Book Title: Arhat Vachan 2002 01
Author(s): Anupam Jain
Publisher: Kundkund Gyanpith Indore

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Page 105
________________ मत- अभिमत अहा अर्हत् वचन त्रैमासिक पत्रिका का छमाही संयुक्तांक (जुलाई - दिसम्बर 01) प्राप्त हुआ। प्रारम्भ से ही इस पत्रिका में ज्ञानोपयोगी, पठनीय सामग्री होने से इसका बैचेनी से इंतजार रहता है, जबकि इस बार छ माह तक बाँट जोहनी पड़ी। इसके साथ ही पत्रिका में कागज कुछ हल्का उपयोग में लेने से इसकी सुन्दरता को भी ठेस लगी। पृष्ठों की संख्या कम किये जाने से आलेख भी कम प्रकाशित किये गये हैं, इससे पाठकों की तृष्णा की पूर्ति नहीं हो पाती है। बड़ी कृपा होगी अगर आप पत्रिका को त्रैमासिक रख उसका कागज तथा पृष्ठ संख्या पूर्ववत करके उसका स्तर यथावत कायम रख सकें। . माणिचन्द जैन पाटनी 2 जनवरी 2002 राष्ट्रीय महामंत्री- दि. जैन महासमिति, इन्दौर अर्हत् वचन का जुलाई - दिसम्बर 2001 अंक प्राप्त हुआ। आभारी हूँ। अंक की सामग्री पठनीय एवं संग्रहणीय है। परिश्रम और प्रस्तुति के लिये साधुवाद। 4 जनवरी 2002 . डा. भगवतीलाल राजपुरोहित, उज्जैन अर्हत् वचन वर्ष - 13, अंक - 3-4 मेरे समक्ष है। 'आगमिक सन्दर्भो के शिल्पी : वैज्ञानिक इतिहासकार यतिवृषभ' शोधालेख श्री सूरजमल बोबरा के गहन अध्ययन का प्रतीक है। लेखक ने बहुत से तथ्य उद्घाटित किये हैं जिनसे जैन गणितज्ञों को उच्च स्तर पर स्थान प्राप्त होता है। 'द्वादशांग श्रुत और उसकी परम्परा' लेख भी द्वादशांग पर अच्छा प्रकाश डालने वाला है। 'अर्हत् वचन' के इस संयुक्त अंक में सम्पादकीय का अभाव कुछ खटकता सा रहा। हर अंक में सम्पादकीय का अपना वैशिष्ट्य रहता है। 10 जनवरी 2002 . ब्र. संदीप 'सरल' संस्थापक - अनेकान्त ज्ञान मन्दिर, बीना अर्हत् वचन का जुलाई - दिसम्बर 2001 अंक प्राप्त हुआ, धन्यवाद। पत्रिका देखने में आकर्षक एवं पढ़ने में उपयोगी है। पत्रिका के आवरण पृष्ठ पर कुण्डलपुर के बड़े बाबा - भगवान ऋषभदेव का चित्र पत्रिका को सार्थकता प्रदान करता है। पत्रिका के आलेख, टिप्पणियाँ एवं आख्याएँ ज्ञानवर्द्धक सरल, सहज एवं प्रवाहमयी हिन्दी के माध्यम से ऐसी उपयोगी जानकारी देने के लिये पत्रिका प्रकाशन से जुड़ा समस्त परिवार साधुवाद का पात्र है। सम्पादकीय की सतत प्रक्रिया क्यों रुक गई है? हमें इसकी प्रतीक्षा रहती है। 22.01.02 . प्रो. बी. के. जैन प्राध्यापक एवं अध्यक्ष - वाणिज्य विभाग, डॉ. हरिसिंह गौर वि.वि., सागर भारतीय संस्कृति की अनमोल धरोहर पांडुलिपियों में छिपी हुई है जिनको कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ के विद्वानों के द्वारा कठिन परिश्रम से उजागर किया जा रहा है। उचित समय आने पर इनकी मेहनत अवश्य सफल होगी तथा हमें ऐसे अनेक तथ्यों की जानकारी मिलेगी जिन पर हमारी आने वाली पीढ़ी अवश्य गर्व करेंगी। 2.3.02 . डॉ. जे. सी. पालीवाल, खरगोन अर्हत् वचन, 14(1), 2002 103 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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