Book Title: Restoration of Original Language of Ardhamagadhi Text
Author(s): K R Chandra
Publisher: ZZ_Anusandhan

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Page 3
________________ (62) शेनो आधार लईने तेओ संपादन करे ? अद्यपर्यन्त जेटला संस्करणो आगम ग्रंथोना प्रकाशित थया छे ते बधामां पाठोथी एकरूपता जोवा मळती नथी. आ प्रकारनी विचारणा अने तपास उपरथी एम कहेवा, थाय छे के दरेक आगम ग्रंथनी जेटली हस्तप्रतो मळती होय तेमाथी बधा ज पाठान्तरो नोंधवा जोईए अने तेना आधारे भाषानां प्राचीन स्वरूप साथे जे जे पाठो मेळ खाता होय ते ते पाठोने स्वीकारीने जैन आगमसाहित्यनुं फरीथी संपादन करवू जोईए. आवो प्रयास करवो अत्यंत आवश्यक छे. मारा अध्ययन अनुसार जे दश शब्दोनी मे ग्रंथमां चर्चा करी छे तेमनुं प्राचीन स्वरूप नीचे प्रमाणे होवानुं कही शकाय छे : 1. यथाः अधा, 2 तथाः तधा, 3. प्रवेदितम्: पवेदितं 4. एकदाः एकदा 5 एकः, एके-एके 6. एकेषाम्ः एकेसि 7. औपपादिक: ओपपादिय, औपपातिक ओपपातिय, 8. लोकम्: लोकं. 9. लोके: लोकस्सि. 10. क्षेत्रज्ञ: खेतन्न. ग्रंथना बीजा भागमा आचारांग, सूत्रकृतांग, ऋषिभाषितानि, उतराध्ययन, दसवैकालिक सूत्र अने आचा., सूत्रकृ., उत्तरा नी संस्कृत वृतिओमाथी केटलाक शब्दो म.जै.वि.ना संस्करणोमांथी तेमना पाठान्तरो साथे नोंधावामां आव्या छे जेओ विषे पण आज समालोचनात्मक अध्ययन करी शकाय. आ चर्चानो निष्कर्ष ए छे के आग्रंथोनी हस्तप्रतोमा मळतां बधां प्राचीनगम पाठांतरोनुं संकलन करीने जैन आगमोनुं भाषिक दृष्टिए फरीथी संपादन करवू ए एक अत्यंत आवश्यक कार्य छे. * * * Jain Education International For Private Personal Use Only www.jainelibrary.org

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