Book Title: Jain Dharm Vaidik Dharm Ki Sanskrutik Ekta Ek Sinhavlokan
Author(s): Subhadramuni
Publisher: University Publication

View full book text
Previous | Next

Page 7
________________ 55555555555555555 555 ॐ बुरा समझता है। उस वस्तु पर अच्छा या बुरा होने का आरोप उस वस्तु के यथार्थ दर्शन को आवृत कर देता है। इसीलिए # उपनिषद् का ऋषि प्रार्थना करता है:- हिरण्मयेन पात्रेण, असत्यस्यापिहितं मुखम् । तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये अ (बृहदा. उप.-5/15/1), अर्थात् 'स्वर्णिम पात्र ने सत्य को ढक ॐ रखा है, हे सूर्य! उस आवरण को हटाएं ताकि सत्य-धर्म (स्वरूप).. ॐ को मैं देख सकू'। 55555555555 听听 听听听听听听听 5 s s जब सत्य की दर्शिका: अनेकान्त दृष्टि दर्पण यदि धुंधला है, उस पर परदा पड़ा है, या वह जस्थिर नहीं है तो प्रतिबिम्ब उसमें स्पष्ट नहीं उभरेगा। इसी तरह, #मन रूपी दर्पण में यदि आग्रह, दुराग्रह, ईर्ष्या, द्वेष, आसक्ति, पक्षपात-भावना आदि के आवरण हों या उन विकारों द्वारा मन # डावांडोल हो, अस्थिर हो तो सत्य स्पष्ट रूप से प्रतिबिम्बित नहीं है #हो पाएगा। भगवान् महावीर के धर्म-शासन की जो विरासत हमें प्राचीन आचार्य-परम्परा के माध्यम से मिली है, उसमें सत्य को जानने-समझने की प्रमुख पद्धति का भी संकेत है। वह पद्धति है-एक ही वस्तु में विरोधी बातों के सह-अस्तित्व को स्वीकारना। विरोधों का सह-अस्तित्व सत्य का आधारभूत स्वभाव है। अनेकान्त । दृष्टि सापेक्ष दृष्टि को विकसित करती है, हमारे आग्रह-दुराग्रह या । एकांगी मान्यता का निवारण करती है और सत्य तक पहुंचने में है व्यक्ति को सक्षम बनाती है। वह अनेकता में एकता को देखने का, 5 विरोधों में भी समन्वय-सामंजस्य ढूंढ़ने का मार्ग प्रशस्त करती है और सहिष्णुता के सुखद वातावरण का निर्माण करती है। आचार्य अमृतचन्द्र ने अनेकान्त दृष्टि को व्यावहारिक ॐ पृष्ठभूमि में इस प्रकार समझाया है:

Loading...

Page Navigation
1 ... 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22 23 24 25 26 27 28 29 30 31 32 33 34 35 36 37 38 39 40 41 42 43 44 45 46 47 48 49 50 51 52 53 54 55 56 57 58 59 60 61 62 63 64 65 66 67 68 69 70 71 72 ... 510