Book Title: Anekant 1940 10
Author(s): Jugalkishor Mukhtar
Publisher: Veer Seva Mandir Trust

View full book text
Previous | Next

Page 66
________________ ७३० अनेकान्त [आश्विन, वीर निर्वाण सं०२४६६ नहीं है, इन्हीं दोनों नामोंका मूलसूत्रके लिये प्रयोग भाष्यका नहीं-भाष्यका परिमाण तो उससे कई गुणा पाया जाता है, जिसके दो नमूने इस प्रकार हैं- अधिक है । ग्रन्थ के बहुअर्थ और लघु (अल्याक्षर) "इति तत्वार्थाधिगमेऽहप्रवचनसंग्रहे भाष्यानुसारिण्यां विशेषण भी उसके सूत्रग्रंथ होने को ही बतलाते हैं, अतः तत्वार्थटीकार्या(वृत्तौ)संवर(मोक्ष) स्वरूपनिरूपको नवमो इस विषयमें कोई संदेह नहीं रहता कि 'तत्त्वार्थाधिगम' (दशमो)ऽध्यायः।" और 'अर्हस्प्रवचनसंग्रह' ये दोनों मूल तत्वार्थसूत्रके ही इसके अतिरिक भाष्यकी जिस कारिकाको प्रो० नाम हैं--उसके भाष्यके नहीं । साहबने अपने कथनकी पुष्टि में प्रमाणरूपसे पेश किया ___ और इसलिये राजवार्तिक के उक्त वाक्यमें प्रयुक्त है उसमें भी 'तत्त्वार्थाधिगम' यह नाम मूल सूत्रग्रंथ हुए 'अर्हत्प्रवचने' पद परसे प्रो० साहबने जो यह (बहर्थ लघुग्रंथ ) का बतलाया है और साथ ही उसे नतीजा निकालना चाहा था कि उससे तत्वार्थभाष्यका 'अद्विचनैकदेशका संग्रह' बतलाकर प्रकारान्तरसे ही अभिप्राय है वह नहीं निकाला जा सकता, और न उसका दूसरा नाम 'अर्हत्पवचनसंग्रह' भी सूचित किया उसके आधार पर यह फलित ही किया जा सकता है है-भाष्यके लिये इन दोनों नामोंका प्रयोग नहीं किया कि 'अकलंकदेवके सामने वर्तमानमें उपलब्ध होनेवाला है, जैसा कि प्रो० साहब समझ बैठे हैं ! चुनाँचे खुद श्वेताम्बर-सम्मत तत्वार्थभाष्य मौजूद था और उन्होंने प्रो० साहबके मान्य विद्वान् सिद्धसेन गणि भी इस कारिकाकी टीकामें ऐसा ही सूचित करते हैं,वे तत्वार्था उसके द्वारा उसके अस्तित्वका स्पष्ट उल्लेख किया है धिगम' को इस सूत्रग्रन्थकी अन्वर्थ ( गौण्याख्या ) तथा उसके प्रति बहुमान भी प्रदर्शित किया है ।' खेद संज्ञा बतलाते हैं और साफ़ तौरसे यहाँ तक लिखते हैं है कि प्रो० साहबको इतना भी विचार नहीं पाया कि कि जिस लघुग्रन्थ के कथनकी प्रतिज्ञाका इसमें उल्लेख राजवार्तिकके उक्त वाक्यमें जिस सूत्र ( 'द्रव्याश्रया है वह मात्र दोसौ श्लोक-जितना है । यथाः निगुणा गुणाः' ) का उल्लेख है वह भाष्यकी कोई "तत्त्वार्थोऽधिगम्यतेऽनेनास्मिन् वेति तस्वार्थाधिगमः, पंक्ति न हो कर मूलतत्वार्थसूत्रका वाक्य है, और इयमेवास्य गौण्याख्या नामेति तत्वार्थाधिगमाख्यस्तं, इसलिये प्रकटरूपमें 'अहत्प्रवचन' का यदि कोई दूसरा बह्वर्थ सञ्च ब्रह्मर्थः बहुविपुलोऽर्थोऽस्येति बह्वर्थः सप्त अर्थ लिया जाय तो वह उमास्वातिका मूलतस्वार्थाधिपदार्थनिर्णयएताबांश्च ज्ञेयविषयः । संग्रहं समासं, लघु गमसूत्र होना चाहिये, न कि उसका भाष्य ! फिर उस ग्रंथं श्लोकशतद्वयमात्रं ।” अर्थ तक तो उनकी दृष्टि ही कहाँ पहुँचती, जिसका स्पष्टीकरण ऊपर परीक्षा नं० २ में और उसके पूर्व दोसौ श्लोक जितना प्रमाण मूलग्रंथका ही है, किया जा चुका है । बहुत संभव है कि प्रथम लेखके • 'उमास्वातिवाचकोपज्ञसूत्रभाष्ये' इस प्रकारसे लिखते समय प्रो० साहबके सामने राजवार्तिक और भाष्यका नाम साथमें उल्लेख करने वाला पद सातवें सिद्धसेनकी टीका न रहकर उनके नोट्स ही रहे हों अध्यायको छोड़ कर अन्य किसी भी अध्यायके अन्तमें तथा साथमें पं० सुखलालजीकी हिन्दी टीकाकी प्रस्तानहीं पाया जाता है। वना भी रही हो और उन्हीं परसे आपने अपने लेखका

Loading...

Page Navigation
1 ... 64 65 66 67 68 69 70 71 72 73 74 75 76 77 78 79 80 81 82 83 84 85 86 87 88 89 90 91 92 93 94 95 96