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________________ Ovo o loo ४६० कर्मयोगी श्री केसरीमलजी सुराणा अभिनन्दन ग्रन्थ : पंचम खण्ड SIDIIOISIO आपकी गति जैन दर्शन के अतिरिक्त न्याय एवं योग में भी रही है। जैन सिद्धान्न दीपिका में जहाँ जैन दर्शन के द्रव्य, गुण, पर्याय, जीव, अजीव, बन्ध, पुण्य, पाप, आस्रव, संवर, निर्जरा, मोक्ष आदि का विवेचन है तो भिक्षु- न्यायकणिका में प्रमाण, प्रमाण- लक्षण, प्रमेय आदि न्याय के विषयों का वर्णन है। मनोऽनुशासन नामक कृति में मन, मन की अवस्था, आसन, ध्यान, भावना, प्राणायाम आदि योग दर्शन के विषयों का विवेचन है । पंचसूत्र नामक कृति में अनुशासन एवं सामूहिक जीवन व्यवस्था की महत्ता पर प्रकाश डाला गया है । शिक्षा पण्णवति में भक्तामरस्तो की पादपूतिकर विद्यार्थियों के लिए उपयोगी उपदेशों को दर्शाया गया है। कर्त्तव्यत्रिशिका में साधु-साध्वियों की साधना के लिए समग्र मार्ग दर्शन दिया है। वि० सं० १९०७ में दीक्षा ग्रहण की। आपको किया गया है एवं युवाचार्य महाप्रज्ञ सम्बोधन दर्शनों के प्रकाण्ड विद्वान् हैं और आप आपने दर्शन, महाकाव्य, खण्डकाव्य, स्तोत्र संबोध योग दर्शन की सामग्री का विश्लेषण (५६) मुनि नथमल (पुवाचार्य महाप्रतजी) -नयमल जी ने अब आचार्य तुलसी के उत्तराधिकारी के रूप में युवाचार्य घोषित प्रदान किया गया है। आप अनेक भाषाओं के ज्ञाता और विविध इस सम्प्रदाय में साहित्य रचना की दृष्टि से सबसे अधिक सक्रिय हैं। एवं गीतकाव्य की सृष्टि की है । युक्तिवाद एवं अन्यापदेश न्याय की तथा किया है। भिक्षु महाकाव्य में तेरापंथ के आदि आचार्य भिक्षु के जीवनचरित का आश्रय लिया गया है। शब्द संकलन, भाव सौष्ठव एव पदावली का मनोहारी वर्णन पाठक को बलात् आकर्षित कर लेता है। अश्रुवीणा नामक काव्य १०० श्लोकों का शतक परम्परा का काव्य है। काव्य की मुख्य घटना है। इसी प्रकार रत्नपालचरित भी इसी भाँति की रचना है । महावीर द्वारा चन्दनबाला के आँख में आँसू का अभाव दर्शन इस तुला अतुला आपकी स्फुट पद्य रचननाऐं एवं मुकुल स्फुट निबन्ध है स्तोत्र साहित्य की दृष्टि से आत्मा स्तोत्र एवं कल्याणमन्दिरस्तोत्र की पादपूर्ति करके कालूभक्तामर एवं कालू कल्याणमन्दिर स्तोष की रचना महत्त्वपूर्ण है न केवल पादपूर्ति स्तोत्र ही आपकी क्षमता के परिचायक है अपितु तेरापंची स्तोत्र एवं भिक्षु शतकम् आपकी साम्प्रदायिक महत्त्व की रचनाएँ हैं भिल महाकाव्य में बचे भावों की अर्चना आप ने भिक्षु शतक की रचना करके कर दी । 1 Jain Education International (५७) चन्दनमुनि - वि० सं० १९७१ में सिरसा (पंजाब) में जन्मे चन्दन मुनि युगप्रधान आचार्य तुलसी के प्रधान शिष्यों में से हैं । आप प्राकृत, संस्कृत व हिन्दी भाषा के उद्भट विद्वान् हैं। संस्कृत में आपने १३ से अधिक कृतियाँ लिखी है। नथमल मुनि की भांति ही आपका अधिकार भी महाकाव्य, खण्डकाव्य, नीतिकाव्य एवं स्तोत्र साहित्य पर है। अभिनिष्क्रमण नामक कृति गद्य में लिखी होने पर भी महाकाव्य का सा आनन्द देती है। इसकी रचना तेरापंथी संप्रदाय के द्विशताब्दी समारोह के अवसर पर आचार्य भिक्षु के स्थानकवासी सम्प्रदाय से अभिनिष्क्रमण की स्मृति में हुई है। कृति में भावप्रवणता, विचारगांभीर्य, प्रकृति वर्णन उच्च कोटि के हैं। 'प्रभव प्रबोध' एवं 'अर्जुनमालाकारम्' नामक गद्यकाव्य जम्बूकुमार एवं अर्जुनमाली के जीवन पर आधारित हैं । 'प्रस्ताविक श्लोकशतकम्' एवं 'उपदेशामृतम्' नीति काव्य है । इनमें सामाजिक कुरीतियों एवं समस्याओं का वर्णन एवं समाधान दिया है। प्रथम कृति में १०० श्लोक एवं द्वितीय कृति में १६ चषक है। वीतराग स्तुति स्तोत्र साहित्य का प्रतिनिधित्व करता है । (५८) छत्रमल्ल मुनि - आप भी तेरापंथ सम्प्रदाय के नवमाचार्य आचार्य श्री तुलसी के शिष्य हैं । आपने शतक काव्यों की परम्परा का निर्वाह कर संस्कृत साहित्य को अनेक शतक प्रदान किये हैं । भगवान् श्रीकृष्ण से लेकर तुलसी एवं उनके पंथ तेरापंथ तक उनकी शतक परम्परा की परिधि में आता है। श्रीकृष्ण शतकम्, जयाचार्य शतकम्, कालू For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.211821
Book TitleRajasthan ke Jain Sanskrut Sahityakar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShaktikumar Sharma
PublisherZ_Kesarimalji_Surana_Abhinandan_Granth_012044.pdf
Publication Year1982
Total Pages15
LanguageHindi
ClassificationArticle & Literature
File Size848 KB
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