Book Title: Visheshavashyak Bhashyam Uttararddh
Author(s): Jinbhadra Gani Kshamashraman
Publisher: Rushabhdev Keshrimal Shwetambar Samstha
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Bअमूर्तजी
वेन संबंधः
विशेषावाद
मुत्तस्सामुत्तिमया जीवेण कहं हवेज संबंधो?। सोम्म ! घडस्स व नभसा जह वा दव्वस्स किरियाए॥२११४॥ कोव्याचार्य अहवा पच्चक्खं चिय जीवोवनिबंधणं जह सरीरं । चिट्ठइ कम्मयमेवं भवंतरे जीवसंजुत्तं ॥२११५॥
वृत्ती मुत्तणामुत्तिमओ उबघायाऽणुग्गहा कहं होजा? । जह विण्णाणाईणं मइरापाणोसहाईहिं ॥२११६॥ ॥५१०॥ अहवा नेगंतोऽयं संसारी सव्वहा अमुत्तोत्ति । जमणाइकम्मसंतइपरिणामावन्नरूवो सो ॥२११७॥
॥५१०॥ संताणोणाई उ परोप्परं हेउहे उभावाओ । देहस्स य कम्मस्स य गोयम! बीयंकुराणं व ॥२११८॥ कम्मे चासइ गोयम ! जमग्निहोत्ताई सग्गकामस्स। वेयविहियं विहण्णइ दाणाइफलं च लोयम्मि॥२११९॥ कम्ममणिच्छतो वा सुद्धं चिय जीवमीसराइं वा । मण्णसि देहाईणं जं कत्तारं न सो जुत्तो॥२१२०॥
उवगरणाभावाओ निचेहामुत्तयाइओ वावि । ईसरदेहारंभेवि तुल्लया वाऽणवत्था वा ॥२१२१॥ ___ अहव सहावं मन्नसि विण्णाणघणाइवेयवुत्ताओ।ता बहुदोसं गोयम! ताणं च पयाणमयमत्थो ॥२१२२॥ || छिन्नम्मि संसयम्मी जिणेण जरमरणविप्पमुक्केणं । सो समणो पव्वइओ पंचहिं सह खंडियसएहिं (नि.
'मुत्तस्से'त्यादि ॥ मूत्तस्य कर्मणः अमूर्त्तिमता जीवेन सह कथं 'सम्बन्धः' संश्लेषः स्यात् ? अतः कर्मसिद्धावप्यपरमिदं रन्ध्रमिति मन्यते, उच्यते, सौम्य ! यथा नभसो घटेन द्रव्यस्य चाङ्गुल्यादेः 'क्रियया' आकुश्चनादिलक्षगया, अब चैतावती सम्बन्धक्रिया यत् संयोगो वा समवायो वोभयं वेति, एतच्च मूर्त्तामृर्तयोरविरोधेन वर्तत इति गाथार्थः॥२११४॥ 'अहवेत्यादि।। अथवा यथा प्रत्यक्षमेवेदं शरीरं स्थूलबहलाकारं तिष्ठति, किंविशिष्टं ?-'जीवोपनियन्धनं' अमृर्त्तात्मप्रदेशसंदर्भितं सत, एवं किमित्यत |
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