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________________ . ४४८ कर्मयोगी श्री केसरीमलजी सुराणा अभिनन्दन ग्रन्थ : पंचम खण्ड .... . ................................................................... अनुयोगद्वारसूत्र टीका, आवश्यकसूत्र बृहद्वृत्ति, आवश्यक नियुक्ति टीका, जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्र टीका, जीवागम-सूत्र-लघुवृत्ति, तत्त्वार्थसूत्रटीका, दशवैकालिक सूत्रटीका, नन्दीसूत्रटीका, पिण्डनियुक्ति टीका, प्रज्ञापना सूत्र प्रदेश व्याख्या, ललितविस्तरा, चैत्यवन्दन सूत्रवृत्ति आदि।। राजस्थान के संस्कृत साहित्य को आचार्य हरिभद्रसूरि का आदि कवि कहा जा सकता है। (३) सिद्धषिसूरि-सिषिसूरि निवृत्ति कुल के आचार्य दुर्गस्वामी के शिष्य थे । आचार्य दुर्गस्वामी का स्वर्गवास भिन्नमाल (भीनमाल) में हुआ। अतएव आपका कार्यक्षेत्र राजस्थान ही रहा । दुर्गस्वामी की मृत्यु के पश्चात् आपने गर्गस्वामी को अपना गुरु बनाकर दीक्षा ग्रहण की। उपमितिभवप्रपंच कथा में सं० ६६२ अंकित है। अतएव आपका स्थिति काल १०वीं शती स्वीकार किया जा सकता है। आपकी दो रचनाएँ साहित्यिक जगत् में विख्यात रहीं-उपमितिभव-प्रपंच नामक रचना एक विशालकाय महारूपक है। विश्व साहित्य में यह एक प्राचीनतम रूपकमय उपन्यास है। प्रतीत होता है कि संस्कृत कवि कृष्णचन्द्र यति को 'मोहविजय' नामक रूपक लिखने की प्रेरणा इस ग्रन्थ से मिली होगी। चन्द्रकेवली चरित एक चरित काव्य है। इनके अतिरिक्त उपदेशमाला एवं न्याया वतार पर आपकी टीकाएँ भी प्रसिद्ध हैं। - (४) अमृतचन्द्र-महापण्डित आशाधर ने अमृतचन्द्र का उल्लेख सूरिपद के साथ किया जिससे ज्ञात होता है कि वे अभिजात कुल के थे। पं० नाथूराम प्रेमी ने लिखा है-"अमृतचन्द्र वामणवाडे आये तथा सिंह नामक कवि को 'पज्जुण्णचरिउ' लिखने की प्रेरणा दी। यह बामणवाड़ यदि सवाईमाधोपुर जिले में स्थित बामणवास है तो आपका कार्यक्षेत्र राजस्थान ही सिद्ध होता है। आपका स्थितिकाल १०वीं एवं ११वीं शती के मध्य माना जाता है। आपकी तीन रचनाएँ प्रसिद्ध हैं-(१) पुरुषार्थसिद्ध युपाय, (२) तत्त्वार्थसार, (३) समयसारकलश । पुरुषार्थसिद्ध युपाय २२६ पद्यों की संस्कृत रचना है जिसमें जैनधर्म के त्रिरत्न (सम्यक्दर्शन, सम्यक्ज्ञान, सम्यक्चारित्र) व्यवहारनय-निश्चयनय, आस्रव आदि जैन दर्शन के तत्त्वों का विवेचन है। अधिकारों से संवलित तत्त्वार्थसार में जीव-अजीव, आस्रव, बन्ध, मोक्ष, निर्जरा आदि का विशद विश्लेषण है। आचार्य कुन्दकुन्द की कृति समयसार पर आत्मख्याति नामक टीका में परिष्कृत गद्यशैली एवं गाथा के शब्दों की व्याख्या के मनोरम उदाहरण प्राप्त होते हैं। (५) रामसेन-दिगम्बर सम्प्रदाय के प्रस्तुत कवि रामसेन बागड (डूंगरपुर-बांसवाड़ा क्षेत्र) से सम्बन्धित एवं नरसिंहपुरा जाति के संस्थापक थे। भट्टारक परम्परा के अनेक विद्वानों ने अपनी प्रशस्तियों में रामसेन को आदरपूर्वक स्मरण किया है । आपका समय १०वीं शती माना जाता है। तत्त्वानुशासन नामक २५८ श्लोकों की रचना में अध्यात्म का सुन्दर विश्लेषण किया गया है। अपनी सुबोध एवं सरल शैली के माध्यम से कठोर, नीरस एवं दुर्बोध विषय को भी सहज, सरल एवं सरस बना दिया है । कर्मबन्ध, उसकी मुक्ति, मुक्ति का उपाय (ध्यान), उसका भेद आदि का वर्णन सहज एवं आकर्षक बन पड़ा है। (६) आचार्य महासेन-आचार्य महासेन लाल बागड़ संघ के पूर्णचन्द जयसेन तथा गुणाकरसेन सूरि के शिष्य थे। इनके गुणों के परिगणन में सिद्धान्तज्ञ, वाग्मी, यशस्वियों द्वारा मान्य, सज्जनों में अग्रणी एवं परमार वंशी मुंज द्वारा पूजित' विशेषणों का प्रयोग हुआ है। मुंज के स्थितिकाल के आधार पर आपका समय १०वीं शती स्वीकार किया जा सकता है । १ तच्छिष्यो विदिताखिलोरुसमयो वादी च वाम्मी कवि, शब्दब्रह्मविचारधामयशसां मान्यो सतामग्रणी। आसीत् श्रीमहसेनसूरिरनघः श्रीमुंजराज चितः, सीमादर्शनबोधप्रत्तपसां भब्याब्जनी बान्धवः ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.211821
Book TitleRajasthan ke Jain Sanskrut Sahityakar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShaktikumar Sharma
PublisherZ_Kesarimalji_Surana_Abhinandan_Granth_012044.pdf
Publication Year1982
Total Pages15
LanguageHindi
ClassificationArticle & Literature
File Size848 KB
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