Book Title: Jage Yuva Shakti Author(s): Devendramuni Shastri Publisher: Z_Kusumvati_Sadhvi_Abhinandan_Granth_012032.pdf View full book textPage 9
________________ ___ युवा वर्ग को अपनी शक्तियों का उपयोग करने राष्ट्र का उत्थान करना है तो सबसे पहले स्वयं के hi के लिए यह जरूरी है कि वह सर्वप्रथम अपने चरित्र व नैतिक बल को सुदृढ़ व सुरक्षित रखना आचरण पर ध्यान देवें, चरित्रवान बनें । होगा। ____ आज की परिस्थितियों में चरित्रवान या सदा- ४. सहनशील बनिए-सहिष्णुता एक ऐसा गुण ! चारी बने रहना कुछ कठिन अवश्य है, परन्तु है जो मनुष्य को देवता बना देता है । कहावत हैअसम्भव नहीं है और महत्व तो उसी का है जो सौ-सौ टाँचे खाकर महादेव बने हैं । पत्थर, हथौड़ी कठिन काम भी कर सकता हो। और छैनी की मार खा-खाकर ही देवता की मूर्ति बनती है। मनुष्य भी जीवन में कष्ट सहकर सफल आज खान-पान में, व्यवहार में, लेन-देन में, , होता है। बिना आग में तपे सोना कुन्दन नहीं * मनुष्य की आदतें बिगड़ रही हैं । व्यसन एक फैशन बन गया है। बीड़ी-सिगरेट, शराब-जुआ-सिनेमा, होता, मिट्टी का घड़ा भी आग में पकने पर ही गन्दा खाना और फिजूलखर्ची-यह सब युवा उपयोगी होता है। उसी प्रकार मनुष्य भी विप त्तियों, असफलताओं और परिस्थितियों से संघर्ष शक्ति के वे घुन हैं जो उसे भीतर-भीतर खोखला __ करके, प्रतिकूलताओं से जूझकर, कष्टों को सहन कर रहे हैं। इन बुरी आदतों से शरीर शक्तियाँ करके अपने चरित्र को निखार सकता है। क्षीण होती जाती हैं, यौवन की चमक बुढ़ापे की 1 झुरियों में बदल जाती हैं, साथ ही मानसिक दृष्टि युवा वर्ग में आज सहनशीलता की बहत कमी से भी व्यक्ति अत्यन्त कमजोर, हीन और अबि है। सहनशीलता के जीवन में दो रूप हो सकते श्वासी बन जाता है । आज का युवा वर्ग इन बुरा- ह .. हैं-पहला कष्टों में धैर्य रखना, विपत्तियों में भी इयों से घिर रहा है और इसलिए वह निस्तेज और - स्वयं को सन्तुलित और स्थिर रखना तथा दूसरा निरुत्साह हो गया है । वह इधर-उधर भटक रहा रूप है-दूसरों के दुर्वचन सहन करना, किसी अनहै। परिवार वाले भी परेशान हैं, माता-पिता भी जाने या विरोधी ने किसी प्रकार का अपमान कर चिन्तित हैं और इन बुरी आदतों से ग्रस्त व्यक्ति दिया, तिरस्कार कर दिया तब भी अपना आपा न स्वयं को भी सुखी महसूस नहीं कर पाता है, किन्त खोना । स्वयं को सँभाले रखना और उसके अपवह बुरी आदतों से मजबूर है। स्वयं को इनके मान का उत्तर अपमान से नहीं, किन्तु कर्तव्यचंगुल से मुक्त कराने में असमर्थ पा रहा है। यह पालन से और सहिष्णुता से देवें । उसकी सबसे बड़ी चारित्रिक दुर्बलता है। युवक एक कर्मठ शक्ति का नाम है । जो काम पहले व्यक्ति बुराइयों को पकडता है फिर करता है उसे समाज में भला-बुरा भी सुनना पड़ता फिर बुराइयाँ उसे इस प्रकार जकड़ लेती हैं कि वह है। शारीरिक कष्ट भी सहने पड़ते हैं और लोगों आसानी से मुक्त नहीं हो पाता। वे बुराइयाँ, की आलोचना भी सुननी पड़ती हैं क्योंकि लोग मनुष्य के मानसिक बल को खत्म कर देती हैं। र आलोचना भी उसी की करते हैं जो कुछ करता नतिक भावनाओं को समाप्त कर डालती हैं और है। जो निठल्ला बैठा है कुछ करता ही नहीं शरीर शक्ति को भी क्षीण कर देती हैं इस प्रकार उसकी आलोचना भी क्या होगी, अतः कार्यकर्ताओं उसका नातक एवं शारीरिक पतन होता जाता है। को समाज में आलोचनाएँ भी होती हैं। युवक क्रान्ति की उद्घोषणा करता है, परियुवाशक्ति को शक्तिशाली बनना है और वर्तन का बिगुल बजाता है, समाज व राष्ट्र की अपने आत्मबल एवं चरित्रबल से समाज तथा जीर्ण-शीर्ण मान्यताओं को सुधारना, अन्धविश्वास ३०७ चतुर्थ खण्ड : जैन संस्कृति के विविध आयाम 6068 साध्वीरत्न कुसुमवती अभिनन्दन ग्रन्थ Jain education Internationat Yor Private & Personal Use Only www.janturorary.orgPage Navigation
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