Book Title: Jatasinh Nandi ka Varangcharit aur uski Parampara
Author(s): Sagarmal Jain
Publisher: Z_Shwetambar_Sthanakvasi_Jain_Sabha_Hirak_Jayanti_Granth_012052.pdf
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Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जटासिंहनन्दि का वराङ्गचरित और उसकी परम्परा जटासिंहनन्दि और उनके वराङ्गचरित के दिगम्बर परम्परा से फिर भी सर्वप्रथम पुत्राटसंघीय जिनसेन के द्वारा जटासिंहनन्दि का भिन्न यापनीय अथवा कूर्चक संघ से सम्बन्धित होने के कुछ प्रमाण आदरपूर्वक उल्लेख यह बताता है कि वे सम्भवत: यापनीय परम्परा से उपलब्ध होते हैं । यद्यपि श्रीमती कुसुम पटोरिया के अनुसार वराङ्गचरित सम्बन्धित रहे हों। क्योंकि पुन्नाटसंघ का विकास यापनीय पुन्नागवृक्ष में ऐसा कोई भी अन्तरङ्ग साक्ष्य उपलब्ध नहीं है जिससे जटासिंहनन्दि मूलगण से ही हुआ है ।१५ पुनः श्वेताम्बर आचार्य उद्योतनसूरि ने यापनीय और उनके ग्रन्थ को यापनीय कहा जा सके, किन्तु मेरी दृष्टि में श्रीमती आचार्य रविषेण और उनके ग्रन्थ पद्मचरित के साथ-साथ जटासिंहनन्दि कुसुम पटोरिया का यह कथन समुचित नहीं है । सम्भवत: उन्होंने मूल के वराङ्ग-चरित का उल्लेख किया है । इससे ऐसी कल्पना की जा ग्रन्थ को देखने का प्रयत्न ही नहीं किया और द्वितीयक स्रोतों से उपलब्ध सकती है कि दोनों एक ही परम्परा के और समकालिक रहे होंगे। पुनः सूचनाओं के आधार पर ऐसा मानस बना लिया। श्वेताम्बर और यापनीय में एक-दूसरे के ग्रन्थों के अध्ययन की परम्परा ___ मैंने यथासम्भव मूल ग्रन्थ को देखने का प्रयास किया है और रही है । यापनीय आचार्य प्राचीन श्वेताम्बर आचार्यों के ग्रन्थों को पढ़ते उसमें मुझे ऐसे अनेक तत्त्व मिले हैं जिनके आधार पर वराङ्गचरित और थे। जटासिंहनन्दि के द्वारा प्रकीर्णकों, आवश्यकनियुक्ति तथा सिद्धसेन उसके कर्ता जटिल मुनि या जटासिंहनन्दि को दिगम्बर परम्परा से इतर के सन्मति तर्क और विमलसूरि के पउमचरिय का अनुसरण यही यापनीय अथवा कूर्चक परम्परा से सम्बद्ध माना जा सकता है । इस बताता है कि वे यापनीय सम्प्रदाय से सम्बन्धित रहे होंगे । क्योंकि विवेचन में सर्वप्रथम तो मैं श्रीमती कुसुम पटोरिया के द्वारा प्रस्तुत उन यापनीयों द्वारा इन ग्रन्थों का अध्ययन-अध्यापन एवं अनुसरण किया बाह्य साक्ष्यों की चर्चा करूंगा जिनके आधार पर जटासिंहनन्दि के जाता था, इसके अनेक प्रमाण दिए जा सकते हैं । यह हो सकता है यापनीय होने की संभावना को पुष्ट किया जाता है । उसके पश्चात् मूल कि जटासिंहनन्दि यापनीय न होकर कूर्चक सम्प्रदाय से सम्बन्धित रहे ग्रन्थ में मुझे दिगम्बर मान्यताओं से भिन्न जो तथ्य उपलब्ध हुए हैं, उनकी हों और यह कूर्चक सम्प्रदाय भी यापनीयों की भांति श्वेताम्बरों के अति चर्चा करके यह दिखाने का प्रयत्न करूंगा कि जटासिंहनन्दि यापनीय निकट रहा हो । यद्यपि इस सम्बन्ध में विस्तृत गवेषणा अभी अपेक्षित अथवा कूर्चक परम्परा में से किसी एक से सम्बद्ध रहे होंगे। है। जटासिंहनन्दि यापनीय संघ से सम्बन्धित थे या कूर्चक संघ २. जटासिंहनन्दि यापनीय परम्परा से सम्बद्ध रहे हैं, इस से सम्बन्धित थे, इस सम्बन्ध में तो अभी और भी सूक्ष्म अध्ययन की सम्बन्ध में जो बाह्य साक्ष्य उपलब्ध हैं उनमें प्रथम यह है कि कन्नड़ कवि आवश्यकता है किन्तु इतना निश्चित है कि वे दिगम्बर परम्परा से भिन्न जन्न ने जटासिंहनन्दि को 'काणूरगण' का बताया है। अनेक अभिलेखों अन्य किसी परम्परा से सम्बन्धित हैं क्योंकि उनकी अनेक मान्यताएं से यह सिद्ध होता है कि यह काणूरगण प्रारम्भ में यापनीय परम्परा का वर्तमान दिगम्बर परम्परा के विरोध में जाती हैं । आइए, इन तथ्यों की एक गण था । इस गण का सर्वप्रथम उल्लेख सौदंती के ई० सन् समीक्षा करें - दसवीं शती (९८८) के एक अभिलेख में मिलता है । इस अभिलेख १. जिनसेन प्रथम (पुत्राटसंघीय) ने अपने हरिवंशपुराण (ई० में गण के साथ यापनीय संघ का भी स्पष्ट निर्देष है ।१६ यह सम्भव सन् ७८३) में, जिनसेन द्वितीय (पंचस्तूपान्वयी) ने अपने आदि पुराण है कि इस गण का अस्तित्व इसके पूर्व सातवीं-आठवीं सदी में भी रहा में, उद्योतनसूरि (श्वे० आचार्य) ने अपनी कुवलयमाला (ई०सन् ७७८) हो । डॉ० उपाध्ये जन्न के इस अभिलेख को शंका की दृष्टि से देखते में, राचमल्ल ने अपने कन्नड़ गद्य ग्रन्थ त्रिषष्ठिशलाकापुरुष (ई० सन् हैं। उनकी इस शंका के दो कारण हैं- एक तो यह कि गणों की उत्पत्ति ९७४-८४) में, धवल कवि ने अपभ्रंश भाषा में रचित अपने हरिवंश और इतिहास के विषय में पर्याप्त जानकारी का अभाव है, दूसरे में, जटिलमुनि अथवा उनके वरांगचरित का उल्लेख किया है। इनके जटासिंहनन्दि जन के समकालीन भी नहीं हैं।७। यह सत्य है कि दोनों अतिरिक्त भी पम्प ने अपने आदि पुराण (ई० सन् ९४१) में, नयनसेन में लगभग पांच सौ वर्ष का अन्तराल है किन्तु मात्र कालभेद के कारण ने अपने धर्मामृत (ई० सन् १११२) में और पार्श्वपंडित ने पार्श्वपुराण जन्न का कथन भ्रांत हो, हम डॉ० उपाध्ये के इस मन्तव्य से सहमत (ई० सन् १२०५) में, जन्न ने अपने अनन्तनाथ पुराण (ई० सन् नहीं हैं । यह ठीक है कि यापनीय परम्परा के काणूर आदि कुछ गणों १२०९) में,° गुणवर्ग द्वितीय ने अपने पुष्पदंतपुराण (ई० सन् १२३०)१९ का उल्लेख आगे चलकर मूलसंघ और कुन्दकुन्दान्वय के साथ भी में, कमल भवन ने शांतिनाथ पुराण (ई० सन् १२३३)२२ में और हुआ है किन्तु इससे उनका मूल में यापनीय होना अप्रमाणित नहीं हो महाबल कवि ने अपने नेमिनाथ पुराण (ई० सन् १२५४) में,१३ जाता। काणूरगण के ही १२वीं शताब्दी तक के अभिलेखों में यापनीय जटासिंहनन्दि का उल्लेख किया है। संघ के उल्लेख उपलब्ध होते है (देखें- जैन शिलालेख संग्रह, भाग इन सभी उल्लेखों से यह ज्ञात होता है कि जटासिंहनन्दि ५, लेख क्रमांक १-७) । इसके अतिरिक्त स्वयं डॉ० उपाध्ये ने १२ वीं यापनीय, श्वेताम्बर और दिगम्बर तीनों ही परम्पराओं में मान्य रहे हैं। शताब्दी के पूर्वार्द्ध के कुछ शिलालेखों में काणूरगण के सिंहनन्दि के Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६९४ । उल्लेख को स्वीकार किया है१९ । यद्यपि इन लेखों में काणूरगण के इन सिंहनन्दि को कहीं मूलसंघ और कहीं कुन्दकुन्दान्वय का बताया गया है। लेकिन स्मरण रखना होगा कि यह लेख उस समय का है जब यापनीय गण भी अपने को मूलसंघ से जोड़ने लगे थे। पुनः इन लेखों में सिंहनन्दि का कारगण के आद्याचार्य के रूप में उल्लेख है। उनकी परम्परा में प्रभाचन्द्र, गुणचन्द्र, माघनन्दि, प्रभाचन्द्र, अनन्तवीर्य, मुनिचन्द्र प्रभाचंद आदि का उल्लेख है - यह लेख तो बहुत समय पश्चात् लिखा गया है। पुनः इन लेखों में भी प्रारम्भ में जटासिंहनन्दि आचार्य का उल्लेख है, वहां न तो मूलसंघ का उल्लेख है और न कुन्दकुन्दान्वय का वहां मात्र काणूरमण का उल्लेख है। यह कारगण प्रारम्भ में यापनीय गण था। अतः सिद्ध है कि जटासिंहनन्दि कारगण के आद्याचार्य रहे होंगे। इन शिलालेखों में सिंहनन्दि को गंग वंश का समुद्धारक कहा गया है। यदि गंग वंश का प्रारम्भ ई० सन् चतुर्थ शती माना जाता है तो गंगवंश के संस्थापक सिंहनन्दि जटासिंहनन्दि से भिन्न होने चाहिए । पुनः काणूरगण का अस्तित्व भी ई० सन् की ७ वी ८ वीं शती के पूर्व ज्ञात नहीं होता है। सम्भावना यही है कि जटासिंहनन्दि कारगण के आद्याचार्य रहे हों और उनका गंग वंश पर अधिक प्रभाव रहा हो । अतः आगे चलकर उन्हें गंगवंश का उद्धारक मान लिया गया हो तथा गंगवंश के उद्धार की कथा उनसे जोड़ दी गई हो । ३. जन ने अनन्तनाथ पुराण में न केवल जटासिंहनन्दि का उल्लेख किया है अपितु उनके साथ-साथ ही काणूरगण के इन्द्रनन्दि आचार्य का भी उल्लेख किया है। हम छेदपिण्ड शास्त्र की परम्परा की चर्चा करते समय अनेक प्रमाणों से यह सिद्ध कर चुके हैं कि जटासिंहनन्दि के समकालीन या उनसे किंचित् परवर्ती ये इन्द्रनन्दि रहे हैं२९ जिनका उल्लेख शाकटायन आदि अनेक यापनीय आचार्यों ने किया है। जन्म ने जटासिंहनन्दि और इन्द्रनन्दि दोनों को काणूरगण का बताया है। इससे उनके कान में अविश्वसनीयता जैसी कोई बात नहीं लगती है। जैन विद्या के आयाम खण्ड ६ ४. कोप्पल में उपलब्ध (पुरानी कन्नड़ में) एक लेख भी उपलब्ध होता है जिसके अनुसार जटासिंहनन्दि के चरण चिह्नों को चाव्वय ने बनवाया था। इससे यह सिद्ध होता है कि जटासिंहनन्दि का समाधिमरण सम्भवत: कोप्पल में हुआ हो । पुनः डॉ० उपाध्ये ने गणभेद नामक अप्रकाशित कन्नड़ ग्रंथ के आधार पर यह भी मान लिया है कि कोप्पल या कोपन यापनीयों की मुख्य पीठ थी अतः कोप्पल / कोपन से सम्बन्धित होने के कारण जटासिंहनन्दि के यापनीय होने की सम्भावना अधिक प्रबल प्रतीत होती है। ५. यापनीय परम्परा में मुनि के लिए 'यति' का प्रयोग अधिक प्रचलित रहा है । यापनीय आचार्य पाल्यकीर्ति शाकटायन को 'यतिग्रामाग्रणी' कहा गया है । हम देखते हैं कि जटासिंहनन्दि के इस वराङ्गचरित में भी मुनि के लिए यति शब्द का प्रयोग बहुतायत से हुआ है ग्रन्थकार की यह प्रवृत्ति उसके यापनीय होने का संकेत करती है। ६. वराङ्गचरित में सिद्धसेन के "सन्मति तर्क" का बहुत अधिक अनुसरण देखा जाता है। अनेक आधारों से यह सिद्ध होता है कि सन्मति तर्क के कर्त्ता सिद्धसेन किसी भी स्थिति में दिगम्बर परम्परा- से सम्बद्ध नहीं रहे हैं। यदि वे पाँचवी शती के पश्चात् हुए हैं तो निश्चित ही श्वेताम्बर हैं और यदि उसके पूर्व हुए हैं तो अधिक से अधिक श्वेताम्बर और यापनीय परम्परा की पूर्वज उत्तरभारतीय निन्य धारा से सम्बद्ध रहे हैं। उनके 'सन्मति तर्क' में क्रमवाद के साथ-साथ युगपदवाद की समीक्षा, आगमिक परम्परा का अनुसरण, कृति का महाराष्ट्री प्राकृत में होना आदि तथ्य इस संभावना को पुष्ट करते हैं। वराङ्गचरित के २६ वें सर्ग के अनेक श्लोक 'सन्मति तर्क' के प्रथम और तृतीय काण्ड की गाथाओं का संस्कृत रूपांतरण मात्र लगते हैं - देखें - वराङ्गचरित २६/५२ २६/५३ २६/५४ २६/५५ २६/५७ २६/५८ २६ / ६० २६ / ६१ २६ / ६२ २६/६३ २६ / ६४ सन्मति तर्क १ / ६ १/९ १/११ १/१२ १/१७ १/१८ १२२१ १/२५ १ / २३-२४ १/२५ १/५१ वराङ्गचरित २६ / ६५ २६ / ६९ २६/७० २६/७१ २६/७२ २६/७८ २६/९० २६ / ९९ २६/१०० सन्मति तर्क १/५२ ३/४७ ३/५४ ३/५५ ३/५३ ३/६९ ३/६९ ३/६७ ३/६८ वराङ्गचरितकार जटासिंहनन्दि द्वारा सिद्धसेन का यह अनुसरण इस बात का सूचक है कि वे सिद्धसेन से निकट रूप से जुड़े हुए हैं I सिद्धसेन का प्रभाव श्वेताम्बरों के साथ-साथ यापनीयों और वापनीयों के कारण पुत्राटसंघीय आचार्यों एवं पंचस्तूपान्वय के आचार्यों पर भी देखा जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि जटासिंहनन्दि उस यापनीय अथवा कूर्चक परम्परा से सम्बन्धित रहे होंगे जो अनेक बातों में श्वेताम्बरों की आगमिक परम्परा के निकट थी। यदि सिद्धसेन श्वेताम्बर और यापनीयों के पूर्वज आचार्य हैं तो यापनीय आचार्यों के द्वारा उनका अनुसरण संभव है । ७. वराङ्गचिरत में, अनेक संदर्भों में आगमों, प्रकीर्णकों एवं नियुक्तियों का अनुसरण किया गया है। सर्वप्रथम तो उसमें कहा गया है "वराङ्गमुनि ने अल्पकाल में ही आचारांग और अनेक प्रकीर्णकों का सम्पर्क अध्ययन करके क्रमपूर्वक अंगों एवं पूर्वो का अध्ययन किया। इस प्रसंग में प्रकीर्णकों का उल्लेख महत्त्वपूर्ण है। विषयवस्तु की दृष्टि से तो इसके अनेक सर्गों में आगमों का अनुसरण देखा जाता है। विशेष रूप से स्वर्ग, नरक, कर्मसिद्धांत आदि सम्बन्धी विवरण में उत्तराध्ययन सूत्र का अनुसरण हुआ है। जटासिंहनन्दि ने चतुर्थ सर्ग में जो कर्म सिद्धांत का विवरण दिया है उसके अनेक श्लोक अपने प्राकृत रूप में उत्तराध्ययन के तीसवें कर्म प्रकृति नामक अध्ययन में यथावत् मिलते हैं वराङ्गचरित उत्तराध्ययन ३० / २-३ ४/२-३ . Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जटासिंहनन्दि का वराङ्गचरित और उसकी परम्परा ६९५ ३०/५-६ ४/२४-२५ ये तीन गाथाएं आतुरप्रत्याख्यान से सीधे वराङ्गचरित में गईं ३०/८-९ ४/२५-२६-२७ या मूलाचार के माध्यम से वराङ्गचरित में गई यह एक अलग प्रश्न है। ३०/१०-११ ४/२८-२९ मूलाचार यापनीय ग्रन्थ है। अत: यदि ये गाथाएं मूलाचार से भी ली गई ३०/१२ ४/३३ (आंशिक) हों तो भी जटासिंहनन्दि और उनके ग्रन्थ वराङ्गचरित के यापनीय होने की ३०/१३ ४/३५ (आंशिक) ही पुष्टि होती है । यद्यपि कुन्दकुन्द के ग्रन्थों में भी ये गाथाएं पायी जाती ३०/१५ ४/३७ हैं, किन्तु इतना निश्चित है कि कुन्दकुन्द ने भी ये गाथाएं मूलचार से ही यद्यपि सम्पूर्ण विवरण की दृष्टि से वराङ्गचरित का कर्म सिद्धान्त ली होंगी । और पुन: मूलाचार में आतुरप्रत्याख्यान की ली गई सभी सम्बन्धी विवरण उत्तराध्ययन की अपेक्षा विकसित प्रतीत होता है । इसी गाथायें समाहित कर ली गई हैं, अतः अन्ततोगत्वा तो ये गाथायें आतर प्रकार की समानता स्वर्ग-नरक के विवरण में देखी जाती है। उत्तराध्ययन ली में ३६ वें अध्ययन की गाथा क्रमांक २०४ से २१६ तक वराङ्गचरित के आवश्यकनियुक्ति की भी निम्न दो गाथाएं वराङ्गचरित में नवें सर्ग के श्लोक १-१२ तक किंचित् शाब्दिक परिवर्तन के साथ संस्कृत रूप में पायी जाती हैं। आश्चर्य की बात यह है कि जटासिंहनन्दि भी आगमों हयं नाणं कियाहीणं, हया अन्नाणओ किया । के अनुरूप बारह देवलोकों की चर्चा करते हैं। पासंतो पंगुलो दड्डो घावमाणो अ अंघओ ।।१।। इसी प्रकार प्रकीर्णक साहित्य की भी अनेक गाथाएँ वराङ्गचरित में अपने संस्कृत रूपांतरण के साथ पायी जाती हैं । देखें - संयोगसिद्धिइ फलं वयंति, न हु एकचक्केण रहो पयाइ । अंघो य पंगूय वणे समिच्चा, ते संपउत्ता नगरं पविट्ठा ।।२।। दंसणभट्ठो भट्ठो, न हु भट्ठो होइ चरणपब्मट्ठो । दसणमणुपत्तस्स उ परियडणं नत्थि संसारे ।।६५ ।।। तुलनीय - दसणभट्ठो भट्ठो, दंसणभट्ठस्स नत्थि निव्वाणं ।। क्रियाहीनं च यज्ज्ञानं न तु सिद्धिं प्रयच्छति । सिज्झंति चरणरहिया, दंसणरहिया न सिझंति ।।६६।। परिश्यन्यथा पंगु मुग्धो दग्धो दवाग्निना ।।९९।। - भक्तपरिज्ञा। तौ यथा संप्रयुक्तौ तु दवाग्निमधिगच्छतः । तुलनीय . तथा ज्ञानचरित्राभ्यां संसारान्मुच्यते पुमान् ।।१०१।। दर्शनाद्मष्ट एवानुभ्रष्ट इत्यभिधीयते । -वराङ्गगचरित, सर्ग २६ न हि चारित्रविभ्रष्टो भ्रष्ट इत्युच्यते बुधैः ।।१६।। आगम, प्रकीर्णक और नियुक्ति साहित्य का यह अनुसरण महता तपसा युक्तो मिथ्यावृष्टिरसंयतः । जटासिंहनन्दि और उनके ग्रंथ को दिगम्बरेतर यापनीय या कूर्चक तस्य सर्वज्ञसंदृष्ट्या संसारोऽनन्त उच्यते ।।९७।। सम्प्रदाय का सिद्ध करता है। -वराङ्गचरित, सर्ग २६ ८. जटासिंहनन्दि ने न केवल सिद्धसेन का अनुसरण किया है इसी प्रकार वराङ्गचरित के निम्न श्लोक आतुर प्रत्याख्यान में पाए अपितु उन्होंने विमलसूरि के पउमचरिय का भी अनुसरण किया है । चाहे जाते हैं। यह अनुसरण उन्होंने सीधे रूप से किया हो या रविषेण के पद्मचरित के एकस्तु में शाश्वतिकः स आत्मा सदृष्टिसज्ज्ञानगुणैरूपेतः । माध्यम से किया हो किन्तु इतना सत्य है कि उन पर यह प्रभाव आया शेषाश्च में बाहातमाश्च भावाः संयोगसल्लक्षणलक्षितास्ते ।।१०१।। है । वराङ्गचरित में श्रावक के व्रतों की जो विवेचना उपलब्ध होती है वह संयोगतो दोषमवाप जीवः परस्परं नैकविधानुबन्धि । न तो पूर्णतः श्वेताम्बर परम्परा के उपासकदशा के निकट है और न तस्माद्विसंयोगमतो दुरन्तमाजीवितांतादहमुत्सृजामि ॥१०२ पूर्णत: दिगम्बर परम्परा द्वारा मान्य तत्त्वार्थ के पूज्यपाद् देवनन्दी के सर्वेषु भूतेषु मनः समं मे वैरं न मे केनचिदस्ति किंचित् । सर्वार्थसिद्धि के मूलपाठ के निकट है । अपितु वह विमलसूरि के आशां पुनः क्लेशसहस्त्रमूलां हित्वा समाधि लघु संप्रपद्ये ।।१०३॥ पउपचरिय के निकट है । पउमचरिय के समान ही इसमें भी देशावकासिक - वराङ्गचरित, सर्ग ३१ । व्रत का अन्तर्भाव दिव्रत में मानकर उस रिक्त स्थान की पूर्ति के लिए तुलनीय सलेखना को बारहवाँ शिक्षाव्रत माना गया है। कुन्दकुन्द ने भी इस एगो मे सासओ अप्या नाण-दसणसंजुओ। परम्परा का अनुसरण किया है। किन्तु कुन्दकुन्द विमलसूरि से तो सेसा मे बहिरा भावा सव्ये संजोगलक्खणा ।।२७॥ निश्चित ही परवर्ती हैं और सम्भवतः जटासिंहनन्दि से भी । अत: उनके संजोगमूला जीवेणं पत्त दुक्खपरंपरा । द्वारा किया गया यह अनुसरण अस्वाभाविक भी नहीं है । स्मरण रहे कि तम्हा संजोगसम्बन्ध सव्वं भावेण वोसिरे ।।२८।। कुन्दकुन्द ने त्रस-स्थावर के वर्गीकरण, चतुर्विध मोक्षमार्ग आदि के सम्बन्ध सम्मं मै सव्वभूएस वे मज्झ न केणई । में भी आगमिक परम्परा का अनुसरण किया है। स्पष्ट है कि विमलसरि आसाओ वोसिरित्साणं समाहिं पडिवज्जए ।।२२।। के पउमचरिय का अनुसरण रविषेण, स्वयंभू आदि अनेक यापनीय - आतुर प्रत्याख्यान आचार्यों ने किया है। अत: जटासिंहनन्दि के यापनीय होने की संभावना Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६९६ जैन विद्या के आयाम खण्ड-६ प्रबल प्रतीत होती है। मात्र एक बार दिगम्बर शब्द का प्रयोग मिला है। समान्यतया 'विशीर्णवस्त्रा' ९. जटासिंहनन्दि ने वराङ्गचरित के नवें सर्ग में कल्पवासी देवों शब्द का प्रयोग हुआ है । एक स्थल पर अवश्य मुनियों को निरस्त्रभूषा' के प्रकारों का जो विवरण प्रस्तुत किया है वह दिगम्बर परम्परा से भिन्न कहा गया है किन्तु निरस्त्रभूषा का अर्थ साज-सज्जा से रहित होता है, है। वैमानिक देवों के भेद को लेकर श्वेताम्बर और दिगम्बर परम्परा में नग्न नहीं। - ये कुछ ऐसे तथ्य हैं जिन पर वराङ्गचरित की परम्परा का स्पष्ट रूप से मतभेद है । जहाँ श्वेताम्बर परम्परा वैमानिक देवों में १२ निर्धारण करते समय गम्भीरता से विचार किया जाना चाहिए । मैं चाहूंगा विभाग मानती है वहाँ दिगम्बर परम्परा उनके१६ विभाग मानती है । इस कि आगे आने वाले विद्वान् सम्पूर्ण ग्रन्थ गम्भीरतापूर्वक आलोडन करके संदर्भ में जटासिंहनन्दि स्पष्ट रूप से श्वेताम्बर या आगमिक परम्परा के इस समस्या पर विचार करें। निकट हैं । वे नवें सर्ग के द्वितीय श्लोक में स्पष्ट रूप से यह कहते साध्वियों के प्रसंग में चर्चा करते समय उन्हें जीर्ण-शीर्ण वस्त्रों हैं कि कल्पवासी देवों के बारह भेद हैं। पुन: इसी सर्ग के सातवें श्लोक को धारण करने वाली अथवा विशीर्ण वस्त्रों से आवृत्त देह वाली कहा से नवें श्लोक तक उत्तराध्ययन सूत्र के समान उन १२ देवलोकों के नाम गया है। इससे भी यह सिद्ध होता है कि वराङ्गचरितकार जटासिंहनन्दि भी गिनाते हैं। यहाँ वे स्पष्ट रूप से न केवल दिगम्बर परम्परा से भिन्न को स्त्री दीक्षा और सवस्त्र दीक्षा मान्य थी । जबकि कुन्दकुन्द स्त्री दीक्षा होते हैं बल्कि किसी सीमा तक यापनीयों से भिन्न प्रतीत होते हैं । यद्यपि का सर्वथा निषेध करते है। स्मरण रखना होगा कि यापनीयों में प्रारम्भ में आगमों का अनुसरण करते ११. वराङ्गचरित में स्त्रियों की दीक्षा का स्पष्ट उल्लेख है। हुए १२ भेद मानने की प्रवृत्ति रही होगी किन्तु बाद में दिगम्बर परम्परा उसमें कहीं भी ऐसा उल्लेख नहीं है कि स्त्री को उपचार से महाव्रत होते या अन्य किसी प्रभाव से उनमें १६ भेद मानने की परम्परा विकसित हुई हैं जैसा कि दिगम्बर परम्परा मानती है । इस ग्रन्थ में उन्हें तपोधना, होगी। तत्त्वार्थसूत्र के सर्वार्थसिद्धि मान्य-पाठ में तथा तिलोयपण्णत्ति में अमित-प्रभावी, गणाग्रणी, संयमनायिका जैसे सम्मानित पदों से अभिहित इन दोनों ही परम्पराओं के बीज देखे जाते हैं । तत्त्वार्थसूत्र का सर्वार्थसिद्धि किया गया है। साध्वी वर्ग के प्रति ऐसा आदरभाव कोई श्वेताम्बर या मान्य यापनीय पाठ जहां देवों के प्रकारों की चर्चा करता है वहां वह १२ यापनीय आचार्य ही प्रस्तुत कर सकता है । अत: इतना निश्चित है कि का निर्देश करता है किन्तु जहाँ वह उनके नामों का विवरण प्रस्तुत जटासिंहनन्दि का वराङ्गचरित कुन्दकुन्द की उस दिगम्बर परम्परा का करता है तो वहां १६ नाम प्रस्तुत करता है। यतिवृषभ की तिलोयपण्णत्ति ग्रन्थ नहीं हो सकता जो स्त्रियों की दीक्षा का निषेध करती हो या उनके में भी १२ और १६ दोनों प्रकार की मान्यताएं होने के स्पष्ट उल्लेख उपचार से ही महाव्रत कहे गये हैं, ऐसा मानती हो । कुन्दकुन्द ने पाये जाते हैं। इससे स्पष्ट लगता है कि प्रारम्भ में आगमिक मान्यता सूत्रप्राभृत गाथा क्रमांक २५ में एवं लिङ्गप्राभृत गाथा क्रमांक २० में स्त्री का अनुसरण करते हुए यापनीयों में और यदि जटासिंहनन्दि कूर्चक हैं दीक्षा का स्पष्ट निषेध किया है। तो कूर्चकों में भी कल्पवासी देवों के १२ प्रकार मानने की परम्परा रही १२. वराङ्गचरित में श्रमणों और आर्यिकाओं को वस्त्रदान की होगी। आगे यापनीयों में १६ देवलोकों की मान्यता किसी अन्य परम्परा चर्चा है । यह तथ्य दिगम्बर परम्परा के विपरीत है। उसमें लिखा है कि के प्रभाव से आयी होगी। “वह नृपति मुनि पुङ्गवों को आहारदान, श्रमणों और आर्यिकाओं को वस्त्र १०. वराङ्गचरित में वरांगकुमार की दीक्षा का विवरण देते हुए और अन्नदान तथा दरिद्रों को याचित दान (किमिच्छदानं ) देकर कृतार्थ लिखा गया है कि -'श्रमण और आर्यिकाओं के समीप जाकर तथा उनका हुआ।" यहाँ प्रश्न उपस्थित होता है कि मूल श्लोक में जहाँ मुनि विनयोपचार (वन्दन) करके वैराग्ययुक्त वरांगकुमार ने एकांत में जा पुङ्गवों के लिए आहारदान का उल्लेख किया गया है वहाँ श्रमण और सुन्दर आभूषणों का त्याग किया तथा गुण, शील, तप एवं प्रबुद्ध तत्त्व आर्यिकाओं के लिए वस्त्र और अन्न (आहार) के दान का प्रयोग हुआ है। रूपी सम्यक् श्रेष्ठ आभूषण तथा श्वेत शुभ्र वस्त्रों को ग्रहण करके वे संभवत: यहाँ अचेल मुनियों के लिए ही 'मुनिपुङ्गव' शब्द का प्रयोग जिनेन्द्र द्वारा प्रतिपादित मार्ग में अग्रसर हुए। दीक्षित होते समय मात्र हुआ है और सचेल मुनिके लिए 'श्रमण' । भगवती आराधना एवं उसकी आभूषणों का त्याग करना तथा श्वेत शुभ्र वस्त्रों को ग्रहण करना दिगम्बर अपराजित टीका से यह स्पष्ट है कि यापनीय परम्परा में अपवाद मार्ग परम्परा के विरोध में जाता है। इससे ऐसा लगता है कि जटासिंहनन्दि में मुनि के लिए वस्त्र-पात्र ग्रहण करने का निर्देश है। दिगम्बर परम्परा से भिन्न किसी अन्य परम्परा का अनुसरण करने वाले वस्त्रादि के संदर्भ में उपरोक्त सभी तथ्यों को दृष्टिगत रखते हुए थे। यापनीयों में अपवाद मार्ग में दीक्षित होते समय राजा आदि का नग्न यह कहा जा सकता है कि जटासिंहनन्दि और उनका वराङ्गचरित भी होना आवश्यक नहीं माना गया था । चूंकि वरांगकुमार राजा थे अत: सम्भव यापनीय/कूर्चक परम्परा से सम्बद्ध रहा है। है कि उन्हें सवस्त्र ही दीक्षित होते दिखाया गया हो । यापनीय ग्रन्थ भगवती १३. वर्ण-व्यवस्था के सन्दर्भ में भी वराङ्गचरित के कर्ता जटासिंहनन्दि आराधना एवं उसकी अपराजिता टीका में हमें निर्देश मिलते हैं कि राजा का दृष्टिकोण आगमिक धारा के अनुरूप अति उदार है । उन्होंने वराङ्गचरित आदि कुलीन पुरुषों के दीक्षित होते समय या संथारा ग्रहण करते समय के पच्चीसवें सर्ग में जन्मना आधार पर वर्ण व्यवस्था का स्पष्ट निषेध किया अपवाद लिंग (सवस्त्र) रख सकते हैं। पुन: वराङ्गचरित में हमें मुनि की है। वे कहते हैं कि वर्ण व्यवस्था कर्म-विशेष के आधार पर ही निश्चित होती चर्या के प्रसंग में हेमन्त काल में शीत-परिषह सहते समय मुनि के लिए है इससे अन्य रूप में नहीं। जातिमात्र से कोई विप्र नहीं होता, अपितु Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ज्ञान, शील आदि से ब्राह्मण होता है। ज्ञान से रहित ब्राह्मण भी निकृष्ट है किन्तु ज्ञानी शूद्र भी वेदाध्ययन कर सकता है । व्यास, वसिष्ठ, कमठ, कण्ठ, द्रोण, पराशर आदि ने अपनी साधना और सदाचार से ही ब्राह्मणत्व को प्राप्त किया था। इस प्रकार हम देखते हैं कि वर्णव्यवस्था के संदर्भ में वराङ्गचरितकार का दृष्टिकोण उत्तराध्ययन आदि आगमिक धारा के निकट है। पुनः इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि जटासिंहनन्दि उस दिगम्बर परम्परा के नहीं हैं तो शूद्र जल-त्याग और शूद्रमुक्ति-निषेध करती है। इससे जटासिंहनन्दि और उनके ग्रन्थ वराङ्गचरित के यापनीय अथवा कूर्चक होने की पुष्टि होती है । संदर्भ १. यापनीय और उनका साहित्य; डॉ० कुसुम पटोरिया पृ०, १५७ १५८ । २. वरांगनेय सर्वांगैर्वराङ्गचरितार्थवाक् । कस्य नोत्पादयेद्गाढमनुरागं स्वगोचरम् ।। ५. जटासिंहनन्दि का वराङ्गचरित और उसकी परम्परा - ३. काव्यानुचिन्तने यस्य जटाः प्रचलवृत्तयः । अर्थास्मानुवदन्तीव जटाचार्यः स नोऽवतात् ॥ आदि पुराण (जिनसेन), १/५० ४. जेहिं कए रमणिज्जे वरंग-पउमाण चरियवित्थारे । कह व ण सलाहणिज्जे ते कइणो जडिय - रविसेणो ॥ हरिवंशपुराण (जिनसेन), १/३४-३५ - - - कुवलयमाला, ऐदनय श्रोतृवॅवों जटासिंहनंद्याचार्यर वृत्तं उद्धृत वराङ्गचरित, भूमिका, पृ० ११ ६. मुणिमहसेणु सुलोयणु जेण पउमचरिउ मुणिरविसेणेण । जिणसेणेण हरिवंसु पवित्तु जडिलमुणिणा वरंगचतित्तु ॥ हरिवंश, उद्धृत वराङ्गचरित, भूमिका, पृ० १० ७. आर्यनुत- गृध्रपिंछा -चार्य जटाचार्य विश्रुतश्रुतकीर्त्याचार्य । पुरस्सरमप्पा-चार्य परम्परयँ कुडुग भव्योत्सवमं ॥ - आदिपुराण, १/१२ - ८. वर्यलोकोत्तमर्भाविसुवॉडनधनत्युन्नतकॉडकुंदाचार्यचरित्ररत्नाकररधिकगुणर्सज्जटासिंहनंद्याचार्य श्रीकूर्चिभट्टारकरुदितयशर्मिक्कपेपिगॅ लोकाश्चर्यर्निष्कर्मरॅम्मं पारॅमाडि गँ संसारकांतारदिंदं ॥ धर्मामृत, १ / १३ ९. विदिरपोदर तॉलॅयॅनॅ तू गिदाडाबिदिजिनमुनिप - जटाचार्यर धैर्यद् पँपु गेल्दुदु पसर्गदलुर्केयेननिसि नँगेदुमिर्गे सोगयिसिदं । पार्श्वपुराण, १/१४ १०. वंद्यर् जटासिंहणंद्याचार्यादींद्रणद्याचार्यादिरमुनिपराकाणूर्णणंद्यपृथिवियॉलगॅल्लं ॥ - अनन्तनाथ पुराण, १/१७ ११. नडॅवलियोल् तन्नं समं बडँदारुं नडदरिल्ल गडमतेर्देषु । डियं नडेदुवो पदलिके यॅडेंग जटासिंहणंदि मुनिपुंगवना ।। ६९७ पार्श्व पुष्पदंत- पुराण, १/२९ १२. कार्यविदर्हद्वल्याचार्यजटासिंहनंदिनामोद्दामाचार्यवरगृध्रपिंछाचार्यर चरणारविंदवृंदस्तोत्रं ।। शांतिनाथपुराण, १/१९ १३. धैर्यपरगृध्र पिंछाचार्यर जटासिंहनंदि जगतीख्याताचार्यर प्रभावमत्याश्चर्यमदं पागलूवडब्जजजंगमसाध्यं ॥ - नेमिनाथपुराण, १/१४ १४. हरिवशं (जिनसेन), १/३५ १५. जैनधर्म का यापनीय सम्प्रदाय, प्रो० सागरमल जैन १६............यापनीय संघ प्रतीतकण्डूर्गणाविध 1 जैन शिलालेख संग्रह, भाग २, लेख क्रमांक, १६० १७. वराङ्गचरित, भूमिका (अंग्रेजी), पृ०, १६ १८. जैन शिलालेख संग्रह, भाग-२, लेख क्रमांक २६७, २७७,२९९ - १९. वही भाग - २, लेखक्रमांक, २६७, २७१, २९९ (ज्ञातव्य है कि काणूरगण को मूलसंघ, कुन्दकुन्दान्वय और मेष - पाषाण गच्छ से जोड़ने वाले ये लेख न केवल परवर्ती हैं अपितु इनमें एकरूपता भी नहीं है ।) २०. वराङ्गचरित, सं. ए० एन० उपाध्ये, भूमिका (अंग्रेजी), पृ० १६ पर उद्धृत- वंद्यर्जटासिंहणद्याचार्यदींद्रांद्याचार्यादि मुनि परा काणूर्णणं................. | -अन्नतनाथ पुराण, १/१७ २१. जैनधर्म का यापनीय सम्प्रदाय, प्रो० सागरमल जैन, पृ०१४५ १४६ । २२. वराङ्गचरित, सं० ए० एन उपाध्ये, भूमिका (अंग्रेजी), पृ०१७ | २३. यापनीय पर कुछ और प्रकाश, ए० एन० उपाध्ये, अनेकांत, वीर निर्वाण विशेषांक, १९७५ । २४. तीणां (३/७), यतीन्द्र (३/४३), यतिपतिना (५/११३), यति (५ / ११४), यतिना (८/६८), वीरचर्या यतयो- बभूवुः (३०/ ६१), यतिप्रति (३० / ९९), यति: (३१/२१) । २५. आचारमादौ समधीत्य धीमान्प्रकीर्णकाध्यायमनेकभेदम् । अङ्गानि पूर्वांश्च यथानुपूर्व्यामल्यैरहोभिः सममध्यगीष्ट ॥ - वराङ्गचरित, ३१/१८ २६. स्थूलामहिंसामपि सत्यवाक्यमचोरतादाररतिव्रतं च । भोगोपभोगार्थपरिप्रमाणमन्वर्थदिग्देशनिवृत्तितां च ॥ सामायिकं प्रोषधपात्रदानं सल्लेखनां जीवितसंशये च । गृहस्थधर्मस्य हि सार एषः संक्षेपतस्तेऽभिनिगद्यते स्म ॥ - वही, २२ / २९-३० तुलनीय : पञ्च य अणुव्वयाई. तिण्णेव गुणव्वयाइ भणियाई । सिक्खावयाणि एत्तो, चत्तारि जिणोवइट्ठाणि ॥। ११२ ।। थूलयरं पाणिवहं, मूसावायं अदत्तदाणं च । परजुवईण निवित्ती, संतोसवयं च पञ्चमयं ॥ ११३॥ दिसिविदिसाण य नियमो, अणत्थदण्डस्थ वज्जणं चेव । उवभोगपरीमाणं, तिण्णेव गुणव्वया ऐए ।। ११४।। Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६९८ जैन विद्या के आयाम खण्ड-६ सामाइयं च उववासपोसहो अति हिंसविभागो य । ३३. आवसधे वा अप्पाउग्गे जो वा मट्टिओ हिरिमं । अन्तेसमाहिमरणं, सिक्खासु वयाइं चत्तारि ।।११५।। मिच्छजणे सजणे वा तस्स होज्ज अववादियं लिंगं ।।७८।। - पउमचरिय, उद्देशक १४। आगे इसकी टीका देखें- 'अपवादिकलिंग'-सलेच लिंग' भगवती २७. पंचेवणुव्वायाइं गुणव्वयाई हवंति तह तिण्णि । आराधना यानी अपराजित टीका, पृ० ११४ सिक्खावय चत्तारि य संजमचरणं च सायारं ।। ३४. हेमन्तकाले धृतिबद्धकक्षा दिगम्बरा ह्यभ्रवकाशयोगाः ।। थूले तसकायवहे थूले मोसे अदत्तथूले य । - वराङ्गचरित, ३०/३२ परिहरो परमहिला परिग्गहारंभ परिमाणं ।। ३५. निरस्तभूषाः कृतकेशलोचा: । -वही, ३०/२ दिसिविदिसिमाण पढम अणत्थदंडस्स वज्जणं विदियं । ३६. विशीर्णवस्त्रावृतगात्रयष्टयस्ता: काष्ठमात्रप्रतिमा बभूवुः । भोगोपभोगपरिमा, इयमेव गुणव्वया तिण्णि । - वही, ३१/१३ सामाइयं च पढमं विदियं च तहेव पोसहं भणियं । ३७. (अ) इत्थीसु ण पावया भणिया- सूत्रप्राभृत, २५ तइयं च अतिहिपुज्जं चउत्थ सल्लेहणा अंते ।। (ब) दंसणणांण चरित्ते महिलावग्गम्मि देहि वि वीसट्ठो। - चरित्तपाहुड, गाथा २३-२६ पासत्थ वि हु णियट्ठो भाव विणट्ठो ण सो समणो । २८. दश प्रकारा भवनाधिपानां ते व्यन्तरास्त्वष्टविधा भवन्ति । - लिंगपाहुड, २० ज्योतिर्गणाश्चापि दशार्धभेदा द्विषट्प्रकाराः खलु कल्पवासाः ।। ३८. (अ) नरेन्द्रपत्न्यः श्रुतिशीलभूषा .......प्रतिपन्नदीक्षास्तदा बभूवुः - वराङ्गचरित, ९/२ परिपूर्णकामाः ॥३१/१।। दीक्षाधिराज्यश्रियमभ्युपेता ....॥३१/२।। २९. सीधर्मकल्पः प्रथमोपदिष्ट ऐशानकल्पश्च पुनर्द्वितीयः । (ब) नरवरवनिता मिच्य साध्वीशमुपययुः स्वपुराणि भूमिपालाः ॥२९/९९॥ सनत्कुमारो द्युतिमांस्तृतीयो माहेन्द्रकल्पश्च चतुर्थ उक्तः ।। (स) व्रतानि शीलान्यमृतोपमानि ........३१/४।। ब्राह्यं पुनः पञ्चममाहुरास्तेि लान्तवं षष्ठमुदाहरन्ति । (द) महेन्द्रपत्न्यः श्रमणत्वमाप्य ...........॥३१/११३।। स सप्तमः शुक्र इति प्ररुढः कल्प: सहस्रार इतोइष्टमस्तु ।। ३९. तपोधनानाममितप्रभावा गणाग्रणी संयमनायका सा । यमानतं तन्त्रवमं वदन्ति स प्राणतो यो दशमस्तु वर्ण्यः । -वराङ्गचरित, ३१/६ एकादशं त्वारणमामनन्ति तमारणं द्वादशमच्युतान्तम् ।। ४०. आहारदानं मुनिपुङ्गवेभ्यो, वस्त्रान्नदानं श्रमणार्यिकाभ्यः । - वराङ्गचरित, ९/७-८-९ किमिच्छदानं खलु दुर्गतेभ्यो दत्वाकृतार्थों नृपतिर्बभूव ।। ३०. दशाष्टपञ्चद्वादशविकल्पा: कल्पोपपन्नपर्यन्ताः । ___ -वही, २३/९२ -तत्त्वार्थसूत्र (विवेचक- पं० फूलचंद्रशास्त्री) ४/३, पृ० ११८ ४१. (अ) ..... आपवादिक लिंग सचेललिंग ..... । देखें - ४/१९ में १६ कल्पों का निर्देश है । - भगवती आराधना, टीका, पृ० ११४ ३१. वारस कप्पा केई केई सोलस वदंति आइरिया ।।११५॥ (ब) चत्तारिजणां भत्तं उवकप्पेति .........। सोहम्मीसाणसणक्कुमारमाहिंदबम्हलंतवया। चत्तारिजणा रक्खन्ति दवियमवकप्पियं तयं तेहिं । महसुक्कसहस्सारा आणदपाणदयआरणच्चुदया ॥१२०।। -भगवती आराधना, ६६१ एवं ६६३ - तिलोयपण्णत्ती, आठवां अधिकार । ४२. क्रियाविशेषाद्रव्यवहारमात्राद्दयाभिरक्षाकृषिशिल्पभेदात् । ३२. ततो हि गत्वा श्रमणार्जिकानां समीपमभ्येत्य कृतापचारा: । शिष्टाश्च वर्णाश्चतुरो वदन्ति न चान्यथा वर्णचतुष्टयं स्यात् ।। विविक्तदेशे विगतानुरागा जहुर्वराङ्गयों वर भूषणानि ।।९३॥ - वराङ्गचरित, २५/११ गुणांश्च शीलानि तपांसि चैव प्रबुद्धतत्त्वाः सितशुभ्रवस्त्राः। ४३. ज्ञानं च न ब्रह्म यतो निकृष्टः शूद्राऽपि वेदाध्ययनं करोति ।।४२।। संगृह्य सम्यावरभूषणानि जिनेन्द्रमार्गाभिरता बभूवः ।।९४।। विद्याक्रियाचारुगुणैः प्रहीणो न जातिमात्रेण भवेत्स विप्रः। - वराङ्गचरित २९,९३,९४ ज्ञानेन शीलेन गुणेन युक्तं तं ब्राह्मणं ब्रह्मविदो वदन्ति ॥४३।। व्यासो वसिष्ठः कमठश्च कण्ठः शक्त्युद् द्रोणपराशरौ च । आचारवन्तस्तपसाभियुक्ता ब्रह्मत्वमायुः प्रतिसंपदाभिः ।।४४।। - वही, सर्ग २५ । 77 . 1