Book Title: Subodhika Kalpasutra Tika Gujarati Bhashantar
Author(s): Vinayvijay
Publisher: Shravak Bhimsinh Manek

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Page 408
________________ सुबोग कल्प | ते काले एटले चोथा श्राराने डेडे अने ते समये एटले श्रमण जगवान् श्री महावीर प्रजु राज गृह नगरने विषे समवसस्या ते अवसरे गुणशैल नामना चैत्यने विषे घणा साधु, घणी साध्वी, घणा है ॥१४१॥ श्रावक, घणी श्रविका, घणा देवो अने घणी देवीउनी मध्ये रह्या (बेठा) थका ( पण प्रउन्नपणे ६ खुणामां रहीने नहीं ए नाव जाणवो) था प्रमाणे कद्यु, था प्रमाणे वचनयोग वडे नाख्यु, श्रा, प्रमाणे फल कहेवा वडे करीने जणाव्यु, था प्रमाणे प्ररूप्यु एटले दर्पणनी जेम श्रोताना हृदयमांडू संक्रमाव्युं अने पर्युषणाकल्प नामे अध्ययनने अर्थ एटले प्रयोजन सहित ( पण प्रयोजन विना नहीं), हेतु सहित ( हेतु एटले निमित्त ते जेमके गुरुने पूढीने सर्व करवं ते शा हेतुथी ? कारBण के प्राचार्यो प्रत्यपाय जाणे इत्यादि हेतु बे ते सहित), कारण सहित ( कारण एटले अपवाद ते जेमके 'अंतराविसे कप्प' श्रमचणे तेने कल्पे इत्यादि कारण सहित), सूत्र सहित, अर्थ सहित, बने ( सूत्र अने अर्थ ) सहित, व्याकरण सहित (एटले पूजेला अर्थने कहेवा सहित)वारंवार उपदेश्यु. ए प्रमाणे हुं कहुं बु एम श्री नवाहु खामी पोताना शिष्यो प्रत्ये कहेता हवा. ए प्रमाणे श्री पर्युषणा कल्प नामे दशाश्रुतस्कंधन आठमुं अध्ययन संपूर्ण थयु. 4 ए प्रमाणे जगद्गुरु नहारक श्री हीरविजय सूरीश्वरना शिष्यरत्न महोपाध्याय श्री कीर्तिविजय ६ है गणिना शिष्य उपाध्याय श्री विनय विजय गणिए रचेली कल्पसुबोधिकाने विषेसामाचारी व्याख्यान संपूर्ण थयुं श्रने सामाचारी व्याख्यान नामे श्रात्रीजो अधिकार पण समाप्त थयो. शुन्नं जवतु ! CALC325954505605500RS ॥११॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only

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