Book Title: Ajmer Samiparvi Shektra ke Katipay Upekshit Hindi Sahityakar
Author(s): Kantisagar
Publisher: Z_Hajarimalmuni_Smruti_Granth_012040.pdf
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मुनि कान्तिसागर अजमेर-समीपवर्ती क्षेत्र के कतिपय उपेक्षित हिन्दी साहित्यकार १ प्रेम-प्रेमसुख परमसुखराय
एक ही व्यक्ति के विभिन्न नाम हैं जैसा कि कृति के अन्तः परीक्षण से विदित है. परमसुखराय तो रचना के प्रारम्भ में, कृति के अंतिम भाग में प्रेमसुख और मध्य में प्रेम' नाम से कवि ने नामाभिव्यक्ति की है.
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ये सटोरा निवासी कायस्थ माथुर धगरोटिया किसुनचन्द के पुत्र थे. कायस्थ होने के नाते इन्हें अरबी और फारसी भाषा का पारम्परिक ज्ञान था, विशिष्ट साहित्यिक रुचि के कारण सूचित भाषाओं के गम्भीर ग्रंथों का भी पारायण किया करते थे. राज-कर्म में प्रवीण होने के कारण अजमेर में रहकर कम्पनी सरकार में वकालत का पेशा करते थे. कवि ने आत्मवृत्त देते हुए यह स्वीकार किया है कि बड़े अड़े अंग्रेज इनके बौद्धिक कौशल का लोहा मानते थे. तात्कालिक वरिष्ठ मुकदमों में इनकी उपयोगिता समझी जाती थी. अजमेर में रीयांवाले सेठ के किसी गुमाश्ते ने प्रपंच रचकर सेठ पर २ लाख रुपयों का दावा दायर किया जिसमें ग्रंथकार ने वकालत कर यशोपार्जन किया था.
हातमचरित्र की आदिम कुछ पक्तियों में कवि ने अंग्रेज सरकार की— कंपनी - राज की बहुत प्रशंसा की है और अजमेर में उन दिनों लौकिक त्यौहारों पर निकलनेवाली शोभायात्राओं को भी खूब सराहा है. अजमेर की मस्जिदें, मंदिर समीपस्य पुष्करराज तीर्थ सरोवर और कृपादि का भव्य वर्णन प्रस्तुत कर तात्कालिक अजमेर की सामाजिक,
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धार्मिक एवम् राजनैतिक परिस्थितियों का चित्रण किया है.
सूचित " हातमचरित्र" और भागवत - "दशमस्कंध " अनुवाद परमसुखराय की दो अज्ञात रचनाएं हैं जिनका परिचय सर्व प्रथम इस प्रबंध में कराया जा रहा है. कवि ने हातमचरित्र में सूचित किया है कि उनके किसी मित्र ने आग्रह
१. बूटी विटपादिधनें फल-फूल लगे सबके मन भाए ।
वर्षेति भेव सुगर्ज प्रसंन चराचर जोवन के हित आए । पान अनेक सुवस्तु भरें धरनी दधि रत्न सुमुक्ति सुहाए !
प्रेम कहें सत्पुरुषनि को धन इसो हुवे सब ही सुप पाए ||
२. इस नगर को अवस्थिति का ठीक-ठीक पता नहीं चला है, पर १७-१८ वीं शती के हस्तलिखित ग्रन्थों की पुष्पिकाओं में 'स टोरा' का नाम अवश्य आता है. स्थानकवासी सम्प्रदाय के मुनियों की अधिकतर रचनाओं का सम्बन्ध इस नगर से रहा है. सम्भावना तो यही की जा सकती है उदयपुर और कोटा मंडल में ही इसका अस्तित्व हो.
३. अच्छा होता यदि कवि ने सेठ का नाम भी अंकित किया होता, यांवाले सेठ का सम्बन्ध स्थानकवासी परम्परा से रहा है. मुन्शी देवीप्रसादजी ने अपने 'संवत् १६६८ के दौरे में रीयांवाले सेठों का उल्लेख इस प्रकार किया है. 'पीपाड से एक कोस पर खालसे का एक वड़ा गाँव रीयां नामक है. इसको सेठों को रीयां भी बोलते हैं क्योंकि यहाँ के सेठ पहले बहुत धनवान् थे. कहते हैं कि एक बार महाराजा मानसिंह जी से किसी अंग्रेज ने पूछा था कि मारवाड़ में कितने घर हैं तो महाराज ने कहा था कि ढाई घर हैं. एक घर तो यां के सेठों का है, दूसरा सबलाडे के दीवाना का है और आधे घर में सारा मारवाड़.
ये सेठ मोहोत जाति के ओसवाल थे. इनमें पहले रेखाजी बड़ा सेठ था, उसके पीछे जीवनदास हुआ, उसके पास लाखों ही रुपये सैंकड़ों हजारों सिक्के थे. महाराजा विजयसिंहजी ने उसको नगरसेठ का खिताब और एक महीने तक किसी आदमी को कैद कर रखने का अधिकार भी दिया था. जीवनदास के बेटे हरजीमल हुए, हरजोमल के रामदास, रामदास के हमीरमल और हमीरमल्ल के बेटे सेठ चाँदमल अजमेर में हैं.
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जीवनदास के दूसरे बेटे गोरवनदास के सोभागमल, सोभागमल के बेटे धनरूपमल कुचामण में थे. जिनकी गोद में अब सेठ चांदमल का बेटा है.
सेठ जीवनदास की छत्री गांव के बाहर पूरब को तरफ पोपाड के रास्ते पर बहुत अच्छी बनी है। यह १६ खम्भों की है. शिखर के नीचे चारों तरफ़ एक लेख खुदा है जिस का सारांश यह है
सेठ जीवनदास मोहोत के ऊपर छत्री सुत गोरधनदास हरजीमल कराई नींव संवत १८४१ फागुन सुदि १ को दिलाई. कलस माह सुदि १५ सं० १८४४ गुरुवार को चढाया. नागरी प्रचारिणी पत्रिका सं० २६७७, पृष्ठ १६७-८
इनके वहाँ पर एक प्रतापजी नामक कवि के रहने का उल्लेख भी किया गया है.
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