द्र वाल्यकाल से भट्टारक शुभचन्द्र विद्वानों के सम्पर्क में रहने लगे थे। आपके गुरु भट्टारक विजयकीर्ति थे । व्याकरण एवं छन्दशास्त्र में निपुणता प्राप्त कर आप भट्टारक ज्ञानभूषण एवं विजयकीर्ति दोनों के सान्निध्य में रहने लगे। सं० १५७३ में आप भट्टारक पद पर अभिषिक्त हुए। ईडर शाखा की गद्दी के सर्वोच्च अधिकारी भट्टारक शुभचन्द्र ने राजस्थान, गुजरात एवं उत्तर प्रदेश को अपने उपदेशों से पवित्र किया । भट्टारक शुभचन्द्र वक्तृत्व कला में पटु एवं अनेक विषयों में पारंगत थे। , संघव्यवथा एवं आत्मसाधना के अतिरिक्त समय को साहित्य साधना में लगाने वाले भट्टारक की लगभग ४० संस्कृत कृतियां हैं। इनमें १. चन्द्रप्रभचरित २. श्रेणिकचरित १ जीवंधरचरित ४ प्रनचरित २ पाण्डवपुराण काव्यात्मक कृतियां हैं। पाण्डवपुराण की लोकप्रियता इनके जीवनकाल में ही बहुत अधिक हो गयी थी। शेष रचनाओं में चन्दनकथा, अष्टान्हिक कथा रचनायें कथा साहित्य की श्रीवृद्धि करती है। शेष रचनायें पूजा, व्याकरण, न्याय सम्बन्धी है । लेख के आधार को दृष्टिगत रखते हुए उन पर विचार करना यहाँ स्थगित रखा गया । (३४) भट्टारक जिनचन्द्र - आप वड़ली निवासी श्रीवन्त एवं सिरियादेवी के पुत्र थे । सुलतान कुमार नामक यह आईती दीक्षा प्राप्त कर सुमतिधीर एवं आचार्य पद प्राप्त कर जिनचन्द्र हो गये। सं० १६४८ में अकबर ने आपको युगप्रधान का विरुद्ध प्रदान किया। राजस्थान, गुजरात एवं पंजाब में विहार करने वाले आचार्य जिनचन्द्र सूरि की एक ही कृति विख्यात है। औषधि - विधि- प्रकरण टीका वास्तव में आयुर्वेद से सम्बन्धित कृति है । (३५) पुण्यसागर -- जिनहंस सूरि के शिष्य पुण्यसागर की दो कृतियाँ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति सूत्र टीका एवं प्रश्नोतरकषष्ठिशतकाव्य टीका जिनकी क्रमशः १६४५ में जैसलमेर एवं १६४० में बीकानेर में रचना हुई । (३६) जिनराजसूरि-बीकानेर में धर्मसी एवं धारलदे के घर में सं० १६४७ में आपका जन्म हुआ । खेतसी नामक यह बालक १६५६ में दीक्षा प्राप्त कर राजसमुद्र तथा आचार्य पद प्राप्त कर जिनराजसूरि बन गया। आप नव्यन्याय एवं साहित्य शास्त्र के प्रकाण्ड पण्डित थे । १. जैन साहित्य और इतिहास - नाथूराम प्रेमी, पृ० ३८१-८२ २. जैन साहित्य और इतिहास - नाथूराम प्रेमी, पृ० ३८२ ३. जैन प्रशस्ति संग्रह - पं० परमानन्द ४. राजस्थान के जैन शास्त्र भण्डारों की ग्रंथ सूची, भाग चतुर्थ ४६३-८३० ५. भट्टारक सम्प्रदाय, पृ० १५८ ६. जैन साहित्य और इतिहास, नाथूराम प्रेमी, पृ० ३८३, ७. प्रशस्ति संग्रह डा० कस्तूरचन्द कासलीवाल, पृ०७१ · . Page #10 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४५६ कर्मयोगी श्री केसरीमलजी सुराणा अभिनन्दन ग्रन्थ : पंचम खण्ड -.-.-.-.-.-.-.-.-.-.-.-.................................................... आपकी प्रमुख कृतियाँ नैषधीयचरितम् की जैनराजी टीका एवं भगवती सूत्र की टीका है। नैषधीय महाकाव्य की टीका परिमाण ३६०० श्लोकों का है। (३७) समयसुन्दर-आप का जन्म सांचोर निवासी रूपसी एवं लीलादेवी के घर सं० १६१० में हुआ। आपने सकलचन्दगणि से दीक्षा ग्रहण की। सं० १६४० में गणि, १६४६ में वाचनाचार्य एवं १६८१ में उपाध्याय पद क्रमशः जैसलमेर, लाहौर एवं लवेरा में प्राप्त किया। सिन्ध के अधिकारी मखनूम महमूद शेख काजी और जैसलमेर के रावत भीमसिंह आपसे प्रभावित थे। समयसुन्दर ने अपने प्रभाव का उपयोग कर सिन्ध, जैसलमेर, खंभात, मण्डोवर एवं मेड़ता के शासकों से जीवहिंसा-निषेध की घोषणा करवाई। कश्मीर विजय के समय अकबर के सम्मुख कहे गये वाक्य-"राजा नो ददते सौख्यम्" को आधार बनाकर अष्टलक्षी की रचना की। आप व्याकरण, साहित्य, साहित्यशास्त्र आदि के प्रकाण्ड पण्डित थे। आपकी प्रमुख रचनाएँ निम्न प्रकार हैं-१. अष्टलक्षी, २. जयसिंह सूरि-पदोत्सवकाव्य, ३. रघुवंशटीका, ४. कुमार-संभव-टीका, ५. मेघदूत टीका, ६. शिशुपालवध तृतीयसर्ग की टीका, ७. रूपकमाला अवचूरि, ८. ऋषभभक्तामर। उक्त सारिणी से ज्ञात होता है कि आप कालिदास एवं माघ से अत्यधिक प्रभावित थे। ४ रचनाएँ तो दोनों कवि के काव्यों पर टीका ही हैं। जयसिंह पदोत्सव काव्य भी रघुवंश के श्लोकों की पादपूर्ति ही है। इसी भांति ऋषभभक्तामर भी वस्तुत: भक्तामर स्तोत्र की पादपूर्ति ही है। वाग्भटालंकार एवं वृत्तरत्नाकर की टीका एवं भावशतक काव्यशास्त्र के ग्रन्थ हैं। जबकि सारस्वत रहस्य, लिंगानुशासन अवणि, शब्द रूपावली, अनिटकारिका आदि ग्रन्थ व्याकरण की टीकाएँ एवं रचनाएँ हैं । कल्पसूत्रटीका, दशवकालिक सूत्र टीका, नवतत्त्व प्रकरण टीका आदि टीकायें एवं विशेष-शतक, गाथा-सहस्री. सप्तस्मरण एव अनेक स्तोत्रों की रचना कर आपने बहुश्रुतता का परिचय दिया। (३८) गुणविनय-जयसोमोपाध्याय के शिष्य गुणविनय को १६४६ में वाचक पद प्राप्त हुआ। सम्राट जहाँगीर ने आपसे अत्यधिक प्रभावित होकर कविराज की उपाधि प्रदान की । गुणविनय मूलत: टीकाकार हैं उनकी सभी रचनायें टीकाएँ ही हैं। १. खण्डप्रशस्तिटीका, २. नेमिदूत-टीका, ३. दमयन्ती-कथाचम्पू टीका, ४. रघुवंश टीका, ५. वैराग्यशतक टीका, ६. संबोध-सप्तति टीका, ७. कर्मचन्द्रवंश प्रबन्ध टीका, ८. लघुशांतिस्तवटीका, ६. शीलोपदेशलघुवृत्ति । प्रतीत होता है कि मुनि गुणविनय साहित्य (काव्य) प्रेमी थे। ये स्वयं काव्य की रसचर्वणा कर दूसरों के लिए भी पानक रस तैयार कर देते थे। ये टीका ग्रन्थ वास्तव्य में काव्यानन्द में आयी ग्रन्थियों को खोलने के लिए ही लिखे गये हैं। (३६) श्री बल्लभोपाध्याय-ज्ञान विमलोपाध्याय के शिष्य श्री वल्लभोपाध्याय का कार्यक्षेत्र जोधपूर, नागौर बीकानेर एवं गुजरात था। आप व्याकरण कोष के मूर्धन्य विद्वान्, कवि एवं सफल टीकाकार थे। आपकी कृतियों में ८ मूल ग्रन्थ एवं १२ टीकायें हैं । विजयदेव-माहात्म्य काव्य एवं विद्वत्प्रबोधकाव्य महाकाव्य की श्रेणी की रचनाएँ हैं । शेष रचनाएँ स्तुतियाँ एवं प्रशस्तियाँ हैं जिनमें अरजिनस्तव एवं रूपजीवंशप्रशस्ति प्रमुख हैं। १. महोपाध्याय समय सुन्दर म० विनयसागर २. यह वृत्ति विनयसागर के सम्पादन में राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान से प्रकाशित हो गई। ३. यह कृति सुमति सदन कोटा से प्रकाशित है। ४. प्रथम कृति रा० प्रा० वि० प्र० जोधपुर से एवं द्वितीय कृति सुमति सदन कोटा से प्रकाशित है। . Page #11 -------------------------------------------------------------------------- ________________ राजस्थान के जैन संस्कृत साहित्यकार टीका ग्रन्थों में अधिकांश रचनाएँ हेमचन्द्राचार्य की हैं जिनमें १ हेमनाममाला संग्रह टीका २. हेमनाममाला शिलोच्छ टीका, ३. हेमलंगानुशासन दुर्गप्रदप्रबोध टीका, ४. हेमनिघण्टु टीका, ५. सिद्ध हेमशब्दानुशासन टीका प्रमुख है। (४०) सहजकीति - हेमनन्दन के शिष्य सहजकीर्ति ने कल्पसूत्र, गौतम कुलक, वैराग्यशतक, सारस्वत, आदि ग्रन्थों पर टीका लिखी । ४५७ (४१) गुणरत्न - विनयप्रमोद के शिष्य गुणरत्न की काव्य प्रकाश, तर्कभाषा, सारस्वत एवं रघुवंश पर टीका प्राप्त होती है। यह प्रतीत होता है कि आप काव्यशास्त्र, न्यायदर्शन, व्याकरण एवं साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान थे । (४२) सुरचन्द वीरकलन के लिय सूरचन्द दर्शन एवं साहित्यशास्त्र के प्रकाण्ड पण्डित थे आपकी कृतियों स्थूलभद्र गुणमाला काव्य, शान्तिलहरी, शृंगाररसमाला एवं पर्दकविशति काव्य की मौलिक रचनाएँ हैं। अष्टार्थी श्लोक वृत्ति एवं 'जैन तत्वसार की स्वोपज्ञ टीका' टीका साहित्य के अन्तर्गत परिगणित होती है । 1 (४३) मेघविजयोपाध्याय कृपाविजय के शिष्य मेघविजयोपाध्याय काव्य, व्याकरण, न्याय, ज्योतिष आदि के विद्वान् थे । आपने अपने आपको कालिदास, भारवि, माघ एवं कविराज के समकक्ष माना है । इसलिए इन्होंने उनकी शैली में ही काव्य प्रणयन किया । कालिदास की शैली में मेघदूत - समस्यालेख, भारवि की शैली में किरातार्जुनीय पादपूर्ति, माघ की शैली में देवानन्द-महाकाव्य तथा कविराज की शैली में सप्तसंधानकाव्य का प्रणयन किया। इस काव्य में कवि ने राम, कृष्ण, ऋषभदेव, शान्तिनाथ, नेमिनाथ, पार्श्वनाथ तथा महावीर का चरित श्लेष विधि से वर्णित किया। २ श्लोकों के ७ अर्थ निकलते हैं जो अलग-अलग महापुरुषों के जीवन पर घटित होते हैं। देवानन्द महाकाव्य की रचना स० १७२७ में सादड़ी में हुई एवं ग्रन्थकार ने इसकी लिपि ग्वालियर में की 3 इनके अतिरिक्त लघु त्रिषष्टिशलाका-पुरुष-चरित, भविष्यदत्त चरित हस्तसंजीवनयुक्ति प्रबोध, मातृका प्रसाद आदि रचनाएँ भी उपलब्ध हैं । (४४) भट्टारक श्रीभूषण - भट्टारक भुवनकीर्ति के शिष्य भट्टारक श्रीभूषण सं० १७०५ में नागौर की गद्दों पर अभिषिक्त हुए। आपकी पाँच रचनाएँ बहुत प्रसिद्ध है। पांचों रचनाएँ पूजा-पद्धति का विश्लेषण करती हैं। इनके नाम क्रमश: निम्न प्रकार हैं 1 १. अनन्त चतुर्दशीपूजा, २. अनन्तनाथ पूजा, ३. भक्तामरपूजा, ४. श्रुतस्कन्ध पूजा, ५. सप्तर्षि पूजा । (४५) वाविराज - खण्डेलवाल वंश में उत्पन्न वादिराज स्वयं को धनंजय, आशाधर एवं वाणभट्ट का अवतार एवं तकनगर (टोडारायसिंह को अनहिलपुर के समान बतलाता है। वादिराज तलकनगर के नरेश राजसिंह के महामात्य थे । आपके चार पुत्र थे-- रामचन्द्र, लालजी, नेमिदास, विमलदास । १. भारतीय विद्या मन्दिर अहमदाबाद से प्रकाशित । २. काव्येऽस्मिन् त एव सप्त कविता अर्था समग्रधिये ३. देवानन्द महाकाव्य ग्रन्थ प्रशस्ति ३. ४. धनंजयाशाधरवाग्भटानां धत्ते पदं सम्प्रति वादिराजः । बांडिलवंशभवपोमधुन जिनोति गुप्तगात्रः ॥ वादिराज की तीन कृतियाँ प्राप्त होती हैं - वाग्भटालंका रटीका, ज्ञानलोचनस्तोत्र तथा सुलोचनाचरित । बान्मटालंकार की टीका की रचना दीपमालिका सं० १७२९ में हुई। - सप्तसंधानकाव्य ४ : ४२. . Page #12 -------------------------------------------------------------------------- ________________ .४५८ कर्मयोगी श्री केसरीमलजी सुराणा अभिनन्दन ग्रन्थ : पंचम खण्ड . . . . . .. . ..-. -. -.-.-.--. .... ...... ...... ..... (४६) भट्टारक देवेन्द्रकीति-जगत्कीर्ति के शिष्य भट्टारक देवेन्द्रकीर्ति का ढूढाड प्रदेश की राजधानी (आमेर) में पट्टाभिषेक हुआ । महाराज सवाई जयसिंह के राज्यकाल में ईसरदा में आपने समयसार पर टीका लिखकर सं० १७८८ में समाप्त की। (४७) महोपाध्याय रामविजय-दयासिंह के शिष्य रूपचन्द्र ही दीक्षा प्राप्ति के उपरान्त रामविजय के रूप में विख्यात हो गये । आपका कार्यक्षेत्र जोधपुर बीकानेर ही रहा । आपकी रचनाएँ काव्य, ज्योतिष, व्याकरण एवं आचारशास्त्रपरक है। गौतमीय महाकाव्य में महावीर द्वारा गौतम को अपनी ओर आकर्षित कर अपने पंथ में सम्मिलित करना वर्णित है । गुणमालाप्रकरण, सिद्धान्तचन्द्रिका, मुहूर्तमणिमाला आदि रचनाएँ व्याकरण, नीतिशास्त्र, एवं ज्योतिष के साहित्य में अभिवृद्धि करती हैं। (४८) महोपाध्याय क्षमाकल्याण-अमृतधर्म के शिष्य क्षमाकल्याण का जन्म सं० १८०१ में केसरदेसर नामक स्थान में हुआ। मुनिजिनविजय के अनुसार राजस्थान के जैन विद्वानों में आप एक उत्तम कोटि के विद्वान् थे। इसके बाद राजस्थान में ही नहीं अन्यत्र भी इस श्रेणी का कोई जैन विद्वान् नहीं हुआ। इनकी अनेक रचनाएँ प्राप्त होती हैं, जिनमें कुछ निम्न हैं :१. तर्कसंग्रहफक्किका २. भूधातुवृत्ति ३. समरादित्य केवलीचरित ४. यशोधरचरित ५. चैत्यवंदन-चतुर्विंशतिका ६. विज्ञानचन्द्रिका ७. सूक्तिरत्नावलि ८. परसमयसारविचारसंग्रह ६. प्रश्नोत्तर सार्धशतक । इनके अतिरिक्त गौतमीय महाकाव्य की टीका इनकी टीका पद्धति पर प्रकाश डालती है। (४६) भट्टारक सुरेन्द्रकोति-आपका पट्टाभिषेक सं० १८२२-२३ में जयपुर में हुआ। आपकी सात रचनाएँ उपलब्ध हैं१. अष्टाह्निका कथन २. पंचकल्याण विधान ३. पंचमास-चतुर्दशी-व्रतोद्यापन ४. लब्धिविधान ५. पुरन्दर व्रतोद्यापन ६. सम्मेदशिखर पूजा ७. प्रतापकाव्य (५०) जिनमणि-सं० १९४४ में जन्मे मनजी की जन्मभूमि बाकड़िया बड़गाँव है । सं० १९६० में पालीताणा में आपकी दीक्षा हुई । सं० २००० में बीकानेर में आचार्य पद प्राप्त किया। कोटा, बम्बई, कलकत्ता में कार्यरत जिनमणि गुरु सुमतिसागर के शिष्य थे। संस्कृति की दृष्टि से एक ही रचना उल्लेखनीय है-साध्वी व्याख्यान निर्णय । यह व्याख्यान की दृष्टि से उपयोगी विषयों का संकलन है। (५१) बुद्धि मुनिगणि-केसरमुनि के शिष्य बुद्धिमुनिगणि का जन्म सं० १९५० में हुआ। राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र में विहार कर अपने जैन धर्म का प्रचार-प्रसार किया । आपकी प्रमुख कृतियाँ कल्पसूत्र टीका, कल्याणक परामर्श, पर्युषणा परामर्श है। इन कृतियों के अतिरिक्त साधुरंगीय सूत्रकृतांग दीपिका, पिण्डविशुद्धि आदि ग्रन्थों का सम्पादन बड़ी योग्यता एव विद्वता से किया है। (५२) आचार्य घासीलाल-सं० १९४१ में जसवन्तगढ़ में जन्मे आचार्य घासीलाल स्थानकवासी सम्प्रदाय के आचार्य जवाहरलालजी शिष्य के थे । व्याकरण, कोश, काव्य, स्तोत्र आदि में आपकी अमित गति है। - Page #13 -------------------------------------------------------------------------- ________________ राजस्थान के जैन संस्कृत साहित्यकार ४५६ आपकी कृतियाँ शिवकोश, उदयसागर कोश, श्रीलाल नाममालाकोश कोश साहित्य में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती हैं। इसी प्रकार व्याकरण के क्षेत्र में भी आपकी तीन कृतियों से जैन जगत आलोकित है। लघुसिद्धान्त कौमुदी, सिद्धान्तकौमुदी एवं अष्टाध्यायी के समान आपके आहेत व्याकरण, आहत लघु व्याकरण तथा आर्हत सिद्धान्त व्याकरण प्रसिद्ध है। ___काव्य की दृष्टि से शान्तिसिन्धु महाकाव्य, लोकाशाह महाकाव्य, पूज्य श्रीलाल काव्य, लवजी मुनि काव्य महत्त्वपूर्ण है। स्तोत्र जगत् में कल्याण मंगल स्तोत्र, वर्धमान स्तोत्र, नवस्मरण प्रमुख हैं। सिद्धान्त साहित्य में जैनागम तत्त्वदीपिका, तत्त्वप्रदीप, गृहस्थकल्पतरु, नागम्बर मंजरी एवं सूक्ति संग्रह का स्थान मुख्य है। (५३) आचार्य ज्ञानसागर-आपका जन्म सीकर जिलान्तर्गत राणोली ग्राम में सं० १९४८ में चतुर्भुज एवं घेवरीदेवी के घर हुआ। प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने के उपरान्त उच्च अध्ययन के लिए आप वाराणसी गये। वहाँ संस्कृत एवं जैनसिद्धान्त का अध्ययन कर शास्त्र परीक्षा उत्तीर्ण की। अविवाहित रहकर आचार्य ने अपना समग्र जीवन माँ भारती को समपित कर दिया । आपकी रचनाएँ महाकाव्य एवं चम्पू काव्य हैं। महाकाव्य की दृष्टि से वीरोदय, जयोदय एवं दयोदय एवं चम्पूकाव्य की दृष्टि से समुद्रदत्त, सुदर्शनोदय एवं भद्रोदय सर्वप्रमुख रचनाएँ हैं। वीरोदय में भगवान महावीर का जीवन-चरित वणित है। इस काव्य ने कालिदास, भारवि, माघ एवं श्रीहर्ष की स्मृति दिला दी है। 'माघे सन्ति त्रयो गुणाः' वाली कहावत चरितार्थ कर दी है। जयोदय काव्य में २८ सगों में जयकुमार एवं सुलोचना की कथा के माध्यम से अपरिग्रहव्रत का सन्देश दिया गया है। दयोदय में सामान्य व्यक्ति को नायक बनाकर महाकाव्य लिखने की जैन परम्परा का निर्वाह किया गया है। मृगसेन नामक धीवर के व्यक्तित्व को उभार कर अहिंसा व्रत का महत्त्व वणित किया गया है। समुद्रदत्त, सुदर्शनोदय एवं भद्रोदय नामक चम्पू लिखकर चम्पूसाहित्य की श्रीवृद्धि की है। आपकी हिन्दी साहित्य में भी अनेक रचनाएँ हैं जिनमें ऋषभचरित, भाग्योदय, विवेकोदय प्रमुख हैं। इनमें भी संस्कृत बहल शब्दों का प्रयोग किया गया है। (५४) कालगणि-वि० सं० १९३३ में जन्मे तेरापंथ के आठवें आचार्य कालूगणि का संस्कृत का अध्ययन बहुत विशद एवं प्रामाणिक था। यह भी कहा जा सकता है कि दो शती पूर्व प्रवर्तित तेरापंथ संप्रदाय में संस्कृत का प्रचार-प्रसार एवं रचनाओं की दृष्टि से आपका योगदान अविस्मरणीय है। राजस्थान के थली प्रदेश में भिक्षुशब्दानुशासन की रचना करवाकर व्याकरण के सरलीकरण की दिशा में प्रयास किया। इतना ही नहीं, मुनि चौथमल को निरन्तर संस्कृत साहित्य का अध्ययन एवं मनन की प्रेरणा आपसे मिलती रही। आचार्य कालूगणि को यह बात अखरती थी कि सारस्वत चन्द्रिका संक्षिप्त है, सिद्धान्त कौमुदी में वातिकों की अधिकता है, हेमशब्दानुशासन की रचना पद्धति कठोर है। अतएव गुरु की इस टीस को समझकर इस ग्रन्थ की रचना हुई। इसलिए गुरु को समर्पित इस ग्रन्थ की रचना में कालूगणि के महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता। (५५) आचार्य श्री तुलसी-युग प्रधान आचार्य श्री तुलसी तेरापंथ धर्म संघ के नवमें आचार्य एवं अणुव्रत अनुशास्ता के रूप में सर्वत्र ख्यात हैं। नागौर जिले के लाडनूं ग्राम में वि० सं० १९७१ में जन्म लेकर आपने ११ वर्ष की उम्र में दीक्षा ग्रहण की एवं अष्टमाचार्य के दिवंगत होने के पश्चात् आप वि० सं० १९९३ में तेरापंथ धर्मसंघ के नवम आचार्य के रूप में प्रसिद्ध हुए। आप प्राकृत, अपभ्रंश, संस्कृत, हिन्दी, राजस्थानी, गुजराती व अंग्रेजी भाषा के ख्यात विद्वान्, कवि एवं उच्च कोटि के साहित्यकार हैं। - O Page #14 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Ovo o loo ४६० कर्मयोगी श्री केसरीमलजी सुराणा अभिनन्दन ग्रन्थ : पंचम खण्ड SIDIIOISIO आपकी गति जैन दर्शन के अतिरिक्त न्याय एवं योग में भी रही है। जैन सिद्धान्न दीपिका में जहाँ जैन दर्शन के द्रव्य, गुण, पर्याय, जीव, अजीव, बन्ध, पुण्य, पाप, आस्रव, संवर, निर्जरा, मोक्ष आदि का विवेचन है तो भिक्षु- न्यायकणिका में प्रमाण, प्रमाण- लक्षण, प्रमेय आदि न्याय के विषयों का वर्णन है। मनोऽनुशासन नामक कृति में मन, मन की अवस्था, आसन, ध्यान, भावना, प्राणायाम आदि योग दर्शन के विषयों का विवेचन है । पंचसूत्र नामक कृति में अनुशासन एवं सामूहिक जीवन व्यवस्था की महत्ता पर प्रकाश डाला गया है । शिक्षा पण्णवति में भक्तामरस्तो की पादपूतिकर विद्यार्थियों के लिए उपयोगी उपदेशों को दर्शाया गया है। कर्त्तव्यत्रिशिका में साधु-साध्वियों की साधना के लिए समग्र मार्ग दर्शन दिया है। वि० सं० १९०७ में दीक्षा ग्रहण की। आपको किया गया है एवं युवाचार्य महाप्रज्ञ सम्बोधन दर्शनों के प्रकाण्ड विद्वान् हैं और आप आपने दर्शन, महाकाव्य, खण्डकाव्य, स्तोत्र संबोध योग दर्शन की सामग्री का विश्लेषण (५६) मुनि नथमल (पुवाचार्य महाप्रतजी) -नयमल जी ने अब आचार्य तुलसी के उत्तराधिकारी के रूप में युवाचार्य घोषित प्रदान किया गया है। आप अनेक भाषाओं के ज्ञाता और विविध इस सम्प्रदाय में साहित्य रचना की दृष्टि से सबसे अधिक सक्रिय हैं। एवं गीतकाव्य की सृष्टि की है । युक्तिवाद एवं अन्यापदेश न्याय की तथा किया है। भिक्षु महाकाव्य में तेरापंथ के आदि आचार्य भिक्षु के जीवनचरित का आश्रय लिया गया है। शब्द संकलन, भाव सौष्ठव एव पदावली का मनोहारी वर्णन पाठक को बलात् आकर्षित कर लेता है। अश्रुवीणा नामक काव्य १०० श्लोकों का शतक परम्परा का काव्य है। काव्य की मुख्य घटना है। इसी प्रकार रत्नपालचरित भी इसी भाँति की रचना है । महावीर द्वारा चन्दनबाला के आँख में आँसू का अभाव दर्शन इस तुला अतुला आपकी स्फुट पद्य रचननाऐं एवं मुकुल स्फुट निबन्ध है स्तोत्र साहित्य की दृष्टि से आत्मा स्तोत्र एवं कल्याणमन्दिरस्तोत्र की पादपूर्ति करके कालूभक्तामर एवं कालू कल्याणमन्दिर स्तोष की रचना महत्त्वपूर्ण है न केवल पादपूर्ति स्तोत्र ही आपकी क्षमता के परिचायक है अपितु तेरापंची स्तोत्र एवं भिक्षु शतकम् आपकी साम्प्रदायिक महत्त्व की रचनाएँ हैं भिल महाकाव्य में बचे भावों की अर्चना आप ने भिक्षु शतक की रचना करके कर दी । 1 (५७) चन्दनमुनि - वि० सं० १९७१ में सिरसा (पंजाब) में जन्मे चन्दन मुनि युगप्रधान आचार्य तुलसी के प्रधान शिष्यों में से हैं । आप प्राकृत, संस्कृत व हिन्दी भाषा के उद्भट विद्वान् हैं। संस्कृत में आपने १३ से अधिक कृतियाँ लिखी है। नथमल मुनि की भांति ही आपका अधिकार भी महाकाव्य, खण्डकाव्य, नीतिकाव्य एवं स्तोत्र साहित्य पर है। अभिनिष्क्रमण नामक कृति गद्य में लिखी होने पर भी महाकाव्य का सा आनन्द देती है। इसकी रचना तेरापंथी संप्रदाय के द्विशताब्दी समारोह के अवसर पर आचार्य भिक्षु के स्थानकवासी सम्प्रदाय से अभिनिष्क्रमण की स्मृति में हुई है। कृति में भावप्रवणता, विचारगांभीर्य, प्रकृति वर्णन उच्च कोटि के हैं। 'प्रभव प्रबोध' एवं 'अर्जुनमालाकारम्' नामक गद्यकाव्य जम्बूकुमार एवं अर्जुनमाली के जीवन पर आधारित हैं । 'प्रस्ताविक श्लोकशतकम्' एवं 'उपदेशामृतम्' नीति काव्य है । इनमें सामाजिक कुरीतियों एवं समस्याओं का वर्णन एवं समाधान दिया है। प्रथम कृति में १०० श्लोक एवं द्वितीय कृति में १६ चषक है। वीतराग स्तुति स्तोत्र साहित्य का प्रतिनिधित्व करता है । (५८) छत्रमल्ल मुनि - आप भी तेरापंथ सम्प्रदाय के नवमाचार्य आचार्य श्री तुलसी के शिष्य हैं । आपने शतक काव्यों की परम्परा का निर्वाह कर संस्कृत साहित्य को अनेक शतक प्रदान किये हैं । भगवान् श्रीकृष्ण से लेकर तुलसी एवं उनके पंथ तेरापंथ तक उनकी शतक परम्परा की परिधि में आता है। श्रीकृष्ण शतकम्, जयाचार्य शतकम्, कालू Page #15 -------------------------------------------------------------------------- ________________ राजस्थान के जैन संस्कृत साहित्यकार 461 शतकम्, तुलसी शतकम् एवं तेरापंथ शतकम् लिखकर शतक परम्परा को व्यक्ति जीवन पर आधारित 7 शतक प्रदान किये। (56) मुनि दुलीचन्द 'दिनकर'-आप भी आचार्य श्री तुलसी के विद्वान् शिष्य हैं। आपकी 3 रचनाएँ प्रसिद्ध हैं-गीतिसंदोह, तुलसीस्तोत्र एवं तेरापंथ शतकम् / प्रथम कृति में गीतिकाओं का संकलन तथा अपर दो कृतियाँ मुनिक्षत्रमल्ल की भांति ही आचार्य तुलसी एवं उनके पंथ की स्तुति में बनायी गई हैं। (60) साध्वी संघमित्रा-साध्वी श्री संघमित्रा तेरापंथ धर्मसंघ की परम विदुषी साध्वियों में से एक है। आप जैन इतिहास, साहित्य व दर्शन की महान ज्ञाता हैं। आप संस्कृत व हिन्दी में समान रूप से लिखती हैं / गीतिकाव्य में भावों की तीव्रता, अनुभूति की सघनता, संक्षिप्तता, संकेतात्मकता एवं सूक्ष्मता अपेक्षित होती है। महिलाओं में इनकी सहज स्वाभाविक उपस्थिति होती है। अतएव साध्वी संघमित्राजी का गीति काव्य के प्रति, सम्मान स्वाभाविक है / आपकी संस्कृत रचनाएँ गीतिमाला एवं नीतिगुच्छ प्राप्त होती हैं। (61) पं० रघुनन्दन शर्मा- जैन नहीं होते हुए भी प० रघुनन्दन शर्मा को जैन साहित्य के विवरण से अलग नहीं कर सकते / तेरापथ के संघनायक आचार्य तुलसी के प्रति भक्ति को आपने अपनी काव्य प्रतिभा से तुलसी महाकाव्य की रचना के रूप में प्रकट किया। 25 सगों के इस महाकाव्य में आचार्य के जन्म का आध्यात्मिक अभ्युदय के रूप में वर्णन, रस, अलंकार, नवीन उपमायें एवं रूपकों का वर्णन कर संस्कृत भाषा की जीवन्तता एवं युगानुरूप परिवर्तनशीलता का प्रमाण दिया है। इनके अतिरिक्त मुनि बुद्धमल्ल, डूंगरमल्ल, नगराज, धनराज, कन्हैयालाल मोहनलाल शार्दूल, साध्वी मंजुलाजी, साध्वी कमलाजी भी साहित्य सृजन में सक्रिय हैं। दिङमात्र प्रदर्शित इन कृतियों एवं कृतिकारों के विवरण से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि राजस्थान में जैन सम्प्रदाय ने संस्कृत की उन्नति एवं प्रसार का प्रशंसनीय कार्य किया / सभी जैन साहित्यकारों ने केवल जैन धर्म एवं दर्शन पर ही लेखनी नहीं चलाई अपितु जैनेतर दर्शन, व्याकरण, काव्य एवं साहित्य पर भी उतनी ही उदारता एवं सहजता से लेखन कार्य किया / आशा है, शोधार्थी वर्ग इस उपेक्षित परम्परा की शोध-खोज की ओर भी ध्यान देना।