Book Title: Jinmahendrasuriji ko Preshit Prakrit Bhasha ka Vignapti Patra
Author(s): Vinaysagar
Publisher: ZZ_Anusandhan
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Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्री जिनमहेन्द्रसूरिजी को प्रेषित प्राकृत भाषा का विज्ञप्ति - पत्र म. विनयसागर विज्ञप्ति - पत्र - लेखन एक स्वतन्त्र विधा है । यह विधा साहित्यशास्त्र के अन्तर्गत ही है किन्तु साहित्यशास्त्र में इसका कोई उपभेद प्राप्त नहीं होता है । जैन मनीषियों द्वारा यह विधा पल्लवित एवं पुष्पित होकर स्वतन्त्र रूप प्राप्त है । अन्य परम्पराओं में सम्भवत: इसका उल्लेख नहीं मिलता है । विज्ञप्ति - पत्र - लेखन के दो रूप प्राप्त होते है १. जैन मुनिगणों द्वारा प्रेषित और २. जैन संघ द्वारा गणनायक एवं आचार्यों को प्रेषित । १. जैन मुनिगणों द्वारा प्रेषित : जैन मुनिगणों द्वारा प्रेषित पत्रों में मुनिजन अपने आचार्यों / गणनायकों को जो संस्कृत, प्राकृत भाषा में पत्र लिखते थे । वे पत्र गद्य, पद्य और गद्यपद्यमिश्रित होते थे । समासबहुल अलंकारों की छटा से युक्त काव्य शैली में लिखित थे । इन पत्रों में मुनिजन अपने चातुर्मासिक धार्मिक क्रिया-कलापों, यात्रा-वृत्तान्तों, प्रवचनों, समाज द्वारा आचरित विशिष्ट कृत्यों और शासन - प्रभावना का वर्णन करते थे । शास्त्र पठन-पाठन का भी अध्ययन-अध्यापन का भी उल्लेख होता था । इन पत्रों का प्रारम्भ तीर्थंकरो, गणधरों और आचार्यदेवों का स्मरण कर वर्तमान गच्छनायक के गुणों का उल्लेख करते हुए, प्रेषणीय स्थान / नगर के गौरव को व्याख्यान करते हुए, नामोल्लेख सहित आचार्यों को सविधि वन्दन करते हुए प्रेषित किया जाता था । तत्पश्चात् प्रेषक मुनिजनों के नाम विस्तार के साथ लिखे जाते थे । ऐतिहासिक वर्णनों का भी इनमें प्राचुर्य रहता था । अन्त में शुभकामना और आशीर्वाद चाहते हुए पत्र पूर्ण किया जाता था । ये पत्र बड़े विशाल होते थे और लघु भी । विशाल पत्रों में एक विक्रम सम्वत् १४४१ में अयोध्या में विराजमान पूज्य लोकहिताचार्य को भेजा गया था । भेजने वाले थेआचार्य जिनोदयसूरि, जो उस समय अणहिलपुर पाटण में विराजमान थे । Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ September-2005 इसमें पद्य केवल ८६ है और शेष भाग गद्य में है। यह गद्य भाग भी महाकवि बाण, दण्डि और धनपाल की शैलीका अनुकरण करता है । शब्दछटा भी आलंकारिक है और ऐतिहासिक घटनाओं का भी निर्देशन है। इसमें तीर्थयात्राओं का विशिष्ट वर्णन है। (यह विज्ञप्ति-पत्र मुनिश्री जिनविजयजी द्वारा सम्पादित होकर जैन-विज्ञप्ति-लेख-संग्रह पुस्तक में प्रकाशित हो चुका इसी प्रकार विक्रम सम्वत् १४८४ में गच्छाधिपति जिनभद्रसूरि को लिखा गया पत्र विज्ञप्तित्रिवेणी के नाम से प्रसिद्ध है । उस समय आचार्य पाटण में ही विराज रहे थे । पत्र के लेखक थे-जैन साहित्य और साहित्यशास्त्र के धुरन्धर विद्वान् उपाध्याय जयसागरजी । उन्होंने यह पत्र सिन्ध प्रदेश स्थित मलिक वाहनपुर से लिखा था । कई लघु विज्ञप्तिपत्र काव्यों के रूप में अथवा महाकाव्य की शैली में या पादपूर्ति-काव्यों के रूप में लिखे गये थे । ये पत्र भी ऐतिहासिक और साहित्यिक दृष्टि से अपना विशेष महत्त्व रखते हैं । कई विज्ञप्तिपत्र चित्रकाव्यबद्ध भी होते हैं अथवा मध्य में चित्रकाव्य भी प्राप्त होते हैं । इन पत्र लेखों में विनयविजयोपाध्याय, मेघविजयोपाध्याय, विजयवर्धनोपाध्याय आदि प्रमुख हैं । इनमें से कतिपय विज्ञप्तिपत्र प्रकाशित भी हो चुके है । २. जैन संघ द्वास गणनायक एवं आचार्यों को प्रेषित : यह पत्र चित्रबद्ध होने के कारण आकर्षणयुक्त दर्शनीय और मनोरम भी होते हैं । विशाल जन्मपत्री के अनुकरण पर विस्तृत भी होते हैं । इन विज्ञप्तिपत्रों की चौड़ाई १० से १२ इंच होती है और लम्बाई १० फुट से लेकर अधिकाधिक १०८ फुट तक होती है । टुकड़ों को सांध-सांघ कर बंडल-सा बन दिया जाता है । इन विज्ञप्तिपत्रों में सबसे पहले काभकलश, अष्ट मंगल, चौदह महास्वप्न और तीर्थंकरों के चित्र चित्रित किये जाते हैं। पश्चात् राजा-बादशाहों के प्रासाद, नगर के मुख्य बाजार, विभिन्न धर्मों के देवालय और धर्मस्थान, कुंआ, तालाब आदि जलाशय, बाजीगरों के खेल और गणिकाओं के नृत्य भी चित्रित होते हैं । तत्पश्चात् जैन समाज का धर्म जुलूस, साधुजन और श्रावक समुदाय के चित्र भी अंकित होते हैं । उसके Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 4 अनुसन्धान ३३ पश्चात् जिन आचार्यों को यह विज्ञप्तिपत्र भेजा जाता है, उनके चित्र, उनके अधिकाधिक सर्वश्रेष्ठ विशेषण और उनके नाम आदि अंकित कर लेखन प्रारम्भ होता है । आचार्य के गुणों की बहुत प्रशंसा करती है । उपासकों का वर्णन करता है । धर्मकृत्यों का वर्णन रहता है और अन्त में आचार्य को अपने नगर में पधारने के लिए विस्तारपूर्वक प्रार्थना/विज्ञप्ति की जाती है। अन्त में उस नगर के अग्रगण्य मुख्य श्रावकों के हस्ताक्षर होते हैं । इन पत्रों में धार्मिक-इतिहास के अतिरिक्त समाज और राजकीय ऐतिहासिक बातें भी गर्भित होती है। इन विज्ञप्तिपत्रों का प्रारम्भ प्राय: संस्कृत भाषा में और अन्तिम अंश देश्य भाषा में होता है। ये विज्ञप्तिपत्र अधिकांशतः चित्रित प्राप्त होते है और कुछ अचित्रित भी होते हैं। बहुत अल्प संख्या में ये पत्र प्राप्त होते हैं । चर्चित पत्र : प्रस्तुत पत्र प्रथम प्रकार का है । इस पत्र को पाली में स्थित पं. जयशेखर मुनि द्वारा जैसलमेर में विराजमान गच्छनायक श्रीपूज्य जिनमहेन्द्रसूरि को भेजा गया है । विक्रम सं. १८९७ में लिखित है । इस पत्र की मुख्य विशेषता यह है कि यह प्राकृत भाषा में ही लिखा गया है। अन्त में पाली नगर के मुखियों के हस्ताक्षरों सहित आचार्य के दर्शनों की अभिलाषा, पाली पधारने के लिए प्रार्थना अथवा अन्य मुनिजनों को भिजवाने के लिए अनुरोध किया गया है । इस पत्र में कोई भी चित्र नहीं है । पत्र की लम्बाई १ फुट तथा चौड़ाई १० इंच है। यह पत्र मेरे स्वकीय संग्रह में है। पत्र का सारांश प्रारम्भ में दो पद्य संस्कृत भाषा में और शार्दूलविक्रीडित छन्द में है । प्रथम पद्य में भगवान् पार्श्वनाथ की स्तुति की गई है और दूसरे पद्य में जैसलमेर नगर में चातुर्मास करते हुए श्री पूज्य जी के पादपद्यों में प्राकृत भाषा में यह विज्ञप्तिपत्र लिखने का संकेत किया है । . इसके पश्चात् प्राकृत भाषा में शान्तिनाथ भगवान् को नमस्कार कर जैसलमेर नगर में विराजमान गणनायक के विशेषणों के साथ गुण-गौरव । यशकीर्ति का वर्णन करते आचार्य जंगमयुगप्रधान श्रीजिनमहेन्द्रसूरि जो कि Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ September-2005 11 पाठक, साधुगणों से परिवृत हैं, से प्रार्थना की गई है कि पाली नगर का श्रीसंघ भक्तिपूर्वक वन्दन करता हुआ निवेदन करता है और लिखता है कि आपके प्रसाद से यहाँ का श्रावक समुदाय सुखपूर्वक है और आप श्री साधु-शिष्यों के परिवार सहित सकुशल होंगे। "पयुर्षण के धार्मिक कार्य-कलापों सम्बन्धित आप द्वारा प्रेषित कृपापत्र प्राप्त हुआ और इस पत्र के साथ आपश्री ने श्रावकों के नाम पृथक पत्र भेजे थे, वे उन्हें पहुंचा दिये गये है। आपके पत्र से हमें बहुत आनंद हुआ और शुभ भावों की वृद्धि हुई ।" "यहाँ भी पयुषण पर्व के उपलक्ष्य में तप, नियम, उपवास और प्रतिक्रमण भी अधिक हुए । कल्पसूत्र की नव वाचना हुई । व्याख्यान सुनकर अनेक श्रावकों ने कन्द-मूल, रात्रि-भोजन आदि अकरणीय कार्यों का त्याग किया । बहुत लोगों ने छठ, अट्ठम, दशम, द्वादश आदि अनेक प्रकार की तपस्या की । चम्पा नाम की श्राविका ने मासखमण किया । ७१ श्रावकों ने सम्वत्सरी प्रतिक्रमण भी किया 1 प्रतिक्रमणों के उपरान्त चार श्रावकों ने - गोलेछा भैरोंदास, छोटमल उम्मेदमल कटारिया, गुमानचन्द बलाही, शोभाचन्द सुकलचन्द चौपड़ा ने श्रीफल की प्रभावना की । पंचमी को स्वधर्मीवात्सल्य हुआ जिसमें ३०० श्रावकों ने लाभ लिया ।" "आषाढ़ सुदि २ बुधवार से जयशेखरमुनि के मुख से आचाराङ्ग सूत्र का व्याख्यान और भावना में महीपाल चरित्र श्रवण कर रहे है । बहुत लोग व्याख्यान श्रवण करने के लिए आते है । अभी आचाराङ्ग सूत्र का लोकविजय नामक द्वितीय अध्ययन के दूसरे उद्देशकों का व्याख्यान चल रहा है । सम्वत्सरिक दिवसों में हमारे द्वारा जो कुछ अविनय-अपराध, भूल हुई हो, उसे आप क्षमा करें, हमें तो आपका ही आधार है । हमारे ऊपर आपका जो धर्म-स्नेह है, उसमें कमी न आने दें । जैसलमेर निवासी भव्य लोग धन्य हैं, जो आप जैसे श्रीपूज्यों के नित्य दर्शन करते है और श्रीमुख से नि:सृत अमृत वाणी सुनते हैं । आपके साथ विराजमान वाचक सागरचन्द्र गणि आदि को वन्दना कहें ।" Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 12 अनुसन्धान ३३ विक्रम सम्वत् १८९७ कार्तिक सुदि सप्तमी रविवार को जयशेखर मुनि ने यह विज्ञसि पत्र लिखा है । इसके पश्चात् राजस्थानी भाषा में श्रीसंघ की ओर से विनती लिखी गई है । इसमें लिखा है कि "आपने इस क्षेत्र को योग्य मानकर पं. नेमिचन्दजी, मनरूपजी, नगराजजी और जसराजजी को यहाँ भेजा है, उससे यहाँ जैन धर्म का बहुत उद्योत हुआ है और व्याख्यान, धर्म- ध्यान का भी लाभ प्राप्त हुआ है । पहले यहाँ पर उपाश्रय का हक और खरतरगच्छ की मर्यादा / समाचारी उठ गई थी । इनके आने से सारी समस्या हल हो गई । आपसे निवेदन है कि पाली क्षेत्र योग्य है । इनको दो-तीन वर्ष तक यहाँ रहने की इजाजत दें ताकि यह क्षेत्र सुधर जाए और बहुत से जीव धर्म को प्राप्त करें ।" | I 1 इसके पश्चात् मारवाड़ी (मुडिया) लिपि में पाली के २८ अग्रगण्यों के हस्ताक्षर हैं । उनमें से कुछ नाम इस प्रकार है- नाबरीया भगवानदास, संतोषचन्द प्रतापचन्द, अमीचन्द साकरचन्द, गोलेछा भैरोलाल रिखबचन्द, कटारिया शेरमल उम्मेदचन्द, कटारिया जेठमल, लालचन्द हरकचन्द, संघवी रूपचन्द रिखबदास, गोलेछा सागरचन्द आलमचन्द आदि । विशेष : इस पत्र में चार यतिजनों के नाम आए है - पं. नेमिचन्द, मनरूप, नगराज, जसराज के नाम आए है । इन चारों के नाम दीक्षावस्था के पूर्व के नाम हैं । खरतरगच्छ दीक्षानन्दी सूची पृष्ठ १०१ के अनुसार सम्वत् १८७९ में फागुण वदी ८ को बीकानेर में श्री जिनहर्षसूरिने शेखरनन्दी स्थापित कर जयशेखर को दीक्षा दी थी। जयशेखर का पूर्व नाम जसराज था और सुमतिभक्ति मुनि के शिष्य थे और जिनचन्द्रसूरि शाखा में थे । श्री जिनमहेन्द्रसूरि श्रीपूज्य जिनमहेन्द्रसूरि को यह विज्ञप्ति पत्र लिखा गया था अत: श्रीजिनमहेन्द्रसूरि का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है : अलाय मारवाड़ निवासी सावणसुखा गोत्रीय शाह रूपजी की पत्नी सुन्दरदेवी के ये पुत्र थे । जन्म सम्वत् १८६७ था । मनरूपजी इनका जन्म नाम था । सम्वत् १८८५ वैशाख सुदी १३ नागौर में इनकी दीक्षा हुई थी Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ September-2005 13 और दीक्षा नाम था - मुक्तिशील । दीक्षानन्दी के अनुसार इनकी दीक्षा १८८३ में सम्भव है । गच्छनायक श्री जिनहर्षसूरि का सम्वत् १८९२ में स्वर्गवास हो जाने पर मिगसर वदी ११ सोमवार १८९२ में मण्डोवर दुर्ग में इनका पट्टाभिषेक हुआ । यह महोत्सव जोधपुर नरेश मानसिंहजीने किया था, और उस महोत्सव के समय ५०० यतिजनों की उपस्थिति थी । यही से खरतरगच्छ की दसवीं शाखा का उद्भव हुआ । मण्डोवर में गद्दी पर बैठने के कारण यह शाखा मण्डोवरी शाखा कहलाई ! इधर यतिजनों में विचार-भेद होने के कारण बीकानेर नरेश के आग्रह पर जिनसौभाग्यसूरि गद्दी पर बैठे । श्री जिनमहेन्द्रसूरि के उपदेश से जैसलमेर निवासी बाफणा गोत्रीय शाह बहादरमल, सवाईराम, मगनीराम, जौंरावरमल, प्रतापमल, दानमल आदि परिवार ने शत्रुजय तीर्थ का यात्रीसंघ निकाला था । इस संध में ११ श्रीपूज्य, २१०० साधु-यतिगण सम्मिलित थे । इस संघ में सुरक्षा की दृष्टि से चार तोपें, चार हजार घुड़-सवार, चार हाथी, इक्यावन म्याना, सौ रथ, चार सौ गाड़ियाँ, पन्द्रह सौ ऊँट साथ में थे । इसमें अंग्रेजों की और से, कोटा महारावजी, जोधपुर नरेश, जैसलमेर के रावलजी और टोंक के नवाब आदि की ओर से सुरक्षा व्यवस्था थी। इस यात्री संघ में उस समय १३,००,०००/- रू. व्यय हुए थे । यही बाफणा परिवार पटवों के नाम से प्रसिद्ध है और इन्हीं के वंशजों ने उदयपुर, रतलाम, इन्दौर, कोटा आदि स्थानों में निवास किया था और राजमान्य हुए थे । इनके द्वारा निर्मित कलापूर्ण एवं दर्शनीय पाँच हवेलियाँ जैसलमेर में आज भी पटवों की हवेलियों के नाम से प्रसिद्ध है, और अमरसागर (जैसलमेर) के दोनों मंदिर इसी पटवी परिवार द्वारा निर्मित है । इसी पटवा परिवार ने लगभग ३६० स्थानों पर अपनी गद्दियाँ स्थापित की थी और गृहदेरासर और दादाबाड़ियाँ भी बनाई थी। इन्हीं के वंशजों में सर सिरहमलजी बाफणा इन्दौर के दीवान थे, श्री चादमलजी बाफणा रतलाम के नगरसेठ थे और दीवान बहादुर सेठ केसरीसिंहजी कोटा के राज्यमान्य थे । उदयपुर में भी यह १. म० विनयसागरः खरतरगच्छ का इतिहास, पृ. सं. २५२-२५३. Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनुसन्धान ३३ परिवार राज्यमान्य रहा है। वर्तमान में इन पाँचों भाईयों के वंशज भित्रभिन्न स्थानों इन्दौर, रामगंज मंडी, झालावाड़, कलकत्ता, आदि में और रतलाम-कोटा परिवार के बुद्धिसिंहजी बाफणा विद्यमान हैं । इस तीर्थ-यात्रा का ऐतिहासिक वर्णन जैसलमेर के पास स्थित अमर-सागर में बाफणा हिम्मतराजजी के मंदिर में शिलापट्ट पर अंकित है । इस शिलापट्ट की प्रशस्ति श्री पूरणचन्दजी नाहर द्वारा सम्पादित जैन लेख संग्रह, तृतीय खण्ड, जैसलमेर के लेखांक २५३० पर प्रकाशित है। स्वनामधन्य मुंबई निवासी सेठ मोतीसा के अनुरोध पर जिनमहेन्द्रसूरिजी बम्बई पधारे और सम्भवतः भायखला दादाबाड़ी की प्रतिष्ठा भी इन्होंने की थी । सम्वत् १८९३ में शत्रुजय तीर्थ पर सेठ मोतीसा द्वारा कारित मोती-वसही टोंक की प्रतिष्ठा भी इन्होंने करवाई थी । सम्वत् १९०१ पोष सुदि पूनम को रतलाम में बाबा साहब के बनवाये हुए ५२ जिनालय मन्दिर की प्रतिष्ठा भी इन्होंने करवाई थी। इस प्रतिष्ठा के समय इनके साथ ५०० यतियों का समुदाय था । सम्वत् १९१४ भाद्रपद कृष्णा ५ को मण्डोवर में आपका स्वर्गवास हुआ । जोधपुर नरेश, उदयपुर नरेश आपके परम भक्त थे । आपके द्वारा प्रतिष्ठित सैकडों मूर्तियाँ आज भी प्राप्त हैं । इनके पाट पर क्रमश: जिनमुक्तिसूरि, जिनचन्द्रसूरि और जिनधरणेन्द्रसूरि विराजमान हुए । वर्तमान में इस शाखा में कोई श्रीपूज्य नहीं है । प्रायः यति समाज भी समाप्त हो चुका है । मूल विज्ञप्तिपत्र इस प्रकार है : श्रीगौतमाय नमः ॥ नम:श्रीवर्धमानाय सर्वकलनाय ॥ ॥ प्रत्यूहव्यूहप्रमथनाय श्रीसाधुगणाधीशाय नमः ॥ स्वस्तिश्रीवरवर्णिनी प्रियतमं विश्वत्रयैकाधिपं, प्रत्यूहप्रशमाय कामदमपि प्रेष्ठं परं कामदम् । प्रास्ताकं पुरुहूतपूजितपदं पार्श्वप्रभुं पावनं, प्रख्यातं प्रणिपत्य सत्यमनसा कायेन वाचापि च ॥१॥ Page #8 -------------------------------------------------------------------------- ________________ September-2005 15 सत्यासेचनके सुजेशलमहादुर्गे पुरे तस्थुषां, चातुर्मास्यविधानसाधनकृते श्रीपूज्यराजामिदम्, विज्ञप्तिच्छदनं प्रमोदसदनं पत्पद्मयोः प्राभृती-- कुर्वे प्राकृतबन्धुरं गुरुधियः शश्वत् क्रियासुः कृपाम् ॥२॥ द्वाभ्यां युग्मम् सोत्थि सिरिसंतिजिणं पणमिऊण सिरिजेसलमेरुणयरपवरे पुज्जा परमपुज्जा उत्तमा उत्तमुत्तमा जातिसंपन्ना कुलसंपन्ना बलसंपन्ना रूवसंपन्ना लज्जालाधवसंपन्ना सुयपुण्णा जियकोहा जियमाणा जियमाया जियलोहा जियनिद्दा जियइंदिया जियपरीसहा खंतिप्पहाणा मुत्तिप्पहाणा भव्ववरपुंडरीया पवरमुहसिरीया सुगहियचरित्तहिरीया पुण्णचंदविसालकंतवयणा अमियमहुरवयणा करुणा भरमंथरनयणा अमियवरगुणभायणत्तणेण अहरीकयगयणा अणेगच्छेगकरविचित्तनायकहणेण रंजियसयलसयणा महिसनाणज्झाणसप्पहविद्धंसकयहत्थदुट्ठमयणा कयाखिलजयजंतुजयणा निद्देसट्टियनरनियरेहि सययकयभयणा सज्जनगुणाणुरत्ता सयलसुहलक्खणलियगत्ता कारुण्णदेसण्णया सत्थीकयसव्वअइदुग्घडसत्थघडण(णा)वक्खाणविहिम्मि विहियपडुनिरुत्ता आइण्णवलेसमुक्किट्ठसूरिगुणजुत्ता चेट्ठिगियाईणं लद्धलक्खत्तणेण वित्तासियनियडिधुज्जधुत्ता नियमिहाणसईवासइसमरियसुद्धसुत्ता विस्सविस्सपसरिय-पवरपण्डुरजसेण विजियमत्तसुत्ता अट्ठमिहिमकिरण-पमाणपडिपुण्णपुण्णभाला गरिदुगुणविसाला सव्वसमयमाणसके लिकरणरायमराला विसयविवागपयडीकरणाकलुससलिणेण विज्झवियवम्महजलणजाला जियदुद्धरमयणा भवियवरपुण्डरीयविबोहणे सहस्सकिरणा चंदेव सीयलीकयक-सायपरिभवियसयलसत्तगणा वियसियकु मुयनयणा महुरवरवयणरंजियसयणा नाणाइप्पहाणा गुणलयणा सयलसूरिगुणनिहाणा, किं बहुणा ? जाव कुत्तियावणब्भूया जिणागमजलनिहिपारगा भट्टारगकुलप्पवरा जंगमजुगप्पहाण-भटारगा सिरि १०८ सिरिसिरिसिरिसिरिसिरिजिणमहिदसूरिसूरिनायगा सुविणीयपाठगवाचग- . साहुसीसगणसपरिवारा तेपई सिरिपल्लियपुरिवराओ' दंसणाभिलासी २. भिन्न लिपि में किनारे पर किसी ने "पल्लयपुरिवराओ" के स्थान पर "खाचरोधनगराओ" लिखा है । वह भ्रामक है । क्योंकि आगे पत्र में संघ की ओर से "पालीखेत्र लायक है जीणसु पालीखेत्र में" लिखा गया है। Page #9 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनुसन्धान ३३ चलणपरियरियापरायणो आणाकारी सयलसावगजणसंघो सिरिपुज्जाणं वरभत्तीए अभिवंदिऊण विपत्तिं विण्णव । तंजहा मायंडमंडलावत्तप्पमाणपयाहिणेण परिमिया भुज्जो भुज्जो दुवालसावत्तवंदणावसेया तहा इत्थ सिरिपुज्जाणं पसायओ सावगाणं सयलसुहमत्थि । सिरिपुज्जाणं साहुसीसपरियरसहियाणं सुहसायकुसलखेमाण पवति सया समीहाओ ( मो ? ) । अवरं च - सिरिपुज्जाणं पज्जोसवणसव्वोदतसंसूयगो किवापत्तो समागओ । अन्ने जे सावगाणं नाणं पत्ता दिना ते सव्वेसिं हत्थे पत्तेयं समप्पिया । पत्तमज्झत्थसमायारवायणाओ अईव आणंदो सिरिपुज्जचलणफासणक्कप्पो पयडीहुओ, बहूणं भव्वाणं सुहभावणा विवड्ढिया । तहा य 16 इत्थ सिरिपज्जोसवणापव्वराओप्पहाणप्पबलवरतवनियमपोसहोववास पडिक्कमणेहिं महिमभरो जाओ । सिरिकप्पसुत्तस्स नव वक्खाणा बहुअविग्घेण अईवदित्ता जाया । वक्खाणं सोऊण बहूहिं जणेहिं कंदमूलराइभोयणपमुहमकज्जं परिहरियं । तहा य सावय - सावियाण मज्झे छट्ट-अट्ठम- दसम दुवालसाइबहुविहो तवो जाओ । मासक्खमणमेगं चंपाभिहाणयाए सावियाए कयं । तहा संवच्छरि पडिक्कमणं एगसत्तरिसावगेहि कयं । तत्थ य चत्तारि सावगेहिं गोलेछा भैरुदास, कटारीया छोटमल्ल उमेदमल्ल, बलाही गुमांनचंद, चोपडा सोभाचंद सुकलचंद - नामेहिं सव्वेसि पडिक्कमणकारगाणं सिरिफलाणि पत्तेयं दित्राणि । संवच्छरिपारणगे पंचमिदिणे सव्वेहिं खरतरगणसावगेहिं साहम्मियवच्छल्लं कयं तत्थ सावगा तिन्नि सया भुत्ता । अईव सोहा पाउन्भूया इच्चाइ धम्मकिच्चाणि हरिसेण संजाया । तहा " - आसाढसुदिबीयबुहवाराओ सिरिआयारपढमअंगो वक्खाणे संघेण जयसेहरमुणिसगासाओ मंडाविओ, उवरिं महीवालचरित्तो भावणाहिगारे वचिज्जइ । तत्थ बहवे सावगा सुणणत्थमागच्छंती । जिणवाणीनीरकन्नफासाओ कम्मपंकमलसरीरत्थं धोवंति । संपयं लोगविजयाभिहाणबीयज्झयणस्स बितिउद्देसगस्स वक्खाणं हवइ । सिरिपुज्जाणं पभावओ बहुजणाणं धम्मफलं मूलं वडिस एसा सिद्धंतसुणणदुल्लहसामग्गी अम्हारिसाणं मंदभग्गजणाणं पुज्जप्पभावं विणा अन्नत्थ कत्थ मिलइ । तहा य Page #10 -------------------------------------------------------------------------- ________________ September-2005 17 जं किंचि संवच्छरंसि सावगेहि सिरिपुज्जाणं दुटुं विणयपडिवत्तिरहियं समायरियं सेत्तं गणवईहिं खमियव्वं उवसमियव्वं खमियमुचियढे सुयसायरटे बउसुयहरटे पसायपरटे सिरिपुज्जाणं सावगा खमंति उवसमंति, सिरिपुज्जेहि वि उवसमियव्वं । वयं सेवगा म्हि सेवगाणं भवयाणमेव लज्जा अस्थि, अम्हाणं तु सिरिमयाणमेव आधारोत्थि । किंबहुणा लिहिएण ? सावगजणेसु किवापीइभावो वड्डेयवो, न छड्डेयव्वो सिणेहो, तुब्भे खमासायरा गुणग्गाहिणो गुणनिहिणो परुवयारपरा विज्जह । तहा य 'जोगखेमकरो नाहो' इय निरुत्ती सिरिमएसु विज्जए । धन्ना तत्थ पुरनिवासिणो भवियजणा जे सिरिपुज्जाणं दंसणं निच्चं करिति, तुज्झ वयणकमलविणिग्गया अमयसरोवमा वाणी सुणंति । अम्हाणं दसणाभिलासा एवं । यतः - यथा चकोरस्तुहिनांशुबिम्बं, यथा रथाङ्गो दिवसाधिनाथम् । यथा मयूरो जलदं समन्तात्, तथा भवद्दर्शनलालसोऽहम् ।। पुण पत्तप्पदाणेण धम्मनेहलया विवड्णीया । यतः मनोभूमौ जाता प्रकृतिचपला या विधिवशात्, गुरो वृद्धि नेया प्रचुरगुणपुष्पप्रसविनी । तथा संसेक्तव्या स्मृतिमुपगतैर्वाक्यसलिलै येथेयं न म्लानिर्भवति मृदुलस्नेहलतिका । तहा अम्हाओ पुज्जभत्ती हीणपुन्नत्तणओ किमवि न संपज्जइ तस्सावराहो खमियव्वो । तहा तत्थ वायगसिरि ५ सागरचंदगणिमादीणं सव्वसाहूणं वंदणा कहेयव्वा । इत्थजोग्गं भत्तिकिच्चं लिहेयव्वं । पयमत्तक्खरहीणाहियस्सावराहो सोहेयव्वे(सहेयव्वो?) । वरिसे अट्ठारसयसत्तणउयाहिए कत्तिय-धवलसत्तमीए रविवारदिणे एसो विष्णत्तिलेहो जयसेहरेण मुणिणा लिहिओ । तथा श्रीसंघनी वीनती आ है - अठै श्रीसंघनै कीरपा कर वंदावसी। अप्रं च अठारा खेत्र जोग्य जांणने श्रीजी महाराज पं । श्री नेमचंदजी मनरूपजी नगराजजी जसराजजी नै मेलाया सो श्री जयनधरमनो बोहत उदोत हुवो । श्रीसंघ सरावक सरावीका ने वखांण वांणी सुणने धरमध्यांननो Page #11 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 18 अनुसन्धान ३३ लाभ विशेष हुंवो, सु आवता चोमासारो आदेश ईणांने ही लीखावसी । आगे तो सारी (थारी ? ) मरजादा । उपासरारो हक सारो उठ गयो थो सो ईणांने मेलणासुं सारी वातरी मरजादरी वधोतर हुई । पंडित है, पालिखेत्र लायक है, जीणसु पालीखेत्र में तो वरस दोय तीन अठे ईणांनै ही रखायां खेत्र सुधरसी ने घणा जीव धरम पांमसी, बडो लाभ उपजसी । । लीखतु नाबरीया भगवानदास संतोकचंद री वंदणा वर १०८ अवधारसी घणा मानसुं | ल || परताबचंद रा वंदना बचावसी १०८ । लासा. अमीचंद साकरचंद नी वंदना वार १०८ अवधारसी घणा बहुमानथी द० लखमीचंद | लखतु गोलेछा भेरोंदास रखबचंद रा वंदणा १०८ वंचीओ धरम सनेह रखावसी । लीखतु कटारीया सेरमल उमेदमलरी वंदना १०८ वार अवधारसी | लीखतु कटारीया जेठमल फतहमलरी वंदना १०८ वार वंचावसी धरम सनेह रखावसी । लीखतु संघवी भींवराज नवलमल अर संघवी समस्तकी वंदना १०८ अवधारसीजी घणा मान सद० नवलमल रा छः । लीखतु | लीखतु लालचन्द हरकचन्द हलावार की वंदना १०८ वार अवधारसी । लीखतु संतोकचन्द नथमल गुलेछा री वंदना १०८ वार अवधारसी । लीखतु भंणसाली रूपचन्द रखबदास री वंदणा १०८ वार अवधारसी । लीखतु पारसचन्द सूरचन्द सुकलचन्द री वंदना १०८ वार अवधारसी । लोखतु । लीखतु ********** लालचन्द मोतीचन्दरी वंदना १०८ वार अवधारसी वंदना १०८ वार अवधारसी Page #12 -------------------------------------------------------------------------- ________________ September-2005 / लीखतु पुगलिया धनसुख री वंदणा 108 वार अवधारसी करपा करने पधारसी और..... / लीखतु गोलेछा अगरचन्द आलमचन्द री ....... वंदणा 108 वार करने अवधारसी / लीखतु सुभकरण सेसकरण * लूणियारी वंदणा मालम 108 वार होसी हस्तखत निहालचन्दरा छ : | लीखतु नथमल चपरोर बंदणा ......... 108 वार अवधारसी / लीखतु नगारामरा वंदणा वंचावसी वार 108 वार वंचावसी धरम सनेह रखा जण वैसे ही रखावसी / लीखतु ..... साल लखमीचन्द अर समसतरी वंदणा 108 वार वंचावसी / लीखतु पारख उमेदमल री वंदणा 108 वार वंचावसी | ली खजांची माणकचन्द अगरचन्द री वंदणा 108 वार वंचावसी / ली माणकचन्द कुनणमल .......... वंदणा श्री 108 वार वंचावसी ! लीखतु कांकरीया भीवराज री वंदणा 108 वार वंचाक्सी / लीखतु ............. वंदणा 108 वार वंचावसी घणा मानसु करी ने / लीखतु नाहटा दौलतराम बुधमल जेठमल री वंदणा 108 वार वंचावसी अवधारसी धमसनेह रखावसी, / लीखतु लधाराम ........ री वंदणा वार 108 अवधारसी धमसनेह रखावसी जी मोहणोत आज्ञाकारी वनेचन्द री वंदणा वार 108 मालम होसी /