Book Title: Siddhantratnikakhyam Vyakaranam
Author(s): Jayantvijay, Vidyavijay
Publisher: Yashovijay Jain Granthmala
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________________ . 14) (14) न चास्य व्याकरणस्यान्ते विशेषेण . दर्शितं तेन विदुषा केवलमेक एव स्वोल्लेखोल्लेखी श्लोक: प्रान्त लिखितः, सं चायम् इति श्रीसागरेन्दुपद्मप्रसादेन जिनेन्दुना सम्यक् / सिद्धान्तरत्निकाख्यं कृतं शब्दानुशासनम् // 1 // अनेन केवलमस्य गुरोर्नाम 'सागरचन्द्र ' इत्यवगम्यते / तत्प्रसादादेतच्छब्दानुशासनकारो जिनेन्दुः कुत्रत्यः कदाभवः ? इत्यादिनिज्ञासया परिवीक्ष्यमाणेषु प्रभूतेषु ग्रन्थेषु नागपुरीयतपागच्छपट्टावली (अहम्मदावादीयजैनयुवकमण्डलप्रकाशिता) पार्श्वचन्द्रगच्छीयपट्टावली( मुंबापुरीस्थाध्यात्मज्ञानप्रसारकमण्डलप्रकाशितगच्छमतप्रबन्धान्तर्गता )प्रभृतेः परिज्ञायते खल्विदम्विक्रमीयैकोनविंशतितमायां शताव्यां नागपुरीयतपागच्छापरनामनि पार्श्वनाद्रगच्छे विवेकचन्द्रसूरिपट्टे लब्धिचन्द्राख्यः सरिः समजनि / विक्र नगरवास्तव्योपके शज्ञातीय-छा महगोत्रीयश्रेष्ठि• गिरधरपत्नीगो मदेतनद्भवस्य यस्य जन्म वि सं. 1835 वर्षे श्रावणे व , दीक्षा स्तम्भतीर्थे वि.सं. 1849 वर्षे वैशाखे शु.३, सुम्पिदमुज्जयिन्यां वि. मं. 1854 वर्षे श्रवणे व. 9, गृर्नरपरु मालव-दक्षिण-बङ्गादिदेशेषु विहृतवतश्च यस्य स्वर्गगमनं विक्रपनगरे वि. सं. 1883 वर्षे कार्तिके व. 10 बभूव / तदन्तेवासिनः स्तवनचतुर्विशिकाकर्तुमहोपाध्यायसागरचन्द्रस्य शिष्यरत्नं महोपाध्याय: श्रीजिन चन्द्रगणिगमीदयमेव प्रस्तुतव्याकरणसिद्धान्तरत्निकाकारः।

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