Book Title: Pravachan Pariksha Part 02
Author(s): Dharmsagar, 
Publisher: Rushabhdev Kesarimal Jain Shwetambar Sanstha

View full book text
Previous | Next

Page 15
________________ श्रीप्रवचन परीक्षा श्रुतदेवतादिस्तुति ७ विश्रामे ॥१३॥ OMGHOTOHOTOHOTOHOTOHOTOHOTS तर्हि चिरं जीव आयातोऽसि खयमेवास्सदुक्तमार्गेण, श्रुतदेवतायामपि तथा श्रद्धेयमितिगाथार्थः॥१५।। अथ येनाराधिता श्रुतदेवता सर्वजनप्रतीता फलदायिनी संवृत्ता तद्व्यतिकरं गाथात्रयेणाह तेणेव वीसठाणाराहणमरहंतगुत्तसुनिमित्तं । भणिअंतत्थवि पवयणपहावणा साऽवि कह हुज्जा ?॥१६॥ इअ चिंतापरतंतो जिणभत्तो हेमचंदसूरिवरो। आराहिअ सुअदेविं जाओ कालिकालसवण्णू ॥१७॥ राया कुमारपालो निम्मविओ तेण परमसंविग्गो। अज्जवि कित्तिपयाया पवयणपासायसिहरंमि॥१८॥ येन कारणेन तीर्थदसाध्यमपि कियत्कार्य श्रुतदेवतासाध्यं तेनैव कारणेन विंशतिः स्थानकानि अर्हत १ सिद्ध २ संघ ३. आचार्य ४ स्थविर ५ उपाध्याय ६ साधु ७ ज्ञान ८ दर्शन ९ विनय १० चारित्र ११. ब्रह्मचर्य १२ शुभध्यान १३ तपः १४सुपात्रदान| १५ अर्हदादिवैयावृत्य १६ समाधि १७ अपूर्वश्रुत १८ श्रुतभक्ति १९ प्रवचनप्रभावना २० रूपाणि तेषामाराधनं-यथोचितविधिना | यथाशक्ति तद्भक्तिकरणं अर्हद्गोत्रस्य-तीर्थकरनाम्नः सु-शोभनं प्रधानं निमित्तं-कारणं भणितं, वीरेणेति गम्यं, तत्रापि प्रवचनप्रभावना गरीयसी, यतो वस्तुगत्या सर्वाण्यपि स्थानानि तत्रान्तर्भवतीति, सापि प्रवचनप्रभावना कथं भवेत् ?-केन प्रकारेण स्थादित्यमुना प्रकारेण चिन्तापरतत्रः-एवं चिन्तान्वितो जिनभक्तः-तीर्थकराज्ञातत्परो हेमचन्द्रमरिवर:-श्रीहेमन्द्रमूरिः श्रुतदेवीमाराध्य कलिकाल| सर्वज्ञो जातः, कलिकालसर्वज्ञ इति बिरुदमुद्वहति स, तेन च कुमारपालो नाम राजा परमसंविज्ञो निर्मापितः, प्रतिबोध्य परमाईतीकृत इत्यर्थः, प्रागुक्तप्रकारेण कीर्तिपताका अद्यापि-सम्प्रत्यपि प्रवचनप्रासादशिखरे-जिनशासनलक्षणप्रासादमस्तके वर्त्तते इतिगाथात्रयेण श्रीहेमाचार्येणाराधिता श्रुतदेवता फलवती संपन्नेति दर्शितमिति गाथात्रयार्थः॥१६-१७-१८॥ अथ पुनरपि त्रिस्तुतिकः शङ्कते MOONOHOUGHOUGHOROMGHORGOOG ॥१३॥ For Pecand Private Use Only wwwberry

Loading...

Page Navigation
1 ... 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22 23 24 25 26 27 28 29 30 31 32 33 34 35 36 37 38 39 40 41 42 43 44 45 46 47 48 49 50 51 52 53 54 55 56 57 58 59 60 61 62 63 64 65 66 67 68 69 70 71 72 73 74 75 76 77 78 79 80 81 82 83 84 85 86 87 88 89 90 91 92 93 94 95 96 97 98 99 100 101 102 103 104 105 106 107 108 109 110 111 112 113 114 115 116 117 118 119 120 121 122 123 124 125 126 127 128 129 130 131 132 133 134 135 136 137 138 139 140 141 142 143 144 145 146 147 148 149 150 151 152 ... 356