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(३८०) भर्यु जारी, कर्मयोग दोकेट ने सारी; धुद्धिसागर गुरु ध्यक्हारी, तासरी जाउं सदा बलिहारी. जय० ॥५॥
॥ मंगल दीपक ॥ जग गुरु जग जब मंगल दीवो, चतुर गुरु जग चिरंजीवो. जग० चन्द्र सूरज ग्रह फरता फेरा, गुरुना प्रकाशे रहे न अंधेरा. जग० ॥१॥ वेदागम तुज महिमा गावे, गुरु कृपावडे मुक्ति थावे. जग. निश्चय भावथी मंगलरूपी, सदसद्रूपी रूपारूपी. जगः ॥२॥ पंचभूत उपमा नहीं पावे, अलख कला नहीं समजी जावे; बुद्धिसागर मंगल माला, पामो ऋद्धि वृद्धि विशाला. जग० ॥३॥
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