Book Title: Agam 05 Bhagwati Sutra Part 02 Hindi Anuwad
Author(s): Dipratnasagar, Deepratnasagar
Publisher: Dipratnasagar, Deepratnasagar

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Page 205
________________ आगम सूत्र ५, अंगसूत्र-५, 'भगवती/व्याख्याप्रज्ञप्ति-2' शतक/वर्ग/उद्देशक/ सूत्रांक भगवन् ! यथाख्यातसंयत कालधर्म प्राप्त कर किस गति में जाता है ? गौतम ! अजघन्यानुत्कृष्ट अनुत्तरविमान में उत्पन्न होता है और कोई सिद्ध होकर है, यावत् सर्व दुःखों का अन्त करता है। भगवन् ! देवलोकों में उत्पन्न होता हुआ सामायिकसंयत क्या इन्द्ररूप से उत्पन्न होता है ? इत्यादि प्रश्न । गौतम ! अविराधना की अपेक्षा कषायकुशील के समान जानना । इसी प्रकार छेदोपस्थापनीयसंयत को जानना । परिहारविशुद्धिकसंयत का कथन पुलाक के समान जानना चाहिए । शेष (सूक्ष्मसम्पराय और यथाख्यात संयत) को निर्ग्रन्थ समान जानना। भगवन् ! देवलोक में उत्पन्न हए सामायिकसंयत की कितने काल की स्थिति कही गई है ? गौतम ! जघन्य दो पल्योपम और उत्कृष्ट तैंतीस सागरोपम है । इसी प्रकार छेदोपस्थापनीयसंयत की स्थिति भी समझना । भगवन्! देवलोक में उत्पन्न होते हुए परिहारविशुद्धिकसंयत की स्थिति ? गौतम ! जघन्य दो पल्योपम और उत्कृष्ट अठारह सागरोपम की है। शेष दो संयतों की स्थिति निर्ग्रन्थ के समान जानना। सूत्र-९४६ भगवन् ! सामायिकसंयत के कितने संयमस्थान कहे हैं ? गौतम ! असंख्येय संयमस्थान हैं । इसी प्रकार यावत् परिहारविशुद्धिकसंयत के संयमस्थान होते हैं । भगवन् ! सूक्ष्मसम्परायसंयम के कितने संयमस्थान कहे हैं ? गौतम ! असंख्येय अन्तर्मुहर्त्त के समय बराबर । भगवन् ! यथाख्यातसंयत के ? गौतम ! अजघन्य-अनुत्कृष्ट एक ही संयमस्थान है। भगवन् ! सामायिक, छेदोपस्थापनीय, परिहारविशुद्धिक, सूक्ष्मसम्पराय और यथाख्यात संयत, इनके संयमस्थानों में अल्पबहुत्व क्या है ? विशेषाधिक है ? गौतम ! इनमें से यथाख्यातसंयत का एक अजघन्यानुत्कृष्ट संयमस्थान है और वही सबसे अल्प है, उससे सूक्ष्मसम्परायसंयत के अन्तर्मुहर्त सम्बन्धी संयमस्थान असंख्यात-गुणे उनसे परिहारविशुद्धिसंयत के संयमस्थान असंख्येयगुणे | उनसे सामायिकसंयत और छेदोपस्थापनीय संयत संयमस्थान तुल्य हैं और असंख्येयगुणे हैं। सूत्र- ९४७ भगवन् ! सामायिकसंयत के चारित्रपर्यव कितने कहे हैं ? गौतम ! अनन्त हैं । इसी प्रकार यथाख्यातसंयत तक के चारित्रपर्यव के विषय में जानना चाहिए। भगवन् ! एक सामायिकसंयत, दूसरे सामायिकसंयत के स्वस्थानसन्निकर्ष की अपेक्षा क्या हीन होता है, तुल्य होता है अथवा अधिक होता है ? गौतम ! वह कदाचित् हीन, कदाचित् तुल्य और कदाचित् अधिक होता है । वह हीनाधिकता में षट्स्थानपतित होता है। भगवन् ! सामायिकसंयत, छेदोपस्थापनीयसंयत के परस्थानसन्निकर्ष की अपेक्षा क्या हीन, तुल्य या अधिक होता है ? गौतम ! पूर्ववत् । इसी प्रकार परिहारविशुद्धिक संयत के विषय में जानना चाहिए। भगवन् ! सामायिकसंयत, सूक्ष्मसम्परायसंयत के परस्थानसन्निकर्ष की अपेक्षा क्या हीन, तुल्य या अधिक होता है ? गौतम ! वह अनन्तगुणहीन होता है। इसी प्रकार यथाख्यातसंयत के विषय में जानना । इसी प्रकार छेदोपस्थापनीयसंयत भी नीचे के तीनों संयतों के साथ षट्स्थानपतित और ऊपर के दो संयतों के साथ उसी प्रकार अनन्तगुणहीन होता है। परिहारविशुद्धिकसंयत को छेदोपस्थापनीयसंयत समान जानना। भगवन् ! सूक्ष्मसम्परायसंयत, सामायिकसंयत के परस्थानसन्निकर्ष की अपेक्षा हीन, तल्य या अधिक होता है ? गौतम ! वह अनन्तगुण अधिक होता है । इसी प्रकार छेदोपस्थापनीय और परिहारविशुद्धिकसंयत के साथ भी जानना । स्वस्थानसन्निकर्ष की अपेक्षा से कदाचित् हीन और कदाचित् अधिक होते हैं, यदि हीन होते हैं तो अनन्त गुण हीन और अधिक होते हैं तो अनन्तगुण अधिक होते हैं। भगवन् ! सूक्ष्मसम्परायसंयत, सामायिकसंयत के परस्थानसन्निकर्ष की अपेक्षा क्या हीन, तुल्य अथवा अधिक होता है ? गौतम ! अनन्तगुण हीन होता है । यथाख्यात संयत नीचे के चार संयतों की अपेक्षा अनन्तगुण अधिक होता है । स्वस्थानसन्निकर्ष की अपेक्षा वह तुल्य होता है। भगवन् ! सामायिकसंयत, छेदोपस्थापनीयसंयत, परिहारविशुद्धिकसंयत, सूक्ष्मसम्परायसंयत और यथा मुनि दीपरत्नसागर कृत् "(भगवती-२) आगमसूत्र-हिन्द-अनुवाद" Page 205

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