Book Title: Pravachansara Part 02
Author(s): Kamalchand Sogani, Shakuntala Jain
Publisher: Apbhramsa Sahitya Academy

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Page 181
________________ णियदं आवश्यकरूप से न ही णेव नहीं 11, 27, 68, 93. 16, 34 47, 62 तं पि तच्चदो इसलिए तो भी यथार्थरूप से उससे उसके बाद इस तरह तध वैसे तधा पादपूरक इसी प्रकार इसलिये तम्हा 9, 10, 12, 13, 18, 29, 33, 70, 108 तम्हा दु तह इस कारण इस कारण ही इसी प्रकार और उसी प्रकार तीन प्रकार का तीन प्रकार से 82, 108 तहेव तिधा तिहा (174) प्रवचनसार (खण्ड-2) Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org

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