Book Title: Bhagavati Sutra ke Thokdo ka Dwitiya Bhag
Author(s): Ghevarchand Banthiya
Publisher: Jain Parmarthik Sanstha Bikaner

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Page 128
________________ १२० --अहो भगवान् ! किसी भी देवलोक में उत्पन्न होने योग्य क्षीण भोगी ( दुर्वल शरीर वाला ) छद्मस्थ मनुष्य क्या उत्थान, कर्म, बल, वीर्य, पुरुषकार, पराक्रम द्वारा विपुल भोग (मनोज्ञ शब्दादि ) भोगने में समर्थ नहीं होता। अहो. भगवान् ! क्या आप इस अर्थ को ऐसा ही कहते हैं ? हे गौतम ! जो इण8 सम? ( यह अर्थ ठीक नहीं है)। अहो. भगवान् ! इसका क्या कारण है ? हे गौतम ! वह उत्थान कर्म बल वीर्य पुरुषकार पराक्रम से कोई भी विपुल भोग (मनोज्ञ शब्दादि ) भोगने में समर्थ है । इसलिए वह भोगी पुरुष भोगों का त्याग 'पच्चक्खाणं करने से महा निर्जरा वाला और महा पर्यवसान (महाफलं ) वाला होता है। २-जिस तरह छद्मस्थ का कहा उसी तरह अधो अवधिज्ञानी ( नियत क्षेत्र का अवधि ज्ञान वाला ) का भी कह देना चाहिए। ... ६-अहो भगवान् ! उसी भव में सिद्ध होने योग्य यावत् सर्व दुःखों का अन्त करने योग्य क्षीणभोगी ( दुर्बल शरीर वाला ) परम अवधिज्ञानी मनुष्य क्या उत्थान कर्म बल वीर्य पुरुषकार पराक्रम से विपुल भोग भोगने में समर्थ नहीं है ? . * इस प्रश्न का आशय यह है कि जो भोग भोगने में समर्थ नहीं है, वह अभोगी है किन्तु अभोगी होने मात्र से ही त्यागी नहीं हो - सकता । त्याग करने से त्यागी होता है और त्याग करने से ही निर्जरा होती है।

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