Book Title: Agam 05 Bhagwati Sutra Part 02 Hindi Anuwad
Author(s): Dipratnasagar, Deepratnasagar
Publisher: Dipratnasagar, Deepratnasagar
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आगम सूत्र ५, अंगसूत्र- ५, 'भगवती / व्याख्याप्रज्ञप्ति-2'
शतक / वर्ग / उद्देशक / सूत्रांक स्वाभाविक रूप से उपकारक होते हैं, उन सभी जीवों को पाँच क्रियाएं लगती हैं । कन्द के अनुसार यावत् बीज के विषय में भी कहना ।
सूत्र - ६९७
भगवन्! शरीर कितने कहे गए हैं? गौतम पाँच, यथा- औदारिक यावत् कार्मण शरीर भगवन् ! ! इन्द्रियाँ कितनी कही गई हैं ? गौतम! पाँच, यथा- श्रोत्रेन्द्रिय यावत् स्पर्शेन्द्रिय । भगवन् ! योग कितने प्रकार का कहा गया है ? गौतम ! तीन प्रकार का यथा- मनोयोग, वचनयोग और काययोग |
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भगवन्! औदारिकशरीर को निष्पन्न करता हुआ जीव कितनी क्रिया वाला होता है? गौतम कदाचित् तीन क्रिया वाला, कदाचित् चार और कदाचित् पाँच क्रिया वाला। इसी प्रकार पृथ्वीकायिक जीव से लेकर मनुष्य तक समझना चाहिए ।
भगवन् ! औदारिक शरीर को निष्पन्न करते हुए अनेक जीव कितनी क्रियाओं वाले होते हैं ? गौतम ! वे कदाचित् तीन कदाचित् चार और पाँच क्रियाओं वाले भी होते हैं। इसी प्रकार अनेक पृथ्वीकायिकों से लेकर अनेक मनुष्यों तक पूर्ववत् कथन करना चाहिए। इसी प्रकार वैक्रियशरीर के विषय में भी एकवचन और बहुवचन की अपेक्षा से दो दण्डक कहने चाहिए। किन्तु उन्हीं के विषय में कहना चाहिए, जिन जीवों के वैक्रियशरीर होता है। इसी प्रकार यावत् कार्मणशरीर तक कहना चाहिए।
इसी प्रकार श्रोत्रेन्द्रिय से यावत् स्पर्शेन्द्रिय तक कहना चाहिए । इसी प्रकार मनोयोग, वचनयोग और काययोग के विषय में जिसके जो हो, उसके लिए उस विषय में कहना । ये सभी मिलकर एकवचन बहुवचन सम्बन्धी छब्बीस दण्डक होते हैं।
सूत्र - ६९८
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भगवन् ! भाव कितने प्रकार के कहे गए हैं? गौतम छह प्रकार के यथा औदयिक यावत् सान्निपातिक । भगवन् । औदयिक भाव कितने प्रकार का है? गौतम दो प्रकार का यथा उदय और उदयनिष्पन्न। इस प्रकार अनुयोगद्वार- सूत्रानुसार छह नामों की समग्र वक्तव्यता कहना । हे भगवन् ! यह इसी प्रकार है ।
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शतक-१७ - उद्देशक - २
सूत्र - ६९९
भगवन् ! क्या संयत, प्राणातिपातादि से विरत, जिसने पापकर्म का प्रतिघात और प्रत्याख्यान किया है, ऐसा जीव धर्म में स्थित है? तथा असंयत, अविरत और पापकर्म का प्रतिघात एवं प्रत्याख्यान नहीं करनेवाला जीव अधर्ममें स्थित है ? एवं संयतासंयत जीव धर्माधर्ममें स्थित होता है ? हाँ, गौतम ! संयत-विरत यावत् धर्माधर्म में स्थित होता है । भगवन् ! क्या इस धर्म में, अधर्म में अथवा धर्माधर्म में कोई जीव बैठने या लेटने में समर्थ है ? गौतम ! यह अर्थ समर्थ नहीं है । भगवन्। किस कारण से ऐसा कहते हैं ? गौतम संयत, विरत और पापकर्म का प्रतिघात और प्रत्याख्यान करने वाला जीव धर्म में स्थित होता है और धर्म को ही स्वीकार करके विचरता है । असंयत, यावत् पापकर्म का प्रतिघात और प्रत्याख्यान नहीं करने वाला जीव अधर्म में ही स्थित होता है और अधर्म को ही स्वीकार करके विचरता है, किन्तु संयतासंयत जीव, धर्माधर्म में स्थित होता है और धर्माधर्म को स्वीकार करके विचरता है । इसलिए हे गौतम! ऐसा कहा गया है ।
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भगवन्! क्या जीव धर्म में स्थित होते हैं, अधर्म में स्थित होते हैं अथवा धर्माधर्म में स्थित होते हैं ? गौतम! जीव, धर्म में भी स्थित होते हैं, अधर्म में भी स्थित होते हैं और धर्माधर्म में भी स्थित होते हैं । भगवन् ! नैरयिक जीव, क्या धर्म में स्थित होते हैं? इत्यादि प्रश्न नैरयिक न तो धर्म में स्थित हैं और न धर्माधर्म में स्थित होते हैं, किन्तु वे अधर्म में स्थित हैं। इसी प्रकार चतुरिन्द्रिय जीवों तक जानना चाहिए।
भगवन् ! पंचेन्द्रिय तिर्यग्योनिक जीव क्या धर्म में स्थित हैं ?... इत्यादि प्रश्न । गौतम ! पंचेन्द्रिय तिर्यग्योनिक जीव धर्म में स्थित नहीं हैं, वे अधर्म में स्थित हैं, और धर्माधर्म में भी स्थित हैं। मनुष्यों के विषय में जीवों के समान
मुनि दीपरत्नसागर कृत् " ( भगवती २ ) आगमसूत्र - हिन्द- अनुवाद”
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