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प्रवचनसारोद्धारः एक अध्ययन
प्रवचनसारोद्धार जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, जैन धर्म एवं दर्शन का सारभूत, किन्तु आकर ग्रन्थ है। इसका विषय वैविध्य एवं कर्ता की व्यापक संग्राहक दृष्टि, इसे जैन विद्या के लघु विश्व-कोष की श्रेणी में लाकर रख देती है। वस्तुत: यह एक संग्रह ग्रन्थ है, जिसमें जैन विद्या के विविध आयामों को समाहित करने का लेखक ने अनुपम प्रयास किया। यद्यपि इसके पूर्व आचार्य हरिभद्रसूरि (विक्रम संवत् की आठवीं शती) ने अपने ग्रन्थों अष्टक, षोड्शक, विंशिका, पंचासक आदि में जैन धर्म, दर्शन और साधना के विविध पक्षों को समाहित करने प्रयत्न किया है, फिर भी विषय वैविध्य की अपेक्षा से ये ग्रन्थ भी इतने व्यापक नहीं हैं, जितना प्रवचनसारोद्धार है। इसमें २७६ द्वार हैं और प्रत्येक द्वार एक-एक विषय का विवेचन प्रस्तुत करता है, इस प्रकार प्रस्तुत कृति में जैन विद्या से सम्बन्धित २७६ विषयों का विवेचन है। इससे इसका बहुआयामी स्वरूप स्पष्ट हो जाता है।
प्रस्तुत कृति १५७७ प्राकृत गाथाओं में निषद्ध है। मात्र गाथा (श्लोक) क्रमांक ७७१ संस्कृत में है। इसकी भाषा महाराष्ट्री प्राकृत है। छन्दों की अपेक्षा से इसमें आर्या छन्द की ही प्रमुखता है, यद्यपि अन्य छन्द भी उपलब्ध होते हैं। इस कृति के अवलोकन से यह स्पष्ट हो जाता है कि जैन परम्परा में ई० पू० छठी शती से लेकर ईसा की तेरहवीं शती तक लगभग दो हजार वर्ष की सुदीर्ध अवधि में प्राकृत में ग्रन्थ लेखन की जीवित परम्परा रही है। मात्र यही नहीं, इसके पश्चात् आज तक भी प्राकृत भाषा में ग्रन्थ लिखे जा रहे हैं जो जैन विद्वानों की प्राकृत के प्रति प्रतिबद्धता के सूचक हैं। प्रस्तुत कृति के लेखक ने इसके अतिरिक्त अनंतनाहचरियं नामक एक अन्य ग्रन्थ भी प्राकृत भाषा में रचा है इससे लेखक को प्राकृत भाषा और विषय दोनों पर अधिकार सिद्ध होता है। साथ ही प्रस्तुत कृति में विविध विषयों का संग्रह उसकी बहुश्रुतता का भी परिचय देता है। प्रवचनसारोद्धार के रचयिता :
प्रवचनसारोद्धार नामक प्रस्तुत कृति के रचयिता आचार्य नेमिचन्द्रसूरि हैं किन्तु ये नेमिचन्द्रसूरि कौन हैं और कब हुए? इस सम्बन्ध में थोड़ी विस्तृत विवेचना अपेक्षित है।
'यद्यपि प्रवचनसारोद्धार की प्रशस्ति में ग्रन्थकार ने इसके रचनाकाल का उल्लेख नहीं किया है किन्तु उन्होंने अपना और अपनी गुरु परम्परा का संक्षिप्त किन्तु
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स्पष्ट निर्देश किया है। कर्ता प्रशस्ति में वे लिखते हैं "धर्म रूपी पृथ्वी का उद्धार करने में महावराह के समान जिनचन्द्रसूरि के शिष्य आम्रदेवसूरि हुए। उनके शिष्य नेमिचन्द्रसूरि, जो विजयसेन गणधर से कनिष्ठ और यशोदेवसूरि से ज्येष्ठ थे, ने सिद्धान्तरूपी रत्नाकर से रत्नों का चयन करके प्रवचनसारोद्धार की रचना की।" इस प्रकार प्रवचनसारोद्धार की इस कर्ता प्रशस्ति में उन्होंने अपनी गुरु परम्परा में केवल अपने प्रगुरु जिनचन्द्रसूरि और गुरु आम्रदेवसूरि के ही नामों का निर्देश किया है, उनके गच्छ आदि का विस्तृत विवरण नहीं दिया है किन्तु अपने द्वारा ही रचित अनंतनाहचरियं की कर्ता प्रशस्ति में अपने गच्छ और गुरु परम्परा का अधिक विस्तृत विवरण दिया है। फिर भी उपरोक्त दोनों प्रशस्तियों से ग्रन्थकार के सांसारिक जीवन के सम्बन्ध में कोई भी जानकारी उपलब्ध नहीं होती है।
अनंतनाहचरियं से इतना विशेष ज्ञात होता है कि वे श्वेताम्बर परम्परा के बृहद् गच्छ के थे । इस गच्छ इसका प्रारम्भ देवसूरि से बताया गया है। इन देवसूरि के शिष्य आदित्यदेवसूरि हुए। आदित्यदेवसूरि के शिष्य आनन्ददेवसूरि और आनन्ददेवसूरि के शिष्य नेमिचन्द्रसूरि (प्रथम) हुए। उसमें इन्हें सिद्धान्त के रहस्यों का ज्ञाता भी कहा गया है। इन्होंने लघुवीरचरित, उत्तराध्ययनवृत्ति, आख्यानकमणिकोष एवं रत्नचूड़चरित आदि ग्रन्थों की रचना की थी। प्रशस्ति में इन नेमिचन्द्रसूरि का जिस प्रकार से गुणगान किया गया है उससे यही सिद्ध होता है कि प्रवचनसारोद्धार के कर्ता ये नेमिचन्द्रसूरि (प्रथम) नहीं हैं। क्योंकि ग्रन्थकार प्रशस्ति में स्वयं अपनी प्रशंसा इस रूप में नहीं कर सकता है। इसी प्रशस्ति में आगे आनन्ददेवसूरि के दूसरे दो शिष्यों प्रद्योतनसूरि और जिनचन्द्रसूरि का उल्लेख भी हुआ है और इन जिनचन्द्रसूरि के आम्रदेवसूर और श्रीचन्दसूरि ऐसे दो शिष्य हुए। ये आम्रदेवसूरि आख्यानकमणिकोष की वृत्ति के रचयिता हैं। प्रशस्ति के अनुसार इन्हीं आम्रदेवसूरि के शिष्यों में हरिभद्रसूरि, विजयसेनसूरि, यशोदेवसूरि और नेमिचन्द्रसूरि (द्वितीय) आदि हुए, यही नेमिचन्द्रसूरि (द्वितीय) इस प्रवचनसारोद्धार के कर्ता हैं।
अपने अनंतनाहचरियं की ग्रन्थ प्रशस्ति में इन नेमिचन्द्रसरि ने अपने को मन्दमति कहा है इससे भी यही सिद्ध होता है कि ये नेमिचन्द्रसूरि (द्वितीय) ही उस अनंतनाहचरियं के एवं प्रवचनसारोद्धार नामक प्रस्तुत कृति के कर्ता हैं। नेमिचन्द्रसूरि ने उस प्रशस्ति में अपने जिन अन्य गुरु भ्राताओं का निर्देश किया है उनमें यशोदेवसूरि को लक्षण, छन्द, अलंकार, तर्क, साहित्य और सिद्धान्त का ज्ञाता कहा गया है। ज्ञातव्य है कि ये यशोदेवसरि ही प्रस्तुत कृति के संशोधक भी थे। इस समग्र चर्चा के आधार पर प्रस्तुत कृति के कर्ता नेमीचन्द्रसूरि (द्वितीय) की जो गुरु परम्परा
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१२२ निर्धारित होती है उसे निम्न सारिणी द्वारा स्पष्टतया समझा जा सकता है----
बृहद्गच्छीय देवसूरि
आदित्यअजितदेवसूरि
आनन्ददेवसूरि (पट्टधर)
नेमिचन्द्रसूरि (प्रथम)
पट्टधर
प्रद्योतनसूरि
पट्टधर
जिनचन्द्रसूरि (पट्टधर)
आम्रदेवसूरि (शिष्य)
श्रीचन्द्रसूरि (शिष्य)
हरिभद्रसूरि विजयसेनसूरि नेमिचन्द्रसूरि (द्वितीय) यशोदेवसूरि गुणाकर पार्श्वदेव (मुख्य पट्टधर) (शिष्य पट्टधर) (शिष्य पट्टधर) (शिष्य पट्टधर) (शिष्य) (शिष्य) प्रस्तुत कृति का रचनाकाल :
यद्यपि प्रवचनसारोद्धार की प्रशस्ति में उसके रचनाकाल का स्पष्ट निर्देश नहीं है, किन्तु उसके कर्ता नेमिचन्द्रसूरि (द्वितीय) का सत्ताकाल विक्रम की १२वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से लेकर १३वीं शताब्दी के पूर्वार्ध तक सुनिश्चित है। उन्होंने अपने अनंतनाहचरियं में उसके रचनाकाल का भी स्पष्ट निर्देश किया है। ग्रन्थ के रचनाकाल के सम्बन्ध में ग्रन्थ की अन्तिम प्रशस्ति में उन्होंने 'रसचंदसरससेवरिसे विक्कमनिवावकन्ते' ' ऐसा स्पष्ट उल्लेख किया है इससे स्पष्ट है कि इस ग्रन्थ की रचना वि०सं० १२१६ में हुई थी। इस कृति में कुमारपाल के राज्यकाल का भी स्पष्ट निर्देश है। इससे भी इसी तथ्य की पुष्टि होती है कि उन्होंने जब वि०सं० १२१६ में अनंतनाहचरियं की रचना की थी, तब गुजरात में कुमारपाल शासन कर रहा था। अत: उनका सत्ताकाल विक्रम की १२वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से १३वीं शताब्दी के पूर्वार्ध तक सिद्ध होता है। ईसा सन् की दृष्टि से तो उनका सत्ताकाल ईसा की १२वीं शताब्दी सुनिश्चित है।
प्रवचनसारोद्धार के टीकाकार सिद्धसेनसूरि ने इसकी टीका की रचना विक्रम संवत् १२४८ मतान्तर से विक्रम संवत् १२७८ में की थी। टीका प्रशस्ति
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१२३ में इस टीका के रचनाकाल का शब्दों के माध्यम से “करिसागर रविसंख्ये' ऐसा निर्देश किया गया है। यहाँ यह मतभेद इसलिए है कि सागर शब्द से कुछ लोग चार
और कुछ लोग सात की संख्या का ग्रहण करते हैं। सागर से चार संख्या का ग्रहण करने पर टीका का रचनाकाल वि०सं० १२४८ और सात संख्या ग्रहण करने पर टीका का रचनाकाल वि०सं० १२७८ निर्धारित होता है। इनमें से चाहे कोई भी संवत् निश्चित हो किन्तु इतना निश्चित है कि विक्रम की तेरहवीं शती के उत्तरार्ध में यह टीका ग्रन्थ निर्मित हो चुका था। मेरी दृष्टि में यदि प्रवचनसारोद्धार बृहद्गच्छीय नेमिचन्द्रसरि (द्वितीय) के जीवन के उत्तरार्ध की और अनंतनाहचरियं के बाद की रचना है तो वह विक्रम संवत् १२१६ के पश्चात् लगभग वि०सं० १२३० के आसपास कभी लिखा गया होगा क्योंकि अनंतनाहचरियं को समाप्त करके इसे लिखने में १०-१५ वर्ष अवश्य लगे होंगे। पुन: मूलग्रन्थ और उसकी टीका के रचनाकाल के मध्य भी कम से कम १५-२० वर्ष का अन्तर तो अवश्य ही मानना होगा। मूलग्रन्थ और उसकी टीका उसी स्थिति में समकालिक हो सकते हैं जबकि टीका या तो स्वोपज्ञ हो या अपने शिष्य या गुरुभ्राता के द्वारा लिखी गई हो।
प्रस्तुत कृति के टीकाकार सिद्धसेनसूरि नेमीचन्द्रसूरि की बृहदगच्छीय देवसूरि की परम्परा से भिन्न चन्द्रगच्छीय अभयदेवसूरि की शिष्य परम्परा के थे। टीकाकार सिद्धसेनसूरि की गुरू परम्परा इस प्रकार है---
चन्द्रगच्छीय अभयदेवसूरि
धनेश्वरसूरि (मुञ्जनृप के समकालीन) अजितसिंहसूरि देवचन्द्रसूरि चन्द्रप्रभ (मुनिपति) भद्रेश्वरसूरि अजितसिंहसूरि
देवप्रभसूरि (प्रमाणप्रकाश एवं श्रेयासंचरित्र के कर्ता) सिद्धसेनसूरि (प्रवचनसारोद्धार के टीकाकार)
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ज्ञातव्य हैं इस काल में जब ग्रन्थों को हाथ से प्रतिलिपि तैयार कराकर उन्हें प्रसारित किया जाता था तब उन्हें दूसरे लोगों के पास पहुंचने में पर्याप्त समय लग जाता था। अत: प्रस्तुत कृति से सिद्धसेनसूरि को परिचित होने और पुनः उस पर टीका लिखने में पच्चीस-तीस वर्ष का अन्तराल तो अवश्य ही रहा होगा। अतः यदि टीका विक्रम की तेरहवीं शती के पूर्वार्ध के द्वितीय चरण विक्रम संवत् १२४८ में लिखी गई है तो मूलकृति कम से कम विक्रम को तेरहवीं शती के प्रथम चरण अर्थात् वि०सं० १२२५-३० में लिखी गई होगी। अतः प्रवचनसारोद्धार की रचना १२२५ के आस-पास कभी हुई होगी।
प्रवचनसारोद्धार मौलिक रचना है या मात्र संग्रह ग्रन्थ ?
प्रवचनसारोद्धार आचार्य नेमिचन्द्रसूरि की मौलिक कृति है या एक संकलन ग्रन्थ है, इस प्रश्न का उत्तर देना अत्यन्त कठिन है क्योंकि प्रस्तुत ग्रन्थ में ६०० से अधिक गाथाएँ ऐसी हैं जो आगम ग्रन्थों, नियुक्तियों, भाष्यों, प्रकीर्णकों, प्राचीन कर्म ग्रन्थों एवं जीवसमास आदि प्रकरण ग्रन्थों में उपलब्ध हो जाती हैं। प्रवचनसारोद्धार की भारतीय प्राच्य तत्व प्रकाशन समिति पिण्डवाड़ा से प्रकाशित प्रति में उसके विद्वान सम्पादक मुनिश्री पद्मसेन विजयजी और मुनिश्री चन्द्रविजय जी ने इसकी लगभग ५०० गाथाऐं जिन-जिन ग्रन्थों से ली गयी हैं, उनके मूल स्त्रोत का निर्देश किया है। इनके अतिरिक्त भी अनेक गाथायें ऐसी हैं जो आवश्यकसूत्र की हरिभद्रीयवृत्ति आदि प्राचीन टीका ग्रन्थों में उद्धृत हैं। पुनः पार्श्वनाथ विद्यापीठ के मेरे शिष्य डॉ० श्रीप्रकाश पाण्डेय की सूचना के अनुसार प्रवचनसारोद्धार में सात प्रकीर्णकों की लगभग ७२ गाथाएँ मिलती हैं। कहीं-कहीं पाठ भेद को छोड़कर ये गाथाएं भी प्रवचनसारोद्धार में समान रूप से ही उपलब्ध होती हैं। इसमें देविदत्थओं की ७, गच्छाचार की १, ज्योतिष्करण्डक की ३, तित्थोगाली की ३२, आराधनापताका (प्राचीन ) की २०, आराधनापताका ( वीरभद्राचार्य रचित) की ६ एवं पज्जंताराहणा ( पर्यन्त - आराधना) की ४ गाथायें मिलती हैं। यह भी स्पष्ट है कि ये सभी प्रकीर्णक नेमिचद्रसूरि के प्रवचनसारोद्धार से प्राचीन हैं। यह निश्चित है कि इन गाथाओं की रचना ग्रन्थकार ने स्वयं नहीं की है, अपितु इन्हें पूर्व आचार्यों द्वारा रचित ग्रन्थों से यथावत् ले लिया है। मात्र इतना ही नहीं अभी भी अनेक ग्रन्थ ऐसे हैं जिनकी गाथा सूचियों के साथ प्रवचनसारोद्धार की गाथाओं का तुलनात्मक अध्ययन नहीं हुआ है। अंगविज्जा जैसे कुछ प्राचीन ग्रन्थों में और भी समान गाथायें मिलने की संभावना है इससे ऐसा लगता है कि प्रवचनसारोद्धार की लगभग आधी गाथायें तो अन्य ग्रन्थों से संकलित हैं। ऐसी स्थिति में नेमिचन्द्रसूरि को ग्रन्थकार या कर्ता मानने पर
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अनेक विपत्तियां सामने आती हैं किन्तु जब तक सम्पूर्ण ग्रन्थ की सभी गाथायें संकलित न हो तब तक अवशिष्ट गाथाओं के रचनाकार तो नेमिचन्द्रसूरि (द्वितीय) को ही मानना होगा। प्राचीन काल में ग्रन्थ रचना करते समय आगम अथवा प्राचीन आचार्यों को कृतियों से बिना नाम निर्देश के गाथायें उद्धृत कर लेने की प्रवृत्ति रही है और इस प्रकार की प्रवृत्ति श्वेताम्बर एवं दिगम्बर दोनों ही परम्पराओं के रचनाकारों में पाई जाती है। उदाहरण के रूप में मूलाचार में उत्तराध्ययनसूत्र, आवश्यकनियुक्ति, आतुरप्रत्याख्यान, महाप्रत्याख्यान आदि अनेक ग्रन्थों की २०० से अधिक गाथायें उद्धृत हैं। यही स्थिति भगवती आराधना एवं आचार्य कुन्दकुन्द के नियमसार आदि ग्रन्थों की भी है।
नियमसार षट्प्राभृत आदि की अनेक गाथाएं श्वेताम्बर आगमों, प्रकीर्णकों, नियुक्तियों एवं भाष्यों आदि में समरूप मिलती हैं। श्वेताम्बर मान्य आगमों में भी संग्रहणी सूत्र आदि की एवं प्रकीर्णकों में एक दूसरे की अनेक गाथायें अवतरित की गई हैं। इस प्रकार अपने ग्रन्थों में अन्य ग्रन्थों से गाथायें अवतरित करने की परम्परा प्राचीनकाल से चली आ रही है।
ऐसी स्थिति में जब दूसरे दूसरे आचार्यों को तत् - तत् ग्रन्थ का रचनाकार मान लिया जाता है तो फिर नेमिचंद्रसूरि (द्वितीय) को प्रस्तुत कृति का कर्ता मान लेने पर कौन सी आपत्ति है? पुनः १६०० गाथाओं के इस ग्रन्थ में यदि ६०० गाथायें अन्यकृतक हैं भी तो शेष १००० गाथाओं के रचनाकार तो नेमीचन्द्रसूरि (द्वितीय) हैं ही। प्रवचनसारोद्वार की कौन सी गाथा किस ग्रन्थ में किस स्थान पर मिलती है अथवा अन्य ग्रन्थों की कौन सी गाथाएँ प्रवचनसारोद्धार के किस क्रम पर हैं इसकी सूची इसी लेख के अन्त में यथास्थान प्रस्तुत है
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जैसा कि लेख के प्रारम्भ में कहा जा चुका हैं प्रवचनसारोद्धार पर आचार्य सिद्धसेनसूरि की लगभग विक्रम की १३वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में लिखी गई 'तत्त्वज्ञान - विकासिनी' नामक एक सरल किन्तु विशद टीका उपलब्ध होती है। टीकाकार सिद्धसेनसूरि की तीन अन्य कृतियों - १. पद्मप्रभचरित्र २. समाचारी और ३. एक स्तुति का उल्लेख मिलता है।
प्रवचनसारोद्धार की 'तत्त्वज्ञान - विकासिनी' नामक यह वृत्ति या टीका टीकाकार की बहुश्रुतता को अभिव्यक्त करती है। उन्होंने इसमें लगभग १०० ग्रन्थों का निर्देश किया है और उनके ५०० से अधिक सन्दर्भों का संकलन किया है। इन उद्धरणों की सूची भी पिण्डवाडा से प्रकाशित प्रवचनसारोद्धार भाग - २ के अन्त में दे दी गई है। इससे वृत्तिकार की बहुश्रुतता प्रामाणित हो जाती है । वृत्तिकार ने जहां
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आवश्यकता हुई वहां न केवल अपनी विवेचना प्रस्तुत की अपितु पूर्व पक्ष को प्रस्तुत कर उसका समाधान भी किया। जहां कहीं भी उन्हें व्याख्या में मतभेद की सूचना प्राप्त हुई उन्होंने स्पष्ट रूप से अन्य मत का भी निर्देश किया है। इसी प्रकार जहां मलपाठ के सन्दर्भ में किसी प्रकार की विप्रतिपत्ति दिखाई दी उन्होंने पाठ को अपनी दृष्टि से शुद्ध बनाने का भी प्रयत्न किया है। इस प्रकार प्रस्तुत ग्रन्थ की यह टीका भी अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। प्रवचनसारोद्धार की विषयवस्तु :
प्रवचनसारोद्धार के प्रारम्भ में मंगल अभिधान के पश्चात् ६३ गाथाओं में इस के २७६ द्वारों का उल्लेख किया गया है। इन द्वारों के नामों को देखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रस्तुत कृति में जैनधर्मदर्शन के विविध पक्षों को समाहित करने का प्रयत्न किया गया है। यद्यपि प्रवचनसारोद्धार में मूल गाथाओं की संख्या मात्र १५९९ है फिर भी इसमें जैन धर्म दर्शन के अनेक महत्त्वपूर्ण पक्षों को समाहित करने का प्रयास किया गया है। मूल गाथाओं की संख्या कम होते हुए भी इसका विषय वैविध्य इतना है कि इसे “जैन धर्म दर्शन का लघु विश्वकोष" कहा जा सकता है। आगे हम इसके २७६ द्वारों की विषयवस्तु का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत करेंगे।
प्रवचनसारोद्धार के प्रथम द्वार में चैत्यवंदन विधि का विवेचन किया गया है। चैत्यवंदन के सम्बन्ध में सर्वप्रथम दस त्रिकों की चर्चा की गई है। ये दस त्रिक निम्न हैं- १. त्रिनिषेधिका २. त्रिप्रदक्षिणा ३. त्रिप्रणाम ४. त्रिविधपूजा ५. त्रिअवस्था भावना ६. त्रिदशानिरीक्षण विरति ७. त्रिविध भूमि प्रमार्जन ८. वर्णत्रिक ९. मुद्रात्रिक और १०. प्रणिधान त्रिका
चैत्यवन्दन हेतु जिन-भवन में प्रवेश करते सर्वप्रथम पुष्प, ताम्बूल आदि सचित्त द्रव्यों का परिहार करे, आभूषण आदि अचित्त द्रव्यों का परिहार नहीं करे और एक अधोवस्त्र तथा एक उत्तरीय धारण करे। ज्ञातव्य है कि कुछ आचार्यों के अनुसार यहाँ अहंकार सूचक अचित्त द्रव्य जैसे छत्र, चामर, मुकुट आदि के भी त्याग का निर्देश है। प्रवचनसारोद्धार की टीका इस सम्बन्ध में विस्तृत विवेचना करती है। चक्षु द्वारा जिन प्रतिमा दिखाई देने पर अंजलि प्रग्रह करे और एकाग्रचित्त होकर पूर्वोक्त दसत्रिकों का अनुसरण करता हुआ जिन प्रतिमा को वन्दन करे । ये दसत्रिक निम्नानुसार हैं
१. सर्वप्रथम निषेधिकात्रिक में गृही जीवन सम्बन्धी सावध व्यापार का प्रतिषेध २. जिन भवन सम्बन्धी सावध व्यापार का त्याग और ३. पूजा विधान सम्बन्धी सावध व्यापार का त्याग। कुछ अन्य आचार्यों के अनुसार ये तीन निषेधिकाएं
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१२७ इस प्रकार हैं
१. जिन मन्दिर के मुख्य द्वार पर आकर गृह सम्बन्धी कार्यों का निषेध करें २. फिर जिन-मन्दिर के मध्य भाग (रंग-मण्डप) में प्रवेश करते समय सावध (हिंसक) वचन-व्यापार का निषेध करें और ३. गर्भगृह में प्रवेश करने पर सभी सावन (हिंसक) कार्यों के मानसिक चिन्तन का भी निषेध करें – यह निषेधिकात्रिक है।
२. जिन प्रतिमा की तीन प्रदक्षिणा करना प्रदक्षिणा त्रिक है। ३. जिन प्रतिमा को तीन बार प्रणाम करना प्रणाम त्रिक है।
४. पूजात्रिक के अन्तर्गत तीन प्रकार की पूजा का उल्लेख किया गया है१. पुष्प पूजा २. अक्षत पूजा और ३. स्तुति पूजा ।
____५. जिन की छद्मस्थ, कैवल्य और सिद्ध- इन तीन अवस्थाओं का चिन्तन करना त्रि-अवस्था भावना है।
६. तीन दिशाओं में न देखकर मात्र जिन-बिम्ब के सन्मुख दृष्टि रखना त्रिदिशानिरीक्षणविरति है।
७. जिस भूमि पर स्थित रहकर जिन प्रतिमा को वन्दन करना है उस स्थल का गृहस्थ द्वारा वस्त्र अञ्चल से और मुनि द्वारा रजोहरण से तीन बार प्रमार्जन करना प्रमार्जनात्रिक है।
८. शब्द, अर्थ एवं आलम्बन (प्रतिमा) ये वर्ण-त्रिक हैं।
९. मुद्रात्रिक के अन्तर्गत तीन प्रकार की मुद्राएं बतायी गई हैं १. जिनमुद्रा २. योगमुद्रा ३. मुक्ताशुक्ति मुद्रा।
१०. मन, वचन और काया की प्रवृतियों का संवरण करके परमात्मा की शरण ग्रहण करना प्रणिधान त्रिक है। ___चैत्यवन्दनद्वार में उपरोक्त दश त्रिकों के साथ-साथ स्तुति एवं वन्दन विधि का तथा द्वादश अधिकारों का विवेचन है। अन्त में चैत्यवन्दन कब और कितनी बार करना आदि की चर्चा के साथ चैत्यवन्दन के जघन्य, मध्यम एवं उत्कृष्ट भेदों का विवेचन करते हुए यह चैत्यवन्दन द्वार समाप्त होता है।
चैत्यवन्दन नामक प्रथम द्वार के पश्चात् प्रवचनसारोद्वार का दूसरा द्वार गुरुवन्दन के विधि-विधा एवं दोषों से सम्बन्धित है। प्रस्तुत कृति में गुरुवन्दन के १९२ स्थान वर्णित किये गये हैं- मुखवत्रिका, काय (शरीर) और आवश्यक क्रिया इन तीनों में प्रत्येक के पच्चीस-पच्चीस स्थान बताये गये हैं। इनके अतिरिक्त स्थान सम्बन्धी छः, गुण सम्बन्धी छ:, वचन सम्बन्धी छः, अधिकारी को वन्दन न करने
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१२८ सम्बन्धी पाँच और अनधिकारी को वन्दन करने सम्बन्धी पाँच स्थान और प्रतिषेध सम्बन्धी पाँच स्थान बताये हैं। इसी क्रम में अवग्रह सम्बन्धी एक, अभिधान सम्बन्धी पाँच, उदाहरण सम्बन्धी पाँच, आशातना सम्बन्धी तेंतीस, वन्दन दोष सम्बन्धी बतीस एवं कारण सम्बन्धी आठ ऐसे कुल १९२ स्थानों का उल्लेख है। इस चर्चा में मुखवस्त्रिका के द्वारा काय अर्थात् शरीर के किन-किन भागों का कैसे प्रमार्जन करना चाहिए इसका विस्तृत एवं रोचक विवरण है। इसी क्रम में गुरुवन्दन करते समय खमासना के पाठ का किस प्रकार से उच्चारण करना तथा उस समय कैसी क्रिया करनी चाहिए इसका भी इस द्वार में निर्देश है। वन्दन के अनधिकारी के रूप में - १. पार्श्वस्थ २. अवसन्न ३. कुशील ४. संसक्त और ५, यथाछन्द ऐसे पाँच प्रकार के श्रमणों का न केवल उल्लेख किया गया है, अपितु उनके स्वरूप का भी विस्तृत विवरण दिया गया है। इसी क्रम में शीतलक, क्षुल्लक, श्रीकृष्ण, सेवक और पालक के दृष्टान्त भी दिये गये हैं। अन्त में तेंतीस, आशातनाओं और वन्दन सम्बन्धी बत्तीस दोषों एवं वन्दना के आठ कारण का विस्तारपूर्वक विवेचन किया गया है।
इस प्रकार प्रथम एवं द्वितीय द्वार लगभग १०० गाथाओं में सम्पूर्ण होते हैं।
प्रवचनसारोद्वार के तीसरे द्वार में देवसिक, रात्रिक, पाक्षिक, चातुर्मासिक और सांवत्सरिक प्रतिक्रमण की विधि तथा इनके अन्तर्गत किये जाने वाले कायोत्सर्ग एवं क्षामणकों (खमासना) की विधि का विवेचन किया गया है। इसमें यह भी बताया गया है कि दैवसिक-प्रतिक्रमण में चार, रात्रिक प्रतिक्रमण में दो, पाक्षिक में बारह, चातुर्मासिक में बीस और सांवत्सरिक में चालीस लोगस्स का ध्यान करना चाहिए। पुन: इसी प्रसंग में इनकी श्लोक संख्या एवं श्वासोश्वास की संख्या का भी वर्णन किया गया है। इस दृष्टि से दैवसिक प्रतिक्रमण में १००, रात्रिक में ५०, पाक्षिक में ३००, चातुर्मासिक में ५०० और वार्षिक में १००० श्वासोश्वास का ध्यान करना चाहिए। इसी क्रम में आगे क्षामणकों (गुरु से क्षमायाचना सम्बन्धी पाठ) की संख्या का भी विचार किया गया है।
चतुर्थ प्रत्याख्यान द्वार में सर्वप्रथम निम्न दस प्रत्याख्यानों की चर्चा है१. भविष्य सम्बन्धी २. अतीत सम्बन्धी ३. कोटि सहित ४. नियन्त्रित ५. साकार ६. अनाकार ७. परिमाण व्रत ८. निरवशेष ९. सांकेतिक और १०. काल सम्बन्धी प्रत्याख्यान। सांकेतिक प्रत्याख्यान में दृष्टि, मुष्ठि, ग्रन्थी आदि जिन आधारों पर सांकेतिक प्रत्याख्यान किये जाते हैं उनकी चर्चा है। इसी क्रम में आगे समय सम्बन्धी दस प्रत्याख्यानों की चर्चा की गई है इसमें नवकारसी, अर्द्ध-पौरुषी, पौरुषी आदि के प्रत्याख्यानों की चर्चा है। इसी क्रम में दस विकृतियों (विगयों) की, बत्तीस
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अनन्तकायों की और बावीस अभक्ष्यों की भी चर्चा की गई है। साथ ही इसमें शुद्ध प्रत्याख्यान के कारण एवं स्वरूप का विवेचन भी है। पाँचवां कायोत्सर्ग द्वार है। इसके अन्तर्गत मुख्य रूप से कायोत्सर्ग के १९ दोषों की चर्चा की गई है इसी क्रम में इन दोषों के स्वरूप का भी किञ्चित् दिग्दर्शन कराया गया है।
प्रवचनसारोद्धार का छठां द्वार श्रावक प्रतिक्रमण के अतिचारों का वर्णन करता है। इसके अन्तर्गत संलेखना के पाँच, कर्मादान के पन्द्रह, ज्ञानाचार के आठ, दर्शनाचार के आठ, चारित्राचार के आठ, तप के बारह, वीर्य के तीन, सम्यकत्त्व के पाँच, अहिंसा आदि पाँच अणुव्रतों, दिक्त आदि तीन गुणव्रतों, सामायिक आदि चार शिक्षाव्रतों- ऐसे श्रावक के बारह व्रतों के साठ अतिचारों का उल्लेख है । यह समस्त विवरण श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र के अनुरूप ही है।
प्रवचनसारोद्धार के सप्तमद्वार में भरत एवं ऐरावत क्षेत्र में हुए तीर्थंकरों (जिन) के नामों की सूची प्रस्तुत की गई है इसके अन्तर्गत जहाँ भरत क्षेत्र के अतीत, वर्तमान और अनागत तीनों चौबीसियों के जिनों के नाम दिये गये हैं वहीं ऐरावत क्षेत्र के वर्तमान काल के जिनों के ही नाम दिये गये हैं।
हम देखते हैं कि प्रवचनसारोद्धार के प्रथम सात द्वारों तक तो अपने भेदप्रभेदों के साथ विषयों का विस्तार से विवेचन हुआ है । किन्तु आठवें द्वार से विवेचन संक्षिप्त रूप में ही किया गया है।
इसी क्रम में अष्टम द्वार में चौबीस तीर्थंकरों के प्रथम गणधरों के नामों का भी उल्लेख है।
नवम द्वार के अन्तर्गत प्रत्येक तीर्थंकर की प्रवर्तनियों अर्थात् साध्वीप्रमुखाओं के नामों का उल्लेख किया गया है।
दशम-द्वार के अन्तर्गत तीर्थंकर नामकर्म के उपार्जन हेतु जिन बीस स्थानकों की साधना की जाती है, उनकी चर्चा है। यह विवेचन ज्ञाताधर्मकथा के मल्ली अध्ययन में मिलता है।
ग्यारहवें द्वार में तीर्थंकरों की माताओं का उल्लेख है।
बारहवें - द्वार में तीर्थंकरों की माताएँ अपने देह का त्याग कर किस गति में उत्पन्न हुईं, इसकी चर्चा है।
तेरहवां-द्वार किसी काल विशेष में जिनों की जघन्य और उत्कृष्ट संख्या का विचार करता है।
चौहदवें- द्वार के अन्तर्गत यह बताया गया है कि किस जिन के जन्म के समय लोक में अधिकतम और न्यूनतम जिनों की संख्या कितनी थी ।
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पन्द्रहवां द्वार जिनों के गणधरों की समग्र संख्या का विवेचन करता है। इसी क्रम में आगे सोलहवें-द्वार में मुनियों की संख्या का, सत्रहवें -द्वार में साध्वियों की संख्या का, अठारहवें-द्वार में जिनों के वैक्रिय लब्धिधारक मनियों की संख्या का, उन्नीसवें-द्वार में वादियों की संख्या का, बीसवें-द्वार में अवधि ज्ञानियों की संख्या का, इक्कीसवें-द्वार में केवल ज्ञानियों की संख्या का, बावीसवें द्वार में मनः पर्यवज्ञानियों की संख्या का, तेवीसवें- द्वार में चतुर्दश पूर्वो के धारकों की संख्या का, चौबीसवेंद्वार में जिनों के श्रावकों की संख्या का और पच्चीसवें-द्वार में श्राविकाओं की संख्या का निर्देश हुआ है।
इसी क्रम में छब्बीसवां-द्वार तीर्थंकरों के शासन-सहायक यक्षों के नाम का उल्लेख करता है तो सत्ताइसवां द्वार यक्षणियों के नामों को सूचित करता है।
प्रवचनसारोद्धार का अठावीसवां द्वार तीर्थंकरों के शरीर के परिमाण (लम्बाई) का निर्देश करता है तो उनतीसवां द्वार प्रत्येक तीर्थंकरों के विशिष्ट लांछन की चर्चा करता है।
तीसवें-द्वार में तीर्थंकरों के वर्ण अर्थात् शरीर के रंग की चर्चा की गई है।
इकतीसवां-द्वार किस तीर्थंकर के साथ कितने व्यक्तियों ने मुनिधर्म स्वीकार किया उनकी संख्या का निर्देश करता है।
बत्तीसवां-द्वार तीर्थंकरों की आयु का निर्देश करता है।
तेतीसवें-द्वार में प्रत्येक तीर्थंकरों ने कितने मुनियों के साथ निर्वाण प्राप्त किया, इसका उल्लेख है तो चौतीसवां-द्वार किस तीर्थंकर ने किस स्थान पर निर्वाण प्राप्त किया, इसका उल्लेख करता हैं ।
"पैंतीसवां-द्वार' तीर्थंकरों एवं अन्य शलाकापुरुषों के मध्य कितने-कितने काल का अन्तराल रहा है, इसका विवेचन प्रस्तुत करता है जबकि छत्तीसवें द्वार में इस बात की चर्चा है कि किस तीर्थंकर का तीर्थ या शासन कितने काल तक चला
और बीच में कितने काल का अन्तराल रहा। इसप्रकार हम देखते हैं कि सातवें द्वार से लेकर छत्तीसवें द्वार तक उन्तीस द्वारों में मुख्यत: तीर्थंकरों से सम्बन्धित विभिन्न तथ्यों का निर्देश किया गया है।
‘सैंतीसवें द्वार' से लेकर 'सन्तानवे -द्वार तक इकसठ द्वारों में पुन: जैन सिद्धान्त और आचार सम्बन्धी विवेचन प्रस्तुत किये गये हैं। यद्यपि बीच में कहींकहीं तीर्थंकरों के तप आदि का भी निर्देश है। सैंतीसवें द्वार में दस आशातनाओं का उल्लेख है तो अड़तीसवें द्वार में चौरासी आशातनाओं का उल्लेख है। इसी चर्चा के प्रसंग में इस द्वार में मुनिचैत्य में कितने समय तक रह सकता है इसकी चर्चा भी
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'उन्तालीसवें-द्वार' में तीर्थंकरों के आठ महाप्रतिहार्यों और 'चालीसवें-द्वार' में तीर्थंकरों के चौंतीस अतिशयों (विशिष्टताओं) की चर्चा है।
'इकतालीसवां-द्वार' उन अठारह दोषों का उल्लेख करता है, जिनसे तीर्थकर मुक्त रहते हैं। दूसरे शब्दों में जिनको उन्होंने नष्ट कर दिया है।
'बयालीसवां-द्वार' जिन-शब्द के चार निक्षेपों की चर्चा करता है और यह बताता है कि ऋषभ, शान्ति, महावीर आदि जिनों के नाम नामजिन हैं जबकि कैवल्य
और मुक्ति को प्राप्त जिन भावजिन अर्थात यथार्थजिन हैं। जिन-प्रतिमा को स्थापना जिन कहा जाता है और जो भविष्य में जिन होने वाले हैं वे द्रव्यजिन कहलाते हैं।
तिरालीसवां-द्वार किस तीर्थंकर ने दीक्षा के समय कितने दिन का तप किया था इसका विवेचन करता है इसी क्रम में चवालीसवें द्वार में किस तीर्थंकर को केवलज्ञान उत्पन्न होने के समय कितने दिन का तप था, इसका उल्लेख है। आगे पैतालीसवें-द्वार में तीर्थंकरों द्वारा अपने निर्वाण के समय किये गये तप का उल्लेख है।
प्रस्तुत कृति का छियालीसवां-द्वार उन जीवों का उल्लेख करता है जो भविष्य में तीर्थंकर होने वाले हैं।
सैतालीसवें-द्वार में इस बात की चर्चा की गई है कि उर्ध्वलोक, तिर्यकलोक, जल, स्थल आदि स्थानों से एक साथ कितने व्यक्ति मुक्ति को प्राप्त कर सकते हैं।
___ 'अड़तालीसवां-द्वार हमें यह सूचना देता है कि एक समय में एक साथ कितने पुरुष, कितनी स्त्रियां अथवा कितने नपुंसक सिद्ध हो सकते हैं।
उनचासवें-द्वार में सिद्धों के भेदों की चर्चा है। ज्ञातव्य है कि वैसे तो सिद्धों में कोई भेद नहीं होता किन्तु जिस पर्याय/अवस्था से सिद्ध हुए हैं, उसके आधार पर सिद्धों के पन्द्रह भेदों की चर्चा की गई है।
__ पचासवें द्वार में सिद्धों की अवगाहना अर्थात् उनके आत्म-प्रदेशों के विस्तारक्षेत्र की चर्चा की गई है। इसी क्रम में यह बताया गया है कि उत्कृष्ट अवगाहना वाले दो, जघन्य अवगाहना वाले चार तथा मध्यम अवगाहना वाले एक सौ आठ व्यक्ति एक साथ सिद्ध हो सकते हैं। अवगाहना के सन्दर्भ में चर्चा करते हुए प्रस्तुत कृति के टीकाकार ने यह भी बताया है कि उत्कृष्ट अवगाहना पांच सौ धनुष और जघन्य अवगाहना दो हाथ परिमाण होती है। यहां यह ज्ञातव्य है कि सिद्धों की उत्कृष्ट, मध्यम और जघन्य अवगाहना के सन्दर्भ में विशेष चर्चा प्रस्तुत कृति के छप्पनवें, सत्तावनवें एवं अठ्ठावनवें द्वार में भी की गयी है।
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'इकावनवें-द्वार में स्वलिंग, अन्यलिंग और गृहस्थलिंग की अपेक्षा से एक समय में कितने सिद्ध हो सकते हैं इसका विवेचन किया गया है। गृहस्थ लिंग से चार, अन्यलिङ्ग से दस और स्वलिंग से एक सौ आठ व्यक्ति एक समय में सिद्ध हो सकते हैं। आगे 'बावनवें-द्वार में यह बताया गया है कि निरन्तर अर्थात् बिना अन्तराल कितने समय तक जीव सिद्ध हो सकते हैं और उनकी संख्या कितनी होती है।
'पनवें-द्वार में स्त्री, पुरुष और नपुंसक की अपेक्षा से एक समय में कितने व्यक्ति सिद्ध हो सकते हैं, इसकी चर्चा है। इस सन्दर्भ में यह बताया गया है कि एक समय में बीस स्त्रियां, एक सौ आठ पुरुष और दस नपुंसक शरीर पर्याय से सिद्ध हो सकते हैं। पुन: इसी द्वार में यह भी बताया गया है कि नरक, भवनपति, व्यंतर और तिर्यकलोक के स्त्रीपुरुष तथा अकल्पवासी अर्थात् गैवेयक एवं अनुत्तरविमानवासी देव पुन: मनुष्यभव ग्रहण करके मुक्ति प्राप्त करते हैं तो वे एक समय में अधिकतम दस-दस व्यक्ति ही सिद्ध हो सकते हैं। कल्पवासी देवों से मनुष्य जन्म ग्रहण कर मुक्त होने वाले जीवों की अधिकतम संख्या एक सौ साठ हो सकती है। पृथ्वीकायिक, अप्कायिक और पंकप्रभा आदि से मनुष्य भव ग्रहण करके मुक्ति प्राप्त करने वाले एक समय में चार-चार व्यक्ति ही सिद्ध हो सकते हैं।
चौपनवें-द्वार में सिद्धों के आत्म-प्रदेशों के संस्थान (विस्तार क्षेत्र) की चर्चा की गई है। इस चर्चा में उत्तानक, अर्धअवनत, पार्श्वस्थित, स्थित, उपविष्ट आदि संस्थानों की चर्चा भी की गई है। इसके पश्चात् पचपनवें द्वार में सिद्धों की अवस्थिति की चर्चा है। वस्तुत: इस प्रसंग में सिद्ध शिला के ऊपर और अलोक से नीचे कितने मध्य भाग में सिद्ध अवस्थित रहे हुए हैं, यह बताया गया है । पुनः जैसा कि हमने पूर्व में सूचित किया है ५६-५७ वें और ५८वें द्वार में सिद्धों की उत्कृष्ट-मध्यम और जघन्य अवगाहना की चर्चा की गई है। उन्सठवें द्वार में लोक की शाश्वत जिन प्रतिमाओं का उल्लेख है।
साठवें द्वार में जिन कल्प का पालन करने वाले मुनियों के और इकसठवें द्वार में स्थविर कल्प का पालन करने वाले मुनियों के उपकरणों का उल्लेख है। इसी प्रसंग में स्वयं बुद्ध और प्रत्येक बुद्ध के स्वरूप की चर्चा भी की गयी है।
___ बासठवें द्वार में साध्वियों के उपकरणों की चर्चा है। जबकि वेसठवां द्वार जिन कल्पिकों की संख्या के सम्बन्ध में विवेचन करता है, चौसठवें द्वार में आचार्य के ३६ गुणों का निर्देश किया गया है, इसी प्रसंग में आचार्य की आठ सम्पदाओं की भी विस्तार से चर्चा की गई है। ज्ञातव्य है कि यहाँ आचार्य के इन छत्तीस गुणों की
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चर्चा अनेक अपेक्षाओं से उपलब्ध होती है।
पैसठवें द्वार में जहाँ विनय के बावन भेदों की चर्चा है, वहीं छियासठवें द्वार में चरण सत्तरी और सड़सठवें द्वार में करण सत्तरी का विवेचन है। पंच महाव्रत, दस श्रमण धर्म, सत्रह प्रकार का संयम, दस प्रकार की वैयावृत्य, नौ ब्रह्मचर्य गुप्तियां, तीन रत्नत्रय, बारह तप और क्रोध आदि चार कपायों का निग्रह ये चरण सत्तरी के सत्तर भेद हैं।
प्रस्तुत कृति में यह भी बताया गया है कि अन्य-अन्य आचार्यों की कृतियों में चरण सत्तरी के इन सत्तर भेदों का वर्गीकरण किस-किस प्रकार से किया गया है।
करण-सत्तरी के अन्तर्गत सोलह उद्गम दोषों, सोलह उत्पादन दोषों, दस एषणा दोषों, पांच ग्रासेषणा दोषों, पांच समितियों, बारह भावनाओं, पांच इन्द्रियों का निरोध, तीन गुप्ति आदि की चर्चा की गई है।
अड़सठवें द्वार में जंघाचारण और विद्याचारण लब्धि अर्थात् आकाश गमन सम्बन्धी विशिष्ट शक्तियों की चर्चा की गई है।
उनहतरवें द्वार में परिहार विशुद्धि तप के स्वरूप का और सत्तर- द्वार में यथालन्दिक के स्वरूप का विवेचन है।
इकहत्तर- द्वार में अड़तालीस निर्यामकों और उनके कार्य विभाजन की चर्चा है। निर्यामक समाधिमरण ग्रहण किये हुए मुनि की परिचर्या करने वाले मुनियों को कहा जाता है।
बहत्तरवें द्वार में पंच महाव्रतों की पच्चीस भावनाओं की विवेचना की गई है। इसी क्रम में तिहत्तरवां द्वार आसुरी आदि पच्चीस अशुभ भावनाओं का विवेचन करता है।
चौहत्तरवें द्वार में विभिन्न तीर्थंकरों के काल में महाव्रतों की संख्या कितनी होती है, इसका निर्देश किया गया है।
___ ७५वें द्वार में चौदह कृतिकमों की चर्चा है। कृतिकर्म का तात्पर्य आचार्य आदि ज्येष्ठ मुनियों के वंदन से है।
७६वें द्वार में भरत, ऐरावत आदि क्षेत्रों में कितने चारित्र होते हैं, इसकी चर्चा करता है। प्रथम और अंतिम तीर्थकर के समय में भरत और ऐरवत क्षेत्र में सामायिक आदि पांच चारित्र पाये जाते हैं किन्तु शेष बाइस तीर्थंकरों के समय में इन क्षेत्रों में सामायिक, सूक्ष्म सम्पराय और यथाख्यात ये तीन चारित्र उपलब्ध होते हैं। महाविदेह क्षेत्र में पूर्वोक्त तीन चारित्र ही होते हैं। इन क्षेत्रों में छेदोपस्थापनीय और परिहार विशुद्धि चारित्र का कदाचित् अभाव होता है।
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७७वें और ७८वें द्वार में यह बताया गया है कि दस स्थितिकल्पों में मध्यवर्ती बाईस तीर्थंकरों के समय में चार स्थित, छ: वैकल्पिक कल्प होते हैं जबकि प्रथम और अन्तिम तीर्थकर के समय में दस ही स्थित कल्प होते हैं।
७९ वें द्वार में निम्न प्रकार के चैत्यों का उल्लेख हुआ है - (१) भक्ति चैत्य (२) मंगल चैत्य (३) निश्राकृत चैत्य (४) अनिश्राकृत चैत्य और (५) शाश्वत चैत्या
८०वें द्वार में निम्न पांच प्रकार की पुस्तकों का उल्लेख हुआ है - (१) गण्डिका (२) कच्छपी (३) मुष्टि (४) संयुक्त फलक (५) छेदपाटी । इसी क्रम में ८१ वें द्वार में पांच प्रकार के दण्डों का, ८२ वें द्वार में पांच प्रकार के तृणों का, ८३ वें द्वार में पांच प्रकार के चमड़े का और ८४ वें द्वार में पांच प्रकार के वस्त्रों का विवेचन किया गया है।
८५वें द्वार में पांच प्रकार के अवग्रहों (ठहरने के स्थानों) का और ८६ वें द्वार में बाइस परीषहों का विवेचन किया गया है।
८७वे द्वार में सात प्रकार की मण्डलियों का उल्लेख है तो ८८ वें द्वार में जम्बूस्वामी के समय में जिन दस बातों का विच्छेद हुआ, उनका उल्लेख है।
८९वें द्वार में क्षपक श्रेणी का और ९०वें द्वार में उपशम श्रेणी का विवेचन है।
९१वें द्वार में स्थण्डिल भूमि (मूल-मूत्र विसर्जन करने का स्थान) कैसी होनी चाहिए- इसका विवेचन उपलब्ध होता है।
९२वें द्वार में चौदह पूर्वी और उनके विषय तथा पदों की संख्या आदि का निर्देश किया गया है।
९३वे द्वार में निम्रन्थों के पुलाक, बकुश, कुशील, निर्ग्रन्थ और स्नातक-ऐसे पांच प्रकारों की चर्चा है।
९४३ द्वार में निर्ग्रन्थ, शाक्य, तापस, गैरूक और आजीवक ऐसे पांच प्रकार के श्रमणों की चर्चा है।
९५वें द्वार में संयोजन, प्रमाण, अंगार, धूम और कारण ऐसे ग्रासैषणा के पांच दोषों का विवेचन किया गया है। मुनि को भोजन करते समय स्वाद के लिये भोज्य पदार्थों का सम्मिश्रण करना, परिमाण से अधिक आहार करना, भोज्य पदार्थों में राग रखना, प्रतिकूल भोज्य पदार्थों की निन्दा करना और अकारण आहार करना निषिद्ध है।
९६वें द्वार में पिण्ड-पाणैषणा के सात प्रकारों का उल्लेख हुआ है। ९७वें द्वार में भिक्षाचर्या अष्टक अर्थात् भिक्षाचर्या के आठ प्रकारों का विवेचन
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किया गया है।
९८३ द्वार में दस प्रायश्चितों का विवेचन किया गया है। दस प्रायश्चित निम्न हैं--- (१) आलोचना (२) प्रतिक्रमण (३) आलोचना सहित प्रतिक्रमण (४) विवेक (५) व्युत्सर्ग (६) तप (७) छेद (८) मूल (९) अनवस्थित उपस्थापना और (१०) पाराञ्चिक।
९९वें द्वार में ओघसमाचारी अर्थात् सामान्य समाचारी का विवेचन है, यह विवेचन ओधनियुक्ति में प्रतिपादित समाचारी पर आधारित है।
१००वें द्वार में पद विभाग समाचारी का उल्लेख है। ज्ञातव्य है कि छेदसूत्रों में वर्णित समाचारी पद विभाग समाचारी कहलाती है।
१०१वें द्वार में चक्रवाल समाचारी का विवेचन किया गया है। चक्रवाल समाचारी इच्छाकार, मिथ्याकार आदि दस प्रकार की है। यह समाचारी उत्तराध्ययन
और भगवतीसूत्र में भी वर्णित है। प्रस्तुत कृति में इस समाचारी का विस्तृत विवेचन है।
१०२वें द्वार में उपशम श्रेणी और क्षपक श्रेणी का विवेचन किया गया है।
१०३वे द्वार में गीतार्थ विहार और गीतार्थ आश्रित विहार का निर्देश है। इसी सन्दर्भ में यात्रा करते समय किस प्रकार की सावधानी रखना चाहिये, इसका भी विवेचन किया गया है। ज्ञातव्य है कि आगम के साथ-साथ देश-काल और परिस्थिति का आकलन करने में समर्थ साधक गीतार्थ कहलाता है।
१०४वें द्वार में अप्रतिबद्ध विचार का निर्देश है। इसमें यह बताया गया है कि मुनि चातुर्मास काल में चारमास तक, अन्य काल में एक मास तक एक स्थान पर रह सकता है, उसके पश्चात् सामान्य परिस्थिति में विहार करना चाहिए।
१०५३ द्वार में जातकल्प और अजातकल्प का निर्देश है। श्रुतसम्पन्न गीतार्थ मुनि के साथ यात्रा करना जातकल्प है और इससे भिन्न अजातकल्प । इसी क्रम में ऋतुबद्ध बिहार को सम्मत विहार कहा गया है और इससे भिन्न विहार को असम्मत विहार कहा गया है।
१०६वे द्वार में मल-मूत्र आदि के प्रतिस्थापन अर्थात् विसर्जन की विधि का विवेचन है। इसी प्रसंग में विभिन्न दिशाओं का भी विचार किया गया है।
१०७वें द्वार में दीक्षा के अयोग्य अट्टारह प्रकार के पुरुषों का उल्लेख किया गया है। इसी क्रम में १०८ वें द्वार में दीक्षा के अयोग्य बीस प्रकार की स्त्रियों का भी उल्लेख है।
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१०९वें द्वार में नपुंसकों को और ११० वें द्वार में विकलांगों को दीक्षा के अयोग्य बताया गया है। नपंसकों की चर्चा करते हुए टीका में उनके सोलह प्रकारों का उल्लेख हुआ है और सोलह प्रकारों में से दस प्रकार को दीक्षा के अयोग्य और छ: प्रकार को दीक्षा के योग्य माना गया है।
१११वें द्वार में साधु को कितने मूल्य का वस्त्र कल्प्य (ग्राह्य) है उसका विवेचन किया गया है । इसी प्रसंग में विभिन्न प्रदेशों और नगरों में मुद्रा विनिमय का पारस्परिक अनुपात क्या था, इसकी भी चर्चा हुई है।
यहाँ यह भी बताया गया है कि एक लाख साभारक के मूल्य वाला वस्त्र उत्कृष्ट होता है और अट्ठारह साभारक या उससे भी कम मूल्यवाला वस्त्र जघन्य होता है। इन दोनों के मध्य का वस्त्र मध्यम कोटि का माना जाता है। मनि के लिये अल्प मूल्य का वस्त्र ही ग्रहण करने योग्य है।
११२वें द्वार में शय्यातर पिण्ड अर्थात जिसने निवास के लिये स्थान दिया हो उसके यहाँ से भोजन ग्रहण करना निषिद्ध माना गया है। इसी क्रम में अट्ठारह प्रकार के शय्यातरों का उल्लेख भी हुआ है।
११३वें द्वार में श्रुतज्ञान और सम्यक्त्व के पारस्परिक सम्बन्ध की चर्चा
११४वें द्वार में पांच प्रकार के निर्ग्रन्थों का पांच प्रकार के ज्ञानों से और चार प्रकार की गतियों से सम्बन्ध बताया गया है।
११५३ द्वार में जिस क्षेत्र में सूर्य उदित हो गया है उस क्षेत्र से ग्रहीत अशन आदि ही कल्प्य होता है, शेष कालातिक्रान्त कहलाता है जो अकल्प्य (अग्राह्य) है।
११६वें द्वार में यह बताया गया है कि दो कोस से अधिक दूरी से लाया गया भोजन-पान क्षेत्रातीत कहलाता है और यह मुनि के लिये अकल्प्य है।
११७वें द्वार में यह बताया गया है कि प्रथम प्रहर में लिया गया भोजन-पान आदि तीसरे प्रहर तक भोज्य होते हैं उसके बाद वे कालातीत होकर अकल्प्य हो जाता हैं।
११८ वें द्वार में पुरुष के लिये बत्तीस कवल भोजन ही ग्राह्य माना गया है। इससे अधिक भोजन प्रमाणतिक्रान्त होने से अकल्प्य माना जाता है।
११९३ द्वार में चार प्रकार के निवास स्थानों को दःख शय्या बताया गया है। इसी प्रसंग में यह भी स्पष्ट किया गया है कि जिन स्थानों पर अश्रद्धालु जन रहते हों, जहाँ पर दूसरों से कुछ प्राप्ति के लिये प्रार्थनायें की जाती हों, जहाँ मनोज्ञ शब्द, रूप अथवा भोजन आदि मिलते हों और जहाँ मर्दन आदि होता हो, वे स्थान मुनि
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के निवास के अयोग्य हैं। १२० वें द्वार में उसके विपरीत चार प्रकार की सुखशय्या अर्थात् मुनि के निवास के योग्य माने गये हैं।
१२१वें द्वार में तेरह क्रिया स्थानों की, १२२ वें द्वार में श्रुत सामायिक, दर्शन सामायिक, देश समायिक और सर्वसामायिक ऐसी चार प्रकार सामायिक की और १२३ वें द्वार में अट्ठारह हजार शीलांगों की चर्चा है। पुन: १२४ वें द्वार में सात नयों की चर्चा की गई है जबकि १२५वें द्वार में मुनि के लिये वस्त्र ग्रहण की विधि बतायी गयी है।
१२६वें द्वार में आगम, श्रुत, आज्ञा, धारणा और जीत ऐसे पांच व्यवहारों की चर्चा है।
१२७वे द्वार में निम्न पांच प्रकार के यथाजात का उल्लेख है। (१) चोलपट्ट (२) रजोहरण (३) और्णिक (४) क्षौमिक और (५) मुखवस्त्रिका । इन उपकरणों से ही श्रमण का जन्म होता है। अत: इन्हें यथाजात कहा गया है।
१२८३ द्वार में मुनियों के रात्रि जागरण की विधि का विवेचन है। उसमें बताया गया है कि प्रथम प्रहर में आचार्य, गीतार्थ और सभी साधु मिलकर स्वाध्याय करें। दूसरे प्रहर में सभी मुनि और आचार्य सो जायें और गीतार्थ मनि स्वाध्याय करें। तीसरे प्रहर में आचार्य जागृत होकर स्वाध्याय करें और गीतार्थ मुनि सो जायें। चौथे प्रहर में सभी साधु उठकर स्वाध्याय करें। आचार्य और गीतार्थ सोये रहें क्योंकि उन्हें बाद में प्रवचन आदि कार्य करने होते हैं।
१२९वें द्वार में जिस व्यक्ति के सामने आलोचना की जा सकती है उसको खोजने की विधि बताई गई है।
१३०वें द्वार में प्रति जागरण के काल के सम्बन्ध में विवेचन किया गया है।
१३१ वें द्वार में मुनि की उपधि अर्थात् संयमोपकरण के धोने के काल का विवेचन है। इसमें यह बताया गया है कि किस उपधि को कितने काल के पश्चात् धोना चाहिए।
१३२वें द्वार में साधु-साध्वियों के आहार की मात्रा कितनी होना चाहिये, इसका विवेचन किया गया है। सामान्यत: यह बताया गया है कि मुनि को बड़े आंवले के आकार के बत्तीस कौर और साध्वी को अट्ठावीस कौर आहार ग्रहण करना चाहिए।
१३३वें द्वार में वसति अर्थात् मुनि के निवास की शुद्धि आदि का विवेचन किया गया है। मुनि के लिये किस प्रकार का आवास ग्राह्य होता है इसकी विवेचना इस द्वार में की गई है।
१३४वें द्वार में संलेखना सम्बन्धी विधि-विधान का विस्तृत विवेचन किया
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१३८ गया है।
१३५३ द्वार में यह बताया गया है कि नगर की कल्पना पूर्वाभिमुख वृषभ के रूप में करे उसके पश्चात् उसे उस वृषभ रूप कल्पित नगर में किस स्थान पर निवास करना है, इसका निश्चय करे। इसमें यह बताया गया है किस अंग/क्षेत्र में निवास करने का क्या फल होता है।
१३६वें द्वार में किस ऋतु में किस प्रकार का जल किसने काल तक प्रासुक रहता है और बाद में सचित्त हो जाता है, इसका विवेचन किया गया है। सामान्यतया यह माना जाता है कि उष्ण किया हुआ प्रासुक जल ग्रीष्म ऋतु में पांच प्रहर तक, शीत ऋतु में चार प्रहर तक और वर्षा ऋतु में तीन प्रहर तक प्रासुक (अचित) रहता है और बाद में सचित्त हो जाता है। यद्यपि चूना आदि डालकर अधिक समय तक उसे प्रासुक रखा जा सकता है।
१३७वें द्वार में पशु-पक्षी आदि तीर्यञ्च-जीवों की मादाओं के सम्बन्ध में विवेचन किया गया है।
१३८वें द्वार में इस अवसर्पिणी काल में घटित हुए इस प्रकार के आश्चयों जैसे महावीर के गर्भ का संहरण, स्त्री-तीर्थकर आदि का वर्णन किया गया है।
___ १३९३ द्वार में सत्य, मृषा, सत्य मृष (मिश्र) और असत्य-अमृषा ऐसी चार प्रकार की भाषाओं का उनके आवान्तर भेदों और उदाहरणों सहित विवेचन किया गया है।
१४०वां द्वार वचन षोड़सक अर्थात् सोलह प्रकार के वचनों का उल्लेख करता है।
१४१वें द्वार में मास पंचक और १४२वें द्वार में वर्ष पंचक का विवेचन है।
१४३वें द्वार में लोक के स्वरूप (आकार-प्रकार) का विवेचन है इसी क्रम में यहाँ लोक पुरुष की भी चर्चा की गयी है।
१४४ से लेकर १४७ तक चार द्वारों में क्रमश: तीन, चार, दस और पन्द्रह प्रकार की संज्ञाओं का विवेचन किया गया है।
१४८वें द्वार में सम्यक्त्व सड़सठ भेदों का विवेचन है, जबकि १४९वें द्वार में सम्यक्त्व के एक-दो आदि विभिन्न भेदों की विस्तार पूर्वक चर्चा की गई है।
१५०वें द्वार के अन्दर पृथ्वीकाय आदि षड् जीवनिकायके कुलों की संख्या का विवेचन है। प्राणियों की प्रजाति को योनि और उनकी उप प्रजातियों को कुल कहते हैं। इन कुलों की संख्या एक करोड़ सत्तानवे लाख पचास हजार मानी गई है।
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१५१ वें द्वार में चौरासी लाख जीव योनियों का विवेचन किया गया है। इस द्वार में पृथ्वीकाय की सात लाख, अपकाय की सात लाख, अग्निकाय की सात लाख, वायुकाय की सात लाख, प्रत्येक वनस्पतिकाय की दस लाख, साधारण वनस्पतिकाय की चौदह लाख, द्वीन्द्रिय की दो लाख, त्रीन्द्रिय की दो लाख, चउरिन्द्रिय की दो लाख, नारक चार लाख, देवता चार लाख, तिर्यञ्च चार लाख, मनुष्यों की चौदह लाख प्रजाति (योनि) मानी गयी है।
१५२वें द्वार में कालत्रिक, द्रव्य षट्क, नवपदार्थ, जीव निकाय षट्क, षट्लेश्या, पंच अस्तिकाय, पांच व्रत, पांच गति, पांच चारित्र का निर्देश है।
१५३ वें द्वार में गृहस्थ उपासक की ग्यारह प्रतिमाओं का विवेचन है । ये ग्यारह प्रतिमायें निम्न हैं: (१) दर्शन प्रतिमा (२) व्रत प्रतिमा (३) सामायिक प्रतिमा (४) पौषधोपवास प्रतिमा (५) नियम प्रतिमा (६) सचित त्याग प्रतिमा (७) ब्रह्मचर्य प्रतिमा (८) आरम्भ त्याग प्रतिमा (९) प्रेष्य त्याग प्रतिमा (१०) औद्देशिक आहार त्याग प्रतिमा (११) श्रमणभूत प्रतिमा ।
१५४वें द्वार में विभिन्न प्रकार के धान्यों के बीज कितने काल तक सचित्त रहते हैं और कब निर्जीव हो जाते हैं: इसका विवेचन किया गया है।
१५५ वें द्वार में कौन सी वस्तुयें क्षेत्रातीत होने पर अचित हो जाती हैं इसका विवेचन किया गया है। इसी क्रम में १५६ वें द्वार में गेहूं, चावल, मूंग-तिल आदि चौबीस प्रकार के धान्यों का विवेचन है।
१५७ वें द्वार में समवायांगसूत्र के समान सत्रह प्रकार के मरणों (मृत्यु) का विवेचन है।
१५८ वें और १५९ वें द्वारों में क्रमशः पल्योपम और सागरोपम के स्वरूप का विवेचन उपलब्ध होता है। इसी क्रम में १६० वें और १६१ वें द्वारों में क्रमशः अवसर्पिणी काल और उत्सर्पिणीकाल के स्वरूप का विवेचन किया गया है उसके पश्चात् १६२ वें द्वार में पुद्गल परावर्त काल के स्वरूप का विवेचन 'हुआ है! १६३ वें और १६४ वें द्वारों में क्रमश: पन्द्रह कर्म भूमियों और तीस अकर्म भूमियों का विवेचन किया गया है।
१६५ वें द्वार में जातिमद, कुलमद आदि आठ प्रकार के भेदों (अहंकारों) का विवेचन है।
१६६ वें द्वार में हिंसा के दो सौ तिरालिस भेदों का विवेचन उपलब्ध होता है। इसी प्रकार १६७ वें द्वार में परिणामों के एक सौ आठ भेदों की चर्चा की
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१४० गई है।
१६८ वें द्वार में ब्रह्मचर्य के अट्ठारह प्रकारों की चर्चा है और १६९ वें द्वार में काम के चौबीस भेदों का विवेचन किया गया है।
इसी क्रम में आगे १७० वें द्वार में दस प्रकार के प्राणों की चर्चा की गई है। जैन दर्शन में पाँच इन्द्रियाँ, मन-वचन और काया--ऐसे तीन बल, श्वासोश्वास और आयु ऐसे दस प्राण माने गये हैं।
१७१ वें द्वार में दस प्रकार के कल्पवृक्षों की चर्चा है।
१७२ वें द्वार में सात नरक भूमियों के नाम और गोत्र का विवेचन किया गया है।
आगे १७३ से लेकर १८२ तक के सभी द्वार नारकीय जीवन के विवेचन से सम्बद्ध हैं। १७३ वें द्वार में नरक के आवासों का, १७४ वें द्वार में नारकीय वेदना का, १७५ वें द्वार में नारकों की आयु का, १७६ ३ द्वार में नारकीय जीवों के शरीर की लम्बाई आदि का विवेचन किया गया है।
पुनः १७७ वें द्वार में नरकगति, प्रतिसमय उत्पत्ति और अन्तराल का विवेचन है।
१७८ वां द्वार किस नरक के जीवों में कौन सी द्रव्य लेश्या पाई जाती है इसका विवेचन करता है, जबकि १७९ वां द्वार नारक जीवों के अवधिज्ञान के स्वरूप का विवेचन करता है।
१८० वें द्वार में नारकीय जीवों को दण्डित करने वाले परमाधामी देवों का विवेचन किया गया है।
१८१ वें द्वार में नारकीय जीवों की उपलब्धि अर्थात् शक्ति का विवेचन है जबकि १८२ वें, १८३ और १८४ वें द्वारों में नारकीय जीवों के उपपात अर्थात जन्म का विवेचन प्रस्तुत है। इसमें यह बताया गया है कि जीव किन योनियों से मरकर कौन से नरक में उत्पन्न होता है और नारकीय जीव मरकर तिर्यंच और मनुष्य योनियों में कहाँ-कहाँ जन्म लेते हैं।
१८५ से १९१ तक के सात द्वारों में क्रमश: एकेन्द्रिय जीवों की काय स्थिति, भवस्थिति, शरीर परिणाम, इन्द्रियों के स्वरूप, इन्द्रियों के विषय, एकेन्द्रिय जीवों की लेश्या तथा उनकी गति और आगति का विवेचन उपलब्ध होता है।
१९२ और १९३ वें द्वारों में विकलेन्द्रिय आदि की उत्पत्ति, च्यवन एवं विरहकाल (अन्तराल) का तथा जन्म और मृत्यु प्राप्त करने वालों की संख्या का
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१४१
विवेचन है।
१९४ - द्वार में भवनपति आदि देवों की कायस्थिति, १९५ वें में उनके भवनादि का स्वरूप, १९६ वें द्वार में इन देवों के शरीर की लम्बाई आदि और १९७ वे द्वार में विभिन्न देवों में पाई जाने वाली द्रव्य लेश्या का विवेचन है। इसी क्रम में १९८ वें द्वार में देवों के अवधिज्ञान के स्वरूप का और १.९९ वें द्वार में देवों की उत्पत्ति में होने वाले विरहकाल का विवेचन है। .
२०० वें द्वार में देवों की उपपात के विरहकाल का और २०१ वें द्वार में देवों के उपपात की संख्या का विवेचन किया गया है।
२०२ और २०३ वें द्वारों में क्रमश: देवों की गति और आगति का विवेचन है।
२०४ वां द्वार सिद्ध गति में जाने वाले जीवों के बीच जो अन्तराल अर्थात् विरहकाल होता है उसका विवेचन करता है।
२०५ वें द्वार में जीवों के आहारादि स्वरूप का विवेचन है।
२०६ वें द्वार में तीन सौ त्रेसठ पाखंडी मतों का विस्तृत विवेचन किया गया है।
२०७ वें द्वार में प्रमाद के आठ भेदों का विवेचन है। - २०८ वें द्वार में बारह चक्रवर्तियों का, २०९ ३ द्वार में नौ बलदेवों का, २१० वें द्वार में नौ वासुदेवों का और २११ वें द्वार में नौ प्रतिवासुदेवों का संक्षिप्त विवेचन उपलब्ध होता है।
२१२ वें द्वार में चक्रवर्ती, वासुदेव आदि के क्रमश: चौदह और सात रत्नों का विवेचन है।
२१३ वें द्वार में चक्रवर्ती, वासुदेव आदि की नव निधियों का विवेचन किया गया है।
२१४ वां द्वार विभिन्न योनियों में जन्म लेने वाले जीवों की संख्या आदि का विवेचन करता है।
२१५ वें द्वार से लेकर २२० वें द्वार तक छः द्वारों में जैन कर्म सिद्धान्त का विवेचन उपलब्ध होता है। इनमें क्रमश: आठ मूल प्रकृतियों, एक सौ अट्ठावन उत्तर प्रकृतियों, उनके बन्ध आदि के स्वरूप तथा उनकी स्थिति का विवेचन किया गया है। अन्तिम दो द्वारों में क्रमशः बयालीस पुण्य प्रकृतियों का और बयासी पाप प्रकृतियों का विवेचन है।
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१४२
२२१ वें द्वार में जीवों के क्षायिक आदि छ: प्रकार के भावों का विवेचन है। इसके साथ ही इस द्वार में विभिन्न गुणस्थानों में पाये जाने वाले विभिन्न भावों का भी विवेचन किया गया है।
२२२ वां एवं २२३ वां द्वार क्रमश: जीवों के चौदह और अजीवों के चौदह प्रकार का विवेचन करता है।
२२४ वें द्वार में १४ गुणस्थानों का, २२५ वें द्वार में चौदह मार्गणाओं का, २२६ वें द्वार में बारह उपयोगों का और २२७ वें द्वार में पन्द्रह योगों का विवेचन है।
२३७ वें द्वार में अट्ठारह प्रकार के पापों का विवेचन है। २३८ वें द्वार में मुनि के सत्ताइस मूल गुणों का विवेचन है। २३९ वें द्वार में श्रावक के इक्कीस गुणों का विवेचन किया गया है।
२४० वें द्वार में तिर्यंच जीवों की गर्भ स्थिति के उत्कृष्ट काल का विवेचन किया गया है जबकि २४१ वें द्वार में मनुष्यों की गर्भ स्थिति के सम्बन्ध में विवेचन है। २४२वां द्वार मनुष्य की काय स्थिति को स्पष्ट करता है।
२४३ वें द्वार में गर्भ में स्थिति जीव के आहार के स्वरूप का विवेचन है तो २४४ वें द्वार में गर्भ का धारण कब सम्भव होता है इसका विवरण दिया गया है। २४५ और २४६ वें द्वार में क्रमश: यह बताया गया है कि एक पिता के कितने पुत्र हो सकते हैं? और एक पुत्र के कितने पिता हो सकते हैं। आधुनिक जीव विज्ञान की दृष्टि से यह एक रोचक विषय है।
२४७ वें द्वार में स्त्री-पुरुष कब संतानोत्पत्ति के अयोग्य होते हैं इसका विवेचन किया गया है । २४८ वें द्वार में वीर्य आदि की मात्रा के सम्बन्ध में चर्चा की गई है इसमें यह भी बताया है कि एक शरीर में रक्त, वीर्य आदि की कितनी मात्रा होती है।
२४९ वें द्वार में सम्यक्त्व आदि की उपलब्धि में किस अपेक्षा से कितना अन्तराल होता है इसका विवेचन किया गया है।
२५० वें द्वार में मनुष्य भव में किनकी उत्पत्ति सम्भव नहीं है, इसका विवरण प्रस्तुत किया गया है।
२५१ वें द्वार में ग्यारह अंगों के परिमाण का और २५२ वें द्वार में चौदह पूर्वो के परिमाण का विवेचन है। इनमें मुख्य रूप से यह बताया है कि किस अंग और किस पूर्व की कितनी श्लोक संख्या होती है।
२५३ वें द्वार में लवण शिखा के परिमाण का उल्लेख है।
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१४३ २५४ वा द्वार विभिन्न प्रकार के अंगुलों (माप विशेष) का विवेचन करता है। २५५ वें द्वार में त्रसकाय के स्वरूप का विवेचन किया गया है। २५६ वें द्वार में छ: प्रकार के अनन्तकायों की चर्चा है।
२५७ वें द्वार में निमित्त शास्त्र के आठ अंगों का विवेचन है। दूसरे शब्दों में यह द्वार अष्टांग निमित्त शास्त्र का विवेचन करता है।
२५८ वें द्वार में मान और उन्मान अर्थात् माप-तौल सम्बन्धी विभिन्न पैमाने दिये गये हैं।
२५९ वें द्वार में अट्ठारह प्रकार के भोज्य पदार्थों का विवेचन है। २६० वां द्वार षट् स्थानक हानि वृद्धि नामक जैन दर्शन की विशिष्ट अवधारणा का विवेचन करता है। २६१ वें द्वार में उन जीवों का निर्देश है, जिनका संहरण सम्भव नहीं होता है। इसमें बताया गया है कि श्रमणी, अपगतवेद, परिहारविशुद्धचारित्र, पुलाकलब्धि, अप्रमत्त गुणस्थानवर्ती, चौदह पूर्वधर एवं आहारकलब्धि से सम्पन्न जीवों का संहरण नहीं होता है।
२६२ वें द्वार में छप्पन अन्तद्वीपों का विवेचन किया गया है। २६३ वें द्वार में जीवों का पारस्परिक अल्पबहुत्व का विचार किया गया है।
२६४ वें द्वार में युगप्रधान सूरियों अर्थात् आचार्यों की संख्या का विवेचन किया गया है।
२६५ वें द्वार में ऋषभ से लेकर महावीर स्वामी पर्यन्त तीर्थ की स्थिति का विचार किया गया है।
२६६ वां द्वार विभिन्न देवलोकों में देवता अपनी काम वासना की पर्ति कैसे करते हैं, इसका विवरण प्रस्तुत करता है।
२६७ वें द्वार में कृष्णराजी का विवेचन है। २६८ वां द्वार अस्वाध्याय के स्वरूप का विस्तृत विवेचन करता है। २६९ वें द्वार में नन्दीश्वर द्वीप के स्वरूप का विवेचन किया गया है। २७० वें द्वार में विभिन्न प्रकार की लब्धियों (विशिष्ट शक्तियों) का विवेचन है।
.२७१ वें द्वार में छ: आन्तर और छ; बाह्य तपों के स्वरूप का विस्तृत विवेचन है।
२७२ वें द्वार में दस पातालकलशों के स्वरूप का विवेचन है। २७३ वें द्वार में आहारक शरीर के स्वरूप का विवेचन किया गया है। २७४ वें द्वार में अनार्य देशों का और २७५ वें द्वार में आर्य देशों का
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१४४
विवेचन है।
अन्तिम २७६ वां द्वार सिद्धों के इकत्तोस गुणों का विवरण प्रस्तुत करता है।
इस प्रकार यह विशालकाय कृति २७६ द्वारों (अध्यायों) में जैन दर्शन के २७६ विशिष्ट पक्षों के विवेचन के साथ समाप्त होती है। यही कारण है कि इस कृति को जैन धर्म दर्शन का एक छोटा विश्वकोष कहा जा सकता है।
हमें यह जानकर अत्यन्त प्रसन्नता होती है कि प्राकृत भारती अकादमी, जयपुर जैन दर्शन के इस महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ को हिन्दी अनुवाद के साथ प्रकाशित कर रही है। इससे जन सामान्य और विद्वत वर्ग दोनों का ही उपकार होगा। क्योंकि इसका हिन्दी भाषा में कोई भी अनुवाद उपलब्ध नहीं था। परम विदुषी साध्वी श्री हेमप्रभा श्री जी० म० सा० ने इस विशालकाय ग्रन्थ का हिन्दी अनुवाद करने का जो कठिनतर कार्य किया है, वह स्तुत्य तो है ही, साथ ही उनकी बहुश्रुतता का परिचायक भी है। ऐसे दुरूह प्राकृत ग्रन्थ का हिन्दी अनुवाद करना सहज नहीं था, यह उनके साहस का ही परिणाम है कि उन्होंने न केवल इस महाकार्य को हाथ में लिया, अपितु प्रामाणिकता के साथ इसे सम्पूर्ण भी किया। अनुवाद में उन्होंने मूल ग्रन्थ के साथ टीका को भी आधार बनाया है। इससे पाठकों को विषय को स्पष्ट रूप से समझने में सहायता मिलती है।
__ अनुवाद सहज और सुगम है और सीधा मूल विषय को स्पर्श करता है वस्तुतः यह पूज्या साध्वीजी का जैन विधा के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण अवदान है और इस हेतु वे हम सभी के साधवाद की पात्र हैं।
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६२९
१८०
१२९
अन्य ग्रन्थों की गाथाएँ और प्रवचनसारोद्धार अङ्गुलसप्तति
प्रवचनसारोद्धार
१३८९ अङ्गुलसप्तति
प्रवचनसारोद्धार
१३९४ अङ्गुलसप्तति
प्रवचनसारोद्धार
१३९५ आचारांगनियुक्ति
प्रवचनसारोद्धार
९२५ आराहणापडाया (प्रा.)
प्रवचनसारोद्धार
८७५ आराहणापडाया (प्रा.)
प्रवचनसारोद्धार
८७६ आराहणापडाया (प्रा.)
प्रवचनसारोद्धार
(99 आराहणापडाया (प्रा.)
प्रवचनसारोद्धार आराहणापडाया (प्रा.)
प्रवचनसारोद्धार
२६७ आराहणापडाया (प्रा.)
प्रवचनसारोद्धार
२६८ आराहणापडाया (प्रा.) ५०४ प्रवचनसारोद्धार आराहणापडाया (प्रा.) ६५१ प्रवचनसारोद्धार आराहणापडाया (प्रा.) ६५१ प्रवचनसारोद्धार
१२५६ आराहणापडाया (प्रा.)
प्रवचनसारोद्धार
६८५ आराहणापडाया (प्रा.) ६७२ प्रवचनसारोद्धार
६८६ आराहणापडाया (प्रा.) ६८६ प्रवचनसारोद्धार
१२०७ आराहणापडाया (प्रा.) ६८७ प्रवचनसारोद्धार
१२०८ आराहणापडाया (प्रा.) ७१४ प्रवचनसारोद्धार
६४१ आराहणापडाया (प्रा.) ७१५ प्रवचनसारोद्धार
६४२ आराहणापडाया (प्रा.) ७१७ प्रवचनसारोद्धार
६४४ आराहणापडाया (प्रा.) ७१९ प्रवचनसारोद्धार
६४६ आराहणापडाया (प्रा.) ७४६ प्रवचनसारोद्धार आराहणापडाया (प्रा.) ७४७ प्रवचनसारोद्धार
६३७ आराहणापडाया (प्रा.)
प्रवचनसारोद्धार
६३८ आराहणापडाया (प्रा.) ७४९ प्रवचनसारोद्धार
६३९ आराहणापडाया (वीरभद्र) ८९ प्रवचनसारोद्धार
२६७ आराहणापडाया (वीरभद्र) ९० प्रवचनसारोद्धार
२६८
६७१
७४८
* इस सम्बन्ध में हमारा आधार मुनि पद्मसेनविजयजी द्वारा सम्पादित एवं भारतीय प्राच्य तत्व प्रकाशन समिति पिण्डवाडा द्वारा प्रकाशित 'प्रदचन-सारोद्धार खण्ड १-२' एवं डॉ. श्री प्रकाश पाण्डेय का आलेख 'प्रकीर्णक एवं प्रवचनसारोद्धार' रहे हैं ।
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१४६
८७५ (ওও
१२४
१८३
१८४
१५९९
२०३
२०४
२०५
२०६ २४७
आराहणापडाया (वीरभद्र) १५५ आराहणापडाया (वीरभद्र) १५७ आराहणापडाया (वीरभद्र) ५४३ आवश्यकनियुक्ति
१२०२ आवश्यकनियुक्ति ११९८ आवश्यकनियुक्ति १५३१ आवश्यकनियुक्ति १५३२ आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति
१६०० आवश्यकनियुक्ति १६०१ आवश्यकनियुक्ति १६०२ आवश्यकनियुक्ति १५४६ आवश्यकनियुक्ति
१७९ आवश्यकनियुक्ति
१८० आवश्यकनियुक्ति
१८१ आवश्यकनियुक्ति
३८५ आवश्यकनियुक्ति
३८६ आवश्यकनियुक्ति
३८७ आवश्यकनियुक्ति
३८८ आवश्यकनियुक्ति
३८९ आवश्यकनियुक्ति
२६६ आवश्यकनियुक्ति
२६७ आवश्यकनियुक्ति
२७६ आवश्यकनियुक्ति
३७७ आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति
२२५ आवश्यकनियुक्ति
३०३ आवश्यकनियुक्ति
३०४ आवश्यकनियुक्ति
३०५ आवश्यकनियुक्ति ३०८ आवश्यकनियुक्ति
३०९ आवश्यकनियुक्ति ३१०
प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार
३१२ ३२० ३२१ ३२२ ३२३
३२४
३२९
३२८ ३८१ ३८२ ३८३ ३८४ ३८५
२२४
३८६
३८७ ३८८ ३८९ ३९०
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१४७
२२८
४५४
२५५
४५५
३०६ ९७० ९६९ ९६७ ९६५ ९५९
४५६ ४८२ ४८३ ४८४ ४८५
४८६
९७१
४८७
९७२
९७३
४८८ ४८९ ६९४ ७००
आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति
१४१८ ६६६ ६६७ ६६८ ६८२ ६८८ ६९६ ११७२ ८५७
प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार
८५८
७५० ७६० ७६१ ७६२ ७६३ ७६४ ७६७ ওও ८३७ ८३८ ८४७ ८४८ १०८४ १३०३ १४४८ १४५६ १४५७ १४५८ १४५९
७५४
७५९
२१४
१३३१ १३३२ १३३४ १३३५
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१४६०
१३३७ १३३८ १३४२ १३४४ १३४७ १३५० १३५१ १३५२ १३५५
१४६२ १४६३ १४६४ १४६५ १४६६ १४६७ १४७० १४७१ १२११
१३५८
१२१३
१४८ आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकभाष्यम् आवश्यकभाष्यम् आवश्यकभाष्यम् आवश्यकभाष्यम् आवश्यकभाष्यम् आवश्यकभाष्यम् आवश्यकभाष्यम् उत्तराध्ययन नियुक्ति उत्तराध्ययन नियुक्ति उत्तराध्ययन नियुक्ति उत्तराध्ययन नियुक्ति उत्तराध्ययन नियुक्ति उत्तराध्ययन नियुक्ति उत्तराध्ययन नियुक्ति उत्तराध्ययन नियुक्ति उत्तराध्ययन नियुक्ति उत्तराध्ययन नियुक्ति उत्तराध्ययन नियुक्ति उत्तराध्ययन नियुक्ति उत्तराध्ययन नियुक्ति उत्तराध्ययन सूत्रम् उत्तराध्ययन सूत्रम्
२१७ २१९
प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवंचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार
१४५४ १४५५ १४६८ १४६९ ६९१ ७६०
२२०
८२
9
७६१
or
०
४८२ ४८३ २१२ २१३ २१५ २१६
१००७ १००८
२१७ २१९
१००९ १०१० १०११
१०१२
२२१ २२२
१०१४ १०१५
or
२२३ २२४ २४/७ २८/१६
or9
७७१ ९५०
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९५१
२५२
९५३
९५५
२८/१८ २८/१९ २८/२० २८/२१ २८/२२ २८/२३ २८/२४ २८/२५ २८/२६ २८/२७
९५६
९५८
९५९
१७
६६८
१०९४ ४९१ ४९२ ५०६
७०३
७०५
५०७
७०८
५०
उत्तराध्ययन सूत्रम् उत्तराध्ययन सूत्रम् उत्तराध्ययन सूत्रम् उत्तराध्ययन सूत्रम् उत्तराध्ययन सूत्रम् उत्तराध्ययन सूत्रम् उत्तराध्ययन सूत्रम् उत्तराध्ययन सूत्रम् उत्तराध्ययन सूत्रम् उत्तराध्ययन सूत्रम् उपदेशपदम् ओघनियुक्ति ओघनियुक्ति ओघनियुक्ति ओघनियुक्ति ओघनियुक्ति ओघनियुक्ति ओघनियुक्ति ओघनियुक्ति ओघनियुक्ति ओघनियुक्ति ओघनियुक्ति ओघनियुक्ति ओघनियुक्ति ओघनियुक्ति ओघनियुक्ति ओघनियुक्ति ओघनियुक्ति ओघनियुक्ति ओघनियुक्ति ओघनियुक्ति ओघनियुक्ति
प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार
५०२
ک
७१३ ७१४
५११
७२१
ک
७२३
ک
م ه
५१४
७१२
५१५
५१६
999999999w, rm or
६९१ ७०६ ७२२
ک
५१८
م هر
ک
५३०
७३०
६७०
३१३
७०९
७१०
१२१
७७०
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१५०
ओघनियुक्ति
ओघनियुक्ति
३१६
३१७
६६०
३५१
३५२
ओघनियुक्तिभाष्यम्
३१३
ओघनिर्युक्तिभाष्यम्
३१४
ओघनिर्युक्तिभाष्यम्
३१५
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ओघनिर्युक्तिभाष्यम् ओघनिर्युक्तिभाष्यम् ओधनिर्युक्तिभाष्यम् ३१८
३१७
ओघनिर्युक्तिभाष्यम्
३१९
३२०
ओधनियुक्तिभाष्यम् ओघनिर्युक्तिभाष्यम्
२
ओघनिर्युक्तिभाष्यम् ओघनियुक्तिभाष्यम्
ओषनिर्युक्तिभाष्यम्
ओघनियुक्ति
ओघनिर्युक्ति
ओघनियुक्ति
कर्मग्रन्थ (प्राचीन)
कर्मग्रन्थ (प्राचीन)
कर्मग्रन्थ (प्राचीन)
कर्मग्रन्थ (प्राचीन)
कर्मग्रन्थ (प्राचीन)
कर्मग्रन्थ (प्राचीन)
कर्मग्रन्थ (प्राचीन)
कर्मग्रन्थ (प्राचीन)
कर्मग्रन्थ (प्राचीन)
कर्मग्रन्थ (प्राचीन)
कर्मग्रन्थ (प्राचीन)
कर्मग्रन्थ (प्राचीन)
कर्मग्रन्थ (प्राचीन)
कर्मग्रन्थ (प्राचीन)
कर्मग्रन्थ (प्राचीन)
१८४
१८५
१/५
१/७
१/७१
१/७२
१/७३
१/७४
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१/७६
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१/७८
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१/८०
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१/८२
४/७९
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
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प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
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प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
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कर्मग्रन्थ (प्राचीन)
कर्मग्रन्थ (प्राचीन)
गच्छायार पइण्णयं
चैत्यवन्दन महाभाष्य
चैत्यवन्दन महाभाष्य
चैत्यवन्दन महाभाष्य
चैत्यवन्दन महाभाष्य
चैत्यवन्दन महाभाष्य
४/१३
४/२६
४/३४
१ / १३६
५९
१९८०
४७८
४८०
४८१
४८२
चैत्यवन्दन महाभाष्य
४८३
चैत्यवन्दन महाभाष्य
४८४
चैत्यवन्दन महाभाष्य
४८५
चैत्यवन्दन महाभाष्य
४८६
चैत्यवन्दन महाभाष्य
४८७
चैत्यवन्दन महाभाष्य
४८९
चैत्यवन्दन महाभाष्य
४९०
चैत्यवन्दन महाभाष्य
४९१
चैत्यवन्दन महाभाष्य
४९२
चैत्यवन्दन महाभाष्य
४९३
चैत्यवन्दन महाभाष्य
४९४
६३
चैत्यवन्दन महाभाष्य जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति वक्षस्कार २ / १९
जीवसमास
४०
जीवसमास
जीवसमास
जीवसमास
जीवसमास
जीवसमास
जीवसमास
जीवसमास
जीवसमास
४१
४२
४३
४४
११७
११८
११९
१२०
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
१७६
१३००
१३०२
१३००
१३१७
१७३७०
६६
२४७५
२४९
२५०
२५१
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२५४
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२५७
२५८
२५९
२६०
२६१
२६२
४३२
१३९०
९६३
९६४
९६५
९६६
९६७
१०१८
१०१९
१०२०
१०२१
Page #33
--------------------------------------------------------------------------
________________
१५२
مر له
م
r
१९
२५
जीवसमास
प्रवचनसारोद्धार
१०२२ जीवसमास
प्रवचनसारोद्धार
१०२३ जीवसमास
प्रवचनसारोद्धार
१०२४ जीवसमास
प्रवचनसारोद्धार
१०२५ जीवसमास
प्रवचनसारोद्धार जीवसमास १२३ प्रवचनसारोद्धार
१०२७ जीवसमास १२४ प्रवचनसारोद्धार
१०२८ जीवसमास १२७ प्रवचनसारोद्धार
१०२९ जीवसमास १३० प्रवचनसारोद्धार
१०३० जीवसमास १३२ प्रवचनसारोद्धार
१०३१ जीवसमास १३३ प्रवचनसारोद्धार
१०३२ जीवसमास
प्रवचनसारोद्धार
११३३ जीवसमास
प्रवचनसारोद्धार
११३४ जीवसमास
प्रवचनसारोद्धार
१३०३ जीवसमास
१९२ प्रवचनसारोद्धार जीवसमास
प्रवचनसारोद्धार
१३१७ जीवसमास
प्रवचनसारोद्धार जीवसमास
प्रवचनसारोद्धार
१३९१ जीवसमास १०३ प्रवचनसारोद्धार
१३९४ जोइसकरंडग पइण्णय
प्रवचनसारोद्धार
१३९० जोइसकरंडग पइण्णयं ८४
प्रवचनसारोद्धार
१३९१ जोइसकरंडग पइण्णय
प्रवचनसारोद्धार
१०३४ ज्योतिष्करण्डक प्रकीर्णक ७९ प्रवचनसारोद्धार
१०२० ज्योतिष्करण्डक प्रकीर्णक
प्रवचनसारोद्धार ज्योतिष्करण्डक प्रकीर्णक ७४
प्रवचनसारोद्धार
१३९१ तित्थोगालीपइण्णयं
प्रवचनसारोद्धार
१०२५ तित्थोगालीपइण्णयं
प्रवचनसारोद्धार
१०३४ तित्थोगालीपइण्णयं
प्रवचनसारोद्धार
१०३६ तित्थोगालीपइण्णयं
प्रवचनसारोद्धार
१०३७ तित्थोगालीपइण्णयं ४६
प्रवचनसारोद्धार
१०६७ * डॉ. श्री प्रकाश पाण्डेय द्वारा निर्दिष्ट गाथाओं के क्रमांक मुनि पद्मसेन विजयजी द्वारा दिये गये गाथा क्रमांक से भिन्न है । हो सकता है यह भिन्नता संस्करण भेद के कारण हो इनमें दस गाथाओं का अन्तर हैं । पासेन विजयजी के संस्करण में इनका क्रमांक क्रमशः ७३, ७४ एवं ८५ है ।
८२
९८८
o
८३
२२
Page #34
--------------------------------------------------------------------------
________________
१५३
४७
४९
१०६८ १०७० १०३४ १३८७ ४०६
m
३८४
४५४
३६० ३९५ ४०० ५६७ ५६८ ५७०
३२५
३२६ १२०९ १२१०
५७१. ६१०
६९२ ८८८ ८८९
६९३ ८८५ ८८६
११३३
तित्थोगालीपइण्णयं तित्थोगालीपइण्णयं तित्थोगालीपइण्णयं तित्थोगालीपइण्णयं तित्थोगालीपइण्णयं तित्थोगालीपइण्णयं तित्थोगालीपइण्णयं तित्थोगालीपइण्णयं तित्थोगालीपइण्णयं तित्थोगालीपइण्णयं तित्थोगालीपइण्णयं तित्थोगालीपइएणयं तित्थोगालीपइण्णयं तित्थोगालीपइण्णयं तित्थोगालीपइण्णयं तित्थोगालीपइण्णयं तित्थोगालीपइण्णयं तित्थोगालीपइण्णयं तित्थोगालीपइण्णयं तित्थोगालीपइण्णयं तित्थोगालीपइण्णयं तित्थोगालोपइण्णयं तित्थोगालोपइण्णायं तित्थोगालीपइण्णयं तित्थोगालीपइण्णयं तित्थोगालीपइण्णयं तित्थोगालीपइण्णयं दशवैकालिकानियुक्ति दशवैकालिकानियुक्ति दशवैकालिकानियुक्ति दशवैकालिकानियुक्ति दशवैकालिकानियुक्ति
प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार
११३६ ११४१ ११४२ ११७० १२०७ १२२० १२३७ १२३८ १२३९ १२४२
on or or w
a r or on a on ० ० orm wxxxmm In " Voor
3 x x x ☆ x r in
१२४३
४८ ३२५ ३२६ ४६
Page #35
--------------------------------------------------------------------------
________________
१५४
दशवेकालिकानिर्युक्ति ૪૩
दशवैकालिकानिर्युक्ति ४८
दशवैकालिकानिर्युक्ति २७३ दशवैकालिकानिर्युक्ति २७४ दशवैकालिकानिर्युक्ति २७५ दशर्वकालिकानिर्युक्ति २७६ प्रवचनसारोद्धार
दशवैकालिकानिर्युक्ति २५७ प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
दशवैकालिकानिर्युक्ति २५२ दशवैकालिकानिर्युक्ति २५३ दशवैकालिकानिर्युक्ति २५९
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
२६०
प्रवचनसारोद्धार
२६१
२६२
६७
८१
१८४
१९२
२८६
२८७
२८९
दशवैकालिकानिर्युक्ति
दशवैकालिकानिर्युक्ति देविदत्थओ पइण्णयं
देविदत्थओ पइण्णयं
देविदत्थओ पइण्णयं
देविदत्थओ पइण्णयं देविदत्थओ पइण्णयं
देविदत्थओ पइण्णयं
देविदत्थओ पइण्णयं
देविदत्थओ पइण्णयं
धर्मरत्नप्रकरण
धर्मरत्नप्रकरण
धर्मरत्नप्रकरण
धर्मसंग्रहणी
धर्म संग्रहणी
धर्म संग्रहणी
निशीथभाष्यम्
निशीथभाष्यम्
निशीथभाष्यम्
निशीथभाष्यम्
निशीथभाष्यम्
निशीथभाष्यम्
५
६
७
६१८
६१९
६२०
१३९०
१३९१
१३९२
४००३
४००१
४००२
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
५५९
७६०
८९१
८९२
८९३
८९४
८९५
१००४
ee
१०३२
१०६३
१०६४
२०६५
११३०
११३३
११३७
११६०
४८६
४८४
१५४०
१३५६
१३५७
१३५८
१२६३
१२६४
१२६५
४९३
४९४
४९७
६७६
६७७
६७८
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________________
३५०६ ३५०७
७९०
३५६१
७९३
३७०९
७९५ ७९६
३७१०
といい
८०१
११४४ ११४५ ११४९ ११४८ ११५८ ११५९
८०२ ८०३ ८०४ ८०५
११६०
८०६
८०७
८०८
८५०
८५१
निशीथभाष्यम् निशीथभाष्यम् निशीथभाष्यम् निशीथभाष्यम् निशीथभाष्यम् निशीथभाष्यम् निशीथभाष्यम् निशीथभाष्यम् निशीथभाष्यम् निशीथभाष्यम् निशीथभाष्यम् निशीथभाष्यम् निशंथभाष्यम् निशोथभाष्यम् निशीथभाष्यम् निशीथभाष्यम् निशीथभाष्यम् निशीथभाष्यम् निशीथभाध्यम् निशीथभाष्यम् निशीथभाष्यम् पञ्चकल्पभाष्यम् पञ्चकल्पभाष्यम् पञ्चसंग्रह पञ्चसंग्रह पञ्चसंग्रह पञ्चवस्तुकप्रकरणम् पञ्चवस्तुकप्रकरणम् पञ्चवस्तुकप्रकरणम् पञ्चवस्तुकप्रकरणम् पञ्चवस्तुकप्रकरणम् पञ्चवस्तुकप्रकरणम्
प्रवचनसाराद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार
८५२ ८५३
११६१ ११६२ ५०८७ ५०८६ ५०८८ ५०८९ ४८३३ ४८३४ ४८३५ २००
२०१ द्वार ३/११ द्वार ३/४ द्वार ३/२५
३७१ ওওও ८२७ १५३८ १५३९ १५४०
१००२ १००३ ७९०
१२७४
१२५४
१२९८
४९४
६११ ६१२ ६१३
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--------------------------------------------------------------------------
________________
१५६
१५४१
१५४७ १५४८ १५४९ १५५० १५५१ १५५२ ३९९ ४००
६१४ ६२३ ६२४ ६२५ ६२६ ६२७ ६२८
Waw KW
७१० ७४५
२३०
८९५ ८९६
७६८ ७७२ ७७३
७८०
ه ل
१३२९
७८१
سه
७८२
पञ्चवस्तुकप्रकरणम् पञ्चवस्तुकप्रकरणम् पञ्चवस्तुकप्रकरणम् पञ्चवस्तुकप्रकरणम् पञ्चवस्तुकप्रकरणम् पञ्चवस्तुकप्रकरणम् पञ्चवस्तुकप्रकरणम् पञ्चवस्तुकप्रकरणम् पञ्चवस्तुकप्रकरणम् पञ्चवस्तुकप्रकरणम् पञ्चवस्तुकप्रकरणम् पञ्चवस्तुकप्रकरणम् पञ्चवस्तुकप्रकरणम् पञ्चवस्तुकप्रकरणम् पञ्चवस्तुकप्रकरणम् पञ्चवस्तुकप्रकरणम् पञ्चवस्तुकप्रकरणम् पञ्चवस्तुकप्रकरणम् पञ्चवस्तुकप्रकरणम् पञ्चवस्तुकप्रकरणम् पञ्चवस्तुकप्रकरणम् पञ्चवस्तुकप्रकरणम् पञ्चवस्तुकप्रकरणम् पञ्चवस्तुकप्रकरणम् पञ्चाशकप्रकरणम् पञ्चाशकप्रकरणम् पञ्चाशकप्रकरणम् पञ्चाशकप्रकरणम् पञ्चाशकप्रकरणम् पञ्चाशकप्रकरणम् पञ्चाशकप्रकरणम् पञ्चाशकप्रकरणम्
प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार
७०७
७०८
८७१ ८७२ ८७३
७०९
८७४
८७५
७०६ १५७४ १५७५ ९२६ ९२७
८७६ ८८५ ८८६
७४
७५
३/१८ ३/१९ ३/२० ३/२१ ५/८ ५/९ ५/१०
२०३ २०४ २०५
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________________
पञ्चाशकप्रकरणम्
पञ्चाशकप्रकरणम्
पञ्चाशकप्रकरणम्
पञ्चाशकप्रकरणम्
पञ्चाशकप्रकरणम्
पञ्चाशकप्रकरणम्
पञ्चाशकप्रकरणम्
पञ्चाशकप्रकरणम्
पञ्चाशकप्रकरणम्
पञ्चाशकप्रकरणम्
पञ्चाशकप्रकरणम्
पञ्चाशकप्रकरणम्
पञ्चाशकप्रकरणम्
पञ्चाशकप्रकरणम्
पञ्चाशकप्रकरणम्
पञ्चाशकप्रकरणम्
पञ्चाशकप्रकरणम्
पञ्चाशकप्रकरणम्
पञ्चाशकप्रकरणम्
पञ्चाशकप्रकरणम्
पञ्चाशकप्रकरणम्
पञ्चाशकप्रकरणम्
पञ्चाशकप्रकरणम्
पञ्चाशकप्रकरणम्
पञ्चाशकप्रकरणम्
पञ्चाशकप्रकरणम्
पञ्चाशकप्रकरणम्
पञ्चाशकप्रकरणम्
पञ्चाशकप्रकरणम्
पञ्चाशकप्रकरणम्
पञ्चाशकप्रकरणम्
पञ्चाशकप्रकरणम्
५/२७
५/२८
५/२९
५/३०
१३/३
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१८/६
१८/७
१७/२६
१७ /१०
१७/८
१७ / १२
१७/१६
१७/३२
१७/३७
१७/३८
१७/३९
१६/२
१२/२
१२/३
१२ / १०
१२ / १४
१४ / २
१४/३
१४/४
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
१४/८ प्रवचनसारोद्धार
१४/९
प्रवचनसारोद्धार
१४/५
१४/६
१४/७
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
१५७
२०७
२०८
२०९
२१०
५६३
५७४
५७५
५७६
५७७
५७८
६४७
६५०
६५१
६५२
६५३
६५४
• ६५६
६५७
६५८
७४०
७६०
७६१
७६३
७६४
८३९
८४०
८४१
८४२
८४३
८४४
८४५
८४६
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________________
१५८
पञ्चाशकप्रकरणम्
पञ्चाशकप्रकरणम्
पञ्चाशकप्रकरणम्
पञ्चाशकप्रकरणम् पर्यन्ताराधना
पर्यन्ताराधना
पर्यन्ताराधना
पर्यन्ताराधना
पिण्डविशुद्धि
पिण्डविशुद्धि पिण्डविशुद्धि पिण्डविशुद्धि
पिण्डविशुद्धि
पिण्डविशुद्धि
पिण्डविशुद्धि
पिण्डविशुद्धि
पिण्डविशुद्धि
पिण्डविशुद्धि
पिण्डविशुद्धि
पिण्डविशुद्धि
पिण्डविशुद्धि
पिण्डविशुद्धि
पिण्डविशुद्धि
पिण्डविशुद्धि
पिण्डविशुद्धि
१५/४१
१०/१७
१०/१८
१०/१९
८
१८
२६०
Tr
३
४
x x
४०८
४०९
५२०
६६२
६६३
६६४
६६५
६६६
२६
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
२७
प्रवचनसारोद्धार
६४२
प्रवचनसारोद्धार
६५०
प्रवचनसारोद्धार
६५१
प्रवचनसारोद्धार
६५२
प्रवचनसारोद्धार
६५३
प्रवचनसारोद्धार
प्रज्ञापनासूत्रम् पद ११/ सू. ८६२गा. १९४ प्रवचनसारोद्धार
प्रज्ञापनासूत्रम् पद ११ / सू. ८६३ गा. १९५
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रज्ञापनासूत्रम् पद १ / सू. ८६६ गा. १९६ प्रज्ञापनासूत्रम् पद १/ सू. प्रज्ञापनासूत्रम् पद १/ सू. प्रज्ञापनासूत्रम् पद १ / सू. प्रज्ञापनासूत्रम् पद १ / सू.
११० गा. १३१ ११० गा. ११९ ११० गा. १२१ ११० गा. १२२
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
८६२
९८५
९८६
९८७
९७६
८७७
९२७
६४१
५६४
५६५
५६६
५६७
५६८
७३४
७३५
७३६
७३७
७३८
८६४
८६५
८६६
८६७
८६८
८६९
८७०
८९१
८९२
८९५
९२८
९५०
९५१
९५२
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१५९ ११३१ १५८७ १५८८ १५८९ १५९० १५९१
१५९२
४९८ ६१४ ६२४ ६२५
६२६
६२७ ६२८
प्रज्ञापनासूत्रम् पद२/सू. १९४ गा. १५१ प्रवचनसारोद्धार प्रज्ञापनासूत्रम् पद१/सू. १०२ गा. ११२ प्रवचनसारोद्धार प्रज्ञापनासूत्रम् पद१/सू.१०२ गा. ११३ प्रवचनसारोद्धार प्रज्ञापनासूत्रम् पद१/सू. १०२ गा. ११४ प्रवचनसारोद्धार प्रज्ञापनासूत्रम् पद१/सू. १०२ गा. ११५ प्रवचनसारोद्धार प्रज्ञापनासूत्रम् पद१/सू. १०२ गा. ११६ प्रवचनसारोद्धार प्रज्ञापनासूत्रम् पद१/सू. १०२ गा. ११७ प्रवचनसारोद्धार बृहत्कल्पभाष्यम् १३२८ प्रवचनसारोद्धार बृहत्कल्पभाष्यम् १४३९ प्रवचनसारोद्धार बृहत्कल्पभाष्यम् १४४१ प्रवचनसारोद्धार बृहत्कल्पभाष्यम् १४४२ . प्रवचनसारोद्धार बृहत्कल्पभाष्यम् १४४३ प्रवचनसारोद्धार बृहत्कल्पभाष्यम्
१४४४ प्रवचनसारोद्धार बृहत्कल्पभाष्यम्
१४४५ प्रवचनसारोद्धार बृहत्कल्पभाष्यम् ६३६१ प्रवचनसारोद्धार बृहत्कल्पभाष्यम्
१७७५ प्रवचनसारोद्धार बृहत्कल्पभाष्यम्
प्रवचनसारोद्धार बृहत्कल्पभाष्यम्
४४४ प्रवचनसारोद्धार बृहत्कल्पभाष्यम्
६८८ प्रवचनसारोद्धार बृहत्कल्पभाष्यम्
४२८६ प्रवचनसारोद्धार बृहत्कल्पभाष्यम्
४२८७ प्रवचनसारोद्धार बृहत्कल्पभाष्यम्
१५०६ प्रवचनसारोद्धार बृहत्कल्पभाष्यम्
१५०७ प्रवचनसारोद्धार बृहत्कल्पभाष्यम्
१५०८
प्रवचनसारोद्धार बृहत्कल्पभाष्यम्
प्रवचनसारोद्धार बृहत्कल्पभाष्यम्
४५७ प्रवचनसारोद्धार बृहत्कल्पभाष्यम्
४५८ प्रवचनसारोद्धार बृहत्कल्पभाष्यम्
४५९ प्रवचनसारोद्धार बृहत्कल्पभाष्यम्
३८९० प्रवचनसारोद्धार बृहत्कल्पभाष्यम्
३८९१ प्रवचनसारोद्धार बृहत्कल्पभाष्यम्
३८९२ प्रवचनसारोद्धार बृहत्कल्पभाष्यम्
३५२५ प्रवचनसारोद्धार
६६३ ७०९
७७५ ७७६ ७८३ ७८४ ७८५ ७८६ ७८७ ७८८ ७८९ ७९७ ७९८ ७९९ ८००
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१६०
८०१
८०२
८०३ ८०५ ८०७ ८०८ ८५०
८५१
३५२६ ३५३० ३५२९ ३५३९ ३५४१ ३५४३ २८३२ २८३१ २८३३ २८३४ ५८२ ५८३ ५८४ १४९४ १४९५ ९७३ ९७४ ९७५
८५२ ८५३ ८७१
८७२
८७३ ८७९ ८८०
बृहत्कल्पभाष्यम् बृहत्कल्पभाष्यम् बृहत्कल्पभाष्यम् बृहत्कल्पभाष्यम् बृहत्कल्पभाष्यम् बृहत्कल्पभाष्यम् बृहत्कल्पभाष्यम् बृहत्कल्पभाष्यम् बृहत्कल्पभाष्यम् बृहत्कल्पभाष्यम् बृहत्कल्पभाष्यम् बृहत्कल्पभाष्यम् बृहत्कल्पभाष्यम् बृहत्कल्पभाष्यम् बृहत्कल्पभाष्यम् बृहत्कल्पभाष्यम् बृहत्कल्पभाष्यम् बृहत्कल्पभाष्यम् बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी
१००१
प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार
१००२
१००३
३५१
३५२ २३९ २५५
९६८ ९६९ १०७२ १०७३ १०७५ १०७६ १०७९ १०८०
२३३
२३४ २७९ २८० २८१ २८२ २८९ २८४ २८५ २८६
१०८१ १०८२
१०८३ १०९१ १०९२ १०९३
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________________
३३३ ३३४ ३१२ ३१३ ३१४ ३०७ ३११ ३१०
३०८ ३४२
१७० १६९ १७१ १७२
or
बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणा बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी
१६१ १०९४ १०९५ १०९६ १०९७ १०९८ १०९९ ११०२ ११०३ ११०४ १११० १११७ १११८ १११९ ११२० ११२४ ११२५ ११२६ ११२७ ११२९ ११३० ११३८ ११३९ ११४० ११४३ ११४६ ११४७ ११४८ ११४९ ११५० ११५१ ११५२
प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार
३३८ ३४० ३४१
४२
or
or
५५
११८ ११९
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________________
११५४
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२२०
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२२२
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१५
१५१
बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी वृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी
१५२ १५३ १५४ १५५ १५६ १८०
प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार
११५६ ११५७ ११५८ ११६१ ११६२ ११६३ ११६४ ११६५ ११६७ ११६८ ११६९ ११७० ११७१ ११७२ ११७३ ११७४ ११७७ ११७८ ११८० ११८१ ११८२ ११८३ ११८४ ११८५ ११८७ १२१५ १२१६ १२१७ १३१७ १४३९
१५७
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१९८
१९९
२००
२०१
२०२ २१४ २१५ ३०३ ३०४ ३१२ ३६३ १८१
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१६३
१४४९ ७६० १०८५ १४४३
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७५०
৩৬০
७८०
* fr 5 แs
७८१ १३२३ १३२४ १३२५
१३२६
बृहत्संग्रहणी ६/५/२४३ बृहत्संग्रहणी २५/७/८०१ भगवतीसूत्रम् ३/७/४ भगवतीसूत्रम् ६/५/२४३ विशेषणवती व्यवहारसूत्रभाष्यम् उ.१ गा.५३ व्यवहारसूत्रभाष्यम् उ.२ गा.२० व्यवहारसूत्रभाष्यम् उ.३ गा.१५ व्यवहारसूत्रभाष्यम् उ.३ गा. १६ श्रावकव्रतभङ्गप्रकरणम् २ श्रावकव्रतभङ्गप्रकरणम् श्रावकव्रतभङ्गप्रकरणम् श्रावकव्रतभङ्गप्रकरणम् श्रावकव्रतभङ्गप्रकरणम् श्रावकव्रतभङ्गप्रकरणम् श्रावकव्रतभङ्गप्रकरणम् श्रावकव्रतभङ्गप्रकरणम् श्रावकव्रतभङ्गप्रकरणम् श्रावकव्रतभङ्गप्रकरणम् श्रावकव्रतभङ्गप्रकरणम् श्रावकव्रतभङ्गप्रकरणम् श्रावकव्रतभङ्गप्रकरणम् श्रावकव्रतभङ्गप्रकरणम् श्रावकव्रतभङ्गप्रकरणम् श्रावकव्रतभङ्गप्रकरणम् श्रावकव्रतभङ्गप्रकरणम् श्रावकव्रतभङ्गप्रकरणम् श्रावकव्रतभङ्गप्रकरणम् श्रावकव्रतभङ्गप्रकरणम् श्रावकव्रतभङ्गप्रकरणम् श्रावकव्रतभङ्गप्रकरणम् श्रावकव्रतभङ्गप्रकरणम्
१३२७ १३२८ १३२९
9 ง ; & # # # # #
प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार
१३३१ १३३२
# # * *
१३३४ १३३५ १३३६ १३३७ १३३८ १३३९ १३४० १३४१ १३४२ १३४४ १३४५ १३४६
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१६४
१३४७
१३४८
2M29 No
१३४९ १३५० ३७३ ३७४ ३७५ ३७६
श्रावकव्रतभङ्गप्रकरणम्
प्रवचनसारोद्धार श्रावकव्रतभङ्गप्रकरणम्
प्रवचनसारोद्धार श्रावकव्रतभङ्गप्रकरणम्
प्रवचनसारोद्धार श्रावकव्रतभङ्गप्रकरणम्
प्रवचनसारोद्धार संतिकरं
प्रवचनसारोद्धार संतिकरं
प्रवचनसारोद्धार संतिकरं
प्रवचनसारोद्धार संतिकरं
प्रवचनसारोद्धार सप्ततिशतस्थानप्रकरणम् २०८ प्रवचनसारोद्धार समवायांगसूत्रम् स्था.१५सू.१गा. ११-१२। प्रवचनसारोद्धार समवायांगसूत्रम् परि. सू. १५८/४७ प्रवचनसारोद्धार समवायांगसूत्रम् परि. सू. १५८/४८ प्रवचनसारोद्धार संबोधप्रकरण
२/१८ प्रवचनसारोद्धार संबोधप्रकरण
२/१२ प्रवचनसारोद्धार संबोधप्रकरण
२/१७ प्रवचनसारोद्धार संबोधप्रकरण
७/९२ प्रवचनसारोद्धार संबोधप्रकरण
७/१४१ प्रवचनसारोद्धार संबोधप्रकरण
७/१४६ प्रवचनसारोद्धार संबोधप्रकरण
७/१४८ प्रवचनसारोद्धार संबोधप्रकरण
६/१५० प्रवचनसारोद्धार संबोधप्रकरण
६/१५१ प्रवचनसारोद्धार संबोधप्रकरण
प्रवचनसारोद्धार संबोधप्रकरण
७/४७ प्रवचनसारोद्धार संबोधप्रकरण
७/४८ प्रवचनसारोद्धार संबोधप्रकरण
७/६४ प्रवचनसारोद्धार संबोधप्रकरण
७/१९८ प्रवचनसारोद्धार संबोधप्रकरण
५/१३८ प्रवचनसारोद्धार संबोधप्रकरण
१/८७ प्रवचनसारोद्धार संबोधप्रकरण
प्रवचनसारोद्धार संबोधप्रकरण
१/३५ प्रवचनसारोद्धार संबोधप्रकरण
प्रवचनसारोद्धार संबोधप्रकरण
१/१४ प्रवचनसारोद्धार संबोधप्रकरण
२/१८ प्रवचनसारोद्धार
or or or a or on n oor n w w
ar r r r
१२० २३८ २६४ २६७ २६९
२७१ २७२ २७७
२७८
२७९
२८० २८३
२८६ ४३२ ४४३
so
*
४५२
४९१
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________________
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
२/२३०
२/२२३
२/६८
२/२३१
२/२७० प्रवचनसारोद्धार
२/२७१
प्रवचनसारोद्धार
२/२७३ प्रवचनसारोद्धार
२/२३४ प्रवचनसारोद्धार
३/२३८
प्रवचनसारोद्धार
२/२३९
प्रवचनसारोद्धार
२/१६
प्रवचनसारोद्धार
२/२४१
प्रवचनसारोद्धार
२/२४९
प्रवचनसारोद्धार
२/२७४
प्रवचनसारोद्धार
२/२७७
प्रवचनसारोद्धार
२/२८० प्रवचनसारोद्धार
१२/५२ प्रवचनसारोद्धार
१२/५३
प्रवचनसारोद्धार
१२/५४
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
१२/५५
१२/५६
११ / ३८
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
४/३०
४/३२
१२/६७
१२/७०
१२/७१
२/५२
४/६०
४/६१
४/६८
४/८४
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
१६५
५५१
५५२
५५७
५६२
५६५
५६६
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६३६
६४०
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६४४
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७४५
७५४
७५५
७५६
७५७
७५८
८०९
८३६
८३७
८५५
८५८
८५९
८९१
९२७
९२८
९३४
९४५
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________________
१६६
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
४/८५
४/८८
४/८९ .
७/१
६/८८
६/८९
६/९०
६/९६
६/९८
६/१०४
६/१०३
६/११०
२/४५
२/६५
२/६६
२/३२
३/३७
३/३८
३/३९
२/४२
३/१९९
३/२००
५/६
५/७
५/८
स्थानांगसूत्रम् स्था. १० सू. ७७७गा. १७५ स्थानांगसूत्रम् स्था. १० सू.७७७गा. १७६
स्थानांगसूत्रम् स्था. ९/ सू. ६७३गा. १
स्थानांगसूत्रम् स्था. ९/सू. ६७३गा. २
स्थानांगसूत्रम् स्था. ९ सू. ६७३गा. ३
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
९४६
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९५०
९७७
९८०
९८१
९८२
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१२४७
१३५४
१३५५
१३५६
१३५७
१३५८
८८५
८८६.
•
मुनि जम्बूविजयजी द्वारा सम्पादित ठाणांगसूत्त में इनका गाया क्रमांक १ से १४ न होकर गाथा क्रमांक ११७-१३० है ।
१२१८
१२१९
१२२०
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________________
१२२२ १२२३ १२२४
स्थानांगसूत्रम् स्था.९ सू.६७३गा. ४ स्थानांगसूत्रम् स्था.९ सू.६७३गा. ५ स्थानांगसूत्रम् स्था.९ सू.६७३गा.६ स्थानांगसूत्रम् स्था.९ सू.६७३गा. ७ स्थानांगसूत्रम् स्था.९ सू.६७३गा.८ स्थानांगसूत्रम् स्था.९ सू.६७३गा. ९ स्थानांगसूत्रम् स्था.९ सू.६७३गा. १० स्थानांगसूत्रम् स्था.९ सू.६७३गा. ११ स्थानांगसूत्रम् स्था.९ सू.६७३गा. १२ स्थानांगसूत्रम् स्था.९ सू.६७३गा.१३ स्थानांगसूत्रम् स्था.९ सू.६७३गा. १४ ।
प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार । प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार
१२२६ १२२७ १२२८ १२२९ १२३० १२३१
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________________
LOT
W
७३
७६
२/१८
५०४
प्रवचनसारोद्धार और अन्य ग्रन्थों की गाथाएँ प्रवचनसारोद्धार
चैत्यवन्दनमहाभाष्यम् १८० प्रवचनसारोद्धार
पञ्चाशकप्रकरणम्
३/१७ प्रवचनसारोद्धार
पञ्चाशकप्रकरणम् ३/१८ प्रवचनसारोद्धार
७४ पश्चाशकप्रकरणम्
३/१९ प्रवचनसारोद्धार
७५
पञ्चाशकप्रकरणम् ३/२० प्रवचनसारोद्धार
पश्चाशकप्रकरणम्
३/२१ प्रवचनसारोद्धार
आवश्यकनियुक्ति १२०२ प्रवचनसारोद्धार
१०३ संबोधप्रकरण प्रवचनसारोद्धार १०६ संबोधप्रकरण
२/१२ प्रवचनसारोद्धार १२० संबोधप्रकरण
२/१७ प्रवचनसारोद्धार
१२४ आवश्यकनियुक्ति ११९८ प्रवचनसारोद्धार
आराधनापताका (प्रा.) प्रवचनसारोद्धार
१८३ आवश्यकनियुक्ति प्रवचनसारोद्धार
आवश्यकनियुक्ति १५३२ प्रवचनसारोद्धार
२०३ आवश्यकनियुक्ति १५९९ प्रवचनसारोद्धार
२०३ पञ्चाशकप्रकरणम् ५/८ प्रवचनसारोद्धार
२०४ आवश्यकनियुक्ति प्रवचनसारोद्धार
२०४ पञ्चाशकप्रकरणम् प्रवचनसारोद्धार २०५ आवश्यकनियुक्ति
१६०१ प्रवचनसारोद्धार
पञ्चाशकप्रकरणम् प्रवचनसारोद्धार २०६ आवश्यकनियुक्ति
१६०२ प्रवचनसारोद्धार
२०७ पञ्चाशकप्रकरणम् ५/२७ प्रवचनसारोद्धार
२०८ पश्चाशकप्रकरणम् प्रवचनसारोद्धार
२०९
पश्चाशकप्रकरणम् प्रवचनसारोद्धार
२१० पश्चाशकप्रकरणम् प्रवचनसारोद्धार
२१७ पञ्चवस्तुप्रकरणम् ३७१ प्रवचनसारोद्धार
संबोधप्रकरण
७/१२ प्रवचनसारोद्धार
आवश्यकनियुक्ति १५४६ प्रवचनसारोद्धार
२४७ चैत्यवन्दन महाभाष्य ४७८
१८
२०५
२३८
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--------------------------------------------------------------------------
________________
४८.१
२४९ २५० २५१ २५२ २५३ २५४ २५५ २५६ २५७ २५८
२५९
२६०
२६१
२६२
२६४
प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार
२६७
चैत्यवन्दन महाभाष्य ४८० चैत्यवन्दन महाभाष्य चैत्यवन्दन महाभाष्य ४८२ चैत्यत्रन्दन महाभाष्य ४८३ चैत्यवन्दन महाभाष्य ४८४ चैत्यवन्दन महाभाष्य ४८५ चैत्यवन्दन महाभाष्य ४८६ चैत्यवन्दन महाभाष्य ४८७ चैत्यवन्दन महाभाष्य ४८९ चैत्यवन्दन महाभाष्य ४९० चैत्यवन्दन महाभाष्य ४९१ चैत्यवन्दन महाभाष्य ४९२ चैत्यवन्दन महाभाष्य ४९३ चैत्यवन्दन महाभाष्य ४९४ संबोधप्रकरण
७/१४१ संबोधप्रकरण
७/१४६ आराधनापताका (वीरभद्र) ८९ आराधनापताका (प्रा.) १७६ आराधनापताका (प्रा.) १८० आराधनापताका (वीरभद्र) ९० संबोधप्रकरण
७/१४८ दशवैकालिकनियुक्ति दशवैकालिकनियुक्ति ४८ संबोधप्रकरण
६/१५० संबोधप्रकरण
६/१५१ संबोधप्रकरण संबोधप्रकरण
७/४७ संबोधप्रकरण
७/४८ संबोधप्रकरण संबोधप्रकरण
७/१९८ संबोधप्रकरण
५/१३८ आवश्यकनियुक्ति १७९
२६७
२६८ २६८ २६९ २७० २७१ २७१ २७२ २७७ २७८ २८९ २८० २८३ २८६
३१०
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________________
३११ ३१२ ३२० ३२१ ३२२ ३२३ ३२४ ३२५
३२६
३२८
م
م
م
प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार
३२९ ३७३ ३७४ ३७५ ३७६ ३८१ ३८२ ३८३ ३८४
आवश्यकनियुक्ति
१८० आवश्यकनियुक्ति १८१ आवश्यकनियुक्ति
३८५ आवश्यकनियुक्ति
३८६ आवश्यकनियुक्ति ३८७ आवश्यकनियुक्ति
३८८ आवश्यकनियुक्ति
३८९ तित्योगालीपइण्णयं तित्योगालीपइण्णयं ५६८ आवश्यकनियुक्ति २६६ आवश्यकनियुक्ति
२६७ संतिकरं संतिकरं संतिकरं संतिकरं आवश्यकनियुक्ति
३७६ आवश्यकनियुक्ति
३७७ आवश्यकनियुक्ति
२२४ आवश्यकनियुक्ति
२२५ तित्योगालीपइण्णयं आवश्यकनियुक्ति ३०३ आवश्यकनियुक्ति
३०४ आवश्यकनियुक्ति
३०५ आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति ३०९ आवश्यकनियुक्ति ३१० निशीथभाष्यम्
१३९० निशीथभाष्यम्
१३९१ तित्थोगालीपइण्णय ३६० चैतयवन्दनमहाभाष्यम् संबोधप्रकरण
१/८७ सप्ततिशतस्थानप्रकरणम् २०८
३८४
३९५
३०८
३८५ ३८६ ३८७ ३८८ ३८९ ३९० ४०३ ४०४ ४०६ ४३२ ४३२ ४४०
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४४३ ४४४ ४४५
१/३४ १/३५
४५२
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४८४
४८५ ४८६
प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार
४८६
संबोधप्रकरण संबोधप्रकरण संबोधप्रकरण संबोधप्रकरण आवश्यकनियुक्ति तित्थोगालीपइण्णयं आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति तित्थोगालीपइण्णयं आवश्यकनियुक्ति देविदत्थओ पइण्णयं तित्थोगालीपइण्णयं आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति देविदत्यओ पइण्णयं आवश्यकनियुक्ति तिथ्योगालीपइण्णयं आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति तित्थोगालीपइण्णयं । संबोधप्रकरण ओघनियुक्ति ओघनियुक्ति निशीथभाष्य निशीथभाष्य पञ्चवस्तुप्रकरणम् निशीथभाष्यम् बृहत्कल्पभाष्यम् ओघनियुक्ति ओघनियुक्ति
२८६
४८७
९७१
४८८ ४८८ ४८९
४८९ ४९१ ४९१
४९२
१२४२ ९७२ ९७३ १२४३ २/१८ ६६८ ६६९ १३९० १३९१ ७७५ १३९२ १३२८ ७०३ ७०५
४९३
४९४ ४९४ ४९७ ४९८
५०७
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प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार
ओघनियुक्ति ओघनियुक्ति ओघनियुक्ति ओघनियुक्ति ओघनियुक्ति ओघनियुक्ति ओघनियुक्ति ओघनियुक्ति ओघनियुक्ति ओघनियुक्ति ओघनियुक्ति ओघनियुक्ति ओघनियुक्ति ओघनिर्युक्तिभाष्यम् ओधनियुक्तिभाष्यम् ओघनियुक्तिभाष्यम् पञ्चवस्तुकप्रकरणम् ओघनियुक्तिभाष्यम् ओघनियुक्तिभाष्यम् ओघनियुक्तिभाष्यम् ओघनियुक्तिभाष्यम् ओघनियुक्तिभाष्यम् दशवैकालिकनियुक्ति दशवैकालिकनियुक्ति ओघनियुक्तिभाष्यम् संबोधप्रकरण संबोधप्रकरण तित्थोगालीपइण्णय दशवैकालिकनियुक्ति संबोधप्रकरण आराधनापताका (वीर) दशवैकालिकनियुक्ति
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प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार
५७४ ५७५ ५७६ ५७७ ५७८
दशवैकालिकनियुक्ति आराधनापताका (प्रा०) ओघनियुक्तिभाष्यम् संबोधप्रकरण पञ्चाशकप्रकरण पिण्डविशुद्धि पिण्डविशुद्धि संबोधप्रकरण पिण्डनियुक्ति संबोधप्रकरण पिण्डविशुद्धि पिण्डविशुद्धि संबोधप्रकरण पञ्चाशकप्रकरण पञ्चाशकप्रकरण पञ्चाशकप्रकरण पञ्चाशकप्रकरण पञ्चाशकप्रकरणम् पञ्चवस्तुप्रकरणम् पञ्चवस्तुप्रकरणम् पञ्चवस्तुप्रकरणम् पञ्चवस्तुप्रकरणम् बृहत्कल्पभाष्यम् पञ्चवस्तुप्रकरणम् पञ्चवस्तुप्रकरणम् बृहत्कल्पभाष्यम् पञ्चवस्तुप्रकरणम् बृहत्कल्पभाष्यम् पञ्चवस्तुप्रकरणम् बृहत्कल्पभाष्यम् पञ्चवस्तुप्रकरणम् बृहत्कल्पभाष्यम्
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६१२
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२/२७१ ४०९ ५२० २/२७३ १८/३ १८/४ १८/५ १८/६ १८/७ १५३८ १५३९ १५४० १५४१ १४३९ १५४७ १५४८ १४४१ १५४९ १४४२ १५५० १४४३ १५५१ १४४४ .
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१५५२ १४४५
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६४१ ६४१
१७४ प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार
पञ्चवस्तुप्रकरणम् बृहत्कल्पभाष्यम् आराधनापताका (प्रा०) संबोधप्रकरण आराधनापताका (प्रा०) आराधनापताका (प्रा०) आराधनापताका (प्रा०) आराधनापताका (प्रा०) संबोधप्रकरण संबोधप्रकरण आराधनापताका (प्रा०) पर्यन्ताराधना आराधनापताका (प्रा०) संबोधप्रकरण आराधनापताका (प्रा०) आराधनापताका (प्रा०) पश्चाशकप्रकरणम् पञ्चाशकप्रकरणम् बृहत्कल्पभाष्यम् पश्चाशकप्रकरणम् ओघनियुक्ति भाष्यम् पञ्चाशकप्रकरणम् पञ्चाशकप्रकरणम् पञ्चाशकप्रकरणम् पश्चाशकप्रकरणम् पश्चाशकप्रकरणम् पञ्चाशकप्रकरणम् बृहत्कल्पभाष्यम्
ओघनियुक्ति निशीथभाष्यम् निशीथभाष्यम् निशीथभाष्यम्
२/२३४ ७४६ ७४७ ७४८ ७४९ ३/२३८ २/२३९ ७१४ २६० ७१५ २/१६ ७१७ ७१९ १७/२६ १७/१०
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१७/१२ १७/१६ १७/३२ १७/३७ १७/३८ १७/३९ १७७५ ७३० ४००३ ४००१ ४००२
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७१० ७१९
७२८ ७३४
प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार
आराधनापताका (प्रा०) आराधनापताका (प्रा.) उत्तराध्ययननियुक्ति तित्थोगालोपइण्णयं आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति पञ्चवस्तुकप्रकरणम् बृहत्कल्पभाष्यम् ओघनियुक्ति ओघनियुक्ति पञ्चवस्तुकप्रकरणम् बृहत्कल्पभाष्यम् संबोधप्रकरण आराधनापताका (वीर) संबोधप्रकरण पिण्डनियुक्ति संबोधप्रकरण पिण्डनियुक्ति पिण्डनियुक्ति पिण्डनियुक्ति गच्छायारपइण्णयं विण्डविशुद्धि संबोधप्रकरण पञ्चाशकप्रकरण पञ्चवस्तुकप्रकरणम् संबोधपकरण आवश्यकनियुक्ति व्यवहारसूत्रभाष्यम् संबोधप्रकरण संबोधप्रकरण संबोधप्रकरण संबोधप्रकरण
७३४ ७३५ ७३६
७३७ ७३७
२/२४१ ६४७ २/२४९ ६६२ २/२७४ ६६३ ६६४ ६६५ ५९ ६६६ २/२७७ १६/२ ३०० २/२८० १४१८
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७६१ ७६१ ७६२ ७६३ ७६३ ७६४ ७६४
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७६८ ७७०
प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार
संबोधप्रकरण आवश्यकनियुक्ति उत्तराध्ययन नियुक्ति ४८२ पञ्चाशकप्रकरणम् १२/२ भगवतीसूत्रम् २५/७/८०१ उत्तराध्ययननियुक्ति ४८३ आवश्यकनियुक्ति
६६७ पञ्चाशकप्रकरण
१२/३ आवश्यकनियुक्ति
६६८ आवश्यकनियुक्ति ६८२ पञ्चाशकप्रकरण
१२/१० आवश्यकनियुक्ति ६८८ पञ्चाशकप्रकरण
१२/१४ आवश्यकनियुक्ति
६९७ पञ्चाशकप्रकरणम्
२३० बृहत्कल्पभाष्यम्
६८८ ओघनियुक्ति
१२१ व्यवहारसूत्रभाष्यम् उ.२ गा. २० उत्तराध्ययनसूत्रम्
२४/७ पञ्चवस्तुकप्रकरण ८९५ पञ्चवस्तुकप्रकरण ८९६ बृहत्कल्पभाष्यम् ४२८६ बृहत्कल्पभाष्यम्
४२८७ आवश्यकनियुक्ति
११७२ पञ्चाशकप्रकरणम् ५/८ पञ्चवस्तुकप्रकरणम् १३२८ व्यवहारसूत्रभाष्यम् उ. ३ गा.१५ पञ्चवस्तुकप्रकरणम् १३२९ व्यवहारसूत्रभाष्यम् उ. ३ गा.१६ पञ्चवस्तुकप्रकरणम्
१३३० बृहत्कल्पभाष्यम् १५०६ बृहत्कल्पभाष्यम्
१५०७
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७७१
७७३ ७७५ ७७६
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७८० ७८० ७८० ७८१ ७८१ ७८२ ७८३ ७८४
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१७७
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१५०८ ४५६ ३१६
७८६ ७८६ ७८७ ७८७
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७८८ ७८९
४५७ १८५ ४५८ ३१७ ४५९ ३५०६
७८९ ७९०
७९१ ७९१
७९३ ७९५
प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार
बृहत्कल्पभाष्यम् बृहत्कल्पभाष्यम् ओघनियुक्ति ओघनियुक्तिभाष्यम् बृहत्कल्पभाष्यम् ओघनियुक्तिभाष्यम् बृहत्कल्पभाष्यम् ओघनियुक्ति बृहत्कल्पभाष्यम् निशीथभाष्यम् पंचकल्पभाष्य निशीथभाष्यम् पंचकल्पभाष्य निशीथभाष्यम् निशीथभाष्यम् निशीथभाष्यम् बृहत्कल्पभाष्यम् बृहत्कल्पभाष्यम् बृहत्कल्पभाष्यम् निशीथभाष्यम् बृहत्कल्पभाष्यम् निशीथभाष्यम् बृहत्कल्पभाष्यम् निशीथभाष्यम् बृहत्कल्पभाष्यम् निशीथभाष्यम् बृहत्कल्पभाष्यम् निशीथभाष्यम् निशीथभाष्यम् बृहत्कल्पभाष्यम् निशीथभाष्यम् बृहत्कल्पभाष्यम्
३५०७ २०१ ३५६१ ३७०९ ३७१० ३८९० ३८९१
३८९२
११४४ ३५२५
७९७ ७९८ ७९९ ८०० ८०० ८०१ ८०१ ८०२ ८०२ ८०३ ८०३ ८०४
११४५
३५२६ ११४९ ३५३० ११४८ ३५२९ ११५८ ११५९ ३५३९ ११६० *३५४०
८०५ ८०५ ८०६ ८०६
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१७८
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारीद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
८०७
८०७
८०८
८०८
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८३८
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૮૪૪
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८५२
८५२
८५३
८५३
८५५
८५८
८५९
८६१
८६२
निशीथभाष्यम्
बृहत्कल्पभाष्यम्
निशीथभाष्यम्
बृहत्कल्पभाष्यम्
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
आवश्यकनियुक्ति
संबोधप्रकरण
आवश्यक नियुक्ति
पञ्चाशकप्रकरणम्
पञ्चाशकप्रकरणम्
पञ्चाशकप्रकरणम्
पञ्चाशकप्रकरणम्
पञ्चाशकप्रकरणम्
पञ्चाशकप्रकरणम्
पञ्चाशकप्रकरणम्
पञ्चाशकप्रकरणम्
आवश्यक नियुक्ति
आवश्यक नियुक्ति
निशीथभाष्यम्
बृहत्कल्पभाष्यम्
निशीथभाष्यम्
बृहत्कल्पभाष्यम्
निशीथभाष्यम्
बृहत्कल्पभाष्यम्
निशीथभाष्यम्
बृहत्कल्पभाष्यम्
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
संबोधप्रकरण
ओघनियुक्ति
पञ्चाशकप्रकरणम्.
११६१
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११६२
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७५४
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१२/७०
१२/७१
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३५२
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८६८ ८६९ ८७० ८७१
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प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार
८७२ ८७२ ८७३ ८७३ ८७४ ८७५ ८७५
१७९ ओधनियुक्ति
३५१ पिण्डनियुक्ति
ओघनियुक्ति पिण्डनियुक्ति
२७ पिण्डनियुक्ति
६४२ पिण्डनियुक्ति
६५० पिण्डनियुक्ति
६५१ पिण्डनियुक्ति पिण्डनियुक्ति
६५३ पञ्चवस्तुकप्रकरणम् ७०७ बृहत्कल्पभाष्यम्
५८२ पञ्चवस्तुकप्रकरणम् ७०८ बृहत्कल्पभाष्यम् ५८३ पञ्चवस्तुप्रकरणम् ७०९ बृहत्कल्पभाष्यम्
५८४ पश्चवस्तुकप्रकरणम् ७०६ पञ्चवस्तुकप्रकरणम् आराहणापडाया (प्रा.) आराहणापडाया (वीर) १५५ पञ्चवस्तुकप्रकरणम् १५७५ आराधनापताका (प्रा०) पर्यन्ताराधना आराधनापताका (प्रा०) आराधनापताका (वीर) पर्यन्ताराधना बृहत्कल्पभाष्यम्
१४९४ बृहत्कल्पभाष्यम् १४९५ पञ्चवस्तुकप्रकरणम् ९२६ स्थानांगसूत्रम् स्थान. १० सू.२७७ गा. १७५ तित्योगालीपइण्णय ८८८ स्थानांगसूत्रम् स्थान. १० सू.७७७ गा. १७६ पञ्चवस्तुकप्रकरणम् ९२७
१५७४
८७६ ८७६ ८७६ ८७७ ८७७
৩৩ ८७९ ८८० ८८५
१५७
८८५
८८५ ८८६ ८८६
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१८० प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार
८८६ ८९१ ८९१ ८९१ ८९२ ८९२ ८९३ ८९४ ८९५ ८९५ ९२५
२७ ९२७ ९२८ ९२८ ९३४ ९३५ ९४५ ९४८ ९४९
तित्थोगालीपइण्णयं ८८९ दशवैकालिकनियुक्ति २७३ प्रज्ञापनासूत्रम् पद् ११/सू. ८६२/गा. १९४ संबोधप्रकरण दशवैकालिकनियुक्ति २७४ प्रज्ञापनासूत्रम् पद् ११/सू. ८६३/गा.१९५ दशवैकालिकनियुक्ति २७५ दशवैकालिकनियुक्ति २७६ दशवैकालिकनियुक्ति २७७ प्रज्ञापनासूत्रम् पद् ११/सू. ८६६/गा.१९६ आचारांगनियुक्ति
३९ संबोधप्रकरण
४/६० पर्यन्ताराधना
१८ प्रज्ञापनासूत्रम् पद् १/सू. ११०/गा.१३१ संबोधप्रकरण
४/६१ संबोधप्रकरण
४/६८ तित्थोगालीपइण्णयं १२२० संबोधप्रकरण
४/८४ संबोधप्रकरण
४/८५ संबोधप्रकरण
४/८८ उत्तराध्ययनसूत्रम्
२८/१६ प्रज्ञापनासूत्रम् पद् १/सू. ११०/गा.११९ संबोधप्रकरण
४/८९ उत्तराध्ययनसूत्रम्
२८/१८ प्रज्ञापनासूत्रम् पद् १/सू. ११०/गा.१२१ उत्तराध्ययनसूत्रम्
२८/१९. प्रज्ञापनासूत्रम् पद् १/सू. ११०/गा.१२२ उत्तराध्ययनसूत्रम्
२८/२० उत्तराध्ययनसूत्रम्
२८/२१ उत्तराध्ययनसूत्रम्
२८/२२ उत्तराध्ययनसूत्रम्
२८/२३ उत्तराध्ययनसूत्रम्
२८/२४
९५०
९५० ९५० ९५१
९५१
।
९५२ ९५२ ९५३ ९५४
९५६ ९५७
Page #62
--------------------------------------------------------------------------
________________
९५८ ९५९ ९६० ९६३
१८१ २८/२५ २८/२६ १८/२७
४०
or m.
३५१
३५२ ७/१ ६/८८
प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार
९६५ ९६६ ९६७ ९६८. ९६९ ९७७ ९८० ९८१ ९८२ ९८४ ९८५ ९८६ ९८६ ९८७
६/८९
उत्तराध्ययनसूत्रम् उत्तराध्ययनसूत्रम् उत्तराध्ययनसूत्रम् जीवसमास जीवसमास जीवसमास जीवसमास जीवसमास बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी संबोधप्रकरण संबोधप्रकरण संबोधप्रकरण संबोधप्रकरण संबोधप्रकरण पञ्चाशकप्रकरण पञ्चाशकप्रकरण संबोधप्रकरण पञ्चाशकप्रकरण संबोधप्रकरण संबोधप्रकरण संबोधप्रकरण निशीथभाष्यम् बृहत्कल्पभाष्यम् निशीथभाष्यम् बृहत्कल्पभाष्यम् निशीथभाष्यम् बृहत्कल्पभाष्यम् दशवैकालिकनियुक्ति दशवैकालिकनियुक्ति उत्तराध्ययननियुक्ति उत्तराध्ययननियुक्ति
९८९
९९२
९९३
६/९० ६/९६ १०/१७ १०/१८ ६/९८ १०/१९ ६/१०४ ६/१०३ ६/११० ४८३३ ९७३ ४८३४ ९७४ ४८३५ ९७५ २५२ २५३ २१२
१००१ १००१ १००२ १००२
०
०
१००४ १००५ १००६ १००७
२१३
Page #63
--------------------------------------------------------------------------
________________
MMMMMMrror or or
१०२० १०२०
१८२ प्रवचनसारोद्धार
१००८ उत्तराध्ययननियुक्ति प्रवचनसारोद्धार
००९ उत्तराध्ययननियुक्ति प्रवचनसारोद्धार
१०१०
उत्तराध्ययननियुक्ति प्रवचनसारोद्धार
१०११
उत्तराध्ययननियुक्ति प्रवचनसारोद्धार
१०१२ उत्तराध्ययननियुक्ति प्रवचनसारोद्धार
१०१४ उत्तराध्ययननियुक्ति प्रवचनसारोद्धार
१०१५
उत्तराध्ययननियुक्ति प्रवचनसारोद्धार
१०१८
उत्तराध्ययननियुक्ति प्रवचनसारोद्धार
१०१८
जीवसमास प्रवचनसारोद्धार
१०१९ जीवसमास प्रवचनसारोद्धार
जीवसमास प्रवचनसारोद्धार
ज्योतिष्करण्डक प्रवचनसारोद्धार
१०२१
जीवसमास प्रवचनसारोद्धार १०२२ जीवसमास प्रवचनसारोद्धार
१०२३
जीवसमास प्रवचनसारोद्धार
१०२४
जीवसमास प्रवचनसारोद्धार १०२५ जीवसमास प्रवचनसारोद्धार
१०२५ तित्योगालीपइण्णयं प्रवचनसारोद्धार
१०२६ जीवसमास प्रवचनसारोद्धार
१०२७
जीवसमास प्रवचनसारोद्धार
१०२८
जीवसमास प्रवचनसारोद्धार
१०२९
जीवसमास प्रवचनसारोद्धार
१०३०
जीवसमास प्रवचनसारोद्धार
१०३१ जीवसमास प्रवचनसारोद्धार
१०३२
जीवसमास प्रवचनसारोद्धार
१०३४
ज्योतिष्करण्डक प्रवचनसारोद्धार
०३४ तित्थोगालीपइण्णयं प्रवचनसारोद्धार
१०३५
ज्योतिष्ठकरण्डक प्र. प्रवचनसारोद्धार १०३५ तित्थोगालीपइण्णय प्रवचनसारोद्धार
तित्थोगालीपइण्णयं प्रवचनसारोद्धार १०३७ तित्थोगालीपइण्णयं
* डॉ. पाण्डे के आलेख में इसका गाथा क्रमांक ९५ है।
२२४ ११७ ११८ ११९ ७९ १२० १२१ १२२ १२५ १२६ १२
१२३ १२४ १२७ १३० १३२ १३३
८६ ११७० २१ २२
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--------------------------------------------------------------------------
________________
१०५७ १०६२ १०६३ १०६४ १०६४ १०६५ १०६५ १०६७ १०६८
२६२
१०७०
४२
२३९
प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार
१८३ संबोधप्रकरण
२/४५ दशवैकालिकनियुक्ति २५९ दशवैकालिकनियुक्ति २६० दशवैकालिकनियुक्ति २६१ संबोधप्रकरण
२/६५ संबोधप्रकरण
२/६६ दशवैकालिकानियुक्ति तित्थोगालीपइण्णयं तित्थोगालीपइण्णयं तित्थोगालीपइण्णयं बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी
२५५ बृहत्संग्रहणी
२३३ बृहत्संग्रहणी
२३४ बृहत्संग्रहणी
२७९ बृहत्संग्रहणी
२८० बृहत्संग्रहणी
२८१ बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी आवश्यकनियुक्ति भगवतीसूत्रम्
३७/४ समवायांगसूत्रम् स्थान १५ सूत्र १/गा. ११-१२ बृहत्संग्रहणी
२८४ बृहत्संग्रहणी
२८५ बृहत्संग्रहणी
२८६ उपदेशपदम् बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी
३३४ बृहत्संग्रहणी
३१२ बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी
२८२ २८९
१०७२ १०७३ १०७५ १०७६ १०७९ १०८० १०८१ १०८२ १०८३ १०८४ १०८५ १०८६ १०९१ १०९२ १०९३ १०९४ १०९४ १०९५ १०९६ १०९७ १०९९ ११०२
४७
१७
३०७ ३११
Page #65
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________________
१८४
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार
प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार
११०३
बृहत्संग्रहणी
११०४ बृहत्संग्रहणी
१११०
बृहत्संग्रहणी
१११७ बृहत्संग्रहणी
१११८
१११९
११२०
११२४
११२५
११२८
११२७
११२९
११३०
११३०
११३१
११३३
बृहत्संग्रहणी
बृहत्संग्रहणी
बृहत्संग्रहणी
बृहत्संग्रहणी
बृहत्संग्रहणी
बृहत्संग्रहणी
बृहत्संग्रहणी
बृहत्संग्रहणी
बृहत्संग्रहणी
देविदत्थओ पइण्णयं
प्रज्ञापनासूत्रम् पद् २ / सू.
जीवसमास
११३३
देविदत्थओ पइण्णयं
११३४
जीवसमास
११३७
देविदत्यओ पइण्णयं
११३८
बृहत्संग्रहणी
११३९
बृहत्संग्रहणी
११४० बृहत्संग्रहणी
११४३ बृहत्संग्रहणी
११४६ बृहत्संग्रहणी
११४७
बृहत्संग्रहणी
११४८ बृहत्संग्रहणी
११४९ बृहत्संग्रहणी
११५०
बृहत्संग्रहणी
११५१ बृहत्संग्रहणी
११५२ बृहत्संग्रहणी
११५३
बृहत्संग्रहणी
११५४
बृहत्संग्रहणी
३१०
३०८
३४२
१७०
१६९
१७९
१७२
३३७
३३८
३४०
३४१
४२
५८
६७
१९४ / गा. १५१
१९
८१
२०
१८४
६
४
१२
१७
३५
३६
३७
५५
११७
११८
११९
१२०
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________________
१४४
११५६ ११५७ ११५८ ११६०
mo 5
१८५ बृहत्संग्रहणी
१४३ बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी
१४८ बृहत्संग्रहणी देविदत्थओ पइण्णयं १९२ बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी
२२१ बृहत्संग्रहणी
२२२ बृहत्संग्रहणी
२२३ बृहत्संग्रहणी
२२४ बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी
१५३ बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी
१८० बृहत्संग्रहणी
१५७ बृहत्संग्रहणी
१८४ बृहत्संग्रहणी
१९८ बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी
२०० बृहत्संग्रहणी
२०१ बृहत्संग्रहणी बृहत्संग्रहणी
२१४ बृहत्संग्रहणी आराधनापताका (प्रा.) ६८६ आराधनापताका (प्रा.) ६८७ समवायांगसूत्रम् परि. सू. १५८/गा. ४७ तित्थोगालीपइण्णयं ५७० समवायांगसूत्रम् परि. सू. १५८/गा. ४८
प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार
१५५
११६२ ११६३ ११६४ ११६५ ११६७ ११६८ ११६९ ११७० ११७१ ११७२ ११७३ ११७४ ११७७ ११७८ ११८० ११८१ ११८२ ११८३ ११८४ ११८५ ११८७ १२०७ १२०८ १२०९ १२०९ १२१०
१९९
२०२
०
२१५
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________________
av
४१
a
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४३
६१०
o
३०३ ३०४
३१२ ९/६७३/१ ९/६७३/२ ९/६७३/३
o
o
o
१८६ प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार
१२१० १२११ १२१२ १२१३ १२१३ १२१५ १२१६ १२१७ १२१८ १२१९ १२२० १२२० १२२१ १२२२ १२२३ १२२३ १२२४ १२२५ १२२६ १२२७ १२२८ १२२८ १२२९ १२२९ १२३० १२३१ १२३८ १२४१ १२४२
तित्थोगालीपइण्णयं आवश्यकभाष्यम् आवश्यकभाष्यम् आवश्यकभाष्यम् तित्थोगालीपइण्णयं बृहसंग्रहणी बृहसंग्रहणी बृहसंग्रहणी स्थानांगसूत्रम् स्थानांगसूत्रम् स्थानांगसूत्रम् - तित्थोगालीपइण्णयं स्थानांगसूत्रम् स्थानांगसूत्रम् स्थानांगसूत्रम् तित्थोगालीपइण्णयं स्थानांगसूत्रम् स्थानांगसूत्रम् स्थानांगसूत्रम् स्थानांगसूत्रम् स्थानांगसूत्रम् तित्थोगालीपइण्णयं स्थानांगसूत्रम् तित्थोगालीपइण्णयं स्थानांगसूत्रम् स्थानांगसूत्रम् संबोधप्रकरण कर्मग्रन्थ (प्राचीन) संबोधप्रकरण
९/६७३/४ ९/६७३/५ ९/६७३/६
o
o
o
o
९/६७३/७ ९/६७३/८ ९/६७३/९ ९/६७३/१० ९/६७३/११
११४१ ९/६७३/१२
११४२ ९/६७३/१३ ९/६७३/१४
३/३२
१/५ ३/३७
o
o
or
• स्थानांग के सन्दर्भ में प्रथम संख्या स्थान की दूसरी सूत्र की एवं तीसरी गाथा की सूचक है।
ज्ञातव्य है कि मुनि जम्बूविजयजी द्वारा सम्पादित संस्करण में गाथा क्रमांक १.१७ न होकर ११७-१३० है ।
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________________
१८७
३/३८ ३/३९ २/४२
३/११ १/७१ १/७२
६१८
प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार
१२४३ १२४४ १२४७ १२५१ १२५४ १२६२ १२६३ १२६३ १२६४ १२६४ १२६५ १२६५ १२६६ १२६७ १२६८ १२६९ १२७० १२७१ १२७२ १२७३ १२७४ १२७६ १२९८ १३०० १३०२ १३०३
१/७३ ६१९ १/७४ ६२० १/७५ १/७६ १/७७ १/७८
संबोधप्रकरण संबोधप्रकरण संबोधप्रकरण कर्मग्रन्थ (प्राचीन) पञ्चसंग्रह कर्मग्रन्थ (प्राचीन) कर्मग्रन्थ (प्राचीन) धर्मसंग्रहणी कर्मग्रन्थ (प्राचीन) धर्मसंग्रहणी कर्मग्रन्थ (प्राचीन) धर्मसंग्रहणी कर्मग्रन्थ (प्राचीन) कर्मग्रन्थ (प्राचीन) कर्मग्रन्थ (प्राचीन) कर्मग्रन्थ (प्राचीन) कर्मग्रन्थ (प्राचीन) कर्मग्रन्थ (प्राचीन) कर्मग्रन्थ (प्राचीन) कर्मग्रन्थ (प्राचीन) पञ्चसंग्रह कर्मग्रन्थ (प्राचीन) पञ्चसंग्रह कर्मग्रन्थ (प्राचीन) कर्मग्रन्थ (प्राचीन) आवश्यकनियुक्ति जीवसमास कर्मग्रन्थ (प्राचीन) जीवसमास कर्मग्रन्थ (प्राचीन) जीवसमास बृहत्संग्रहणी
१/७९
१८० १/८१ १/८२
४/७९ ३/२५ ४/१३ ४/२६ १४
४/३४
१९२
१३०५ १३११ १३१७ १३१७ १३१७
१/१३६
२५
३६३
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________________
१८८
१३१९
१३२३ १३२४ १३२५ १३२६ १३२७ १३२८ १३२९ १३३०
०
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प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार
Ovww
الله الله بره الله له سه له له له سه
به سه ×
जीवसमास श्रावकव्रतभङ्गप्रकरण श्रावकव्रतभङ्गप्रकरण श्रावकव्रतभङ्गप्रकरण श्रावकव्रतभङ्गप्रकरण श्रावकन्नतभङ्गप्रकरण श्रावकव्रतभङ्गप्रकरण श्रावकव्रतभङ्गप्रकरण श्रावकव्रतभङ्गप्रकरण श्रावकव्रतभङ्गप्रकरण श्रावकव्रतभङ्गप्रकरण श्रावकव्रतभङ्गप्रकरण श्रावकव्रतभङ्गप्रकरण श्रावकवतभङ्गप्रकरण श्रावकव्रतभङ्गप्रकरण श्रावकव्रतभङ्गप्रकरण श्रावकवतभङ्गप्रकरण श्रावकव्रतभङ्गप्रकरण श्रावकव्रतभङ्गप्रकरण श्रावकव्रतभङ्गप्रकरण श्रावकव्रतभङ्गप्रकरण श्रावकव्रतभङ्गप्रकरण श्रावकवतभङ्गप्रकरण . श्रावकव्रतभङ्गप्रकरण श्रावकवतभङ्गप्रकरण श्रावकव्रतभङ्गप्रकरण श्रावकव्रतभङ्गप्रकरण श्रावकव्रतभङ्गप्रकरण संबोधप्रकरण संबोधप्रकरण धर्मरल प्रकरणम् संबोधप्रकरणम्
२
~
२४
२५
१३४० १३४१ १३४२ १३४४ १३४५ १३४६ १३४७ १३४८ १३४९ १३५० १३५४ १३५५ १३५६ १३५६
४०
३/१९९ ३/२००
Page #70
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________________
१८९
८२
सूत्र २१९
१३५७ १३५७ १३५८ १३५८ १३८७ १३८९ १३९० १३९० १३९१ १३९१ १३९४ १३९४ १३९५ १३९६ १४३९
७३
९८
७४
१०३
१०३
१८१
प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार
धर्मरत्नप्रकरणम् संबोधप्रकरण धर्मरत्नप्रकरणम् संबोधप्रकरण तित्थोगालीपइण्णयं अङ्गुलसप्तति जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति ज्योतिष्करण्डक जीवसमास ज्योतिष्करण्डक अङ्गलसप्तति जीवसमास अङ्गुलसप्तति विशेषणवती बृहत्संग्रहणी भगवतीसूत्रम् आवश्यकनियुक्ति भगवतीसूत्रम् आवश्यकभाष्यम् आवश्यकभाष्यम् आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति
६/५/२४३
२१४ ६/५/२४३
१४४८ १४४९ १४५४ १४५५ १४५६ १३५७ १४५८ १४५९ १४६० १४६१ १४६२ १४६३ १४६४ १४६५ १४६६ १४६७
२१७ १३३१ १३३२ १३३४ १३३५ १३३७ १३३८ १३४२
३४४ १३४७ १३५० १३५१ १३५२
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________________ 1355 190 प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार प्रवचनसारोद्धार 1468 1469 1470 1471 1540 1587 1588 1589 1590 1591 1592 आवश्यकभाष्यम् 219 आवश्यकभाष्यम् 220 आवश्यकनियुक्ति आवश्यकनियुक्ति 1358 देविदत्थओ पइण्णयं 289 प्रज्ञापनासूत्रम् पद् १/सू. १०२/गा.११२ प्रज्ञापनासूत्रम् पद् १/सू. १०२/गा.११३ प्रज्ञापनासूत्रम् पद् १/सू. १०२/गा.११४ प्रज्ञापनासूत्रम् पद् १/सू. १०२/गा.११५ प्रज्ञापनासूत्रम् पद् १/सू. १०२/गा.११६ प्रज्ञापनासूत्रम् पद् १/सू. १०२/गा.११७