Book Title: Anekant 1948 01
Author(s): Jugalkishor Mukhtar
Publisher: Jugalkishor Mukhtar

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Page 13
________________ किरण १ ] रत्नकरण्ड और आप्तमीमांसाका भिन्नकर्तृत्व पद्यके सन्बन्धमें जैन पण्डितोंका मत जानना प्रसूत होनेमें सन्देह पैदा करता है। जब स्वामीजी चाहा था कि क्या वे उस पद्यको प्रन्थका मौलिक अंश पूर्व पदमें प्राप्त-लक्षणके लिए, उत्सन्नदोष, सर्वज्ञ समझते हैं या प्रक्षिप्त। इस सम्बन्धमें उन्होंने जो और आगमेशी ये तीन विशेषण निर्धारित कर चुके पत्र घुमाया था उसे मैंने अभी तक कहीं प्रकाशित नहीं और स्पष्ट बतला चुके कि इनके विना आप्तता होती ही देखा और न फिर इस बातका ही पता चला कि उन्हें नहीं, तब वे अगले ही पद्यमें आप्तका दूसरा ऐसा पण्डितोंका क्या मत मिला और उसपर उन्होंने क्या लक्षण कैसे प्रस्तुत कर सकते हैं जिसमें उक्त तीनों निर्णय किया। किन्तु उनका वह पत्र प्रकृत विषयसे विशेषण न पाये जाते हों। अगले पद्यमें आप्तका जो इतना सम्बद्ध है कि उसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। लक्षण दिया है, उसमें सर्वक्ष और आगमेशी ये दो वह सर्वथा साहित्य-विषयक है और उसमें कोई वैय- विशेषण देखने में नहीं आते, और इसलिये 'स' के क्तिक गोपनीय बात भी नहीं है। अतएव यदि मैं बाद 'अपि' शब्दको अध्याहृत मानकर यदि यह कहा आज उनके उस पत्रको यहां उपस्थित करूं तो आशा भी जाता कि 'जिसके ये सुधादिक नहीं, वह भी प्राप्त है उसमें कोई अनौचित्य न होगा और मान्य मुख्तार कहा जाता है, तो उसमें पूर्व पद्यका 'नान्यथा ह्याप्तता जी मुझपर क्र द्ध न होंगे। उनका वह पत्र इस भवेत् यह वाक्य बाधक पड़ता है। यदि यह प्रबल प्रकार था नियामक वाक्य न होता तो वैसी कल्पना की जा ___ "प्रिय महानुभाव, सस्नेह जयजिनेन्द्र । आज सकती थी। और यदि स्वामी समन्तभद्रको उत्सन्नमें आपके सामने रत्नकरण्डश्रावकाचारके एक पद्यके दोष आप्तका स्वरूप वहां कहना अभीष्ट होता तो वे सम्बन्धमें अपना कुछ विचार रखना चाहता हूं। प्राप्त मात्रके लक्षण कथन-जैसी सूचना न करके आप्त मात्रक लक्षण कथन आशा है आप उसपर गम्भीरता तथा व्यापक दृष्टि से वैसे प्राप्तकी लक्षण निर्देशको स्पष्ट सूचना करते, विचार करके मुझे शीघ्र ही उत्तर देने की कृपा करेंगे। अर्थात्-'यस्याप्तः स प्रकोत्यते' के स्थानपर 'यस्या वह पद्य 'क्षुत्पिपासा' नामका छठा पद्य है जिसमें तः स प्रदोष मुक्' जैसे किसी वाक्यका प्रयोग करते। श्राप्तका पुन: लक्षण कहा गया है, और जो लक्षण परन्तु ऐसा नहीं है। टीकाकार प्रभाचन्द्र भी इसमें पूर्व लक्षणसे भिन्न ही नहीं, किन्तु कुछ विरुद्ध भी कुछ सहायक नहीं होते। वे उक्त छठे पद्यको देते हुए पड़ता है, और अनावश्यक जान पड़ता है-खासकर प्रस्तावना वाक्य तो यह देते हैं-'श्रथ के पुनस्ते ऐसी हालत में जब कि पूर्व लक्षणको देते हये यहां तक दोषा ये तत्रोत्सन्ना इत्याशङ्कयाह' । परन्तु टीका करते कह दिया है कि 'नान्यथा ह्याप्तता भवेत' और साथमें हुए लिखते हैं-"एतेऽष्टादश दोषा यस्य न सन्ति स 'नियोगेन' पदका प्रयोग करके उसे और भी दृढ़ प्राप्तः प्रकीत्यैते प्रतिपाद्यते।” इससे यह दोषोंका किया गया है। यदि उसमें मात्र दोषोंका नामोल्लेख निर्देशमात्र अथवा उत्सन्नदोष प्राप्तका लक्षण न रहकर होता और 'यस्याप्तः स प्रकोाते' न कहा जाता. तो प्राप्त मात्रका ही दूसरा लक्षण हो जाता है जिसके पूर्व पद्यके साथ उसका सम्बन्ध जुड़ सकता था, जैसा लिये उन्होंने 'अपि' शब्दका भी उद्भावन नहीं किया कि नियमसारमें प्राप्तका स्वरूप देनेके बाद दोषोंके और दूसरी बहस छेड़ दी। साथ ही वैसी स्थितिमें नामोल्लेख वाली एक गाथा है। दोषों के नाम उक्त तब समन्तभद्र आगे 'सर्वज्ञ आप्त' और 'आगमेशी पद्यमें पूरे आये भी नहीं, और इसलिये उन्हें पूरा आप्त'का भी लक्षण प्रतिपादन करते, जो नहीं करनेके लिये चौथे चरणका उपयोग किया जा सकता पाया जाता। था। परन्तु वैसा न करके "यस्याप्तः स प्रकीत्यते" इससे उक्त छठे पद्य की स्थिति बहुत सन्दिग्ध जान इससे उक्त छठे पद्यकी स्थिति बहुत सन्दिर कहना स्वामी समन्तभद्र जैसों की लेखनीसे उसके वहां पड़ती है। और वह सन्देह और भी पुष्ट होता है Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org

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