Book Title: Prashnamala Stavan Author(s): Gyansundarvijay Publisher: Jain Pathshala View full book textPage 9
________________ अण आहारी दोसमा थीति, पन्नवण पीछाणजी। तीन समा भगवती बोले, आजीनवरकी आणजी मु॥५३॥ चर्म तीर्थंकर कल्पसुत्रे, बेयालीस वर्ष दिक्षा संगजी । बायालीस वर्ष जाजरा, देखो चोथो अंगनी ॥मु॥५४॥ जीवा भिगम रुचक द्विपको, कह्यो असंख्यातो मानजी । ठाम दुणो संख्यातो आवे, जोवो जीनवरको ज्ञानजी ।मु।५५। मेरु कंड अडतीस सहसको, समवायांगमें होयजी । तेहिज छत्तीस सहस बतायो, जंबुद्विप पन्नति जोयजी ।।५६। इगसठ संहस जोजनको जाणे, समवायांग दुजौ कांडजी । तेसठ हजार जोजनको देखो, जंबुद्विप पन्नतिमांडजी ।मु।५७। नव हजार नवसो जोजनको, नन्दनवन चोयो अंगजी । चौपन जोजन जाजरो दाख्यो, जोवो पंचमे उपांगजी मु।५८। दशमे अंगे बत्तीसइद्र, अडतालीश पांचमे उपांगजी । चौष्ट कह्या दुजेठाणे, देखो तीजे अंगजी ।।५९। सिद्धांकी अवगणा उववाइ, बत्तीस अंगुलको माननी । जगन्य सात हाथको सीद्धे, ओ भगवतीको ज्ञानजी ।।६। सीद्ध सीलाथी उणो जोजन, सीद क्षेत्र भगवती जाणजी उववाइमे पुरो जोजन, करो पंचागी परमाणजी ॥॥६१।। छठीनरकका मध्य भागसु, धणोदधिनो चरमांतजी। गुणीयासी सहस्रसमवायांग बोले, श्री जीनवाणी सत्यजीम।६२। जिवाभिगम गिणती करतां, इठितर सहस्रजोजन परमाणजी। पंचागी विनते किम जाणो, हिरदे आणो नाणजी ॥॥६३।। रेवंतिथी जेष्टातांइ, तारा अठाणु होयजी। गीणती करतां सत्ताणुं आवे, समवायांगलो जोयजी ।।मू॥६॥Page Navigation
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