Book Title: Agam 45 Anuogdaraim Beiya Chuliya Mulam PDF File
Author(s): Dipratnasagar, Deepratnasagar
Publisher: Deepratnasagar
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से किं तं अपसत्था ? अपसत्था तिविहा पन्नत्ता तं जहा- नाणज्झवणा दंसणज्झवणा चरित्तज्झवणा । से तं अपसत्था, से तं नोआगमओ भावज्झवणा । से तं भावज्झवणा । से तं झवणा । सेतं ओहनिप्फन्ने ।
से किं तं नामनिप्फन्ने ? नामनिप्फन्ने- सामाइए से समासओ चउव्विहे पन्नत्ते तं जहानामसामाइए ठवणसामाइए दव्वसामाइए भावसामाइए । नाम - ट्ठवणाओ गयाओ, दव्वसामाइए वि तहेव, जाव से तं भवियसरीरदव्वसामाइए ।
से किं तं जाणगसरीर-भविय सरीरवतिरित्ते दव्वसामाइए ? जाणगसरीर - भविय सरीरवतिरित्ते दव्वसामाइए पत्तय-पोत्थय लिहियं, से तं जाणगसरीर-भविय सरीर-वतिरित्ते दव्वसामाइए । से तं नोआगमओ दव्वासामाइए । से तं दव्वसामाइए ।
से किं तं भावसामाइए ? भावसामाइए दुविहे पन्नत्ते तं जहा- आगमओ य नोआगमओ य । से किं तं आगमओ भावसामाइए ? आगमओ भावसामाइए जाणए उवउत्ते, से तंग भावसामाइए ।
सुत्तं-३३६
से किं तं नोआगमओ भावसामाइए ? नोआगमओ भावसामाइए :- । [ ३३०] जस्स सामाणिओ अप्पा संजमे नियमे तवे ।
तस्स सामाइयं होइ इइ केवलभासियं ।।
[३३१] जो समोसव्वभूएस तसेसु थावरेसु य । तस्स सामाइयं होइ इइ केवलिभासियं ॥
[३३२] जह मम न पियं दुक्खं जाणिय एमेव सव्वजीवाणं । न हणइ न हणावेइ य सममणती तेण सो समणो ।।
[३३३] नत्थि य से कोइ वेसो पिओ व सव्वेसु चेव जीवेसु । एएण होइ समणो एसो अन्नो वि पज्जाओ ||
[३३४] उरग-गिरि-जलण- सागर - नहतल-तरुगणसमो य जो होइ । भमर-मिय-धरणि-जलरुह-रवि-पवणसमो य सो समणो ॥
[३३५] तो समणो जइ सुमणो भावेण य जइ न होइ पावमणो । सयणे य जणे य समो समो य माणावमाणेसु ।।
[ ३३६ ] से तं नोआगमओ भावसामाइए । से तं भावसामाइए । से तं सामाइए । से तं फिन् ।
से किं तं सुत्तालावगनिप्फन्ने ? सुत्तालावगनिप्फन्ने इयाणिं सुत्तालावगनिप्फन्ने निक्खेवे इच्छावेइ, से य पत्तलक्खणे वि न निक्खिप्पड़, कम्हा ? लाघवत्थं, अओ अत्थि तइ अनुदारे अनुगमे त्ति, तत्थ निक्खित्ते इहं निक्खित्ते भवइ, इहं वा निक्खित्ते तत्थ निक्खित्ते भव, तम्हा हं
निक्खिप्पड़ तहिं चेव निक्खिप्पिस्सइ, से तं निक्खेवे ।
[ दीपरत्नसागर संशोधितः ]
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[४५-अनुओगदाराइं]
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