Book Title: Arhat Vachan 2002 01
Author(s): Anupam Jain
Publisher: Kundkund Gyanpith Indore

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Page 81
________________ की देन निम्न रूप में थी - "Let us say that this tablet is a gift of memory, the mother of the Muses; and that when we wish to remember anything which we have heard or thought in our minds, we hold the wax to the perceptions and thoughts, and in that material receive the impression of them as from the seal of a ring; and that we remember and know what is imprinted as long as the image lasts; but when the image is effaced or can not be taken, then we forget and do not know". इसी प्रकार पतंजलि जैसे कई भारतीय दार्शनिकों ने स्मृति को संस्कार रूप (Impression) में मान्यता दी थी। पतंजलि ने स्मृति को मन के पांच प्रकारों में से एक पर्याय माना, जिसमें शेष पर्याय सम्यक्ज्ञान, मिथ्याज्ञान, कल्पना (Fancy) एवं निद्रा (रूप) में स्वीकारा। जैन आगम में निम्नलिखित सामग्री उपलब्ध है : मनोवर्गणाएं, बंधन, संहनन, संस्थान, अंगोपांग, निर्माण, नामकर्म की वर्गणाएँ, मुख्यत: कार्माण वर्गणाएं, उनकी गति - एक समय में एक प्रदेश या 14 राजुगत प्रदेश (लोकान्तर्गत प्रदेश राशि), पुद्गलकाय बनने में स्पर्श रूक्षत्व गुण के अविभागी प्रतिच्छेद, मतिज्ञानादि के अविभागी प्रतिच्छेद, परमाणु तथा स्कन्धों के गुणों के अविभागी प्रतिच्छेद - यथा: वर्ण, रस, गन्ध तथा आठ प्रकार के स्पर्श, शब्दादि दिये गये होते हैं। पुन: योग और कषाय के संयोग से, अथवा मोह के संयोग से कर्म परमाणुओं का जीव से व्यावहारिक सम्बन्ध या बंध होता है, जिसकी दस अवस्थाएँ होती हैं। असंख्य प्रकार के स्कन्ध होते हैं जो जीव के निमित्त से होने पर कर्म निमित्तिक तथा अन्य निमित्त होने पर पुद्गल निमित्तिक होते हैं। 93 प्रकार के नामकर्म आदि। विशेष विवरण के लिए गोम्मटसारादि ग्रंथ दृष्टव्य हैं। यूनानी गैलेन (Galen), (प्राय: 130 - 200 ई.) की कल्पना थी कि मन सिर में रहता होगा। अरस्तु (Aristotle) निस्संदेह रूप से मन का स्थान हृदय में मानता था जिसे ठंडा रखने में मस्तिष्क युक्ति संगत माना गया था। 16 वीं सदी तक उसका ग्रंथ De Memoria et Reminiscentia" पश्चिमी विश्व में मान्य रहा। प्राय: 700 वर्ष पश्चात Augustine विद्वान की मान्यता थी, "भूतकाल स्मृति रूप है, भविष्य आशा रूप और वर्तमान उपयोग रूप है। अथवा, संक्षेप में, वर्तमान ही अस्तित्वशील है अत: वर्तमान में ही भूतकाल वर्तमान स्मृति के रूप में तथा भविष्य वर्तमान आशा रूप में गर्भित रहता है। स्मृति सम्बन्धी वैज्ञानिक खोजें सर फ्रांसेस गाल्टन (ई. 1822 - 1911) द्वारा प्रारंभ की गयी मानी जाती हैं। यह वैज्ञानिक चार्ल डारविन का चचेरा भाई था। वह औषधि, खोज, मौसम विज्ञान, मानव उत्पत्ति विज्ञान और वंश विज्ञान में उलझा रहता था। उसकी रूचि इस समस्या में थी कि किस प्रकार लोग वस्तुओं को स्मृत रखते हैं तथा विशेषकर उनकी रूचि मानसिक बिम्ब योजना में थी। उसने जो मित्रों आदि को लेकर प्रयोग किये थे वे 1883 में Inquiries into Human Faculty" नामक पुस्तक में प्रकाशित हुए। यह अन्तर्निरीक्षण सूचना स्मृति अध्ययन सम्बन्धी थी। तत्पश्चात जर्मन चिकित्सक एवं मनोवैज्ञानिक हरमाँ एबिंघोस (1850-1909 ई.) ने किसी भी स्मृत अक्रमबद्ध धारा में अनेक प्रकार की सामग्री सम्बन्धी भूल जाने के समय की गणनाएं की थीं। यहाँ से प्रतिधारणा (retention) सम्बन्धी, पुनर्पत कार्य में लगने वाले समय का मात्रा वाचक (परिणाम वाचक) प्रायोगिक अध्ययन प्रारंभ हुआ। तत्सम्बन्धी पुस्तक, "Psychologie des Gedachtniss" 1855 ई. में प्रकाशित हई। इस प्रकार सीखने तथा स्मृति सम्बन्धी आधुनिक प्रायोगिक, मनोविज्ञान का मात्रा वाचक (quantitative) अध्ययन अर्हत् वचन, 14 (1), 2002 79 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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