Book Title: Naishadh Mahakavyam Uttararddham
Author(s): Hargovinddas Shastri
Publisher: Chaukhambha Sanskrit Series Office

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Page 845
________________ 1542 नैषधमहाकाव्यम् / पृष्ठेऽपि किं तिष्ठति नाथ ! नाथ रङ्कुर्विधोरङ्क इवेति शङ्का / तत्त्वाय तिष्टस्त्र मुखे स्व एवं यद्वैरथे पृष्ठमपश्यदस्य / / 79 / / पृष्ठ इति / हे नाथ ! विधोरङ्क इव यथा चन्द्रस्योत्सने कलङ्कमृगो वर्तते, तथा रङ्कुः पृष्टेऽपि पश्चाद्भागे किं तिष्ठति ? अथ न तिष्ठति इति तवाशङ्का चेद्वर्तते इति शेषः / तर्हि स्वं तत्त्वाय याथात्म्यज्ञानार्थ स्वे निजे मुखे विषये तिष्ठस्व, निजमुखमेव निर्णयं पृच्छेत्यर्थः / यत्वन्मुखं द्वैरथे समानशोभाभिलाषाद्विस्थसंबन्धिनि द्वन्द्वयुद्धे. ऽस्य स्वन्मुखाद्भज्यमानत्वात्पलायमानस्य चन्द्रस्य पृष्ठं पश्चाद्भागमपश्यत् / तस्मा. तत्स्वमुखमेव निर्णेतृत्वेन पृच्छेत्यर्थः / त्वन्मुखं चन्द्रादधिकमिति भङ्गया नलमुख. वर्णनं मे कृतम् / तत्वाय तत्वं ज्ञातुं, 'क्रियार्थोपपदस्य च कर्मणि स्थानिनः' इति चतुर्थी, तादर्थ्यमात्रे वा / तिष्ठस्व, स्थेयाख्यायां तङ् / स्वे, वैकल्पिकत्वास्मिन्नभावः // 79 // हे नाथ ! ( इस चन्द्रमाके ) अङ्कमें के समान (जिस प्रकार इसके सम्मुखस्थ अङ्कमें मृग रहता है, उसी प्रकार ) पृष्ठभागमें भी मृग है क्या ? ऐसी यदि आपको शङ्का हो तो निर्णयार्थ अपने मुखसे ही पूछिये, जिसने ( समान शोमा चाहनेके कारण चन्द्रमा तथा आपके मुखके साथ ) दो रथों ( लक्षणासे रथस्थ वीरों ) का युद्ध होनेपर इस (चन्द्रमा) के पृष्ठभागको देखा है / [ चन्द्रमाने जब आपके मुखकी समानता करना चाहा, तब आपके मुखके साथ युद्ध होने लगा और चन्द्रमा पराजित होकर भाग चला, उस समय आपके मुखने चन्द्रमाकी पीठको देखा, इस कारण 'चन्द्रमाकी पीठमें भी कलङ्कमृग है या नहीं' इस शङ्काको 'अपने मुखसे ही पछकर आप अपनी शङ्का दूर कर लें। इस प्रकार चन्द्रमाका वर्णन करती हुई दमयन्तीने अपने प्रियतम नलके मुखको चन्द्राधिक सुन्दर वतलाया ] // 79 // उत्तानमेवास्य वलक्षकुक्षिं देवस्य युक्तिः शशमङ्कमाह / तेनाधिकं देवगवेष्वपि स्यां श्रद्धालुरुत्तानगतौ श्रुतायाम् / / 80 // उत्तानमिति / युक्तिरर्थापत्तिरनुमानं वास्य देवस्य चन्द्रस्य मध्यवर्तिनमकं कलङ्करूपं शशमुत्तानं स्वर्गसंमुखमस्मदादिदृश्यमान पृष्ठभागमाह ब्रूते / यतो वलक्ष. कुर्वि धवलोदरम् / यद्ययं शशकोऽस्मत्संमुखोदरोऽनुत्तानोऽभविष्यत् , तहि मध्यवर्तिशशकोदरस्य धवलत्वाचन्द्रमध्यभागोऽपि धवलोऽभविष्यत् , न च तथा दृश्यते, किंतु मलिनः / तस्मादुत्तान एव शशकश्चन्द्रेऽस्तीति युक्तिराहेत्यर्थः / तेन चन्द्रशशकनिश्चितोत्तानत्वेनैव हेतुनाहं देवगवेष्वपि सुरभीप्रभृतिषु विषये वेदे श्रुतायामुत्तानगती सुरलोकसंमुखचरणतया गमने विषये पूर्वापेक्षयाधिकमतितरां श्रद्धालुरास्तिक्ययुक्ता स्याम् / 'उत्ताना वै देवगवाश्चरन्ति' इति श्रतिायोपपन्नार्थतया सत्यवेस्यहमिदानीमधिकं मन्य इत्यर्थः / देवगवेषु 'गोरतद्धितलुकि' इति टच / 'देवगवीषु' इति पाठे टिवान्डीप् // 8 //

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