Book Title: Bhagavati Sutra ke Thokdo ka Dwitiya Bhag
Author(s): Ghevarchand Banthiya
Publisher: Jain Parmarthik Sanstha Bikaner

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Page 127
________________ : ११६ चित्त भी हैं । भोग जीव हैं या जीव? हे गौतम ! भोग रूपी हैं, रूपी नहीं । भोग सचित भी हैं और जीव भी हैं और अजीव भी हैं । अहो भगवान् ! भोग जीवों के होते हैं या - अजीवों के होते हैं ? हे गौतम! भोग जीवों के होते हैं, " जीवों के नहीं होते । अहो भगवान् ! नारकी के नेरीये कामी हैं या भोगी हैं ? हे गौतम! कामी भी हैं और भोगी भी हैं। ग्रहो भगवान् इसका क्या कारण ? हे गौतम । श्रोत्रेन्द्रिय चक्षुइन्द्रिय आसरी कामी हैं और वाणेन्द्रिय रसेन्द्रिय स्पर्शेन्द्रिय आसरी भोगी हैं। 'इसी तरह भवनपति वाणव्यंतर, ज्योतिषी, वैमानिक, तिर्यच पंचेंद्रिय और मनुष्य ये १५ दण्डक कह देना । चौइन्द्रिय चक्षुइन्द्रिय यसरी कामी हैं, घाणेन्द्रिय रसेन्द्रिय स्पर्शेन्द्रिय आसरी भोगी हैं। तेइन्द्रिय, बेइद्रिय और एकेन्द्रिय ( पांच स्थावर ) भोगी हैं, कामी नहीं । अल्प बहुत्व - सबसे थोड़े कामी भोगी, उससे नोकामी नो भोगी अनंतगुणा, उससे भोगी अनंतगुणा सेवं भंते ! सेवं भंते !! (थोकड़ा नं० -६५) "श्री भगवतीजी सूत्र के सातवें शतक के सातवें उदेशे में 'अनगार क्रिया' का थोकड़ा चलता है सो कहते हैं

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