Book Title: Jainendra Prakriya Part 2
Author(s): Gunanandi Acharya, Shreelal Jain Vyakaranshastri
Publisher: Bharatiya Jain Siddhant Prakashini Sanstha

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Page 7
________________ एका पंचम अमुत ६ ८ १३ १६ १७ २१ ३४ ३९ "" ४३ ** ४७ ५२. ५५ ५७ ५८ ६१ ६६ ८ -६ ፪ ८ २१ ६ < ३ १७ १७ १६ शुच्ध शुद्धिपत्रम् । १८ हकाराद्वर्जित "" व्यंत्यादचः शय: (वृत्तिः ) करोते कष्फडिकः जशः थी 'च कृतेऽय सर्वशब्दवत् मुनीं मृदः परस्य क उप् गिनाक् एवं मातृ गौशब्द: हे जरसे १९ १८ १२ उत्तर १३ मोरव— १२ चमूजम् - शक्तिः हकाराज्वर्जित J1 व्यंत्याद्यचः पदतादुत्तरस्य ह्कारस्य पूर्वस्वं वा भवति क्रुकृशेते कपडिकः जसः शी चाकृतेऽय धर्मशब्दवत् मुनिं मृदः पदस्य क इल ? गिा एवं भ्रातृ ग्छौशब्दः हे जरसौ अंतर -~ गौरव - चमजनू

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