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नाट्यदर्पण पर अभिनवभारती का प्रभाव
काजी अञ्जुम सैफ़ी
आचार्य अभिनवगुप्त के अतुलनीय ज्ञान एवं अद्वितीय मेधा की प्रतीक अभिनवभारती स्वयं टोका होते हुए भी प्रकाण्ड पाण्डित्यपूर्ण विवेचन के कारण स्वतन्त्र नाट्यशास्त्रीय ग्रन्थ से कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। निःसन्देह रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने नाट्यदर्पण की रचना से पूर्व उसका सम्यक् आलोडन किया है। इसी कारण उसको विवेचन-पद्धति, तथ्यों, मन्तव्यों और विचारों का अत्यधिक प्रभाव नाट्यदर्पण पर परिलक्षित होता है।
यह एक आश्चर्यजनक तथ्य है कि सम्पूर्ण नाट्यदर्पण में कहीं भी अभिनवभारती का नाम प्राप्त नहीं होता है। 'नाटक' शब्द की व्युत्पत्ति के प्रसङ्ग में मात्र एक स्थल पर आचार्य अभिनव गुप्त को नामतः आलोचना प्राप्त होती है | इससे इस तथ्य की भी प्रतीति होती है कि रामचन्द्रगुणचन्द्र ने स्वग्रन्थलेखन में स्वतन्त्र ग्रन्थ-लेखन की परम्परा का निर्वाह किया है, किसी का अन्धानुकरण नहीं किया। इसलिये अनेक स्थलों पर उन्होंने तथ्यों को नवीन रूप में परिभाषित और प्रस्तुत करने का सफल प्रयास किया है। ऐसे अवसरों पर सामान्यरूपेण प्राचीन परम्परा और स्वयं से भिन्न मत रखने वाले आचार्यों के विचारों का भी उन्होंने निर्देश किया है। इसके लिये उन्होंने 'केचिद्' आदि शब्दों का प्रयोग किया है । इसी शैली में कतिपय ऐसे मन्तव्यों का भी रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने सङ्केत किया है, जो अभिनवभारतो में भी प्रस्तुत किये गये हैं। नाट्य-दर्पण में ऐसे उद्धरण निम्नलिखित हैंनाट्यदर्पण
अभिनवभारती १. अन्ये तु कार्यार्थमसह्यस्याप्यर्थस्य सहन .... ."तेन दुष्टोऽप्यर्थोऽपमानेन बहुमतीकृतः । तदछादनमामनन्ति । विवृत्ति पृ० ८४ पमानकलङ्कापवारणाच्छादनमिति । ना० शा०
भाग-३ पृ० ५५-५६ । २. अपरे तु क्रोधादेः प्राप्तस्य शमनं द्युतिमाम- सामर्थ्यात्प्रशमनोयस्य क्रोधादेरर्थस्य प्राप्तस्यापि नन्ति । पूर्वोक्त पृ० १०९
यत्प्रशमनं सा द्युतिः । पूर्वोक्त पृ० ५८। ३. केचिदस्य द्वादशनेतृकत्वमाम्नासिषुः । पूर्वोक्त यथा समवकार इति द्वादशेत्यर्थः। पूर्वोक्त भाग-२ पृ० १०९
पृ० ४४४ । ४. केचित् पुनरल्पाक्षरं गायत्र्यादिकमर्धसम-विष- उष्णिक् सप्तभिः गायत्री षड्भिः बन्धकुटिलानि मादिकं चात्र पद्यं मन्यन्ते । पूर्वोक्त पृ० १११ विषमाधसमानि तान्यत्र समवकारे सम्यग्योज्या
नीति । पूर्वोक्त पृ० ४४१ ।
१. विवृति ना द० प. ० २५ ।
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नाट्यदर्पण पर अभिनवभारती का प्रभाव
११९ आचार्य रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने नाट्यदर्पण में अन्य आचार्यों के मतों को विपूल सङ्ख्या में प्रदर्शित किया है। अभिनवभारतो में भी इसी रूप में विविध विचारधाराओं का उल्लेख प्राप्त होता है। नाट्यदर्पण में प्रदर्शित अनेक मत ऐसे हैं जो अभिनवभारती में भी प्राप्त होते हैं। वस्तुतः रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने अपने ग्रन्थ में प्रदर्शित विभिन्न मत-मतान्तरों का पर्याप्त अंश अभिनवभारती से प्राप्त किया है। इनमें से कुछ मत अभिनवभारती के पाठ-भेद के रूप में भी प्राप्त होते हैं। नाट्यदर्पण में उल्लिखित ऐसे मतों का जो अभिनवभारती में भी निर्दिष्ट हैं-हम यहाँ उल्लेख कर
नाट्यदर्पण
अभिनवभारती १. केचित् तु मुखादयः सन्धयोऽवस्थाश्च यत्र अत्र केचिमून् सर्वान् सन्धीनवस्थापञ्चकनिर्वहणे
पृथक्-पृथक् सङ्कपतः पुनरुल्लिङ्ग्यन्ते, तं पृथग्वृत्त्या योज्यमानानिच्छन्ति । ना० शा०
निर्वहणसन्धिमाहुः । विवृत्ति पृ० ५१ भाग-३ पृ० २९ । २. अन्ये तु विपदां शमनं करणमाहुः । पूर्वोक्त अन्ये तु विपदां शमनं करणमाहुः। पूर्वोक्त पृ० पृ० ५६
४१ । ३. अन्ये तु वर्णानां ब्राह्मणादीनां यथासम्भवं यत्तु ब्राह्मणादिवर्णचतुष्टयमेलनमिति तदफलत्वा____ द्वयोस्त्रयाणां चतुर्णां वैकत्र मीलनं वर्णसंहार- दनादृत्यमेव । पूर्वोक्त पृ० ४७ ।
माचक्षते । पूर्वोक्त पृ० ६५ ४. अन्ये तु 'चित्रार्थ रूपकं वचः' इति पठन्ति । अन्ये तु चित्रार्थमेव वचो रूपकमिति मन्यन्ते । पूर्वोक्त पृ० ७४
पूर्वोक्त पृ० ४८। ५. अन्ये त्वस्य स्थाने युक्ति पठन्ति । पूर्वोक्त पृ. ९० युक्तिरित्यन्ये इदमङ्गं व्यवहरन्ति । पूर्वोक्त पृ० ५६ ६. केचिदन्यतमाङ्गानङ्गीकारेण द्वादशाङ्गमेवैतं केचिदत्रान्यतममङ्गं नाधीयते, द्वादशाङ्गमेवैतत्स
सन्धिमिच्छन्ति, एवं गर्भसन्धिमपीति । पूर्वोक्त धिमाहः । पूर्वोक्त पृ० ५६ ।
पृ० ९१ ७. अन्ये तु-'स्वभाव शुद्ध-पाखण्ड्यादेश्वरितं अन्ये त्वाहुः येषां स्वभावत एव चरितं शिष्टमध्ये
प्रहस्यते, तत् सङ्कीर्णचरितविषयत्वात् सङ्की- सभ्येतरतमत्वेन प्रहसानहंतदविशुद्धत्वात् सङ्कीर्णम्,
र्णम्' इत्याहुः । पूर्वोक्त पृ० ११३ तद्योगाच्च रूपकम् । पूर्वोक्त भाग-२ पृ० ४४८ । ८. सङ्कीर्णमनेकाक़ केचिदनुस्मरन्ति । पूर्वोक्त प्रहसनस्याङ्कनियमानभिधानात् . शुद्धमेकाङ्क पृ० ११३
सङ्कीर्णं त्वनेकाझं वेश्यादिचरितसङ्ख्याबलादिति
केचित् । पूर्वोक्त पृ० ४४९ । । रामचन्द्र-गुणचन्द्र की शैली की एक प्रमुख विशेषता यह भी है कि उन्होंने विषयों को परिभाषित कर उनके स्पष्टीकरण के लिये एक अथवा अधिक उदाहरण तत्सम्बद्ध विविध ग्रन्थों से प्रस्तुत किये हैं। निश्चितरूपेण शुष्क शास्त्रीय नियमों के व्यावहारिक प्रदर्शन से विषय-बोधन में पर्याप्त सहायता प्राप्त होती है। यहाँ भी उन्होंने अभिनवभारती की सामग्री का लाभ उठाया है, क्योंकि आचार्य अभिनवगुप्त द्वारा प्रदर्शित उदाहरणों को उन्होंने तत्-तत् प्रसङ्गों में अनेकशः स्वीकार कर नाट्यदर्पण में अनेक स्थलों पर प्रदर्शित किया है। अभिनवभारती पर आधारित नाट्यदर्पण के निम्न उदाहरणों को प्रस्तुत किया जा सकता है
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१२०
विषय
१. नाटक में दिव्य पात्र
२. वृत्तबन्ध शिक्षा
३. पताकास्थानक
४. फलागम
५. दैवायत्त फल में पुरुष व्यापार की
गौणता से सम्बद्ध शङ्का । ६. मुखसन्धि ७. प्रतिमुखसन्धि ८. निर्वहण सन्धि
९. परिकर सन्ध्यङ्ग १०. परिन्यास
११. समाहिति
१२. उद्भेद
१३. करण १४. विलोभन
१५. भेद
१६. प्रापण १७. विलास
१८. वर्ण संहृति १९. नर्म
२०. नर्मद्युति
२१. सङ्ग्रह
२२. उदाहृति
२३. क्रम
२४. शङ्का २५. आक्षेप
२६. अधिबल
२७. द्रव
२८. छादन
२९. शक्ति
३०. व्यवसाय ३१. सन्धि
३२. आनन्द
३३. विनय रहित वेश्या नायिका से
युक्त प्रकरण
काजी अज्जुम सैफी
नाट्यदर्पण अभिनवभारती
पृ० २५
३०
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ना० शा ० भाग-२ पृ० ४४१
पृ० ४२९
भाग - ३ पृ० २० २१
पृ० ८
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भाग-३ पृ० ५६
पृ० ५३
५४
भाग-३ पृ० ५७
पृ० ५८
भाग-२ पृ० ४३३
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نے اس
Norm
" ४५४
नाट्यदर्पण पर अभिनवभारती का प्रभाव
१२१ विषय
नाट्यदर्पण अभिनवभारती ३४. वीथी
पृ० ११७ ना० शा० पृ० ४५९ ३५. व्याहार ३६. त्रिगत
" ४५८ ३७. असत्प्रलाप ३८. वाक्केली
, ४५६ ३९. नालिका
, ४५५ ४०. उद्घात्यक ४१. अवस्पन्दित
,, ४५५ ४२. आमुख
भाग-३ पृ० ९३ ४३. आरभटी वृत्ति में विचित्र नेपथ्य एवं माया-शिर-दर्शन।
, १४० पृ० १०४ ४४. आरभटी वृत्ति में विचित्र भाव कार्यान्तर ।
॥१४१
, १०४ ४५. आक्षेपिकी ध्रुवा
,, १७३ , भाग-४ पृ० ३६० उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि अभिनवभारती में प्रदर्शित उदाहरणों की विपुल सङ्ख्या का नाट्यदर्पण में उदारतापूर्वक प्रयोग किया गया है। अतः इस दृष्टि से भी रामचन्द्र गुणचन्द्र अभिनवगुप्त के ऋणी हैं।
___ तथ्यों के तार्किक विवेचन की दृष्टि से नाट्यदर्पण में यत्र-तत्र विविध शब्दों की व्युत्पत्तिपरक व्याख्या प्रस्तुत की गयी है। इस क्षेत्र में भी उस पर अभिनवभारती का स्पष्ट भाव परिलक्षित होता है। नाट्यदर्पण में अनेक ऐसी निरुक्तियाँ हैं, जिनका अभिनवभारती से पूर्ण साम्य है। दोनों ग्रन्थों में समान रूप में निर्दिष्ट ऐसे स्थल निम्नलिखित हैंनाट्यदर्पण
अभिनवभारती १. नाटकमिति नाटयति विचित्रं रञ्जनाप्रवेशेन "तथा हृदयानुप्रवेशरञ्जनोल्लासनया हृदयं
सभ्यानां हृदयं नर्तयतीति नाटकम् । विवृत्ति शरीरं चोपायव्युत्पत्तिपरिघट्टितया चेष्टया नर्तयति पृ० २५
""नाटकमिति । ना० शा० भाग-२ पृ० ४१३ २. स प्रसिद्धि प्राशस्त्य हेतुत्वात् पताकेव 'प्रसिद्धिप्राशस्त्ये सम्पादयति । पताकावदुपयोपताका । पूर्वोक्त पृ० ३९
गित्वादियं पताकेति चिरन्तनाः । पूर्वोक्त भाग-३
पृ० १५ ३. अर्थः कर्म-करणव्युत्पत्त्या प्रयोजनमुपायश्च । ""अर्थः प्रयोजनमुपायश्च, कर्म-करणव्युत्पत्त्या । पूर्वोक्त पृ० ३९
पूर्वोक्त पृ० १८-१९ ४. "प्रकर्षेण स्वार्थानपेक्षया करोतीति प्रकरी। प्रकर्षण स्वार्थानपेक्षया करोतीति । ना० शा० विवृत्ति पृ० ४१ ।
भाग-३ पृ० १५। ५. स मुखस्याभिमुख्येन वर्तत इति प्रतिमुखम् । प्रतिमुखं प्रतिराभिमुख्येन यतोऽत्र वृत्तिः । पूर्वोक्त पूर्वोक्त पृ० ४८।
पृ० २५ ।
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१२२
काजी अञ्जुम सैफी नाट्यदर्पण
अभिनवभारती ६. नर्मणो द्योतनं नर्मद्युतिः। पूर्वोक्त नर्म च सुतरां द्योतितं भवतीति नर्मद्युतिः। पृ० ६७
पूर्वोक्त पृ० ४४। ७. स उत्कर्षहरणादुदाहृतिः । पूर्वोक्त उत्कर्षमाहरतीत्युदाहरणम् । पूर्वोक्त पृ० ४८ ।
पृ०७५ ८. बुद्धिस्तत्र क्रमते, न प्रतिहन्यत इत्यर्थः। बुद्धिर्हि तत्र क्रमते न प्रतिहन्यते । पूर्वोक्त पृ० ४९
पूर्वोक्त पृ० ७६ ९. सा द्रवति' श्लथीभवति हृदयमनयेति विद्रवति विलीयते हृदयं येनेति । पूर्वोक्त पृ० ५२ ।
द्रवः । पूर्वोक्त पृ० ७७ १०. तोटयति भिनत्ति हृदयमिति तोटकम् । भिन्नत्ति यतो हृदयं ततस्तोटकम् । पूर्वोक्त पृ० ५१
पूर्वोक्त पृ० ८१ ११. मार्गाच्चलनम् (द्रवः) पृ० ८२ ।। ""द्रवणं चलनं मार्गादिति द्रवः । पूर्वोक्त पृ० ३३ १२. प्रकर्षण रोच्यते"इति प्ररोचना। प्रकर्षेण रोचत इति प्ररोचना । पूर्वोक्त पृ० ५६
पृ० ९० १३. आनन्दहेतुत्वादानन्दः । पृ० ९६ । तदानन्त(नन्द)हेतुत्वादानन्दः । पूर्वोक्त पृ० ५८ १४. डिमो डिम्बो विप्लव इत्यर्थः, तद्योगादयं डिमो डिम्बो विद्रव इति पर्यायाः, तद्योगादयं डिमः । पृ० ११४
डिमः । पूर्वोक्त भाग-२ पृ० ४४३ १५. उत्क्रमणोन्मुखा सृष्टिर्जीवितं यासां ता उत्क्रमणीया सृष्टिर्जीवितं प्राणा यासां ता उत्सृ
उत्सृष्टिकाः शोचन्त्यः स्त्रियस्ताभिरङि- ष्टिकाः शोचन्त्यः स्त्रियस्ताभिरङ्कित इति तत्वादुत्सृष्टिकाङ्कः। पृ० ११५
तथोक्तः । पूर्वोक्त पृ० ४४६ १६. ईहा चेष्टा मृगस्येव स्त्रीमात्रार्थात्रेतीहा- ईहा चेष्टा मृगस्येव स्त्रीमात्रार्था यत्र स ईहामृगः । मृगः । पृ० ११६
पूर्वोक्त पृ० ४४२ १७. विविधोऽर्थ आह्रियतेऽनयेति व्याहारः। व्याहारः विविधोऽर्थोऽभिनीयते येन। पूर्वोक्त पृ० ११७
पृ०४५८ १८. तदधिकबलसम्बन्धादधिबलम् । पृ० ११९ अधिबलसम्बन्धादधिबलम् । पूर्वोक्त पृ० ४५७ १९. वचनं तद् दृष्टार्थगर्भवाद् दृष्टशोणित- तद्वचनं दृष्टार्थगर्भत्वात्गण्ड इव गण्डः । पूर्वोक्त ___ गर्भगण्ड इव गण्डः । पृ० १२१
पृ० ४५८ २०. त्रिगतमनेकार्थगतम् । पृ० १२४ अनेकमर्थं गतमिति त्रिगतम् । पूर्वोक्त पृ० ४५८ २१. नाली व्याजरूपा प्रणालिका । पृ० १२९ नालिका प्रणालिका न्याजेत्यर्थः । पूर्वोक्त पृ०४५५ २२. मृदा परपक्षमर्दनेन स्वपक्षमवति रक्षतीति मृदवमिति मर्दनं मृत्परपक्षमर्दनेन स्वपक्षभवति मृदवम् । पृ० १२९
रक्षतीति । पूर्वोक्त पृ० ४५७ २३. उद्घाते प्रश्नात्मके साधूद्घात्यम् । प्रश्नात्मके उद्घाते साध्विति यत् । ना० शा० पृ० १३१
भाग-२, पृ० ४५४ २४. अन्य कार्यावलगनादवलगितम् । पृ० १३२ अन्यकार्यावलगनादवलगितम् । पूर्वोक्त पृ० ४५४ २५. अवस्पन्दितं चक्षुःस्पन्दनादिवदन्तर्गत- अवस्पन्दितं चक्षुःस्पन्दनादिवदन्तर्गतसूचनीयसम्भसूचनीयसम्भवात् । पृ० १३३
वात् । पूर्वोक्त पृ० ४५५
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नाट्यदर्पण पर अभिनवभारती का प्रभाव
नाट्यदर्पण
अभिनवभारती
२६. 'आङ्मर्यादायाम्' तेन मुखसन्धि सम्प्राप्य मुखसन्धेनिवर्तते यतः आङ्मर्यादायाम् । ना० शा० निवर्तते । पृ० १३६
भाग - ३ पृ० ९३
२७. प्रसादप्रयोजना प्रासादिकी । पृ० १७३
प्रसादयोजनः । प्रासादिकीं विधात् । पुर्वोक्त भाग - ४ पृ० ३६
दूषयतीति विदूषकः दूषयन्ति विस्मारयन्ति । पूर्वोक्त भाग - ३ पृ० २५१-२५२
२८. विशेषेण दूषयन्ति विनाशयन्ति विस्मारयन्तीति विदूषकाः । पृ० १७८
रामचन्द्र - गुणचन्द्र ने 'नाट्यदर्पण' में 'वेणीसंहार' की आलोचना करते हुए भानुमती के साथ दुर्योधन के रत्यभिलाष रूप विलास को तत्कालीन परिवेश में असङ्गत होने के कारण अनुचित कहा है । इसी रूप में 'वेणीसंहार' की यह आलोचना आचार्य अभिनवगुप्त द्वारा भी की गयी है । रामचन्द्र - गुणचन्द्र के अनुसार 'पुष्पदूषितक' में अशोकदत्त के कथन से नन्दयन्ती के चरित्र के सम्बन्ध में प्रदर्शित व्यलीक सम्भावना निर्वहण सन्धि पर्यन्त उपयोगी होने के कारण दोषपूर्ण नहीं है । निर्वासन के पश्चात् उस जैसी उत्तम प्रकृति की नायिका का अधम प्रकृति वाले शबर सेनापति के घर में निवास अवश्य ही दोषपूर्ण एवं अनुचित है । इन्हीं तथ्यों के आधार पर 'अभिनवभारती' में भी 'पुष्पदूषितक' की आलोचना एवं समर्थन किया गया है । ४
नाट्यदर्पण की विवृत्ति पर भी अभिनवभारती का अत्यधिक प्रभाव है । रामचन्द्र- गुणचन्द्र ने स्वरचित विवृत्ति में विपुल मात्रा में अभिनव भारतीय के अंशों का समाहार किया है । कहीं उसके भावों, कहीं शब्दों, कहीं वाक्यों और कहीं-कहीं तो सम्पूर्ण अनुच्छेद को ही यथावत् अथवा यत्किञ्चित् परिवर्तन सहित नाट्यदर्पण में ग्रहण कर लिया गया है । नाट्यदर्पण के अभिनवभारती से प्रभावित अंशों को हम यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं
नाट्यदर्पण
९. यद्यपि समवकारे शृङ्गारत्वमस्ति, तथापि न तत्र कैशिकी । न खलु काममात्रं शृङ्गारः, किन्तु विलासोत्कर्ष:, न चासौ
अभिनवभारती
नन्वेवं शृङ्गारयोगे काव्ये कैशिकीहीनता । ''न कामसद्भावमात्रादेव कैशिकी सम्भवः, रौद्र प्रकृतीनां तद्भावात् । विलासप्रधानं यद्रूपं सा कैशिकी | ना० शा ० भाग - २, पृ० ४४०-४४१.
प्रकृतीनां तृणाम् । पृ० २४
२. इह ख्यातत्वं त्रिधा नाम्ना चेष्टितेन देशेन इह त्रिविधया प्रसिद्धया प्रसिद्धत्वं भवति, अमुक एवंकारी अमुदेश इति । पूर्वोक्त पृ० ४११ नायिका तु दिव्याप्यविरोधिनी यथोवंशीनायकचरितेनैव तद्वृत्तस्याक्षेपात् । पूर्वोक्त पृ० ४१२
१२३
च । पृ० २४
३. नायिका तु दिव्याऽपि भवति यथोर्वशी, प्रधाने मर्त्यचरिते तच्चरितान्तर्भावात् । पृ० २५
१. ना० द० पू० ६२ ।
२. अभि० भा० ( ना० शा ० भाग - ३) पृ० ४२ । ३. विवृत्ति ना० द० पृ० १०३ ।
४. अभि० भा० ( ना० शा ० भाग - २) पृ० ४३२ ।
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१२४
काजी अम
नाट्यदर्पण
अभिनवभारती
४. अत्यन्तभक्तानामेवं नाम देवताः प्रसीदन्तीति देवताऽऽराधनपुरः सरमुपायानुष्ठा नमामिति । पृ० २५ ५. इह तावत् न निसर्गतः किञ्चित् चरितं मुख्यमङ्गं वा, किन्तु बहुष्वपि फलेषु
निरन्तर भक्ति भावितानामेवन्नामदेवताः प्रसीदन्ति, तस्माद् देवताराधनपुरस्सरमुपायानुष्ठानं कार्यमिति । पूर्वोक्त पृ० ४१२
...न निसर्गतः किञ्चिदाधिकारिकम् । पूर्वोक्त भाग - ३ पृ० २; जगत्कण्टकरावणोद्धरणं शरणाकविर्यस्यात्यन्तमुत्कर्षमभिप्रेति तत्फल- गतविभीषणरक्षणमित्याद्यपि हि प्रधानफले सीताप्रत्यानयनलक्षणे विवक्षिते न शक्तयन्तरव्यापारसाध्यम्'' । पूर्वोक्त पृ० ३; कविर्यत्फलमुत्कर्षेण विवक्षिते तत्प्रधानफलम् । पूर्वोक्त पृ० ४
मिष्टम् | रामप्रबन्धेषु हि सुग्रीवमैत्री - शरणागत विभीषणरक्षण सीताप्रत्यानयनादिषु सीताप्रत्यानयनस्यैव प्राधान्यं कविना प्रतिपादितम् । पृ० २७ ६. प्रयत्नान्तरे हि तदपि मुख्यं स्यात् तापसवत्सराजे हि वत्सराजस्य मुख्याय कौशाम्बीराज्यलाभाय प्रवृत्तेनैव यौगन्धरायण - व्यापारेण प्रासङ्गिकं वासवदत्तासङ्गमपद्मावती प्राप्त्यादिकर्मापि साध्यते । पृ० २७ ७. उपायस्वरूपापरिज्ञाने तद्विषयाणामा रम्भादीनाम् नैषामौदेशिको निबन्धक्रमः फलस्य मुख्यसाध्यस्य हेतव उपायाः । इह हेतुर्द्विधा अचेतनः ... चेतनोऽपि द्विधा मुख्य उपकरणभूतश्च । उपकरणभूतो द्विधा स्वार्थसिद्धियुतः परार्थसिद्धिपरः । परार्थसिद्धिपरश्च पूर्वः पताका, अन्यः प्रकरीति । पृ० ३७
८. गोपुच्छस्य च केशाः केचित्स्तोकमात्रया यिनः केचिन्मध्यावधयः केचिदंतव्यापिनः एवं प्रबन्धवस्तून्यपि । यथा रत्नावल्यां प्रमोदोत्सवो मुखसन्धावेव निष्ठितः, मुखोपक्षिप्त बाभ्रव्यादिवृत्तान्तश्च निर्वहणारम्भे रत्नावली प्राप्त्यादयश्च साररूपाः पदार्था अन्त इति । पृ० ३०
९. इत्यादि नायक प्रतिनायकामात्याद्याश्रयेण विचित्ररूपो बीजोपन्यास | पृ० ३९
शक्त्यन्तरेऽपि पृथक् व्यापार्यमाणे तस्याप्याधिकारिकत्वमेव स्यात् । तापसवत्सराजे राज्यप्रत्यापत्तेः प्रधानफलत्वे वासवदत्तासङ्गमपद्मावती प्राप्त्यादी क्रियान्तरानुपयोग एव मन्तव्यः । पूर्वोक्त पृ० ३
तदनभिधाने उपायादिस्वरूपापरिज्ञानात् प्रारम्भाद्यवस्थानाम् यत्रार्थः फलं तस्य प्रकृतय उपाया फलहेतवः इत्यर्थः । तत्र जडचेतनतया द्विधा - करणम्.... । चेतनोऽपि द्विधा मुख्य उपकरणभूतश्च अन्त्योऽपि द्विधा स्वार्थसिद्धिसहिततया परार्थसिद्धया युक्तः शुद्धयापि च तत्राद्यो बिन्दुः द्वितीयः पताका तृतीयः प्रकरी | तासामौद्देशिकोक्तिवदुपनिबन्धक्रमनियम इत्यर्थः । पूर्वोक्त पृ० १२
अन्ये तु यदा गोपुच्छे केचिद्वाला : ह्रस्वाः केचिद्दीर्घाः । तद् यथारत्नावल्यां -प्रमोदोत्सवो मुखसन्धावेव निष्ठित इत्यादि यावत् बाभ्रव्यवृत्तान्तो मुखोपक्षिप्तो निर्वहणनिष्ठां प्राप्तः । साररूपाश्च पदार्थाः पर्यन्ते कर्तव्याः । पूर्वोक्त भाग-२ पृ० ४२८-४२९
तत्रापि कचिन्नायकोद्देशेन कचित्प्रतिनायका श्रयेणेत्यादिभेदेर्बहुधा भिद्यते । पूर्वोक्त भाग - ३ पृ० १३
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नाट्यदर्पण पर अभिनवभारती का प्रभाव
१२५ १०. .. परस्य प्रधानस्य प्रयोजनं सम्पादयति "परस्य प्रयोजनसंपत्तये भवदपि स्वप्रयोजनं
.."। सुग्रीव विभीषणादिहि रामादिनोप. सम्पादयति । एवं सुग्रीवविभीषणप्रभृतिरपि क्रियमाणो रामादेरात्मनश्चोपकाराय भवन् रामादिनोपक्रियमाणे रामादेरात्मनश्चोपकाराय रामादेः प्रसिद्धि प्राशस्त्यं च सम्पादयति । प्रभवमाने प्रसिद्धिप्रशस्त्यै सम्पादयतीति ।" पृ० ३९
पताकावदुपयोगित्वादियं पताकेति चिरन्तनाः ।
पूर्वोक्त पृ० १५ ११. तावत्येव पताकानायकस्य स्वफलसिद्धि- तावत्येव पताकानायकस्य स्वफलसिद्धिरूप
निबध्यते । निर्वहणसन्धावपि तत्फले निबन्धनीया, सिद्धफलस्त्वसौ प्रधानफल एव निबध्यमाने तुल्यकालयोरुपकार्योपकारक- व्याप्रियमाण आसीनोऽपि भूतपूर्वगत्या पताकात्वाभावात् न तेन प्रधानस्योपकारः शब्दवाच्यो न मुख्यत्वेन । निर्वहणपर्यन्ते तत्फले स्यात् । सिद्धफलस्त्वसौ प्रधानफल एव क्रियमाणे तुल्यकालयोरुपकारकत्वाभावात् तेन व्याप्रियमाणो भूतपूर्वगत्या पताकाशब्द- प्रधानोपकारो न भवेत् । पूर्वोक्त पृ० १८
वाच्य इति । पृ० ३९ १२. अन्यस्मिन्नुपाये चिन्तिते सहसोपायान्तर अस्मिन्नपाये चिन्तिते सहसोपायान्तरप्राप्ति यथा
प्राप्तिर्यथा नागानन्दे जीमूतवाहनस्य नागानन्दे जीमूतवाहनस्य शङ्खचडाप्राप्तवध्यपटस्य शङ्खचूडादप्राप्तवध्यपटस्य कञ्चुकिना कञ्चुकिना वासोयुगलार्पणम् । पूर्वोक्त पृ० २०
वासोयुगलार्पणम् । पृ० ४० १३. यथा रामाभ्युदये द्वितीयेऽके सीतां प्रति यथा रामाभ्युदये तृतीयेऽङ्के सीतां प्रति सुग्रीवस्य
सुग्रीवस्य संदेशोक्तिः–'बहुनाऽत्र किमुक्तेन' संदेशोक्तिः-- 'बहुनात्र किमुक्तेन ॥' अत्रान्य .अत्र पारेऽपि जलधेरित्यतिशयोक्तिरपि प्रयोजने नातिशक्त्याशयेन प्रयुक्तेऽपि वचसि पारेसीतां प्रति तथैव वृत्तत्वात् प्रकृतसम्बद्धा। पीत्यादिप्रकृतोपयोगातिशयात् पताकास्थानकम् । अत्र चातिशयोक्तिमात्राच्चिन्तितात् प्रयो- पूर्वोक्त पृ० २० जनादपरं तथैव सोताहरणं प्रयोजनं
सम्पन्नमिति सामान्यलक्षणम् । पृ० ४० १४. उपायानुष्ठानस्यावश्यकर्तव्यादिना व्यव- प्रयुज्यते फलं यैरुपायानुष्ठानैः तेषामितिवृत्तव
धाने सति नायक-प्रतिनायकामात्यदीनां शादवश्यकर्तव्यतादिभिर्विच्छेदेऽपि . सति यदनुयदनुसन्धानं ज्ञानमसौ ज्ञानविचारणफल- सन्धानात्मकं प्रधाननायकग्रतं - - सन्धिद्रव्यज्ञानं लाभोपायत्वाद् बिन्दुः। सर्वव्यापित्वाद् बिन्दु, ज्ञानविचारणं फललाभोपायत्वात् । पूर्वोक्त वा जले तैलबिन्दुरेव बिन्दुः । "केवलं पृ० १३;"तैलबिन्दुवत् सर्वव्यापकत्वादपि बिन्दुः । बोज मुखसन्धेरेव प्रभृति निबध्यते, बिन्दुस्तु बीजं च मुखसन्धेरेव प्रवात्मानमुन्नेषयति तदनन्तरमिति । पृ० ४१
बिन्दुस्तदनन्तरमिति विशेषोऽनयोः । पूर्वोक्त
पृ० १४ १५. प्रधाननायक-पताकानायक - प्रकरीनायकैः प्राज्ञैःप्रधाननायकपताकानायकप्रकरीनायकैश्चेतन
साध्ये प्रधानफलत्वेनाभिप्रेते बीजस्य रूपैः सम्पूर्णतादायी पूर्वपरिगृहीतस्य प्रधानस्य प्रारम्भावस्थोत्क्षिप्तस्य प्रधानोपायस्य बीजाख्योपायस्य फलम् आरभत इत्यारम्भ शब्दसहकारी सम्पूर्णतादायी सैन्य-कोश-दुर्ग- वाच्यो द्रव्य क्रियागुणप्रभृतिः सर्वोऽर्थः सहकारी
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काजी अञ्जुम सैफ़ी सामाद्यपायलक्षणो द्रव्य-गुण-क्रिया-प्रभृतिः कार्यमित्युच्यते, चेतनैः कार्यते फलमिति सर्वोऽर्थश्चेतनेः कार्यते फलमिति कार्यम् । व्युत्पत्त्या "तेन जनपदकोश दुर्गादिक व्यापार पृ० ४२
वैचित्र्यंसामाधुपायवर्ग इत्येतत्सर्वं कार्यऽन्तर्भवति ।
पूर्वोक्त पृ० १६. १६. "" बाहुल्यं प्राधान्यं वा निबन्धनीयम् ।। "प्रधानत्वेन बाहुल्येन निबन्धनीयम् । पूर्वोक्त पृ० ४२
पृ० १६. १७. पञ्चानामवश्यम्भावमाह । ""उद्देशोक्त- उद्देशक्रमेणैव प्रयोक्तृभिः कविभिः निबन्धनीय
क्रमेणैव निबध्यन्ते । "प्रेक्षापूर्वकारिणां तया ज्ञातव्याः। .."चावश्यंभाविक्रमत्वमासाहि प्रथमारम्भस्ततः प्रयत्नस्ततः सम्भा- मुच्यते । न हि प्रेक्षापूर्वकारिणोऽवस्थान्तरासम्भावना ततो निश्चयस्ततः फलप्राप्तिरित्यय- वनायां प्रारम्भ उचितो भवति, तत् प्रारम्भश्चेमेव क्रम इति । पृ० ४४
दुत्तरोत्तरावस्थाप्रसर एव । पूर्वोक्त पृ० ६. १८. तदर्थमौत्सुक्यमुपायविषयमनेनोपायेनैतत् "यदौत्सुक्यमानं तद्विषयस्मरणोत्व ण्ठानुरूपं,
सिध्यतीति स्मरणोत्कण्ठाऽदिकर्म तदनु- अनेनोपायेनैतत् सिद्धयतीति,प्रारम्भः । पूर्वोक्त
गुणो व्यापारश्चोभयमारम्भः । पृ० ४४ पृ० ६. १९. मात्रशब्देन फलान्तरयोगः प्रतिबन्धनिश्च- तस्यकार्यान्तरयोगः प्रतिबन्धकवारणं च मात्रपदेयश्च व्यवच्छिद्यते । पृ० ४५
नावधारितम् । पूर्वोक्त पृ० ७. २०. .."निश्चयो नियता फलव्यभिचारिण्याप्तिः। 'नियतां नियन्त्रितां फलव्यभिचारिणी पश्यति पृ० ४६
तदा नियतफलप्राप्तिर्नामावस्था । पूर्वोक्त पृ० ७. २१. इह च तावत् पुरुषकारमात्राभिनिवेशिनां पुरुषकारमात्राभिमानिनां देवमवजानानां चार्वा
देवमपाकुर्वतां नास्तिकानां देवबहुमान- कादितमेमयुषां, स दैवबहुमान व्युत्पत्तये हि पुरुषव्युत्पत्तये पुरुषकारोऽप्यफलस्तदभावोऽपि कारोऽप्यफल:, तदभावोऽपि सफलः प्रदर्शनीयः।
सफल इति दर्शनीयम् । पृ० ४७ पूर्वोक्त पृ० ८. २२. अपरथा परतः प्राप्तमपि फलं नाङ्गी- अपरथा परतः प्राप्तमपि फलं नाङ्गीकुर्यात् । कुर्यादिति । पृ० ४७
पूर्वोक्त पृ०९. २३. महावाक्यार्थस्यांशा भागाः परस्परं महावाक्यार्थरूपस्य तेनार्थावयवा सन्धीयमानाः स्वरूपेण चाङ्गैः सन्धीयन्त इति सन्धयः। परस्परमङ्गश्च सन्धय इति । पूर्वोक्त पृ० २३.
पृ० ४८ २४. प्रारम्भावस्थाभावित्वात् प्रधानवृत्तस्य प्रागारम्भभावित्वान्मुखमिवमुखम् । प्रारम्भो
भागो मुखमिव मुखम् ।"प्रारम्भोपयोगी पयोगी यावानर्थराशिः प्रसक्तानुप्रसक्त्या विचित्रायावानर्थराशिः प्रसक्तानुप्रसक्त्या विचित्र- स्वाद आपतितः तावान् मुखसन्धिः। पूर्वोक्त रससन्निवेशस्तावान् मुखसन्धिरित्यर्थः। पृ० २३; यथा रत्नावल्यां प्रथमोऽङ्कः, तथा हि यथा रत्नावल्यां प्रथमोऽङ्कः। अत्र हि आमात्यस्य वीरो, वत्सराजस्य शृङ्गाराद्भुतो, सागरिका-राजदर्शनरूपे अमात्यप्रारम्भ- ततःशृङ्गार इति इयानयं सागरिकाया राजदर्शनेविषयीकृतेऽर्थराशी अमात्ययौगन्धराय- ऽमात्यप्रारम्भविषयीकृतेऽर्थराशिरुपयोगीति मुखणस्य पृथ्वीसाम्राज्यविजिगीषोर्वीरः, वत्स- सन्धिः । पूर्वोक्त भाग-३ पृ० २४. राजस्य वसन्तविभावः शृङ्गारः, पौर
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नाट्यदर्पण पर अभिनवभारती का प्रभाव
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प्रमोदावलोकनादद्भुतः, ततः उद्यानग
मनादारभ्य पुनः शृङ्गारः इति । पृ० ४८ २५. "स मुखस्याभिमुख्येन वर्तत इति प्रति- ""प्रतिमुखं प्रतिराभिमुख्येन यतोऽत्र वृत्तिः । मुखम् । पृ० ४८
पूर्वोक्त पृ० २५. २६. ह्यमात्येन सागरिकाचेष्टितरूपं बीजं मुख- .."अमात्येन सागरिकाचेष्टितं वसन्तोत्सवकामदेव
सन्धौ न्यस्तं वसन्तोत्सव-कामदेवपूजाऽऽदि- पूजादिना तिरोहितं नष्टमिव "सुसङ्गतारचितना तिरोहितत्वादीषल्लक्ष्यम् । तस्य च राजतत्समागमपर्यन्तं काव्यं द्वितीयाङ्कगतं सुसङ्गतारचित राज-सागरिकी-समागम - प्रतिमुखसन्धिः । पूर्वोक्त पृ० २४-२५.
नेन द्वितीयाङ्के उद्घाट इति । पृ० ४९ २७. उत्पत्त्युद्घाटन-दशाद्वयाविष्टस्य बीज- उत्पत्त्युद्घाटन दशाद्वयाविष्टस्य बीजस्य यत्रोद्भेदः
स्योन्मुख्यं फलजननाभिमुख्यं तद्वान् । फलजननाभिमुख्यत्वं स गर्भ । पूर्वोक्त पृ० २५.
प० ४९ २८. अवमर्शसन्धौ तु प्राप्त्यंशः प्रधानम् । अवमर्श त्वप्राप्तेरेव प्रधानता। पूर्वोक्त पृ० २६.
पृ० ४९ २९. जनक-विघातकयोस्तुल्यबलत्वात् सन्देहात्म- "जनक विघातकयोस्तुल्यबलत्वात् कथं न
कत्वम् "नियतफलाप्तिरूपत्वम् । 'श्रेयांसि संदेहः। "नियता फलप्राप्तिरुच्यते । श्रेयांसि बहु
बहुविघ्नानि भवन्ति' इति| पृ० ५०. विघ्नानीति'" । पूर्वोक्त पृ० २७ ३०. यथा रत्नावल्यामैन्द्रजालिकप्रवेशात् उदाहरणं रत्नावल्यामैन्द्रजालिकप्रवेशात्प्रभृत्या
प्रभृत्यासमाप्तेरिति । पृ० ५१ समाप्तेः । पूर्वोक्त पृ० २९. ३१. नृ-स्त्रियोः परस्परमोहा""| पृ० ६१ ..."प्रमदा पुरुषो या तदर्था या समीहा। पूर्वोक्त
पृ० ४२. ३२. य एव मुखे रस उपक्षिप्यते । "कामफले ''एव हि रसो मुख उपक्षिप्तः । पूर्वोक्त पृ० ४३;
च रूपके "प्रतिमुखे विलासेन स एव कामफलेषु रूपकेषु प्रतिमुख एव ह्यास्थाफलत्वेन विस्तार्यते । यस्तु वेणीसंहारे भानु
रतिरूपेण भाव्यम् । "यस्तु वेणीसंहारे भानुमत्या मत्या सह दुर्योधनस्य दर्शितो रत्यभिलाष- सह दर्योधनस्य दर्शितो विलासः, स नायकस्य रूपो विलास , स नायकस्य तादृशेऽवसरे
तादृशेऽवसरेऽत्यनुचितः इति चिरन्तनैरेवोक्तम् । ऽनुचितः । यदाह-सन्धि-सन्ध्यङ्गघटनं
यथा सहृदयालोककार:-'सन्धिसन्ध्यङ्गघटनं रसबन्धव्यपेक्षया । न तु केवल शास्त्रार्थ
रसबन्धव्यपेक्षा। न तु कवलशास्त्रार्थस्थितिस्थितिसम्पादनेच्छया ।।', इति । पृ० ६२ सम्पादनेच्छया । पूर्वोक्त पृ० ४२. ३३. दोषाच्छादनाय यत् पुनहसनं हास्यहेतु
दोषो येनोक्तेन प्रच्छादयितुमिष्यते तस्यापि हास्यवाक्यं सा तस्य नर्मणो द्योतनं नर्मद्युतिः ।
जननत्वेन नर्म च सुतरां द्योतितं भवतीति नर्मयथा रत्नावल्याम्-'"अत्र मौर्यदोषं.
द्युतिः । यथा च रत्नावल्यां द्वितीयेङ्ङ्के विदूषकः । छादयितुं यद् विदूषकेणोच्यते, तद् राज्ञो ।
""अत्र हि मौयंदोषं छादयितुं यद्विदूषकेणोहास्यहेतुत्वान्नर्मद्युतिः । पृ० ६७
च्यते तद्राज्ञो हास्यजननमिति नर्मैव द्योतितं भवति । पूर्वोक्त पृ० ४४.
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काजी अञ्जम सैफी ३४. अनियतो ह्याकारो रूपमुच्यते । पृ० ७३ ""रूपमिति चानियता आकृतिरुच्यते । पूर्वोक्त
पृ०४८. ३५. निश्चयरूपत्वादेव चोहरूपाया युक्तेभिद्यते। "निश्चयात्मकत्वादूहः । पूर्वोक्त पृ० ४९.
पृ०७४ ३६. लोकप्रसिद्धवस्त्वपेक्षया यः समुत्कर्षः लोकप्रसिद्धवस्त्वपेक्षया यत् सातिशयमुच्यते
समुत्कृष्टोऽर्थः, स उत्कर्षाहरणादुदाहृतिः। उत्कर्षमाहरतीत्युदाहरणम् । पूर्वोक्त पृ० ४८.
पृ० ७५ ३७. भावस्य परीभिप्रायस्याथवा भाव्यमान- भावस्य भाव्यमानस्य वस्तुनो भावनातिशये सत्यूह
स्यार्थस्योह प्रतिभाऽऽदिवशान्निर्णयो। प्रतिभावनादिबलात्"। बुद्धिर्हि तत्र क्रमते न ""बुद्धिस्तत्र क्रमते, न प्रतिहन्यत इत्यर्थः । प्रतिहन्यते । पूर्वोक्त पृ० ४९.
पृ०७६ ३८. भयत्रासकारिणो वस्तुनो या शङ्गाऽपाय- भयत्रासकारिणो वस्तुनो या शङ्का यदाशङ्कनं स
कारकत्वसम्भावना, सा द्रवति श्लथी. विद्रवः, विद्रवति विलीयते हृदयं येनेति । पूर्वोक्त
भवति हृदयमनयेति द्रवः । पृ० ७७ पृ० ५२. ३९..""प्रकर्षणाविर्भावनमाक्षेपः।""अभिप्रायस्य "अभिप्रायस्य हि तत्राक्षेपो बहिः कर्षणम् ।
बहिष्कर्षणमाक्षेपः । यथा रत्नावल्यां वासवदत्तायामेव सागरिकेति राज्ञा विदूषकेण च वासवदत्तायामेव सागरिकेति राज्ञा परिगृहीतायां तदुक्तिषु सागरिके शीतांशुमुंखमुत्पले विदूषकेण च परिगृहीतायां तदुक्तिषु- इत्यादिषु । पूर्वोक्त पृ० ५०. प्रियसागरिके ! शीतांशुर्मुखमुत्पले।
पृ० ७८
४०. परस्परवञ्चनप्रवृत्तयोर्यस्य बुद्धिसहा- परस्परवचनप्रवृत्तयोर्यस्यैवाधिकं (कर्म) सहाय
यादिबलाधिक्येन यत्कर्मतरमभिसन्धातुं बुद्धयादोनबलम्बयति स एव तमतिसन्धातुं समर्थ, तत् कर्म छलविषये अधिक(बल)- वञ्चयितुं समर्थ इति तदिदं कर्माधिबलम् । छलयोगादधि(बल)छलम् । यथा रत्ना- यथा-सागरिकावेषं धारयन्ती वासवदत्ता विदूवल्याम्-"किं पद्मस्य।' अत्र साग- षकबुद्धिदौर्बल्याद्राजानमतिसंधत्ते किं पद्मस्य" रिकावेषं धारयन्ती विदूषकबुद्धि- इत्यादि श्लोकान्तमधिबलम् । पूर्वोक्त पृ० ५१. दौर्बल्याद् वासवदत्ता राजानमभिसन्धत्ते ।
पृ० ७९ ४१. क्रोध-हर्षादि-सम्भूतावेग-गभितं वचनं आवेगगर्भ यद् वचनं तत्तोटकम् । स चावेगो
तोटयति भिनत्ति हृदयमिति तोटकम् । हर्षात्, क्रोधात् अन्यतोऽपि वा । भिनत्ति यतो पृ० ८१
हृदयं ततस्तोटकम् । पूर्वोक्त पृ० ५१. ४२. व्यतिक्रमो मार्गाच्चलनम् । यथा रत्ना- यथा भर्तृसंनिधानेऽपि विदूषकस्य सागरिकायाश्च
वल्यां सन्निहितं भर्तारमवगणय्य विदूषकस्य वासवदत्तया बन्धनम् ।"द्रवणं चलनं मार्गादिति सागरिकायाश्च वासवदत्तया बन्धनमिति । द्रवः । पूर्वोक्त पृ० ५३. पृ० ८२ .
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नाट्यदर्पण पर अभिनवभारती का प्रभाव
१२९ ४३. यद्यपि श्रमोद्वेग-वितर्कादयो व्यभिचारि- यद्यपि श्रमोवेग वितर्कलज्जाप्रभृतयो व्यभि
मध्ये लक्षयिष्यन्ते, तथापि रसविशेष- चारिवगै सत्यवसरेऽवश्यप्रयोज्याः सन्ध्यङ्गत्वेपुष्टयर्थ सन्ध्यङ्गावसरेऽपि लक्ष्यन्त इति। नोक्ता मन्तव्याः । पूर्वोक्त पृ० ५५.
पृ० ८६ ४४. क्रुद्धस्य प्रसादनमनुकूलनं बुद्धि-विभवादि- विरोधिनः कुपितस्य प्रशमः प्रसादनं शक्तिः बुद्धि
शक्तिकार्यत्वेन सा शक्तिः । पृ० ८८ विभवादिशक्तिकार्यत्वात् । पूर्वोक्त पृ० ५३. ४५. अथनिर्वहणसन्धेरङ्गानि लक्षयितुमद्दि- अथ निर्वहणसन्धावुद्देशक्रमेणाङ्गानि लक्षयितुं ___ शति । पृ० ९१
प्रक्रमते । पूर्वोक्त पृ० ५७. ४६. स्वापराधोद्घट्टनं परिभाषा | पृ० ९३ ..'अन्योन्यापराधोदघट्टनं वचनम् । पूर्वोक्त
पृ० ५८. ४७. प्रकारशतैर्वाञ्छितस्यार्थितस्य सामस्त्येन अथितस्य तथेति प्रकारशतै प्रार्थितस्थ सम्यगपुन___ आगमः प्राप्तिरानन्दहेतुत्वादानन्दः। वियोगवद्यदागमनं तदानन्तहेतुत्वादानन्दः । पृ० ९६
पूर्वोक्त पृ० ५८. ४८. ""इतिवृत्तस्याविच्छेदश्च रसपुष्ट्यर्थः, इति वृत्ताविच्छेदोऽपि हि रसस्यैव पोषकः,
विच्छेदे हि स्थाय्यादेस्त्रुटित्वात् कुतस्त्यो अन्यथा विच्छेदे स्थाय्यादेस्त्रुटितत्वात् क रसरसास्वादः ? पृ० १०२
वार्ताः । पूर्वोक्त भाग-३ पृ० ६२. ४९. योग्यतां च रसनिवेशैकव्यवसायिनः योग्यतां च कविरेव जानाति, न च मुक्तक
प्रबन्धकवयो विदन्ति, न पुनः "मुक्तक- कविः । पूर्वोक्त पृ० ६२.
वयः ! पृ० १०२ ५०. एवं च पुष्पदूषितकेऽशोकदत्तादिशब्दा. एतदेवाभिमन्यमानेन पुष्पदूषितकेऽशोकदत्तादि
कर्णनेन समुद्रदत्तस्य नन्दयन्त्यां या व्य- शब्दाकर्णनेन समुद्रदत्तस्य शङ्का योपनिबद्धा सा लोकशङ्कोपनिबद्धा, सा न दोषाय । पर- न दोषाय निर्वहणान्तोपयोगिनो हि नन्दयन्तीनिपुरुषपम्भावनाया निर्वहणं यावदत्रोपयो- सिनं तस्याश्च गृहान्तरावस्था । इदमेव मुखगित्वात् । "पुत्रे दूरस्थिते निर्वासनं, निर्वा- सन्धौ मलं परपुरुषसम्भावनामूलत्वात्। एवमनसितायाश्च शबरसेनापतिगृहेऽवस्थानमनु- भ्युपगमे तु श्वशुरेण बध्वा" असन्निहिते पूत्रे चितमेव । वणिगमात्यविप्राश्च स्ववर्गा- निर्वासनं शबरसेनापतिगृहेऽवस्थानमित्युत्तमप्रकृपेक्षयैवोत्तमाः, न राजापेक्षया ।......" तीनामनुपपन्नमेव । तस्मात् स्ववर्गापेक्षयेदमुत्तमप्रकरणे हि नायको व्युत्पादस्य | पृ० १०३ त्वमद्यतनेराजोचितानामुत्तमप्रकृतीनां वणिमात्रे
""। प्रकरणे हि तादृश एव नायकः ।"व्युत्पा
द्यश्च | पूर्वोक्त भाग-२ पृ० ४३२. ५१. तथा च वेश्यायां नायिकायां विनयरहित- .."आचारः कुलस्त्रियां विनयप्रधानः अन्यस्यां तद्
मपि चेष्टितं निबध्यते । यथा विशाखदेव- विपरीतः । तथा च देवीचन्द्रगुप्ते वसन्तसेनामुद्कृते देवीचन्द्रगुप्ते माधवसेनां समुद्दिश्य दिश्य चन्द्रगुप्तस्योक्तिः । पूर्वोक्त पृ० ४३३. कुमारचन्द्रगुप्तस्योक्तिः" | पृ० १०४ १७
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५२. तत्र कञ्चुकिस्थाने दासः । अमात्यस्थाने श्रेष्ठ । विदूषकस्थाने विटः । पृ० १०४ ५३. गृहवार्तायां गार्हस्थ्योचित पुरुषार्थसाधके वृत्ते कुलजैव स्त्री नायिकात्वेन वणिगादीनां निबन्धनीया । पृ० १०४ ५४. ''''पूर्वक विकृतकाव्यादो क्लृप्तं सत् समुद्रदत्ततच्चेष्टितादिवद् ग्राह्यम् । अथवा यत्राप्यं तत् पूर्वषिप्रणीतशास्त्रव्यतिरिक्त बृहत्कथाऽऽयुपनिबद्धं मूलदेवतच्च - रितादिवदुपादेयम् । पृ० १०५
काजी अञ्जुम सैफी
५५. तयोः प्रत्येकं प्रसिद्धयप्रसिद्धिभ्यां चतुदत्त्वान्नाटिकाऽपि चतुर्विधा । पृ० १०७ ५६. नियुद्धं बाहुयुद्धम्, स्पर्धेनं शौर्य-विद्या-कुलधन-रूपादि - कृतः संहर्षः । पृ० १०९ ५७. अत एवात्र गद्यं पद्यं चोजोगुणयुक्तम् । ... सेनापत्यमात्यादि - दीप्तरसनायकसम्पन्नः । पृ० १०९
******
५८. यथा शाक्यानां स्त्रीसम्पर्को गर्हणीयो न चम् | पृ० ११३
५९. अङ्कावताररूपाश्चात्राङ्का
विधेयाः ।
चूलिकाङ्कमुखयोरपि युद्धादिवर्णने निबंधो भवत्येव । पृ० ११४
६३. शङ्कुकस्त्वधमप्रकृतेर्नायकत्वमनिच्छन् प्र
हसन - भाणादी हास्यरसप्रधाने विटादेर्ना - यकत्वं प्रतिपादयन् कथमुपादेयः स्यादिति । ...द्वाभ्यां पात्राभ्यामुक्ति - प्रत्युक्तिवैचित्र्यविशिष्टाभ्यामेकेन वा पात्रेणाकाश भाषितसमन्वितेन युक्ताः । पृ० ११७
कञ्चुकिस्थाने दासः, विदूषकस्थाने विटः, अमात्यस्थाने श्रेष्ठीत्यर्थः । पूर्वोक्त पृ० ४३१.
गार्हस्थ्योचिता वार्ता पुरुषार्थसाधकमितिवृत्तं न तत्र वेश्याङ्गना नायिकात्वेन निबन्धनीया । पूर्वोक्त पृ० ४३२.
अनार्षमिति पुराणादिव्यतिरिक्त बृहत्कथाद्युपनिबद्धं मूलदेवचरितादि । आहार्यमिति पूर्वकविकाव्याद् वाहरणीयं समुद्रदत्तचेष्टितादि । पूर्वोक्त पृ० ४३०.
तथा हि देवी कन्या च ख्याताख्याताभेदेन चतुर्धा | पूर्वोक्त पृ० ४३६.
नियुद्धं बाहुयुद्धं संघर्षः शौर्यविद्याकुलरूपादिकृता स्पर्धा । पूर्वोक्त पृ० ४४५.
६०. देवोपालम्भात्मनिन्दाऽऽदिरूपानुशोचना- परिदेवितं त्मकं परिदेवितम् । पृ० ११५
६१. ते च यथासम्भवं स्त्रीविषया अन्यविषया वा । पृ० ११६
६२. शरीरिणि व्याजेन पलायनादिना । पृ० ११६
तं काव्यामोजोगुणयुक्तम् । पूर्वोक्त पृ० ४४५; ''अपि त्वमात्यसेनापतिप्रभृतेर्दीप्तरसस्य । पूर्वोक्त पृ० ४४४.
यथा शाक्यानां स्त्रीसम्पर्कः प्रहमनीयो भवति, न चौर्यम् । पूर्वोक्त पृ० ४४९.
अङ्कावतार एव चात्र भवति । चूलिकाङ्कमुखयोस्त्वत्रापि युद्धादिवर्णने समुपयोगोऽस्त्येव । पूर्वोक्त
पृ० ४४४.
दैवोपालम्भात्मनिन्दारूपमनुशोचनं
यत्र । पूर्वोक्त पृ० ४४६.
..... यथायोगं स्त्रीविषयाणि अन्यविषयाणि । पूर्वोक्त पृ० ४४२.
व्याजमिति पलायनादि । पूर्वोक्त पृ० ४४२.
अधमप्रकृते तु न नायकत्वमिति ध्रुवं प्रहसनकभाणकादौ किं ब्रूयात्, हास्यादिरसप्रधानत्वे
म एव नायकः । पूर्वोक्त पृ० ४५९; एकहायेंरित्याकाशपुरुष भाषितैरित्यर्थः । द्विहार्येति उक्तिप्रत्युक्तिवैचित्र्येणेत्यर्थः । पूर्वोक्त पृ० ४५३.
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नाट्यदर्पण पर अभिनवभारती का प्रभाव ६४. मिथः परस्परं जल्पे उक्ति-प्रत्युक्तिकमे यत्रोक्तिप्रत्यक्तिक्रमे क्रियमाणे परस्परप्रज्ञानोप
क्रियमाणे स्वपक्षस्य स्वाभ्युपगमस्य पर- जीवनबलात्स्वपक्षसुघटितादधिबलसंबन्धादधिब - स्परप्रज्ञोपजीवनबलात् स्थापना सुघटितत्वं लम् । पूर्वोक्त पृ० ४५७. क्रियते यत्र, तदधिकबलसम्बन्धादधि
बलम् । पृ० ११९ ६५. एतद् वचः सख्या भर्तृप्रत्यायनप्रयोजने- एतद्वचनं सखी-संबन्धि भर्तृप्रत्यायनं प्रयोजन
नोक्तं विदग्धजनस्य हास्यं श्वशुरादेर्वञ्चनां, मुद्दिश्य प्रयुक्तं तस्य पल्या अपि संबन्धिनां छलं सपत्न्या रोषं जनयतीति । पृ० १२६ विदग्धजनस्य हास्यं सपत्न्या वचनं रोषं जन
यति । पूर्वोक्त पृ० ४५८. ६६. ""प्रत्यसतोऽसाधुभूतस्य प्रलपनम् असत्प्र- असतोऽसाधुभूतस्य वस्तुनः प्रलपनमस्मिन्नित्य___ लापः । पृ० १२७
सत्प्रलाप इति । पूर्वोक्त पृ० ४५६. ६७. यथा वा व्यसनिना राजपुत्रेण किं सुख- ""यथा व्यसनिना राजपुत्रेण किं सुखमिति
मिति पष्टे मन्त्रिपूत्रेणोच्यते-'सर्वदा पृष्ठे तेनोत्तरं दीयते-'सर्वथा यो"।' पूर्वोक्त यो.... ।' पृ० १२७
पृ० ४५६. ६८. परविप्रतारणकारि यदुत्तरं हास्याय परवितारणकारि यदुत्तरं, अत एव हास्ययुक्ता सा
हास्यनिमित्तं निगढार्थत्वाद् भवति सा नालिका प्रणालिका व्याजेत्यर्थः । पूर्वोक्त पृ०४५५.
नाली व्याजरूपा प्रणालिका । पृ० १२९ । ६९. गुणानां दोषत्वं, दोषाणां च गणत्वं गुणानां दोषत्वं दोषाणां वा गुणत्वं यत्र क्रियते येनोत्तरेण व्यत्ययो विपर्यासः क्रियते,
तन्मृदवम् । 'मृदवमिति मर्दनं मृत्परपक्षमर्दनेन तन्मृदा परपक्षमर्दनेन स्वपक्षमवति रक्ष- स्वपक्षभवति रक्षतीति । पूर्वोक्त पृ० ४५७.
तीति मृदवम् । पृ० १२९ ७०. ""उद्घाते प्रश्नात्मके साधूद्घात्यम् । यदा तत्र यदा विवक्षितमुत्तरं दातुं शक्तोऽयं स्यादिति
प्रष्टा विवक्षितोत्तरदानसमर्थः, किन्तु यन्मम मनसि वर्तते तदेव वक्ति नवेत्येवमादिना यन्ममाभिप्रेतं तद्युक्तमयुक्तं वेत्यभिसंधाय निमित्तेन यदा पष्टैव प्रतिवचनं वैचित्र्यमभिसन्धापृच्छति, प्रतिवक्ता चोचितमभिधत्ते य पृच्छति, प्रतिवक्तोचितमभिधत्ते तदा तदुत्तरतदोद्घात्यमित्यर्थः । पृ० १३१-१३२
मुद्घात्यकम् । प्रश्नात्मके उदाते साध्विति यत् ।
पूर्वोक्त पृ० ४५४. ७१. विवक्षितप्रयोजनस्यान्यकार्यकरणव्याजेन यत्रोत्तरे दीयमाने अन्यानुसन्धानपूर्वकेऽप्यन्यत्कार्य
सम्पत्तिर्यत्र तदन्यकार्यावलगनादवलगि- सिध्यति तदान्यकार्यावलगनादवलगतम् । पूर्वोक्त तम् । पृ० १३२
पृ० ४५४. ७२. पुरुषार्थसाधको विचित्रो व्यापारो वृत्तिः। तस्माद् व्यापारः पुमर्थसाधको वृत्तिः। पूर्वोक्त पृ० १३५
पृ० ४५२. ७३. कायिक्यो हि व्यापृतयो मानसैर्वाचिकैश्च कार्यचेष्टा अपि हि मानसीभिः सूक्ष्माभिश्च वाचिव्यापारैः सम्भिद्यन्ते । पृ० १३५ कीभिश्चेष्टभिर्व्याप्यन्त एव । पूर्वोक्त भाग-३
पृ० ९१.
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१३२
काजी अञ्जम सैफी
७४. वाचिक्यो मानस्यश्च कायपरिस्पन्दाविना- मानस्यापि वाचिक्यपि चेष्टा अवश्यं सूक्ष्म काल
भाविन्य एव"प्राणादिरूपकायपरिस्पन्दा- परिस्पन्दमन्दप्राणव्यापाररूपं नाभिवर्तते । पूर्वोक्त
भावे मनोव्यापृत्यनुपलक्षणाच्च । पृ० १३५ ना० शा० भाग-३ पृ० ९१. ७५. आभ्यो हि वर्णनीयत्वेन कविहृदये व्यव- ताभ्योऽपि वाच्यरूपत्वेन कविहृदये व्यवस्थि
स्थिताभ्यः काव्यमुत्पद्यते । पृ० १३५ ताभ्यः काव्यमुत्पद्यते । पूर्वोक्त भाग-२ पृ० ४०८ ७६. तेनानभिनेयेऽपि काव्ये वृत्तयो भवन्त्येव । वृत्त्यङ्गान्यवि सर्वकाव्येषु सन्त्येव । यद्यपि सर्वेपृ० १३५
षामभिनेयानभिनेयानां काव्यानां वृत्तयः । पूर्वोत्त
पृ० ४०८. ७७. 'न हि व्यापारशून्यं किञ्चिद् वर्णनीय- न च क्रियाशन्यः कश्चिदप्यंशोऽस्ति । तेषु च न _मस्ति । पृ० १३५
व्यापारत्रयशन्यः कश्चिदपि काव्यांशोऽस्ति ।
भाग-३, पृ० ८७. ७८. मूर्छादौ तु व्यापाराभावेन वृत्त्यभा- मूर्छादौ तु व्यापाराभावे वृत्त्यभाव एव । पूर्वोक्त वेऽपि । पृ० १३५
भाग-२ पृ० ४५२. ७९. 'आङ् मर्यादायाम्' तेन मुखसन्धि सम्प्राप्य मुखसन्धेनिवर्तते यतः, आङ्मर्यादायाम्, यदि
निवर्तते। 'ईषदर्थ वा' तत ईषन्मुखं वात्रामुखं प्रारम्भमीषन्मुखं वा प्रस्ताव्यतेऽनयेति । मुखसन्धिसूचकत्वादारम्भः। प्रस्तावना पूर्वोक्त भाग-३ पृ० ९३.
शब्देनाप्येतदुच्यते । पृ० १३६ ८०. स्पष्टोक्तिस्त्वेवं यथा नागानन्दे नाटयि- स्पष्टोक्तिप्रत्यक्तिभिः, यथा नागानन्दे 'नाटयितव्ये"| पृ० १३६
तव्ये"। पूर्वोक्त पृ० ९३. ८१. सत् सत्त्वं प्रकाशस्तद् यत्रास्ति तत् सत्त्व- सत्सत्त्वं प्रकाशः तद्विद्यते यत्र तत्सत्त्वं मनः, न्मनस्तत्र भवा| पृ० १३९
तस्मिन् भवः । पूर्वोक्त पृ० ९६. ८२. आध! वाचा न्यक्कारः । पृ० १३९ ।। आधर्षणं वाचा न्यक्कारः । पूर्वोक्त पृ० ९७. ८३. "सूत्रधारे तत्तुल्यगुणाकृतिस्थापक एवं च यदा स्थापकोऽपि सूत्रधारतुल्यगुणाकारो" ____ आमुखमनुतिष्ठति । पृ० १३९
आमुखं भवति । पूर्वोक्त पृ० ९३. ८४. दीप्ता रसा रौद्रादय औद्धत्यावेगादिहेतवः। दीप्तरसा रौद्रादयः उद्धताः।""क्रोधावेगाद्यास्ते। पृ० १४०
पूर्वोक्त पृ० १०३. . ८५. भय-हर्षातिशयाकुलितपात्रप्रवेशः। पृ० भयातिशयेन हर्षातिशयेन च क्षिप्रमेव प्रवेश१४०
निर्गमौ । पूर्वोक्त पृ० १०४. ८६. तत्र विचित्रं नेपथ्यं वेणीसंहारे अश्वत्था
यथा मायाशिरोनिक्षेपे रामाभ्युदये चित्रं नेपथ्यम्, म्नः ।"मायाशिरोदर्शनं रामाभ्युदये। यथा वाश्वत्थाम्नः । पूर्वोक्त पृ० १०४.
पृ० १४० ८७. तथाहि अङ्गदेनाभिद्रूयमाणाया मन्दोदर्या तत्रैव अङ्गदादभिद्र्यमाणाया मन्दोदर्या भयं,
भयम्, अङ्गदस्योत्साहोऽस्यैव रावणदर्शनेन अङ्गदस्योत्साहः, ""रावणस्यातिक्रोधः, यस्तातेन
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नाट्यदर्पण पर अभिनवभारती का प्रभाव
१३३ 'एतेनापिसुरा जिताः' इत्यादि वदतो हासः, निगृह्य बालक इव प्रक्षिप्य कक्षान्तरे' इति वदतोऽ'यस्तातेन निगृह्य बालक इव प्रक्षिप्य ङ्गदस्य जुगुप्सा-हासविस्मयरसा। पूर्वोक्त पृ० कक्षान्ते' इति च जल्पतो जुगुप्सा हास- १०४.
विस्मयाः, रावणस्य रति क्रोधौ । पृ०१४१ ८८. अनेन गृह-भृत्याधुपमर्दनस्य ग्रहः । “गुणे- आघर्षणं दारादिखलीकरणम् । अविक्षेपो देश
वसूया मात्सर्यम् । द्रोहो जिधांसा दारादि- जात्यभिजनविद्याकर्मनिन्दा। .."उपघातो गृहखलीकार-विद्या-कर्म-देश-जात्यादि-निन्दा- भृत्याद्यपमर्दनम् ।"अभिद्रोहो जिघांसा । मात्सयं राज्य-सर्वस्वहरणादिराधर्षः । पृ० १४८ गुणेष्वसूया। आदिग्रहणाद् राज्यापहरणादि ।
पूर्वोक्त भाग-१ पृ० ३२०. ८९. पराक्रमः परकीयमण्डलाद्याक्रमणसाम- सन्ध्यादिगुणानां सम्यक्प्रयोगो नयः । इन्द्रियजयो
र्थ्यम् । बलं हस्त्यश्व-रथ-पदाति-धन- विनयः। बलं हस्त्यश्वरथपादातम् । पराक्रमः धान्य-मन्त्र्यादिसम्पत्" । न्यायः सामा- परकीयमण्डलाद्याक्रमणावस्कन्दः । "प्रतापः शत्रुदीनां सम्यक्प्रयोगः। अनेनेन्द्रियजयो विषये सन्तापकारिणी प्रसिद्धिः । प्रभावोऽभिजनगृह्यते । अनेन शत्रुविषये सन्तापपर्तृत्व धनमन्त्रिसम्पत् । पूर्वोक्त पृ० ३२४-३२५.
प्रसिद्धिरूपः प्रतापो गृह्यते । पृ० १४९ ९०. निष्ठेवः कफनिरसनम् । उद्वेगो गात्रधून- निष्ठीवन कफनिरासनम् । उद्वेजनं गात्रोधूननम् । नम् । पृ० १५०
पूर्वोक्त भाग-१ पृ० ३२९ ९१. इन्द्रजालं मन्त्र-द्रव्य-हस्तयुक्त्यादिनाऽस- इन्द्रजालं मन्त्रद्रव्यवस्तुयुक्त्यादिना असम्भव
म्भवद्वस्तुप्रदर्शनम् । रम्यः सातिशयत्वेन वस्तुप्रदर्शनम् । "अतिशेत इत्यतिशयः । "यच्च
हृद्योऽर्थः शिल्पकर्मरूप" | पृ० १५० शिल्पं कर्मरूपम्। पूर्वोक्त पृ० ३२९-३३०. ९२. एवंविधरूपैव, अपरेषां तु पाठ्यानामु- एवं च नित्यमेवं रूपमेव । अन्यपाठ्यानामुत्था
स्थापनादीनां पूर्वरङ्गाङ्गानां प्रयोगवशा- पनादीनां प्रयोगवशादन्यथात्त्वोपपत्तिर्दृष्यते ।
दन्यथात्वमपि भवति । पृ० १७१ पूर्वोक्त पृ० २१७. ९३. अत एव कवयो रूपकारम्भे 'नाद्यन्ते सूत्र- पुराणकवयो लिखन्ति स्म 'नान्द्यन्ते सूत्रधारः' इति ।
धारः' इति पठन्ति । पृ० १७२ पूर्वोक्त पृ० २१७. ९४. यथा उदात्तराघवे रामस्य प्रस्तुतशृङ्गा- यथा उदात्तराघवे रामस्य प्रस्तुतशृङ्गारक्रमोल्ल
रोल्लङ्घनेन-'अरे रे तापस"। इत्यादि- नेन-'अरे तापस।' इत्यादिना। यथा नेपथ्यवाक्याकर्णनेन वीररसाक्षेपः । वाक्याकर्णनेन वीररसस्याक्षेपस्य तु रसस्य पृ० १७३
माशृण्यते । पूर्वोक्त भाग-४, पृ० २६०-२६१. ९५. इयं च प्रावेशिक्याक्षेपिक्यनन्तरमवश्यं "इयं हि प्रावेशिक्याक्षेपिक्या अनन्तरमवश्य
प्रयोज्येति वृद्धसम्प्रदायः । पृ० १७३. प्रयोज्या भवति । पूर्वोक्त पृ० ३६१. ९६.""अनुकतुर्यदा अनाशङ्कित एव धनविघा- अनकर्जर्यदनाशङ्कितधनविषयादत्युद्धत प्रयोग
तादिना विघात उद्धतप्रयोगश्रमाद् वा श्रमवशाद् वा भ्रमादिदोष सम्भावना । वस्त्रामूर्छा-भ्रमादिसम्भावना वस्त्राभरणादेर्वा भरणावकाशादित्सयागीयते सान्तराध्रुवा। तत्र
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काजी अञ्जुम सैफी प्रच्युतिस्तदा तत्संवरणावकाशदित्सयेयं च प्राक्तनं भावि वा रसस्वरूपमनुवृत्तिमित्यगीयते । अस्यां च प्राक्तनं भावि वा रसस्य वश्यम् | केवलं छिद्राच्छदन मात्र प्रयोजनायास्वरूपमनुवय॑म् । छिद्राच्छादनमात्रप्रयो- मस्यां न सार्थक पदकदम्बयोजनमुपगीति शुष्काजनत्वात् चास्या न सार्थकपवनासनमुप- क्षरैरेवेयं लक्ष्ये च । पूर्वोक्त पृ० ३६१. योगीति शुष्काक्षराण्येवास्यां निबध्यन्ते ।
पृ० १७३ ९७. यथोपश्रुतिशकुनन्यायेन प्रत्ययेन" | पृ० इत्यादि काकतालीय श्रतिशकूनन्यायेन लौकि१७३
कस्य । पूर्वोक्त भाग-४ पृ० ३६१. ९८. ""न तु देशकालावस्थाद्यपेक्षयानी त्याव- प्राणात्ययेऽपीति न तु नीत्यनुवर्तनेन कथञ्चित् सहनपूर्वकं निर्यातनमिति । पृ० १७६ ।। देशकालाद्यनुवर्तनेन सहनपूर्वकं निर्यातनम् ।
पूर्वोक्त भाग-३, पृ० १६७. ९९. सहजा मुखराग-दृष्टिविकारादिरहिता। मुखराग दृष्टि विकारादयः । पूर्वोक्त भाग-२ पृ० १७६
पृ० १६६. १००. यथासम्भवं सन्धिं विग्रहेण, विग्रहे विग्रहं वा सन्धिना दूषयतीति विदूषकः, विप्रलम्भ
सन्धिना च विशेषेण दूषयन्ति, विनाश- नत्वे विनोदने दूषयन्ति विस्मारयन्ति । पूर्वोक्त यन्ति, विप्रलम्भं तु विनोददानेन भाग-३ पृ० २५१-२५२.
विस्मारयन्तीति विदूषकाः । पृ० १७८ १०१. यथोर्वशी पुरूरवसः। 'नपे दिव्ये न च ""इत्यस्यापवादमाह दिव्यवेश्येत्यादि। यथा
प्रभौ' इत्यस्यापवादोऽयमिति । पृ० १७९ पुरूरवसः उर्वश्या । पूर्वोक्त पृ० १९६. १०२. अन्यनारी व्यासङ्गादिना । पृ० १८१ व्यासङ्गादित्यन्यनारीविषयादित्यर्थः । पूर्वोक्त
पृ० २०९. १०३. बाल्येऽपि किञ्चिदुन्मीलन्ति, वार्धके तु ते हि यौवने उद्रिक्ता दृश्यन्ते बाल्ये त्वनुद्भिन्ना
प्राचुर्यण नश्यन्ति । पृ० १८१-१८२ वार्धके तिरोभूताः । पूर्वोक्त पृ० १५४. १०४. पुंसां तूत्साहादयो मुख्यतोऽलङ्काराः । तेन पुंसस्तूत्साहवृत्त्यात एव परमालङ्काराः, तथा च
नायकभेदेषुद्धतादिषु धीरत्वं विशेषण- सर्वष्वेव नायकभेदेषु धीरत्वमेव विशेषणतयोक्तम् । मुक्तम् । भावादयस्तु पुरुषाणामुत्साहा- तदाच्छादितास्तु शृङ्गारादयः धीरललित द्याच्छादिता एव भवन्तीति ते गौणाः। इत्यादौ । पूर्वोक्त पृ० १५८.
पृ० १८२ १०५. भ्रू-चिबुक-ग्रीवाऽऽदेश्च सातिशयो विकारः चोद्घ्रतारकचिबुकग्रीवादेः सातिशयो विकारः...
शृङ्गारोचित उद्भिद्योद्भिद्य विश्रान्ति- शृङ्गारोचितमाकारम् । स्वेत्युद् भिद्योद्भिद्य
मत्त्वेनासन्ततो हाव इति । पृ० १८२ विश्राम्यन् हावः ! पूर्वोक्त पृ० १५६-१५७. १०६. प्रसरणशीलं सशृङ्गारं समुचितविभाव- "स तु प्रसरणकधर्मकः, ""यदा तु रतिवासना
विशेषोपग्रहविरहादनियतविषयं प्रबुद्धरति. प्रबोधात्तां प्रबुद्धां रतिमभिमन्यते केवलं समुभावसमन्वितं हेला । पृ० १८२ चितविभावोपग्रहविरहान्निविषयतया स्फुटीभावं न
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नाट्यदर्पण पर अभिनवभारती का प्रभाव
१०७. एते च त्रयोऽङ्गजाः परस्परसमुत्थिता अपि भवन्ति । तथा हि कुमारीशरीरे प्रौढतम कुमारगतभाव- हाव-हेला-दर्शनश्रवणाभ्यां भावादयोऽनुरूपा विरूपाश्च भवन्ति । पृ० १८२
१०८. रागः प्रियतमं प्रत्येव बहुमानः । मदो मद्यकृतश्चित्तोल्लासः । हर्षः सौभाग्यगर्वः । अन्यथा वक्तव्येऽन्यथा वचनम्, हस्तेनादातव्ये पादेनादानम्, कटीयोग्यस्य कण्ठे निवेशन- मित्यादिकः । पृ० १८३ १०९. प्रियतमप्रीत्यतिशयेन
। पृ० १८३
११०. रूपलावण्यादीनां च पुरुषेणोपभुज्यमानानां यदौज्ज्वल्यं छाया विशेषः । पृ० १८४
१. भावानां साध्यफलोचितानां रतिहर्षोत्सवादीनां याचनं प्रार्थना । पृ० ७४
२. चौर-नृपारि-नायकादिभ्यो भयमुद्वेगः । पूर्वोक्त पृ० ७६.
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प्रतिपद्यते तदा तज्जनितो देहविकारविशेषो हेला । पूर्वोक्त भाग - ३ पृ० १५७.
अप्येते परस्परसमुत्थिता भवन्ति । तथा हि कुमारीशरीरे प्रोढ़तम कुमार्यंन्तरगतहेलावलोकने पूर्वोक्त पृ० १५५.
इसके अतिक्ति पताकास्थानक, कार्यावस्था और अर्थप्रकृतियों को चेतन एवं अचेतन रूप में Shant व्याख्या तथा अन्य विविध स्थल भी अभिनवभारती से वैचारिक दृष्टि से प्रभावित तथा अनुप्राणित प्रतीत होते हैं । यह सम्भावना भी सत्य प्रतीत होती है कि रामचन्द्र - गुणचन्द्र द्वारा कथित 'नाट्यदर्पण -विवृत्ति' नाम भी अविनवगुप्त के 'नाट्य वेद-विवृत्ति' से प्रेरित रहा होगा ।
इन समस्त तथ्यों को पृष्ठभूमि में भी यह कथन तो अनुचित ही होगा कि नाट्यदर्पण में अभिनवभारती का अन्धानुकरण किया गया है । वस्तुतः रामचन्द्र- गुणचन्द्र ने अवसर के अनुरूप अभिनवगुप्त के मन्तव्य की आलोचना तथा उनमें संशोधन एवं परिवर्धन भी किया है, परन्तु प्रस्तुत शोध-पत्र की सीमाओं को दृष्टिगत रखते हुए हम यहाँ नाट्यदर्पण के एतत्सम्बद्ध स्थलों का उल्लेख उचित नहीं समझते हैं ।
वचनेऽन्यथावक्तव्येऽन्यथाभाषणम्, हस्तेनादातव्ये, पादेनादानम् रसनायाः कण्ठे न्यासः इत्यादि । मद्येन कृतो रागः प्रियतमं प्रत्येव बहुमानो हर्षः । सौभाग्यगर्यो यथा । पूर्वोक्त पृ० १६०.
नाट्यदर्पण की विवृत्ति में २ स्थल ऐसे भी प्राप्त होते हैं जिन पर नाट्यशास्त्र और अभिनव भारती का संयुक्त प्रभाव दृष्टिगोचर होता है । यहीं उनका प्रदर्शन कर देना तो अनङ्ग-कीर्तन ज्ञात नहीं होता है
प्रियतमगतैः प्रीत्या तं प्रति बहुमानातिशयेन । पूर्वोक्त पृ० १५९.
तान्येव रूपादीनि पुरुषेणोपभुज्यमानानि छायान्तरं श्रयन्ति । पूर्वोक्त पृ० १६२ ।
एतत्साध्यफलोचितभावलक्षणम् । ना० शा० भाग – ३ | पृ० ५० । रतिहर्षोत्सवानां तु प्रार्थना प्रार्थनाभवेत् ।
८६।१९ ना० शा०.
अरिशब्दान्नायकादि । अभि० भा० (ना० शा० भाग - ३) पृ० ५१; भय नृपारिदस्यूत्थमुद्वेगः परिकीर्तितः । ८८।१९ ना० शा० ।
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________________ काजी अञ्जुम सैफी इस समस्त विवेचन से नाट्यदर्पण पर अभिवभारती का अत्यधिक प्रभाव है यह स्वतः स्पष्ट हो जाता है। वस्तुतः यदि नाट्यदर्पण के अभिनवभारती से प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित सम्पूर्ण अंशों को उसमे पृथक कर दिया जाये तो उसका मूल स्वरूप ही अस्त-व्यस्त हो जायेगा। यह सब उस समय और भी विचित्र प्रतीत होता है, जल नाट्यदर्पणकार स्वयं काव्यापहार की कटु शब्दों में करते हैं।' काज़ी पाड़ा, बिजनौर (उ० प्र०) 246701 ग्रन्थ-सूची 1. नाट्यदर्पण (ना० द०)-रामचन्द्र-गुणचन्द्र, ओरियण्टल इन्स्टीट्यूट, बड़ौदा, 1959 / 2. नाट्यशास्त्र (ना० शा०) भरत, भाग-१ / ओरियण्टल इन्स्टीट्यूट, बड़ौदा, द्वितीय संस्करण 3. नाट्यशास्त्र-भरत, भाग-२, ओरिएण्टल इन्स्टीट्यूट, बड़ौदा, 1934 / 4. नाट्यशास्त्र-भरत, भाग-३, ओरिएण्टल इन्स्टीट्यूट, बड़ौदा 1954 / 5. नाट्यशास्त्र-भरत, भाग-४, ओरिएण्टल इन्स्टीट्यूट, बड़ौदा 1964 / 6. हिन्दी नाट्यर्पण-रामचन्द्र-गुणचन्द्र, हिन्दी-विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली, प्रथम संस्करण 1961 / 7. दि नाट्यदर्पण ऑव रामचन्द्र एण्ड गुणचन्द्र-ए क्रिटिकल स्टडो-त्रिवेदी के० एच०, इन्स्टीट्यूट ऑव इण्डोलॉजी, अहमदाबाद, फर्स्ट एडीशन, 1966 / 1. अकवित्वं परस्तावत् कलङ्कः पाठशालिनाम् / अन्यकाव्यैः कवित्वं तु कलङ्कस्यापि चूलिका / / ना० द० प्रारम्भिक श्लोक सं० 11 /