Book Title: Anusandhan 2005 02 SrNo 31
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
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अनुसन्धान-३१
इहलोअ-परलोअभउ कट्ठदुट्ठगहगण विणासइ ॥ वम्माएविहि-अंगरुह जिणवर विग्घविणास । कमठमहासुरदप्पहर सुविहाणं तुह पास ! ॥२३॥ चलणि चालिउ मेरुसिहरग्गु खिल्लंतई संगमउ गयणमग्गि वटुंत निज्जिउ । नियठाणह गयउ सुरु मुंठिघायजज्जरिउ लज्जिउ ॥ एहु परक्कम अतुलबल बालत्तणि तुह वीर ! सुयसिद्धनराहिवह सुविहाणं तुह वीर ! ॥२४॥ जे सुसावय-साहु वरचित्त सुपसत्थ सुपसन्नमण निसिविरामि थिरु करिवि नियमणु । चउवीसहं तित्थंकरहं सुप्पभाई जे थुणई अणुदिणु ॥ ते संसारमहाजलहि उत्तरइ अप्पाणु । पावइ दुक्खह खउ करवि संति भद्दु कल्लाणु ॥२५॥ इति श्राविकाणां चतुर्विंशति नमस्कार ॥
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