Book Title: Adorshopadhyay arthat Sohanvijayji Maharaj ka Jivan Vruttant
Author(s): Hansraj Pt
Publisher: Atmanand Jain Sabha

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Page 223
________________ ( १८०) अधिक चलते हुए ये दोनों महात्मा गुरु-शिष्य गुजरांवाला की तरफ पधारे । पंजाबकी असह्य गरमी, और पंजाबका वह लंबा २ विहार ! हमारे चरित्रनायक के पांव सूज गये, फट गये, पांवोमें से लोहूकी बूंदे तक भी टपकने लगी और रही सही कसर आंखोने पूरी करदी-आंखे दुखने लगीं । फिर भी हमारे चरित्रनायक गुरुभक्ति करने में बराबर डटे रहे, किंचित् मात्र भी गुरुमहाराज को तकलीफ न आनेदी ! अहा ! कैसी आदर्श गुरुभक्ति ? सुज्ञ पाठक ! काम पड़ने पर हमारे चरित्रनायक श्री गुरु महाराजकी भक्तिके साथ २ अन्य छोटे बड़े सब महात्माओंकी सेवाभक्ति करने में भी तत्पर रहेते थे। अंत तक जैनधर्म प्रचारकी भावना । हमारे चरित्रनायक की अंततक अपरिचित अनार्यदेशों में भी पवित्र जैन धर्मके प्रचारकी और वहांके लोगोमें धर्मभावना जागृत करनेकी सुंदर भावना थी। जब गुजरांवाला ( पंजाब )में श्री आत्मानंद जैन महा सभा पंजाबका अधिवेशन हुआ था, तब इसमें संमिलित होनेके लिए पंजाब भरके लगभग सब मुख्य सद्गृहस्थ पधारे थे । ___* यह वृत्तांत बाबू लक्ष्मीपतिजी जैन बी. ए. मुलतान निवासीने मुझसे बम्बई शहरमें कहा था। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com

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